खाद्य प्रसंस्करण में तकनीक की भूमिका लगातार बढ़ रही है। मैसूर स्थित सीएसआईआर-केंद्रीय खाद्य तकनीकी अनुसंधान संस्थान (सीएफटीआरआई) के निदेशक डॉ. गिरिधर पर्वतम ने कहा है कि एआई और मशीन लर्निंग खाद्य गुणवत्ता, सुरक्षा और पारदर्शिता बेहतर करने में अहम योगदान देंगे। हैदराबाद में हाल में एक सम्मेलन में आए डॉ. पर्वतम ने ईनाडु से बातचीत में यह विचार रखा।

उन्होंने बताया कि संस्थान ने पिछले 76 वर्षों में खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र को 500 से अधिक तकनीकें, 5,500 से अधिक लाइसेंस और करीब एक हजार परामर्श परियोजनाएं दी हैं। बाजार में कई उत्पाद इन्हीं तकनीकों से बने हैं। इनमें आशीर्वाद आटा, पिल्सबरी आटा, अमूल मिल्क पाउडर और आईटीसी योगा बार शामिल हैं।

संस्थान की उपलब्धियों में मैकडॉनल्ड्स के लिए तैयार मल्टी-मिलेट बन भी शामिल है। डॉ. पर्वतम के मुताबिक, कम मात्रा में खाने पर भी जरूरी पोषक तत्व मिल सकें, ऐसे स्नैक्स और न्यूट्रिडेंस बार्स पर ध्यान दिया जा रहा है। इससे पोषण-केंद्रित खाद्य उत्पादों को बढ़ावा मिलेगा।

विज्ञापन
विज्ञापन

पोषण नुकसान और ग्रेडिंग में एआई

फसल कटाई से पैकेजिंग तक पोषक तत्वों का कितना नुकसान होता है, इसे पहचानने के लिए डिजिटल ट्रेसबिलिटी की जा रही है। इस काम में एआई आधारित सेंसर का इस्तेमाल हो रहा है। इसी तरह सब्जियों की ग्रेडिंग एआई आधारित मशीनों और सेंसर से अधिक सटीक तरीके से की जा सकती है।

खबरों के लिए ज्वाइन करें हमारा Whatsapp Channel

डॉ. पर्वतम के अनुसार, एआई आधारित नवाचार खाद्य गुणवत्ता बनाए रखने और कृषि वेस्ट घटाने में मदद करेंगे। इससे प्रसंस्करण की पूरी श्रृंखला में सुधार की संभावना बनती है।

मिलेट्स की स्टोरेज और मोबाइल यूनिट

ज्वार, रागी और बाजरा जैसे मोटे अनाज सामान्य तौर पर दो महीने के भीतर कीटग्रस्त होने लगते हैं। इस समस्या के लिए संस्थान ने बिना रसायन और कम तापमान पर आधारित मिनिमल प्रोसेसिंग तकनीक विकसित की है। इससे मिलेट्स की भंडारण अवधि एक साल तक बढ़ाई जा सकती है। छोटे कारोबारियों के लिए इसे जरूरत के अनुसार उपलब्ध कराया जा सकता है।

पूर्वोत्तर राज्यों के किसानों के लिए मोबाइल प्रोसेसिंग यूनिट बनाई गई है। यह यूनिट लेकर बस सीधे खेतों तक जाती है। वहीं सब्जियों और फलों की सफाई, स्टरलाइजेशन और सुखाने जैसे काम किए जा सकते हैं। अगर तेलुगु राज्यों की सरकारें आगे आएं, तो वहां के किसानों को भी यह तकनीक दी जा सकती है।

गोदाम और पीडीएस में बर्बादी पर समाधान

गोदामों और सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी पीडीएस में चावल की काफी बर्बादी होती है। इसे एक्वाकल्चर उत्पादों के साथ मिलाकर चिप्स जैसे एक्सट्रूडेड स्नैक्स में बदला जा सकता है। एक्वाकल्चर में भी वेस्ट निकलता है, इसलिए दोनों को मिलाने से मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार हो सकता है।

डॉ. पर्वतम के मुताबिक, आंध्र प्रदेश सरकार इस पहल को प्रोत्साहित कर रही है। चीन और जापान जैसे देशों में सीवीड और फिश पाउडर मिलाकर स्नैक्स, चिप्स और पापड़ कई सालों से बनाए जा रहे हैं। ऐसे प्रोटीन-समृद्ध उत्पाद तैयार कर दूसरे देशों को निर्यात करने की संभावना भी है।

स्रोत: Eenadu

विज्ञापन
विज्ञापन
पढ़िए फटाफट खबरेंस्वाइप करके पढ़ें