राजकोट (गुजरात): आधुनिकता की अंधी दौड़ और भागदौड़ भरी जिंदगी में हमारे समाज का पारिवारिक ताना-बाना तेजी से बिखर रहा है। आज के इस दौर में सबसे ज्यादा उपेक्षा का शिकार हमारे बुजुर्ग हो रहे हैं। जिन माता-पिता ने अपनी पूरी उम्र, अपनी सारी जमा-पूंजी और अपनी जवानी बच्चों का भविष्य संवारने में लगा दी, जीवन के अंतिम और सबसे नाजुक पड़ाव पर उन्हें ही दर-दर की ठोकरें खाने के लिए बेसहारा छोड़ दिया जाता है।READ ALSO:-मेरठ में रोंगटे खड़े कर देने वाला हादसा: साइकिल सवार को बचाने में 'बकरे' समेत गहरे कुएं में जा गिरा बाइक सवार, 3 घंटे हवा में अटकी रही सांसें
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"जब परिवार साथ छोड़ देता है, तब इंसान को सबसे ज़्यादा ज़रूरत सम्मान और अपनेपन की होती है।" इसी महान और संवेदनशील भावना को अपने काम का मूलमंत्र बनाते हुए गुजरात के राजकोट स्थित 'विनुभाई बचुभाई नागरेचा परिसर' (सदभावना वृद्धाश्रम) ने एक ऐसा बीड़ा उठाया है, जो पूरी दुनिया के लिए एक नजीर बनने जा रहा है। संस्था का स्पष्ट मानना है कि उनका उद्देश्य बेसहारा बुजुर्गों को सिर्फ एक छत या चार दीवारी (आश्रय) देना नहीं है, बल्कि उन्हें वह खोया हुआ पारिवारिक स्नेह, सम्मान और चिकित्सा सुविधा प्रदान करना है, जिसके वे असल हकदार हैं।
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पिछले एक दशक का संघर्ष और निस्वार्थ सेवा का सफर

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सदभावना वृद्धाश्रम की यह यात्रा रातों-रात शुरू नहीं हुई है। पिछले 10 वर्षों से यह संस्था बिना किसी स्वार्थ और बिना किसी शोर-शराबे के मानवता की सच्ची सेवा कर रही है। आज के समय में जहां अस्पतालों में इलाज का खर्च आम आदमी की कमर तोड़ देता है, वहीं यह आश्रम निःसंतान, दिव्यांग, गंभीर रूप से बीमार, कैंसर से जूझ रहे और कोमा (Coma) में जा चुके बुज़ुर्गों की पूरी तरह से नि:शुल्क (Free of Cost) सेवा कर रहा है।
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वर्तमान समय की बात करें तो इस वृद्धाश्रम में 700 से अधिक बुज़ुर्ग निवास कर रहे हैं। इनमें से सबसे बड़ी और हृदय विदारक बात यह है कि एक बहुत बड़ी संख्या उन मरीजों की है जो पूरी तरह से बिस्तर पर पड़े हैं (Bedridden हैं)। जो खुद से उठ-बैठ नहीं सकते, खाना नहीं खा सकते और अपनी नित्य क्रियाएं भी खुद नहीं कर सकते। ऐसे लाचार बुजुर्गों की साफ-सफाई से लेकर उन्हें अपने हाथों से खाना खिलाने तक का काम आश्रम के सेवादार पूरी श्रद्धा और अपनत्व के साथ करते हैं।
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500 करोड़ का महा-प्रोजेक्ट: 5000 बुजुर्गों के लिए दुनिया का सबसे बड़ा आश्रय

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बुजुर्गों की बढ़ती संख्या और समाज में अपनों द्वारा सताए गए माता-पिता की दर्दनाक स्थिति को देखते हुए, संस्था ने अब अपने इस सेवा कार्य को एक विशाल और ऐतिहासिक रूप देने का फैसला किया है। संस्था के प्रतिनिधियों ने एक बेहद अहम जानकारी साझा करते हुए बताया है कि राजकोट में एक नए और अत्याधुनिक परिसर का निर्माण कार्य जोरों पर चल रहा है।
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500 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से बन रहा यह नया 'विनुभाई बचुभाई नागरेचा परिसर' पूरी तरह से तैयार होने के बाद दुनिया के सबसे बड़े नि:शुल्क वृद्धाश्रमों में शुमार हो जाएगा। इस विशालकाय प्रोजेक्ट के तहत यहां एक साथ 5000 जरूरतमंद और बेसहारा बुज़ुर्गों के रहने की विश्वस्तरीय व्यवस्था की जा रही है। संस्था का एकमात्र लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि देश का कोई भी बुज़ुर्ग, चाहे वह किसी भी राज्य या धर्म का हो, जीवन के आखिरी दिनों में खुद को अकेला, लाचार या उपेक्षित महसूस न करे।
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सिर्फ छत नहीं, बल्कि एक संपूर्ण अस्पताल और सुखद घर है यह परिसर

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जब कोई व्यक्ति जीवन के अंतिम पड़ाव पर होता है, तो उसे सिर्फ दो वक्त की रोटी की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि उसे लगातार चिकित्सीय देखभाल और मानसिक शांति की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। इस बात को गहराई से समझते हुए, 5000 लोगों की क्षमता वाले इस नए वृद्धाश्रम को किसी फाइव-स्टार अस्पताल और एक शांत आध्यात्मिक केंद्र की तर्ज पर डिजाइन किया गया है।
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यहां बुजुर्गों के लिए निम्नलिखित विश्वस्तरीय सुविधाएं 24 घंटे और पूरी तरह से मुफ्त उपलब्ध कराई जा रही हैं:
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    24 घंटे अत्याधुनिक मेडिकल सुविधा: आश्रम के अंदर ही एक मिनी अस्पताल जैसी व्यवस्था है, जहां डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ चौबीसों घंटे मौजूद रहते हैं। इमरजेंसी के लिए एंबुलेंस और आईसीयू (ICU) जैसी जीवन रक्षक प्रणालियों की भी व्यवस्था है।
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    फिजियोथेरेपी सेंटर (Physiotherapy): उम्र के साथ जोड़ों का दर्द, पैरालिसिस (लकवा) और अन्य शारीरिक परेशानियां आम हो जाती हैं। इसके लिए एक आधुनिक फिजियोथेरेपी सेंटर बनाया गया है, जहां विशेषज्ञ बुजुर्गों की कसरत और मालिश करवाकर उन्हें राहत पहुंचाते हैं।
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    सत्संग हॉल और भव्य मंदिर: मानसिक और आध्यात्मिक शांति के लिए एक विशाल सत्संग हॉल का निर्माण किया गया है। यहां रोजाना भजन-कीर्तन और प्रवचन होते हैं। साथ ही परिसर में एक सुंदर मंदिर भी है, जहां बुजुर्ग अपनी आस्था के अनुसार पूजा-पाठ कर सकते हैं।
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    सांस्कृतिक कार्यक्रम और मनोरंजन: बुजुर्गों का अकेलापन दूर करने और उनके चेहरों पर मुस्कान लाने के लिए समय-समय पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों, लोक गीतों और नाटकों का आयोजन किया जाता है।
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    आधुनिक रहने की व्यवस्था: सभी कमरे हवादार, साफ-सुथरे और बुजुर्गों की सुविधा (जैसे व्हीलचेयर फ्रेंडली रैंप, अटैच बाथरूम) के हिसाब से बनाए गए हैं।
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संवाद और भावनात्मक सहारा है असली दवा

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सदभावना वृद्धाश्रम का दर्शन बहुत ही स्पष्ट और मानवीय है। संस्था का मानना है कि बुज़ुर्गों को सिर्फ़ कड़वी दवाइयों या इंजेक्शन से ठीक नहीं किया जा सकता। उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत होती है— सम्मान, मीठे संवाद और एक मजबूत भावनात्मक सहारे की। जब कोई सेवादार उनके पास बैठकर उनके पुराने दिनों की बातें सुनता है, उनके माथे पर हाथ फेरता है, तो उनकी आधी बीमारी वैसे ही दूर हो जाती है। यह आश्रम एक ऐसी जगह है जहां कोई मरीज नहीं है, बल्कि सब एक बड़े परिवार के सम्मानित सदस्य हैं।
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समाज से एक भावुक अपील: आप भी बनें इस महायज्ञ का हिस्सा

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यह 5000 बुजुर्गों का प्रोजेक्ट केवल एक संस्था के दम पर नहीं, बल्कि पूरे समाज के सहयोग और जागरूकता से ही सफल हो सकता है। संस्था ने देश भर के नागरिकों से एक बेहद मार्मिक अपील की है।
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उनका कहना है कि, "यदि आपको अपने आस-पड़ोस, किसी रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, अस्पताल के बाहर या सड़क किनारे कोई भी ऐसा बुज़ुर्ग दिखाई दे जो बेसहारा है, बीमार है, या जिसे उसके परिवार ने घर से निकाल दिया है, तो कृपया आंखें न मूंदें। उन्हें उनके हाल पर मरने के लिए न छोड़ें। तुरंत सदभावना वृद्धाश्रम से संपर्क करें और उस लाचार बुज़ुर्ग को हमारे पास तक पहुंचाने में अपना सहयोग दें। हम उन्हें न केवल आश्रय देंगे, बल्कि जीवन के अंतिम क्षणों तक उन्हें वह सम्मान देंगे जिसके वे अधिकारी हैं।"
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राजकोट का यह 'विनुभाई बचुभाई नागरेचा परिसर' आज के इस स्वार्थी समाज के मुंह पर एक तमाचा भी है और इंसानियत के लिए एक उम्मीद की किरण भी। 500 करोड़ की लागत से बन रहा दुनिया का यह सबसे बड़ा मुफ्त वृद्धाश्रम इस बात का प्रमाण है कि इंसानियत आज भी जिंदा है। जब तक ऐसी संस्थाएं और ऐसे नेक दिल लोग समाज में मौजूद हैं, तब तक बेसहारा बुजुर्गों को अपने बुढ़ापे से डरने की जरूरत नहीं है।
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