मेरठ (सिटी डेस्क/ग्राउंड रिपोर्ट): किसी भी इंसान के जीवन का सबसे बड़ा सपना अपना एक घर बनाना होता है। वह अपनी पूरी जिंदगी की गाढ़ी कमाई, पाई-पाई जोड़कर एक छत तैयार करता है। लेकिन सोचिए, यदि 50 साल तक उस घर में शांति से रहने, सरकार को हर तरह का टैक्स चुकाने और फ्री-होल्ड रजिस्ट्री कराने के बाद अचानक एक दिन प्रशासन का नोटिस आ जाए कि आपका घर अवैध है, तो उस परिवार पर क्या गुजरेगी? उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर के शास्त्रीनगर इलाके में आजकल बिल्कुल ऐसा ही खौफनाक मंजर देखने को मिल रहा है।
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मेरठ के शास्त्रीनगर स्थित सेक्टर 2, 3 और 4 में 'सेटबैक' (भवन निर्माण के दौरान आगे-पीछे छोड़ी जाने वाली खाली जगह) के नियमों को लेकर एक बहुत बड़ा भूचाल आ गया है। आवास विकास परिषद (Awas Vikas Parishad) द्वारा आधी सदी (50 वर्ष) बाद अचानक की जा रही इस दंडात्मक कार्रवाई के खिलाफ क्षेत्र की महिलाएं अपने घरों से बाहर निकल आई हैं और उन्होंने अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिया है। पीड़ित परिवारों का सीधा आरोप है कि आवास विकास परिषद अपनी आधी सदी पुरानी गलतियों, भ्रष्टाचार और विभागीय कमियों को छिपाने के लिए अब निर्दोष जनता को 'बलि का बकरा' बना रहा है।
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प्रेस वार्ता में फूटा गुस्सा: अधिवक्ता राकेश कुमार पाठक ने खोली प्रशासन की पोल

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इस अनिश्चितकालीन धरने के बीच, मामले को कानूनी और सामाजिक पटल पर मजबूती से रखने के लिए सेक्टर 4 की महिलाओं और पीड़ित परिवारों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश कुमार पाठक ने एक विस्तृत प्रेस वार्ता का आयोजन किया। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में न केवल आवास विकास परिषद की कार्यप्रणाली की धज्जियां उड़ाई गईं, बल्कि शासन-प्रशासन के उस दोहरे रवैये को भी बेनकाब किया गया, जिसके तहत एक तरफ तो सरकारें गरीबों को घर देने का दावा करती हैं और दूसरी तरफ दशकों से बसे-बसाए मध्यमवर्गीय परिवारों को उजाड़ने पर तुली हैं।
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50 साल की 'कुंभकर्णी नींद' पर सवाल: अधिवक्ता राकेश कुमार पाठक ने दस्तावेजों और तथ्यों का हवाला देते हुए कड़े शब्दों में कहा, "आवास विकास परिषद द्वारा जब इस योजना (शास्त्रीनगर) को विकसित किया गया था, तब से लेकर आज तक यानी करीब 50 वर्षों तक कभी भी यह स्पष्ट नहीं किया गया कि संबंधित आवासों में सेटबैक (Setback) छोड़ना अनिवार्य है। जब इन मकानों का निर्माण हो रहा था, तब आवास विकास के इंजीनियर और अधिकारी कहां थे? न तो निर्माण के समय किसी प्रकार की पूर्व सूचना (Prior Information) दी गई, न ही कोई रोक लगाई गई और न ही समय रहते कोई कानूनी नोटिस (Legal Notice) जारी किया गया। आज 50 साल बाद, जब दो-तीन पीढ़ियां इन घरों में गुजर चुकी हैं, तब अचानक अधिकारियों को सेटबैक के नियमों की याद कैसे आ गई?"
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उन्होंने आगे कहा कि यह पूरी कार्रवाई केवल अपनी विभागीय लापरवाही को छिपाने का एक 'सेटबैक टूल' (Setback Tool) बन गई है, जिससे गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के सामने अपने ही घर में बेघर होने का भीषण संकट खड़ा हो गया है।
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क्या है 'सेटबैक' नियम और मेरठ में क्यों बना यह गले की फांस?

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नगर नियोजन (Urban Planning) और भवन निर्माण उपनियमों के तहत, 'सेटबैक' वह अनिवार्य खाली जगह होती है जो किसी भी प्लॉट पर निर्माण करते समय आगे, पीछे या किनारों पर छोड़नी पड़ती है। इसका उद्देश्य हवा, रोशनी, और आपातकालीन स्थितियों (जैसे आग लगने पर फायर ब्रिगेड की गाड़ी का प्रवेश) के लिए जगह सुनिश्चित करना होता है।
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मेरठ के शास्त्रीनगर का विवाद: शास्त्रीनगर (विशेषकर सेक्टर 2, 3 और 4) को दशकों पहले बसाया गया था। उस समय जिन लोगों को प्लॉट या भवन आवंटित किए गए थे, उन्होंने अपनी जरूरत और तत्कालीन विभागीय अधिकारियों की मौन सहमति (या अनदेखी) से घरों का निर्माण कर लिया। उस समय की भौगोलिक स्थिति, आबादी का दबाव और नियमों की जटिलता आज जैसी नहीं थी।
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पीड़ित परिवारों का कहना है कि अगर हमने नियम तोड़ा था, तो सरकार ने उसी वक्त हमें क्यों नहीं रोका? मकान रातों-रात तो नहीं बन गए। महीनों तक ईंटें जुड़ती रहीं, लिंटर डलते रहे, तब आवास विकास के जेई (JE) और एई (AE) क्या कर रहे थे? अब जब लोग 50 साल से रह रहे हैं, तो पुरानी फाइलों की धूल झाड़कर उन पर सेटबैक का डंडा चलाया जा रहा है।
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सरकारी दोहरेपन की हद: 50 साल से टैक्स वसूला, फ्री-होल्ड किया, फिर अवैध कैसे?

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इस पूरे प्रकरण में जो सबसे बड़ा और हैरान करने वाला कानूनी और नैतिक पेंच है, वह है सरकार और नगर निगम द्वारा लगातार टैक्स की वसूली।
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धरने पर बैठी महिलाओं और पीड़ित परिवारों ने प्रशासन के सामने कुछ ऐसे ज्वलंत सवाल रखे हैं, जिनका जवाब फिलहाल किसी भी अधिकारी के पास नहीं है:
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    टैक्स की नियमित वसूली: अगर ये मकान सेटबैक नियमों का उल्लंघन करके बनाए गए थे और शुरुआत से ही अवैध थे, तो नगर निगम और जलकल विभाग पिछले 50 सालों से इन घरों से नियमित रूप से गृहकर (House Tax), जलकर (Water Tax) और सीवर टैक्स (Sewer Tax) क्यों और किस नियम के तहत वसूल रहे हैं? अवैध निर्माण से सरकारी खजाना भरना क्या अपराध नहीं है?
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  2. \r\n
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    फ्री-होल्ड (Free-hold) रजिस्ट्री का ढोंग: कई परिवारों ने सरकारी खजाने में लाखों रुपये का शुल्क जमा करके अपने इन आवासों को लीज होल्ड से 'फ्री-होल्ड' करा लिया है। बकायदा रजिस्ट्रार कार्यालय में इनकी पक्की रजिस्ट्री (Registry) हो चुकी है। पीड़ितों का तर्क है कि जब सरकार ने खुद पैसा लेकर प्रॉपर्टी को फ्री-होल्ड कर दिया है, तो अब उसे अवैध या विवादित बताकर तोड़ने या कार्रवाई करने का क्या औचित्य रह जाता है?
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    नगर निगम को हस्तांतरण (Transfer to Nagar Nigam): आवास विकास परिषद ने वर्षों पहले इस पूरी कॉलोनी और इसके रखरखाव की जिम्मेदारी मेरठ नगर निगम (Meerut Nagar Nigam) को हस्तांतरित (Transfer) कर दी थी। जब कॉलोनी हस्तांतरित हो चुकी है, तो अब इतने सालों बाद आवास विकास परिषद किस अधिकार से वापस आकर लोगों का उत्पीड़न कर रही है?
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पीड़ितों का साफ कहना है कि इन 50 वर्षों में लोगों को हमेशा यह अटूट विश्वास रहा कि उनके मकान 100% वैध हैं। लेकिन अब अचानक इस कार्रवाई ने लोगों को मानसिक अवसाद में धकेल दिया है।
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सड़कों पर उतरी 'आधी आबादी': भय, असुरक्षा और मानसिक संताप का माहौल

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शास्त्रीनगर के इस धरने की सबसे खास बात यह है कि इसका नेतृत्व महिलाएं कर रही हैं। घर की चारदीवारी को संभालने वाली ये महिलाएं आज अपने उसी घर को बचाने के लिए चिलचिलाती धूप, धूल और प्रशासन की धमकियों की परवाह किए बिना सड़क पर बैठी हैं।
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महिलाओं का दर्द और खौफ: धरने पर बैठी एक बुजुर्ग महिला ने रुंधे हुए गले से बताया, "मेरे पति ने अपनी पूरी पेंशन का पैसा लगाकर इस घर की मरम्मत कराई थी। आज वह इस दुनिया में नहीं हैं। हम महिलाएं घर में अकेले रहती हैं। रोज डर लगता है कि कब आवास विकास का बुलडोजर आ जाएगा। रात को ठीक से नींद नहीं आती। क्या सरकारें इसलिए चुनी जाती हैं कि वे बुढ़ापे में हमारी छत छीन लें?"
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एक अन्य महिला प्रदर्शनकारी ने कहा कि शासन-प्रशासन के इस तानाशाही रवैये के कारण पूरे सेक्टर में भय और असुरक्षा का माहौल पनप गया है। लोग अवसाद (Depression) में जा रहे हैं। कई परिवारों के घर में शादियां तय हैं, लेकिन घर के विवादित होने के नोटिस ने सारी खुशियों पर पानी फेर दिया है।
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"यह केवल ईंट-पत्थर का मकान नहीं है, हमारी पीढ़ियों की यादें और खून-पसीने की कमाई इसमें लगी है। सरकार की इस मनमानी से न केवल हम प्रताड़ित हो रहे हैं, बल्कि खुद सरकार की छवि (Government's Image) भी जनता की नजरों में धूमिल हो रही है," एक युवा प्रदर्शनकारी ने आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा।
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प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन

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अधिवक्ता राकेश कुमार पाठक ने कानूनी पहलुओं पर जोर देते हुए बताया कि वर्षों बाद अचानक शुरू की गई यह कार्रवाई 'प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों' (Principles of Natural Justice) का खुला और सरासर उल्लंघन है।
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कानून यह कहता है कि यदि कोई प्रशासनिक निकाय (Administrative Body) अपनी ड्यूटी करने में विफल रहता है, तो उसका खामियाजा आम जनता को नहीं भुगतना चाहिए। 50 साल की देरी (Delay and Laches) अपने आप में प्रशासन की मंशा पर सवाल उठाती है।
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    अचानक बिना किसी सुनवाई के डराना-धमकाना।
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    कानूनी रूप से मान्य हो चुके (टैक्स देने वाले) निर्माण को अचानक अवैध बताना।
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    किसी भी कठोर कार्रवाई से पहले प्रभावित लोगों का पक्ष न सुनना।
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ये सभी बातें दर्शाती हैं कि यह कार्रवाई न्यायसंगत नहीं, बल्कि शक्ति का दुरुपयोग (Abuse of Power) है, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और मध्यम आय वर्ग (LIG/MIG) के लोग गंभीर वित्तीय और मानसिक संकट में आ गए हैं।
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जनप्रतिनिधियों और समाजसेवियों से मार्मिक अपील: "हमारी आवाज बनिए"
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इस विशाल प्रेस कॉन्फ्रेंस और धरने के मंच से पीड़ित परिवारों ने मेरठ के सभी स्थानीय जनप्रतिनिधियों (सांसदों, विधायकों), पार्षदों, सामाजिक संगठनों, बार एसोसिएशन के वकीलों और समाजसेवियों से एक बेहद भावुक और मार्मिक अपील की है।
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महिलाओं ने हाथ जोड़कर गुहार लगाई कि, "यह लड़ाई सिर्फ हमारी नहीं है। आज आवास विकास परिषद हमारे साथ यह अन्याय कर रहा है, कल यह शहर की किसी भी दूसरी कॉलोनी के साथ हो सकता है। इसलिए सभी जिम्मेदार लोग, जिन्हें हमने वोट देकर अपना नेता चुना है, वे हमारी ढाल बनकर आगे आएं और शासन-प्रशासन (लखनऊ मुख्यालय) तक हमारी इस पीड़ा को पहुंचाएं।"
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उन्होंने कहा कि यदि स्थानीय विधायक और सांसद इस मुद्दे पर गंभीरता दिखाते हुए मुख्यमंत्री के संज्ञान में यह बात लाते हैं, तो निश्चित रूप से एक मानवीय समाधान निकल सकता है।
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शासन-प्रशासन से पीड़ित परिवारों की 4 प्रमुख मांगें
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धरने पर बैठे लोगों ने अपनी मांगों का एक स्पष्ट मांग-पत्र (Charter of Demands) तैयार किया है, जिसे वे जिला प्रशासन के माध्यम से सरकार तक पहुंचाना चाहते हैं। उनकी प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं:
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  1. \r\n
    मानवीय आधार पर तत्काल राहत: इस 50 साल पुराने मामले में नियमों की लकीर पीटने के बजाय 'मानवीय आधार' (Humanitarian Grounds) पर मामले की निष्पक्ष सुनवाई की जाए और सेटबैक की कार्रवाई पर तत्काल पूर्ण रोक (Stay) लगाई जाए।
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  2. \r\n
  3. \r\n
    सुनवाई का अवसर (Right to be Heard): किसी भी प्रकार की दंडात्मक या ध्वस्तीकरण (Demolition) की कार्रवाई से पहले प्रत्येक प्रभावित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने और कानूनी दस्तावेज प्रस्तुत करने का पर्याप्त अवसर दिया जाए।
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  4. \r\n
  5. \r\n
    यथास्थिति (Status Quo) बहाल हो: चूंकि कॉलोनी अब नगर निगम के अधीन है और प्रॉपर्टी फ्री-होल्ड हो चुकी है, इसलिए इन मकानों को उसी स्थिति में नियमित (Regularize) किया जाए जिस स्थिति में वे वर्तमान में हैं। जरूरत पड़ने पर एकमुश्त समाधान योजना (OTS) के तहत मामूली शमन शुल्क (Compounding Fee) का विकल्प दिया जाए, लेकिन तोड़फोड़ या बेदखली बिल्कुल न हो।
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  7. \r\n
    दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई: जिन विभागीय इंजीनियरों और अधिकारियों की नाक के नीचे 50 साल तक यह सो-कॉल्ड 'अवैध' निर्माण होता रहा, उनके खिलाफ जांच बैठाकर उनके पेंशन और भत्तों से जुर्माना वसूला जाए, न कि आम जनता को परेशान किया जाए।
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आगे की राह (The Road Ahead)

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मेरठ के शास्त्रीनगर का यह 'सेटबैक विवाद' कोई सामान्य प्रशासनिक मामला नहीं रह गया है; यह सीधे तौर पर हजारों लोगों के जीने के अधिकार (Right to Life and Livelihood under Article 21) और सिर पर छत होने के संवैधानिक हक से जुड़ गया है।
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एक तरफ सरकार 'प्रधानमंत्री आवास योजना' के तहत लोगों को घर देने का विश्व रिकॉर्ड बनाने का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ 50 साल से अपने पक्के घरों में रह रहे लोगों को 'नियमों की तकनीकी खामियों' में फंसाकर उजाड़ने की साजिश रची जा रही है।
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शास्त्रीनगर सेक्टर 2, 3 और 4 की इन साहसी महिलाओं ने यह साफ कर दिया है कि वे आवास विकास परिषद के इस मनमाने फरमान के आगे घुटने नहीं टेकेंगी। यदि जिला प्रशासन और राज्य सरकार ने जल्द ही कोई सकारात्मक, न्यायपूर्ण और मानवीय कदम नहीं उठाया, तो यह धरना-प्रदर्शन आने वाले दिनों में एक उग्र जन-आंदोलन (Mass Agitation) का रूप ले सकता है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी। देखना यह है कि क्या सत्ता के गलियारों में बैठी सरकार इन रोती-बिलखती महिलाओं की पुकार सुनती है, या फिर 'सिस्टम की जिद' के आगे 50 साल पुराने आशियाने ताश के पत्तों की तरह ढह जाएंगे?
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