मेरठ (उत्तर प्रदेश): शहरों में बेतरतीब और अवैध तरीके से खड़ी की जा रही कंक्रीट की इमारतों पर देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने अब तक का सबसे कड़ा और ऐतिहासिक रुख अपनाया है। मेरठ शहर में नियमों की धज्जियां उड़ाकर किए गए अवैध निर्माण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने सख्त आदेश जारी करते हुए 859 संपत्तियों पर बने अवैध 'सेटबैक' (Setback) को महज दो महीने के भीतर जमींदोज करने का फरमान सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि यह फैसला सिर्फ एक शहर या राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश के बिल्डरों, अतिक्रमणकारियों और लापरवाह प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक बेहद गंभीर चेतावनी है।READ ALSO:-यूपी मौसम महा-अपडेट: आंधी-बारिश पर लगा ब्रेक, अब आसमान से बरसेगी आग; 45°C तक पहुंचेगा पारा, जानें अपने शहर का हाल
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इस पूरे मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने न केवल स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा किया, बल्कि यह भी साफ कर दिया कि आम नागरिकों की जान-माल की सुरक्षा सर्वोपरि है। अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा है कि लोगों की जिंदगी को दांव पर लगाकर कोई भी व्यावसायिक गतिविधि या बिजनेस नहीं चलाया जा सकता।
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क्या है 'सेटबैक' (Setback) का नियम और क्यों है यह इतना महत्वपूर्ण?

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इस गंभीर और बड़े फैसले को गहराई से समझने के लिए यह जानना बहुत जरूरी है कि 'सेटबैक' आखिर होता क्या है। किसी भी शहर में नगर निगम या विकास प्राधिकरण के भवन निर्माण नियमों (Building Bylaws) के तहत, किसी भी रिहायशी या कमर्शियल (व्यावसायिक) इमारत का निर्माण करते समय प्लॉट की बाहरी बाउंड्री और मुख्य इमारत के बीच चारों तरफ कुछ अनिवार्य खाली जगह छोड़नी होती है। इस छोड़ी गई खाली जगह को ही 'सेटबैक' कहा जाता है।
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इस जगह को छोड़ने का मुख्य कारण आपातकालीन सुरक्षा होता है। अगर इमारत में कभी आग लग जाए, तो दमकल विभाग (Fire Brigade) की गाड़ियां इस खाली जगह का इस्तेमाल करके इमारत के पीछे तक आसानी से पहुंच सकती हैं और बचाव कार्य कर सकती हैं। इसके अलावा, भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं के दौरान इमारत से बाहर निकलने, प्राकृतिक रोशनी (Sunlight) और हवा के सही प्रवाह (Ventilation) के लिए भी यह जगह अनिवार्य होती है। लेकिन, मेरठ के मामले में लालची बिल्डरों और संपत्ति मालिकों ने अधिक मुनाफे के चक्कर में इस जीवन रक्षक खाली जगह (सेटबैक) पर ही पक्का और अवैध निर्माण कर लिया था, जिससे एक बड़ा सुरक्षा संकट पैदा हो गया था।
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सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी: "यह पूरे देश के लिए एक चेतावनी है"

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सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने इस बेहद संवेदनशील मामले की सुनवाई की। 'लाइव लॉ' (Live Law) की रिपोर्ट के अनुसार, सुनवाई के दौरान जजों का रुख बेहद सख्त था। अदालत ने पूरे मामले को एक नजीर मानते हुए कहा:
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"यह मामला सिर्फ उत्तर प्रदेश तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे देश के लिए एक खुली चेतावनी है। अगर प्रशासन ने समय रहते सही कदम उठाए होते और नियमों का सख्ती से पालन कराया होता, तो आज इतनी बड़ी और विकराल समस्या पैदा ही नहीं होती।"
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सुनवाई के दौरान जब यह बात सामने आई कि सीलिंग की कार्रवाई का व्यापारियों द्वारा भारी विरोध किया जा रहा है, तो अदालत ने साफ लहजे में कहा कि कानून का राज (Rule of Law) लोगों के शोर-शराबे या विरोध प्रदर्शन के आगे बिल्कुल नहीं झुक सकता है। अदालत ने कहा, "व्यवसाय किसी की जिंदगी की कीमत पर नहीं चल सकता है।"
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प्रशासन को जबरदस्त फटकार: अवैध इमारतों में कैसे खुले स्कूल और अस्पताल?

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शीर्ष अदालत ने उत्तर प्रदेश के अधिकारियों और आवास विकास परिषद की कार्यप्रणाली की धज्जियां उड़ा दीं। कोर्ट ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी अति-संवेदनशील सेवाएं देने वाले संस्थान भी इन अवैध इमारतों में धड़ल्ले से चल रहे थे।
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अदालत ने अधिकारियों को फटकार लगाते हुए पूछा, "आपने स्कूलों, अस्पतालों और यहां तक कि सरकारी बैंकों को भी ऐसी इमारतों से संचालित करने की इजाजत कैसे दे दी, जो पूरी तरह से अवैध हैं और जिनके पास कोई वैध अनुमति नहीं है?" इससे पहले, 6 अप्रैल को हुई सुनवाई में कोर्ट ने 859 संपत्तियों में से मेरठ के सेंट्रल मार्केट की 44 संपत्तियों को तत्काल प्रभाव से सील करने का आदेश दिया था और प्रशासन से इसकी विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी। बुधवार को यूपी आवास एवं विकास परिषद ने भारी पुलिस बल की मौजूदगी में इन सभी 44 दुकानों और संपत्तियों को सील कर दिया। हालांकि, इस दौरान प्रशासन को स्थानीय व्यापारियों और अतिक्रमणकारियों के भारी विरोध का सामना भी करना पड़ा।
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सील की गई 44 संपत्तियों का चौंकाने वाला विवरण: कोर्ट में यूपी आवास एवं विकास परिषद की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील राजीव शकधर ने सील की गई संपत्तियों का जो ब्योरा दिया, वह हैरान करने वाला था। इन 44 संपत्तियों में शामिल हैं:
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    6 स्कूल: जहां रोजाना सैकड़ों मासूम बच्चों की जान खतरे में रहती है।
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    6 अस्पताल/क्लीनिक: जहां मरीजों का इलाज होता है और आपात स्थिति में उन्हें बाहर निकालना असंभव हो सकता है।
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    4 बैंक्वेट हॉल: जहां शादियों में हजारों लोगों की भीड़ जमा होती है।
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    3 बैंक और 1 नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC): जो पूरी तरह कमर्शियल गतिविधियां हैं।
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इन आंकड़ों को देखकर पीठ ने कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा, "हमारे लिए सबसे जरूरी बात मासूम बच्चों, आम लोगों और मरीजों की जान है। हमें आपके बिजनेस या मुनाफे से कोई लेना-देना नहीं है। आप किसी की जान की कीमत पर अपना बिजनेस कर रहे हैं।"
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कोई जुर्माना नहीं आएगा काम: सेटबैक को किसी भी तरह वैध नहीं किया जा सकता

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भारत में अक्सर यह देखा गया है कि लोग पहले अवैध निर्माण कर लेते हैं और बाद में नगर निगम या विकास प्राधिकरण में कुछ जुर्माना (Compounding Fee) जमा करके अपने अवैध निर्माण को नियमित (Regularize) करवा लेते हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस 'जुगाड़' वाले रास्ते को हमेशा के लिए बंद कर दिया है।
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अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट और कड़े शब्दों में कहा है कि, "सेटबैक के उल्लंघन को किसी भी तरह से वैध नहीं किया जा सकता है।" कोर्ट ने कहा कि कोई भी व्यक्ति महज कुछ जुर्माना या फीस देकर इस अवैध कब्जे को सही नहीं ठहरा सकता। नियमों को पूरी सख्ती के साथ लागू किया जाएगा और अवैध निर्माण को हर हाल में गिरना ही होगा।
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ध्वस्तीकरण (Demolition) का सख्त एक्शन प्लान और प्रक्रिया

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सुप्रीम कोर्ट ने 859 संपत्तियों पर बुलडोजर एक्शन की पूरी प्रक्रिया को भी अदालत के रिकॉर्ड पर साफ कर दिया है। कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया पूरी तरह कानूनी दायरे में होनी चाहिए:
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    नोटिस की प्रक्रिया: सबसे पहले प्रशासन द्वारा अवैध निर्माण हटाने के लिए सभी संबंधित संपत्ति मालिकों को कानूनी नोटिस दिया जाएगा।
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    10 से 15 दिन का अल्टीमेटम: कब्जा करने वालों को 10 से 15 दिन का स्पष्ट समय मिलेगा कि वे खुद ही अपने संसाधनों से अवैध हिस्से (सेटबैक एरिया) को हटा लें।
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    प्रशासनिक ध्वस्तीकरण: अगर तय सीमा के भीतर संपत्ति मालिक ऐसा नहीं करते हैं, तो प्रशासन बिना किसी रियायत के खुद अपनी मशीनों (बुलडोजर) से ध्वस्तीकरण करेगा।
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    खर्च की वसूली (Cost Recovery): सबसे अहम बात यह है कि प्रशासन द्वारा की गई इस तोड़फोड़ का सारा खर्च (मशीनों और लेबर का खर्चा) अवैध कब्जा करने वालों से ही राजस्व बकाये की तरह वसूला जाएगा।
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अधिकारियों की लापरवाही और जवाबदेही तय करने का निर्देश

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शीर्ष अदालत ने इस पूरे प्रकरण के लिए सीधे तौर पर प्रशासनिक अमले की घोर लापरवाही को जिम्मेदार माना है। कोर्ट का मानना है कि निचले स्तर के अधिकारियों की मिलीभगत और अनदेखी के कारण ही अवैध निर्माण इतने बड़े और भयावह स्तर तक पहुंचे हैं। अब इस भ्रष्टाचार पर रोक लगाना बेहद जरूरी हो गया है।
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कार्रवाई में पूरी पारदर्शिता बनी रहे, इसके लिए कोर्ट ने यूपी आवास एवं विकास परिषद को निर्देश दिया है कि वह सील की गई 44 संपत्तियों की स्थिति पर एक विस्तृत हलफनामा (Affidavit) दाखिल करे। इस हलफनामे में हर संपत्ति की सील करने से 'पहले की तस्वीरें' (Before) और 'बाद की तस्वीरें' (After) शामिल होनी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कागजों के साथ-साथ जमीन पर भी कार्रवाई पूरी ईमानदारी से की गई है।
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सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले की अगली सुनवाई जुलाई के महीने में करेगा, जहां प्रशासन को अपनी की गई कार्रवाई की पूरी प्रोग्रेस रिपोर्ट अदालत के पटल पर रखनी होगी। यह ऐतिहासिक आदेश निश्चित रूप से पूरे देश में अवैध निर्माण करने वाले भू-माफियाओं और बिल्डरों की नींद उड़ाने वाला साबित होगा।
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