मेरठ शहर का दिल कहे जाने वाले मेरठ सेंट्रल मार्केट (Meerut Central Market) में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हुई बड़ी सीलिंग कार्रवाई ने पूरे शहर की अर्थव्यवस्था को हिला कर रख दिया है। 44 संपत्तियों पर सीलिंग और सभी 860 आवासीय भूखंडों पर व्यावसायिक (कमर्शल) गतिविधियों को पूरी तरह से बंद करने के सख्त आदेश के बाद व्यापारियों में भारी दहशत का माहौल है। लेकिन अब यह दहशत धीरे-धीरे भीषण राजनीतिक आक्रोश में बदलती जा रही है। रोजी-रोटी छिनने के इस संकट काल में व्यापारियों का गुस्सा सीधे तौर पर स्थानीय जनप्रतिनिधियों पर फूट पड़ा है। आलम यह है कि सोशल मीडिया पर शहर के दिग्गज भाजपा नेताओं के 'लापता' होने के पोस्टर तेजी से वायरल हो रहे हैं। इस पूरे प्रकरण ने एक बड़े सियासी तूफान को जन्म दे दिया है।Read also:-मेरठ में सीलिंग का 'तूफान': 44 संपत्तियों पर लगा ताला, विरोध में पूरा शहर बंद; डॉक्टरों की OPD ठप, भावुक हुआ किन्नर समाज, सड़कों पर पसरा सन्नाटा
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सोशल मीडिया पर वायरल हुए 'लापता' नेताओं के पोस्टर

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इस महासंकट के बीच, मेरठ सेंट्रल मार्केट के व्यापारियों द्वारा बनाए गए विभिन्न व्हाट्सएप और सोशल मीडिया ग्रुप्स में एक विशेष पोस्टर आग की तरह फैल रहा है। इस पोस्टर में उत्तर प्रदेश सरकार के ऊर्जा राज्यमंत्री डॉ. सोमेंद्र तोमर, मेरठ के सांसद व मशहूर टीवी अभिनेता अरुण गोविल और शहर के प्रथम नागरिक यानी महापौर (मेयर) हरिकांत अहलूवालिया की तस्वीरें लगी हुई हैं। इन तीनों कद्दावर भाजपा नेताओं की तस्वीरों के ठीक नीचे बड़े-बड़े अक्षरों में "लापता" (Missing) लिखा हुआ है।
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व्यापारी इन पोस्टर्स को जमकर शेयर कर रहे हैं और तीखे कमेंट्स के जरिए अपनी भड़ास निकाल रहे हैं। उनका कहना है कि चुनाव के समय वोट मांगने के लिए जो नेता घर-घर आते थे, आज जब हजारों परिवारों की आजीविका उजड़ रही है, तो वे पूरी तरह से गायब हो चुके हैं।
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व्यापारियों की मांग: पूरे शहर की सड़कों पर लगे बैनर

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सोशल मीडिया ग्रुप्स पर इस पोस्टर को शेयर करते हुए कई व्यापारी नेताओं और आम दुकानदारों ने मांग की है कि यह विरोध केवल व्हाट्सएप तक सीमित नहीं रहना चाहिए। व्यापारियों ने स्पष्ट रूप से लिखा है कि इस प्रकार के "लापता" बैनर पूरे शहर के मुख्य चौराहों और सड़कों पर बड़े-बड़े होर्डिंग्स के रूप में लगने चाहिए।
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इसके पीछे व्यापारियों का तर्क यह है कि आम जनता को भी यह सच्चाई पता चलनी चाहिए कि जब शहर के हजारों लोगों का रोजगार एक झटके में बंद हो रहा था और उनके परिवारों के सामने भूखे मरने की नौबत आ गई थी, उस नाजुक समय में वो जनप्रतिनिधि कहां थे जिन्हें उन्होंने भारी बहुमत से अपने हितों की रक्षा के लिए चुना था? यह सीधे तौर पर जनता के विश्वास के साथ धोखा है।
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संकट की इस घड़ी में अपनों के बीच आना चाहिए था

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इस पूरे बवाल पर राष्ट्रीय अल्पसंख्यक मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुदीप जैन ने भी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने व्यापारियों के इस गुस्से को पूरी तरह से जायज ठहराते हुए कहा, "व्यापारियों ने अपने वोट के अधिकार का इस्तेमाल करके ऐसे जनप्रतिनिधि इसलिए चुने थे, ताकि वे मुसीबत के समय उनकी ढाल बन सकें। उन्हें उम्मीद थी कि ये नेता उनकी पीड़ा को सदन में और सरकार के उच्च स्तर पर उठाएंगे।"
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जैन ने आगे कहा कि जब आज व्यापारियों पर इतनी बड़ी मुसीबत टूट पड़ी है और उनके प्रतिष्ठान सील हो रहे हैं, उस समय इन नेताओं का उनके बीच न पहुंचना बेहद निराशाजनक है। नेता सुख-दुख के साथी होते हैं, लेकिन इनकी गैरमौजूदगी ने व्यापारियों को गहरा आघात पहुंचाया है, और यही कारण है कि हताशा में उन्होंने इस तरह के पोस्टर जारी किए हैं। 
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"कोई नेता नहीं चाहता उसकी वोट खत्म हो"

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इस प्रकरण में व्यापारियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे किसान मजदूर संगठन के महानगर अध्यक्ष विजय राघव ने नेताओं की इस चुप्पी के पीछे की असली वजह बताई है। उन्होंने कहा, "यह प्रकरण हमारे भी संज्ञान में है कि नेता गायब हैं। दरअसल, कोई भी जनप्रतिनिधि या नेता यह नहीं चाहता कि मेरी वोट खराब हो या मैं सार्वजनिक रूप से कुछ ऐसा बोलूं जिससे एक वर्ग मुझसे नाराज हो जाए।"
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राघव ने इसके पीछे के कानूनी पहलू को भी स्पष्ट किया। उन्होंने कहा, "यह मामला सीधे तौर पर देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) का है। कोई भी नेता सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना या कोर्ट की अवमानना (Contempt of Court) के पचड़े में नहीं पड़ना चाहता। इसलिए, खुद को सुरक्षित रखने के लिए स्थानीय भाजपा नेताओं ने इस पूरे विवाद से एक सुरक्षित दूरी बना ली है और चुप्पी साध ली है।"
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डबल इंजन सरकार से भारी नाराजगी

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हजारों व्यापारियों में इस बात को लेकर भी भयंकर नाराजगी है कि शहर में सांसद और महापौर भाजपा के हैं, राज्य में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार है और केंद्र में भी भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार है। इसके बावजूद उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही है।
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व्यापारियों का स्पष्ट मानना है कि अगर यह "डबल-इंजन" सरकार और उसके नुमाइंदे वास्तव में चाहते और समय रहते उचित कानूनी पैरवी करते, तो आज उनके प्रतिष्ठान सीलिंग की इस खौफनाक स्थिति तक नहीं पहुंचते। उन्हें लगता है कि शासन और प्रशासन स्तर पर उनके मामले को जानबूझकर कमजोर छोड़ दिया गया। 
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क्या हुई थी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई? जानिए पृष्ठभूमि

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इस पूरे आक्रोश को समझने के लिए सुप्रीम कोर्ट में हुई हालिया सुनवाइयों को जानना जरूरी है:
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    6 अप्रैल 2026 की सुनवाई: सुप्रीम कोर्ट ने मेरठ विकास प्राधिकरण और आवास विकास को कड़ी फटकार लगाते हुए जल्द से जल्द 44 संपत्तियों को सील करने का सख्त आदेश दिया था। इस आदेश के तहत की गई कार्रवाई की चपेट में सैकड़ों छोटी-बड़ी दुकानों के साथ-साथ इलाके के प्रमुख बैंक, शादी के मंडप, हॉस्पिटल और स्कूल भी आ गए थे।
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    9 अप्रैल 2026 (गुरुवार) की सुनवाई: इसके बाद गुरुवार को मामले की विस्तृत सुनवाई हुई। इस सुनवाई में कोर्ट ने और भी कड़ा रुख अपनाते हुए आदेश दिया कि शास्त्री नगर योजना के सभी 860 भूखंडों (प्लॉट) पर अगले दो महीने के अंदर 'सेटबैक' (Setback) की कार्रवाई पूरी की जाए। साथ ही इन सभी आवासीय प्लॉटों पर चल रही व्यावसायिक (कमर्शल) गतिविधियों को पूरी तरह बंद कर दिया जाए। 
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सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेशों के चलते मेरठ सेंट्रल मार्केट के व्यापारियों का भविष्य फिलहाल अंधकारमय नजर आ रहा है। एक तरफ जहां उन्हें अपनी जमा-पूंजी और व्यापार छिनने का गम है, वहीं दूसरी तरफ अपनों का साथ न मिलने की टीस उन्हें अंदर तक कचोट रही है। सांसद अरुण गोविल, मंत्री डॉ. सोमेंद्र तोमर और मेयर के 'लापता' पोस्टर केवल एक विरोध का तरीका नहीं हैं, बल्कि यह उस टूटते हुए राजनीतिक विश्वास का प्रतीक है, जो दशकों से इस व्यापारी वर्ग ने अपने नेताओं पर किया था। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि व्यापारियों के इस भारी दबाव और पोस्टर वॉर के बाद, क्या ये गायब जनप्रतिनिधि सामने आकर कोई ठोस समाधान निकाल पाते हैं या नहीं।
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मेरठ की सेंट्रल मार्केट में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 44 संपत्तियों के सील होने और 860 आवासीय भूखंडों पर कमर्शियल गतिविधि बैन होने से व्यापारियों में हाहाकार मचा है। रोजी-रोटी छिनने के इस संकट में स्थानीय जनप्रतिनिधियों के गायब रहने से व्यापारी भड़क गए हैं। सोशल मीडिया पर राज्यमंत्री डॉ. सोमेंद्र तोमर, सांसद अरुण गोविल और मेयर हरिकांत अहलूवालिया के 'लापता' पोस्टर वायरल हो रहे हैं। व्यापारियों की मांग है कि इन पोस्टर्स को पूरे शहर की सड़कों पर लगाया जाए। किसान और अल्पसंख्यक संगठनों ने भी नेताओं की इस चुप्पी को वोटबैंक बचाने और सुप्रीम कोर्ट की अवमानना से बचने का हथकंडा करार दिया है।
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