मेरठ (8 अप्रैल 2026): उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हो रही शास्त्री नगर सेंट्रल मार्केट की सीलिंग कार्रवाई ने अब एक बड़ा राजनीतिक भूचाल ला दिया है। प्रशासन का बुलडोजर और सीलिंग टीम जब व्यापारियों की जीवनभर की कमाई पर ताला जड़ रही थी, तब ईंट-गारे के साथ-साथ एक और चीज टूट रही थी—वह था 'व्यापारियों का भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर दशकों पुराना अटूट भरोसा'।READ ALSO:-मेरठ सेंट्रल मार्केट सीलिंग: सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद 44 संपत्तियों पर एक्शन, रो पड़ीं महिलाएं, व्यापारी को आया हार्ट अटैक
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शास्त्री नगर और सेंट्रल मार्केट का इलाका मेरठ में भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की सबसे मजबूत प्रयोगशाला और 'अभेद्य किला' माना जाता है। यहाँ का व्यापारी वर्ग हमेशा से भाजपा का कोर वोटर और सबसे बड़ा आर्थिक व नैतिक समर्थक रहा है। लेकिन, पिछले 48 घंटों से जिस तरह से व्यापारियों को सड़कों पर घसीटा जा रहा है, उन्हें हार्ट अटैक आ रहे हैं और उनकी दुकानें सील हो रही हैं, उसके बीच स्थानीय भाजपा नेताओं की 'रहस्यमयी चुप्पी' और 'दूरी' ने व्यापारियों के दिलों में गहरी टीस पैदा कर दी है।
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अपनों की बेरुखी: जख्मों पर नमक और दरकता 'अभेद्य किला'
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व्यापारी इस बात से सबसे ज्यादा आहत और तिलमिलाए हुए हैं कि जिस दुख और संकट की घड़ी में उन्हें अपने द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधियों के साथ की सबसे ज्यादा जरूरत थी, उस समय सभी भाजपाइयों ने उनसे किनारा कर लिया। जब प्रशासन का डंडा चल रहा था, तब कोई भी बड़ा भाजपा नेता व्यापारियों के आंसू पोंछने या प्रशासन से बीच-बचाव करने के लिए सेंट्रल मार्केट में खड़ा नजर नहीं आया।
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आसमान से बरसते पानी और आंखों से बहते आंसुओं के बीच सड़कों पर बैठे व्यापारियों का दर्द उस वक्त बगावत में बदल गया, जब उन्हें यह अहसास हुआ कि चुनाव के वक्त "हम तुम्हारे साथ हैं" का नारा देने वाले नेताओं ने अपने मोबाइल फोन स्विच ऑफ कर लिए हैं या वे शहर से बाहर होने का बहाना बना रहे हैं।
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सांसद अरुण गोविल और ऊर्जा मंत्री सोमेंद्र तोमर पर सीधा निशाना

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सड़कों पर रोते-बिलखते व्यापारियों के निशाने पर सबसे ज्यादा मेरठ के नवनिर्वाचित सांसद (और रामायण फेम) अरुण गोविल और स्थानीय विधायक व उत्तर प्रदेश सरकार में ऊर्जा राज्यमंत्री डॉ. सोमेंद्र तोमर रहे। व्यापारियों ने चीख-चीख कर अपनी नाराजगी जाहिर की और इन दोनों बड़े नेताओं को 'मतलबी' तक करार दे दिया।
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सांसद अरुण गोविल पर फूटा आक्रोश: सांसद अरुण गोविल को लेकर व्यापारियों में एक खास तरह की नाराजगी है। प्रदर्शन स्थल पर मौजूद एक बुजुर्ग और रोते हुए व्यापारी ने भारी मन से जो कहा, वह भाजपा आलाकमान की नींद उड़ाने के लिए काफी है। व्यापारी ने कहा:
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"अरुण गोविल जी पिछली बार जब छोटी सी कार्रवाई हुई थी, तब यहाँ आए थे। उन्होंने शटर उठाकर लड्डू बांटे थे, हमारे साथ नाच-गाकर खूब फोटो खिंचवाई थीं और सोशल मीडिया पर डाली थीं। आज जब हमारे ऊपर असली संकट आया है, हमारी दुकानें हमेशा के लिए छिन रही हैं, तो वे पूछने तक नहीं आए कि हम जिंदा भी हैं या मर गए। आज वो 'राम' कहां हैं? क्या हम अपने बच्चों को जहर देकर मार दें?"
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ऊर्जा मंत्री सोमेंद्र तोमर से भी निराशा: स्थानीय विधायक और ऊर्जा मंत्री सोमेंद्र तोमर के लिए यह उनका अपना विधानसभा क्षेत्र है। व्यापारी मानकर चल रहे थे कि 'अपना विधायक' उनके और सुप्रीम कोर्ट या प्रशासन के बीच कोई ढाल बनेगा। लेकिन उनकी गैरमौजूदगी ने व्यापारियों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि सत्ता के रसूख के आगे वोटरों की अहमियत शून्य हो जाती है।
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सियासत का बदला रंग: सपा-कांग्रेस का साथ, अपनों का हाथ खाली

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इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा हैरानी की बात यह रही कि भाजपा का घोर समर्थक माना जाने वाला यह व्यापारी वर्ग आज विपक्षी नेताओं के बीच अपना दर्द बांटता और उनके कंधों पर सिर रखकर रोता नजर आया। जहाँ सत्ताधारी दल के स्थानीय कार्यालयों पर सन्नाटा पसरा रहा, वहीं समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के नेताओं ने मौके की नजाकत को समझते हुए तुरंत सेंट्रल मार्केट का रुख किया।
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सपा नेता जीतू नागपाल (जिनकी कल ADM सिटी से तीखी नोकझोंक भी हुई थी) और कांग्रेस के कई स्थानीय नेता सीलिंग के दौरान व्यापारियों के साथ सड़क पर कंधे से कंधा मिलाकर खड़े दिखे। विपक्ष के इन नेताओं ने प्रशासन के सामने ढाल बनने की कोशिश की। व्यापारियों ने खुलेआम मीडिया के सामने स्वीकार किया कि, "चुनाव के वक्त हम भाजपा के साथ अंधभक्तों की तरह खड़े थे, हमने उन्हें चंदा दिया, वोट दिया। लेकिन आज जब हमारी बरसों की मेहनत सील हो रही है, तो सबने अपने फोन बंद कर लिए हैं। आज अगर कोई हमारे आंसू पोंछने आया है, तो वह विपक्ष है।"
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"यह दुकानों पर नहीं, हमारे भरोसे पर सील है..."

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बातचीत के दौरान कई व्यापारियों के सब्र का बांध पूरी तरह टूट गया। 44 संपत्तियों (जिनमें बैंक, स्कूल और अस्पताल भी शामिल हैं) पर हुई सीलिंग ने पूरे बाजार को उजाड़ कर रख दिया है। व्यापारियों का स्पष्ट कहना है कि प्रशासन सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन कर रहा है, यह बात वे समझते हैं, लेकिन क्या जनप्रतिनिधियों का यह फर्ज नहीं था कि वे शासन स्तर पर इस मामले की पैरवी करते? क्या 70 करोड़ रुपये का शमन शुल्क (Compound Fee) लेने के बाद भी उन्हें बेघर किया जाना न्यायसंगत है?
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एक महिला व्यापारी ने रोते हुए कहा, "यह जो ताले आज हमारे शटर पर लग रहे हैं, यह सिर्फ दुकानों पर सील नहीं है, बल्कि उस अगाध भरोसे पर भी सील है जो हमने भाजपा के जनप्रतिनिधियों पर जताया था।" भाजपाइयों की इस बेरुखी ने व्यापारियों के दिल में वो गहरी टीस पैदा कर दी है, जो शायद आसानी से नहीं भरेगी।
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क्या भविष्य में भाजपा को उठानी पड़ेगी इसकी भारी कीमत?

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मेरठ का यह 'सेंट्रल मार्केट सीलिंग कांड' सिर्फ एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं रह गया है, बल्कि यह भाजपा के लिए एक बहुत बड़ा सियासी खतरे का अलार्म है। उत्तर प्रदेश की शहरी राजनीति में व्यापारी वर्ग 'ओपिनियन मेकर' माना जाता है। अगर यह वर्ग भाजपा से छिटकता है, तो इसका सीधा असर आने वाले नगर निगम और विधानसभा चुनावों पर पड़ सकता है।
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व्यापारियों ने कल यानी 9 अप्रैल 2026 को पूरे 'मेरठ बंद' का आह्वान किया है। इस बंद को सफल बनाने के लिए व्यापारी खुद सड़कों पर उतरकर प्रचार कर रहे हैं। इस बंद की सफलता यह तय करेगी कि व्यापारियों का गुस्सा कितना व्यापक है।
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आज जो हालात मेरठ के सेंट्रल मार्केट में हैं, वह सत्ता और जनता के बीच टूटते संवाद का सबसे जीवंत उदाहरण है। जिस 'राम' (अरुण गोविल) को मेरठ की जनता ने पलकों पर बिठाकर संसद भेजा था, आज उसी जनता को संकट के समय अपने 'राम' की तलाश है। यदि भाजपा नेतृत्व ने समय रहते इन नाराज व्यापारियों से संवाद स्थापित कर उनके घावों पर मरहम नहीं लगाया, तो 'अभेद्य किले' में लगी यह सेंध भविष्य में एक बड़ी राजनीतिक खाई में तब्दील हो सकती है।
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(मेरठ सीलिंग, व्यापारियों के आंदोलन और 'मेरठ बंद' से जुड़ी हर पल की अपडेट के लिए हमारे साथ बने रहें।)
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