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\r\n\r\nमेरठ (Meerut News): किसी भी शहर के विकास का पैमाना वहां की चमचमाती इमारतें ही नहीं होतीं, बल्कि वहां की वो बुनियादी सुविधाएं होती हैं जो एक आम नागरिक के जीवन को सुगम बनाती हैं। उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहरों में शुमार और 'स्मार्ट सिटी' बनने की राह पर अग्रसर मेरठ महानगर, इन दिनों अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है। शहर के कई इलाकों में आलम यह है कि लोग बदबूदार माहौल, बजबजाती नालियों, मच्छरों के आतंक और अंधेरी सड़कों के बीच जीवन यापन करने को मजबूर हैं। सबसे ज्यादा चिंता और आक्रोश की बात यह है कि जिम्मेदार विभाग—मेरठ नगर निगम—जनता की शिकायतों को कूड़ेदान में डाल रहा है। लगातार अनुस्मारकों (Reminders) और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर फरियाद करने के बावजूद जब कोई समाधान नहीं निकला, तो अब स्थानीय नागरिकों का सब्र जवाब दे गया है।READ ALSO:-मेरठ में खूनी संघर्ष: सेप्टिक टैंक के विवाद में युद्ध का मैदान बना अजराड़ा गांव, पुलिसकर्मी के घर पर बरसाए गए पत्थर
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समस्याओं का अंबार: कैसे नरक बन रहा है जीवन?
\r\n\r\nइस पूरे प्रकरण को प्रमुखता से सामने लाने वाले एंटी करप्शन फाउंडेशन ऑफ इंडिया, मेरठ के जिला युवा अध्यक्ष मयंक वर्मा ने शहर की बदहाली का जो खाका खींचा है, वह किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है। एक तरफ हम 21वीं सदी के भारत की बात करते हैं, वहीं मेरठ के कई इलाके आज भी उन समस्याओं से जूझ रहे हैं जिन्हें दशकों पहले ही खत्म हो जाना चाहिए था।
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1. बजबजाती नालियां और चरमराती सफाई व्यवस्था: मयंक वर्मा ने बताया कि क्षेत्र की नालियां कचरे और सिल्ट से पूरी तरह अटी पड़ी हैं। नियमित सफाई व्यवस्था पूरी तरह से ठप हो चुकी है। हल्की सी बारिश या घरेलू पानी के अधिक इस्तेमाल से यह गंदा पानी सड़कों और लोगों के घरों के बाहर जमा हो जाता है। सड़ांध और दुर्गंध के कारण लोगों का अपने ही घरों में बैठना या चैन की सांस लेना दूभर हो गया है। सफाई कर्मचारियों का अता-पता नहीं है और अगर वे आते भी हैं, तो महज खानापूर्ति करके चले जाते हैं।
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2. फॉगिंग का अभाव और मंडराता महामारियों का खतरा: रुकते हुए गंदे पानी और कचरे के ढेरों ने पूरे क्षेत्र को मच्छरों की 'ब्रीडिंग ग्राउंड' (प्रजनन स्थली) में तब्दील कर दिया है। गर्मी और उमस के इस मौसम में मच्छरों का प्रकोप इतना अधिक है कि रात तो दूर, दिन में भी लोगों का बैठना मुश्किल है। नगर निगम की ओर से फॉगिंग (मच्छर रोधी धुएं का छिड़काव) किए हुए अरसा बीत चुका है। स्थानीय लोगों को अब डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया जैसी जानलेवा और संक्रामक बीमारियों का खौफ सताने लगा है। अगर समय रहते स्वास्थ्य विभाग और नगर निगम नहीं जागे, तो हालात बेकाबू हो सकते हैं।READ ALSO:-मेरठ में खूनी संघर्ष: सेप्टिक टैंक के विवाद में युद्ध का मैदान बना अजराड़ा गांव, पुलिसकर्मी के घर पर बरसाए गए पत्थर
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3. अंधेरे में डूबीं सड़कें: हादसों और अपराध को न्योता: एक अन्य सबसे गंभीर समस्या है—लंबे समय से खराब पड़ी स्ट्रीट लाइटें। सूरज ढलते ही कई इलाके घुप अंधेरे में डूब जाते हैं। बंद पड़ी स्ट्रीट लाइटों के कारण रात के समय महिलाओं, बुजुर्गों और काम से लौटने वाले लोगों के लिए क्षेत्र में भारी असुरक्षा का माहौल पैदा हो जाता है। अंधेरे का फायदा उठाकर असामाजिक तत्वों का जमावड़ा लगा रहता है, जिससे चोरी और छिनतई जैसी घटनाओं की आशंका बनी रहती है। इसके अलावा, टूटी सड़कों और अंधेरे के कॉकटेल ने सड़क दुर्घटनाओं का ग्राफ भी बढ़ा दिया है।
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शिकायतों का डिजिटल पुलिंदा और निगम की 'नो रिस्पॉन्स' नीति
\r\n\r\nइस पूरे मामले में सबसे अधिक निराशाजनक पहलू नगर निगम के अधिकारियों का अड़ियल और लापरवाह रवैया है। मयंक वर्मा ने बताया कि उन्होंने व्यवस्था को सुधारने के लिए हर संभव लोकतांत्रिक और विभागीय तरीका अपनाया।
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- \r\n पहली आधिकारिक शिकायत: 05 अप्रैल 2026 को संबंधित अधिकारियों को पहली बार विस्तृत शिकायत प्रेषित की गई थी। उम्मीद थी कि नई तकनीक और 'ई-गवर्नेंस' के इस दौर में त्वरित कार्रवाई होगी।\r\n \r\n
- \r\n अनुस्मारक (Reminder): 11 दिनों तक जब निगम के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी, तो 16 अप्रैल 2026 को पुनः एक लिखित अनुस्मारक भेजा गया, जिसमें स्थिति की गंभीरता का हवाला दिया गया।\r\n \r\n
- \r\n डिजिटल माध्यमों का उपयोग: यह सोचकर कि शायद कागजी फाइलें दब गई हों, मयंक वर्मा और स्थानीय लोगों ने नगर निगम के आधिकारिक मोबाइल ऐप, व्हाट्सएप कंप्लेंट नंबर और ईमेल का भी सहारा लिया।\r\n \r\n
- \r\n सोशल मीडिया का दबाव: यहां तक कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व ट्विटर) पर भी उच्चाधिकारियों और संबंधित विभागों को टैग करते हुए कई बार समस्या को उठाया गया।\r\n \r\n
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परंतु, विडंबना देखिए कि "क्लिक पर समाधान" का दावा करने वाले तंत्र ने आज 08 मई 2026 तक कोई भी सकारात्मक कदम नहीं उठाया है। यह दर्शाता है कि अधिकारी वातानुकूलित कमरों से बाहर निकलकर जनता की सुध लेने को राजी नहीं हैं।
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"जनता के टैक्स का पैसा आखिर जा कहां रहा है?"
\r\n\r\nस्थानीय नागरिकों के बीच अब यह सवाल गूंजने लगा है कि यदि हाउस टैक्स, वाटर टैक्स और अन्य कई तरह के कर (Taxes) समय पर वसूले जा रहे हैं, तो जनता को उसके बदले सुविधाएं क्यों नहीं मिल रही हैं? क्या करदाताओं का पैसा सिर्फ कागजी योजनाओं और अधिकारियों के वेतन के लिए है? लोगों का कहना है कि जब चुनाव आते हैं, तो यही नेता और अधिकारी घर-घर जाकर वादों की झड़ी लगा देते हैं, लेकिन चुनाव बीतते ही जनता को भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है। मयंक वर्मा का यह कदम अब आम जनता की आवाज बन चुका है, जो इस भ्रष्ट और सुस्त व्यवस्था से त्रस्त आ चुकी है।
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नगर आयुक्त से आर-पार की मांग: जवाबदेही तय हो
\r\n\r\nहालात को बेकाबू होता देख और अधिकारियों की चिर-निद्रा से क्षुब्ध होकर मयंक वर्मा (जिला युवा अध्यक्ष, एंटी करप्शन फाउंडेशन ऑफ इंडिया) ने अब सीधे मेरठ के नगर आयुक्त से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
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उन्होंने अपनी अपील में स्पष्ट रूप से निम्नलिखित मांगें रखी हैं:
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- \r\n त्वरित समाधान: क्षेत्र में तत्काल प्रभाव से सफाई कर्मचारियों की विशेष टीम भेजी जाए, नालियों की डी-सिल्टिंग हो, और फॉगिंग मशीनें चलवाई जाएं।\r\n \r\n
- \r\n रोशनी की व्यवस्था: खराब पड़ी सभी स्ट्रीट लाइटों की मरम्मत 24 से 48 घंटे के भीतर सुनिश्चित की जाए।\r\n \r\n
- \r\n जवाबदेही और कार्रवाई: उन अधिकारियों, अवर अभियंताओं (JE), और सफाई निरीक्षकों की पहचान की जाए जिन्होंने 05 अप्रैल से लेकर अब तक की गई शिकायतों को नजरअंदाज किया। कर्तव्य में घोर लापरवाही बरतने वाले ऐसे कर्मचारियों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।\r\n \r\n
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आगे क्या?
\r\n\r\nआज, 08 मई 2026 को मेरठ की जनता नगर निगम की ओर टकटकी लगाए देख रही है। मयंक वर्मा और स्थानीय नागरिकों ने चेतावनी दी है कि यदि अब भी उनकी न्यायोचित मांगों को दरकिनार किया गया और जमीनी स्तर पर सुधार नहीं दिखा, तो उन्हें मजबूरन लोकतांत्रिक तरीके से सड़कों पर उतरकर जन-आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ेगा। अब गेंद पूरी तरह से मेरठ नगर निगम प्रशासन और नगर आयुक्त के पाले में है। देखना यह दिलचस्प होगा कि क्या निगम का अमला नींद से जागकर जनता की सेवा के अपने असली फर्ज को निभाता है, या 'स्मार्ट सिटी' के ये अंधियारे और बदबूदार अध्याय यूं ही चलते रहेंगे।
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(रिपोर्ट: न्यूज़ डेस्क | इनपुट्स: मयंक वर्मा, जिला युवा अध्यक्ष, एंटी करप्शन फाउंडेशन ऑफ इंडिया, मेरठ)
Sabse pehle comment karne wale banein.