मेरठ (Meerut): उत्तर प्रदेश सरकार (UP Government) द्वारा आगामी अगस्त माह से प्रदेश भर में लागू की जाने वाली नई 'ई-रजिस्ट्रेशन' (E-Registration) प्रणाली लागू होने से पहले ही भारी विवादों में घिर गई है। मंगलवार, 16 जून 2026 को मेरठ जिले में निबंधन (रजिस्ट्री) कार्य से जुड़े हजारों अधिवक्ताओं, बैनामा लेखकों (Deed Writers) और स्टाम्प वेंडरों ने इस नई व्यवस्था के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।READ ALSO:-एससी/एसटी छात्रवृत्ति घोटाले में ED का बड़ा प्रहार: मेरठ के भाजपा MLC धर्मेंद्र भारद्वाज के शिक्षण संस्थानों से जुड़ी 13.83 करोड़ की संपत्ति कुर्क
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इस नई नीति के तहत सरकार संपत्ति पंजीकरण को पूरी तरह से ऑनलाइन और पेपरलेस करने की तैयारी कर रही है। लेकिन, दशकों से इस पेशे से जुड़े लोगों का साफ तौर पर कहना है कि यह 'डिजिटलीकरण' की आड़ में रजिस्ट्री विभाग का 'निजीकरण' (Privatization) करने की एक गहरी साजिश है। इस विरोध प्रदर्शन के चलते मेरठ के सभी निबंधन कार्यालयों (Registry Offices) में कामकाज पूरी तरह से ठप हो गया है, जिससे दूर-दराज से आए आम लोगों को बिना रजिस्ट्री कराए ही बैरंग लौटना पड़ रहा है। आइए इस पूरे विवाद, प्रदर्शनकारियों की मांगों और सरकार की नई नीति का विस्तार से विश्लेषण करते हैं।
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क्या है ई-रजिस्ट्रेशन (E-Registration) की नई व्यवस्था?

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राज्य सरकार की नई नीति के अनुसार, आगामी अगस्त महीने से प्रदेश भर में संपत्तियों की रजिस्ट्री की प्रक्रिया को डिजिटल रूप दिया जाना है। इस नई व्यवस्था में:
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    आवास विकास परिषद (Awas Vikas Parishad) और विकास प्राधिकरण (Development Authorities) सीधे तौर पर ई-रजिस्ट्री (E-Registry) कर सकेंगे।
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    खरीदार और विक्रेता सीधे पोर्टल के माध्यम से अपने दस्तावेज अपलोड कर सकेंगे, जिससे बीच के माध्यमों (जैसे बैनामा लेखक या अधिवक्ता) की भूमिका लगभग खत्म हो जाएगी।
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    सरकार का तर्क है कि इससे पारदर्शिता आएगी और आम जनता के समय की बचत होगी।
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लेकिन इसी 'सीधी प्रक्रिया' ने उन लाखों लोगों की नींद उड़ा दी है, जिनकी रोजी-रोटी पीढ़ियों से कचहरी और निबंधन कार्यालयों के बाहर दस्तावेज लिखने से चलती आ रही है।
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'लाखों परिवारों के सामने खड़ा हुआ रोजी-रोटी का संकट'

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इस नई व्यवस्था के खिलाफ मंगलवार को मेरठ में अलग-अलग संगठनों ने लामबंद होकर जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। मेरठ दस्तावेज एसोसिएशन के अध्यक्ष नवीन कुमार शर्मा ने इस हड़ताल का नेतृत्व करते हुए सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए।
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नवीन कुमार शर्मा ने कहा, "यह केवल एक तकनीकी बदलाव नहीं है, बल्कि यह हमारे अस्तित्व पर सीधा प्रहार है। वर्षों से, बल्कि पीढ़ियों से हमारे पूर्वज इसी परंपरागत तरीके से बैनामा लिखने का कार्य करते आ रहे हैं। वर्तमान में पूरे उत्तर प्रदेश में लाखों लोग सीधे तौर पर इस कार्य से जुड़े हैं। अगर सरकार बीच से हमारी भूमिका को पूरी तरह से समाप्त कर देगी, तो लाखों परिवारों के सामने रोजी-रोटी का भयानक संकट खड़ा हो जाएगा।"
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उन्होंने आगे आरोप लगाया कि सरकार की मंशा साफ है कि वह धीरे-धीरे इस पूरे काम को निजी हाथों (Corporate Sectors) में सौंपना चाहती है, जैसा कि हाल के वर्षों में कई अन्य सरकारी विभागों में देखा गया है। काम छीनने की यह कोशिश किसी भी तरह से उचित नहीं है और संगठन मांग करता है कि पुरानी और सुचारू रूप से चल रही व्यवस्था को ही आगे भी जारी रखा जाए।
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'निजीकरण की साजिश': 7 महीने में भाग गई थी पिछली निजी कंपनी

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विरोध प्रदर्शन में शामिल उत्तर प्रदेश दस्तावेज लेखक प्रांतीय संगठन के मंत्री मनोज कुमार चौहान ने भी ई-पंजीकरण को लेकर कड़ा ऐतराज जताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस पूरी योजना के पीछे की असल कहानी कुछ और है।
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मनोज कुमार चौहान ने कड़े शब्दों में कहा, "आवास विकास और विकास प्राधिकरणों को सीधे ई-रजिस्ट्री का अधिकार देना सरासर गलत है। इससे प्रदेश भर के लाखों दस्तावेज लेखक और अधिवक्ता दर-बदर हो जाएंगे। असल में सरकार ई-पंजीयन की इस नई और जटिल व्यवस्था को निजी हाथों में सौंपने की फिराक में है।"
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उन्होंने सरकार को पुरानी विफलता की याद दिलाते हुए एक बड़ा खुलासा किया। चौहान ने बताया कि, "इससे पहले भी सरकार ने रिकॉर्ड मेंटेन करने और डिजिटाइजेशन के लिए एक निजी संस्था (Private Company) को करोड़ों का टेंडर दिया था। लेकिन वह संस्था काम के दबाव और तकनीकी खामियों के चलते महज 7 महीने में ही काम अधूरा छोड़कर भाग गई थी। अब एक बार फिर सरकार बिना जमीनी हकीकत जाने यह नई कार्यप्रणाली हम पर थोप रही है, जिससे सभी अधिवक्ता और लेखक आहत हैं।"
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विकास प्राधिकरणों पर जनता के उत्पीड़न का गंभीर आरोप

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इस हड़ताल को दस्तावेज परामर्श समिति का भी पूरा समर्थन प्राप्त है। समिति के अध्यक्ष अरुण शर्मा ने इस विषय को पूरी तरह से निंदनीय करार दिया। उन्होंने कहा कि प्रदेश भर में सभी दस्तावेज लेखक और अधिवक्ता इस विषय से गहरे चिंतित हैं।
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अरुण शर्मा ने एक बेहद व्यावहारिक समस्या की ओर इशारा करते हुए कहा, "सरकार सोच रही है कि सीधे विकास प्राधिकरण से ई-रजिस्ट्री हो जाएगी, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कोई भी आम नागरिक सीधे जाकर आवास विकास या विकास प्राधिकरण में अपने रजिस्ट्री के कार्य को आसानी से नहीं करवा सकता है। जितने भी विकास प्राधिकरण हैं, वहां भ्रष्टाचार और लालफीताशाही चरम पर है। वहां आम जनता का सिर्फ उत्पीड़न (Harassment) किया जाता है। एक छोटे से हस्ताक्षर के लिए लोगों को महीनों चक्कर काटने पड़ते हैं। ऐसे में ई-रजिस्ट्री आम जनता के लिए सुविधा कम और मुसीबत ज्यादा साबित होगी।"
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क्या कहता है प्रशासन? (Assistant Registrar का बयान)

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इस पूरे गतिरोध और हड़ताल के चलते मेरठ प्रशासन भी हरकत में आ गया है। निबंधन कार्यालय में कामकाज ठप होने के कारण शासन को रिपोर्ट भेजी जा रही है।
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सहायक निबंधक (Assistant Registrar) बोबिल कुमार ने स्थिति को स्पष्ट करते हुए बताया, "तमाम दस्तावेज लेखक और अधिवक्ता आज हड़ताल पर हैं। उन्होंने हमें अपना एक विस्तृत मांग पत्र (Memorandum) सौंपा है, जिसे हमने तत्काल प्रभाव से उच्चाधिकारियों और शासन को भेज दिया है। मूल रूप से यह विरोध अगस्त माह से प्रदेश भर में लागू होने वाली प्रस्तावित 'ई-रजिस्ट्रेशन' प्रक्रिया को लेकर है। इसके अलावा, संगठनों ने रजिस्ट्री कार्यालय की टाइमिंग और कुछ अन्य स्थानीय समस्याओं को दर्शाते हुए भी ज्ञापन दिया है। हम शासन के दिशा-निर्देशों का इंतजार कर रहे हैं।"
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पुरानी व्यवस्था बनाम नई ई-रजिस्ट्री व्यवस्था (एक तुलनात्मक नज़र)

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आधार (Basis)
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पुरानी व्यवस्था (Current Registry)
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नई ई-रजिस्ट्री व्यवस्था (Proposed)
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दस्तावेज तैयार करना
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बैनामा लेखकों और वकीलों द्वारा मैनुअली या टाइप करके।
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पोर्टल पर डिजिटल फॉर्म के माध्यम से (स्वयं या ऑपरेटर द्वारा)।
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मध्यस्थ की भूमिका
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अधिवक्ता और डीड राइटर अहम भूमिका निभाते हैं।
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मध्यस्थ की भूमिका लगभग शून्य हो जाएगी।
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विकास प्राधिकरण की भूमिका
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अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) तक सीमित।
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सीधे ई-रजिस्ट्री करने का अधिकार मिलेगा।
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रोजगार पर असर
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लाखों लोगों को प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रोजगार मिलता है।
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बैनामा लेखकों और वकीलों के काम में भारी कमी की आशंका।
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सरकारी तर्क
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प्रक्रिया लंबी है, समय अधिक लगता है।
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भ्रष्टाचार मुक्त, तेज और पूरी तरह पारदर्शी प्रणाली होगी।
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आगे क्या होगा?

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मेरठ में भड़की यह चिंगारी अब पूरे उत्तर प्रदेश में फैलने के आसार नजर आ रहे हैं। सरकार के लिए 'डिजिटल इंडिया' (Digital India) और 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' के तहत ई-रजिस्ट्रेशन को लागू करना एक बड़ा कदम है, लेकिन लाखों पेशेवरों की रोजी-रोटी की चिंताओं को नजरअंदाज करना भी एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती साबित हो सकता है।
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अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या उत्तर प्रदेश सरकार अपने फैसले पर अडिग रहती है, या फिर अधिवक्ताओं और बैनामा लेखकों के इस भारी दबाव के आगे झुककर ई-रजिस्ट्री के नियमों में कोई बीच का रास्ता (Middle Ground) निकालती है। फिलहाल, जब तक शासन से कोई ठोस आश्वासन नहीं मिलता, तब तक मेरठ में संपत्ति खरीदने और बेचने वालों को रजिस्ट्री के लिए भारी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
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