मेरठ (Meerut News): पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (PVVNL) के अंतर्गत मेरठ में कार्यरत संविदा बिजली कर्मचारियों (लाइनमैनों) के सब्र का बांध अब टूट गया है। अपनी जान हथेली पर रखकर दिन-रात बिजली व्यवस्था सुचारु रखने वाले इन कर्मचारियों ने विभाग के अधिकारियों की तानाशाही और शोषण के खिलाफ खुले तौर पर मोर्चा खोल दिया है।
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'निविदा-संविदा कर्मचारी सेवा समिति' (NSEWA) के बैनर तले कर्मचारियों ने पीवीवीएनएल मेरठ के अधिशासी अभियंता (विद्युत नगरीय वितरण खण्ड - वाणिज्य द्वितीय) को एक ज्ञापन सौंपा है। संगठन ने दो टूक चेतावनी दी है कि यदि 7 कार्यदिवसों के भीतर उनकी पेट्रोल भत्ते और सुरक्षा उपकरणों से जुड़ी मांगें नहीं मानी गईं, तो वे श्रम आयुक्त कार्यालय में शिकायत दर्ज कराने के साथ-साथ 'कार्य बहिष्कार' (हड़ताल) करने के लिए मजबूर होंगे। यदि ऐसा होता है तो भीषण गर्मी के इस मौसम में मेरठ शहर की बिजली व्यवस्था और राजस्व वसूली का काम पूरी तरह से ठप हो सकता है।READ ALSO:-मेरठ में रूह कंपाने वाली वारदात: कलयुगी पिता ने सौतेली मां के साथ मिलकर 17 साल की बेटी को उतारा मौत के घाट, गुपचुप कर दिया अंतिम संस्कार
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क्या है पूरा मामला? (The Core Issue)

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दरअसल, 22 मई 2026 को PVVNL के कार्यालय द्वारा एक ज्ञाप जारी किया गया था, जिसमें सभी संविदा कर्मचारियों को प्रतिदिन राजस्व वसूली (Revenue Collection) और बिल न जमा करने वालों के बिजली कनेक्शन काटने (Disconnection) के लिए फील्ड में जाने का निर्देश दिया गया था।
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कर्मचारियों का आरोप है कि उन्हें फील्ड में तो भेजा जा रहा है, लेकिन निगम की तरफ से न तो कोई सरकारी वाहन उपलब्ध कराया गया है और न ही यातायात का कोई खर्च दिया जा रहा है। इसी बात को लेकर निविदा-संविदा कर्मचारी सेवा समिति के पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष सचिन सिंह ने संगठन की तरफ से एक कड़ा पत्र अधिकारियों को लिखा है और संविदा कर्मियों की जमीनी हकीकत से रूबरू कराया है।
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संविदा कर्मचारियों की 4 प्रमुख मांगें और उनकी पीड़ा

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यूनियन द्वारा सौंपे गए पत्र में मुख्य रूप से चार गंभीर समस्याओं को उठाया गया है, जो सीधे तौर पर संविदा कर्मियों के जीवन और आजीविका से जुड़ी हैं:
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1. मामूली वेतन और भारी भरकम पेट्रोल का खर्च (Petrol Allowance Demand)

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संविदा कर्मचारियों की सबसे बड़ी समस्या उनका आर्थिक शोषण है। पत्र में स्पष्ट किया गया है कि राजस्व वसूली और विच्छेदन के लिए एक कर्मचारी को अपनी निजी बाइक से प्रतिदिन 40 से 50 किलोमीटर तक का सफर तय करना पड़ता है। इसके अलावा उन्हें अपने निजी मोबाइल और इंटरनेट का भी इस्तेमाल विभागीय काम के लिए करना पड़ता है।
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    दर्द की हकीकत: एक संविदा कर्मचारी को महीने भर की हाड़तोड़ मेहनत के बाद मात्र ₹10,000 से ₹12,000 का न्यूनतम वेतन मिलता है। इसमें से ₹2,500 से ₹3,000 तो हर महीने केवल पेट्रोल और मोबाइल रिचार्ज में खर्च हो जाते हैं। ऐसे में इतनी महंगाई में वे अपना घर कैसे चलाएं?
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    मांग: श्रम विभाग के शासनादेश (संख्या 688/36-3-2006) और अनुबंध की शर्तों का हवाला देते हुए संगठन ने मांग की है कि सभी फील्ड कर्मचारियों को ₹100 प्रतिदिन या ₹2,500 प्रतिमाह पेट्रोल भत्ता वेतन के साथ दिया जाए। जब तक भत्ता नहीं मिलता, किसी भी कर्मचारी को निजी वाहन से फील्ड कार्य के लिए बाध्य न किया जाए।
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2. दूसरे बिजलीघर पर काम कराना जानलेवा और बीमा क्लेम का डर

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विद्युत विभाग में लाइनमैन का काम अत्यधिक तकनीकी और जोखिम भरा होता है। एक लाइनमैन को उसी उपकेन्द्र (Substation) की भौगोलिक और तकनीकी जानकारी होती है, जहां उसकी तैनाती की जाती है।
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    अधिकारियों की मनमानी: संगठन का आरोप है कि अधिकारी मौखिक (Verbal) आदेश देकर कर्मचारियों को उनके निर्धारित कार्य-क्षेत्र से हटाकर दूसरे उपकेन्द्र या खण्ड पर राजस्व वसूली और लाइन ठीक करने के लिए भेज देते हैं।
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    बीमा क्लेम निरस्त होने का खतरा: यदि किसी संविदा कर्मी की दूसरे बिजलीघर के क्षेत्र में काम करते समय करंट लगने से दुर्घटना या मौत हो जाती है, तो बीमा कंपनी यह कहकर क्लेम निरस्त कर देती है कि "कर्मचारी की ड्यूटी वहां नहीं थी।"
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    मांग: संविदा कर्मी से केवल उसी बिजलीघर पर काम लिया जाए जहां उसकी तैनाती है। यदि अन्यत्र भेजना ही है, तो इसका लिखित आदेश और अतिरिक्त जोखिम भत्ता दिया जाए। यूनियन ने सख्त लहजे में कहा है कि अगर दूसरे बिजलीघर पर काम करते समय किसी कर्मचारी की जान जाती है, तो उसके परिवार को 50 लाख रुपये की क्षतिपूर्ति (मुआवजा) सीधे उस संबंधित अधिकारी की जेब से वसूल कर दी जाए जिसने उसे वहां भेजा था।
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3. वेतन रोकने की अवैध धमकी (Violation of Wage Act)

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दिनांक 22 मई 2026 के विभागीय ज्ञाप में यह तानाशाही फरमान सुनाया गया था कि यदि कोई कर्मचारी शाम तक राजस्व वसूली की रिपोर्ट नहीं देता है, तो उसका पूरे दिन का वेतन रोक लिया जाएगा (काट लिया जाएगा)।
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    यूनियन का पलटवार: अध्यक्ष सचिन सिंह ने इसे 'वेतन भुगतान अधिनियम, 1936' की धारा 7 का खुला उल्लंघन बताया है। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट न देना 'अनुमन्य कटौती' (Permissible Deduction) की श्रेणी में नहीं आता है। कार्य न करने की स्थिति में पहले स्पष्टीकरण मांगा जाना चाहिए, न कि सीधे वेतन काट लिया जाए। संगठन ने इस तानाशाही आदेश को तत्काल निरस्त करने की मांग की है।
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4. सुरक्षा उपकरणों (Safety Gear) की भारी अनदेखी

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बिजली के खंभों पर और 11 हजार वोल्टेज की चलती लाइनों के बीच काम करने वाले इन कर्मचारियों की सुरक्षा भगवान भरोसे है। राजस्व वसूली या कनेक्शन काटने जाते समय अक्सर उपभोक्ताओं के साथ विवाद होने का डर भी बना रहता है।
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    मांग: संगठन ने स्पष्ट किया है कि फील्ड में भेजने से पहले हर संविदा कर्मचारी को अनिवार्य रूप से हेलमेट, रबर के दास्ताने (Gloves), सेफ्टी शूज (Safety Shoes) और विभागीय पहचान पत्र (I-Card) उपलब्ध कराया जाए। बिना सुरक्षा उपकरणों के किसी भी कर्मचारी को फील्ड में न भेजा जाए।
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7 दिन का अल्टीमेटम: आगे क्या होगा? (The Road Ahead)

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निविदा-संविदा कर्मचारी सेवा समिति ने 26 मई को हस्ताक्षरित अपने पत्र (पत्रांक NSEWA/21/PVVNL/2026) के माध्यम से प्रशासन को कड़ा संदेश दे दिया है। संगठन ने कहा है कि यदि पत्र मिलने के 7 कार्यदिवस के भीतर इन चारों मांगों पर सकारात्मक और लिखित कार्यवाही नहीं की जाती है, तो संगठन चुप नहीं बैठेगा।
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मजबूरन कर्मचारियों को 'कार्य बहिष्कार' यानी हड़ताल पर जाना पड़ेगा। इसके अलावा नियमों के उल्लंघन को लेकर सीधे सहायक श्रम आयुक्त (Labour Commissioner), मेरठ के कार्यालय में अधिकारियों के खिलाफ कानूनी शिकायत भी दर्ज कराई जाएगी।
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संगठन ने इस पत्र की प्रतिलिपि (Copy) संज्ञान के लिए प्रबंध निदेशक (MD) पी.वि.वि.नि.लि. मेरठ, अधीक्षण अभियंता (नगरीय वितरण मण्डल) और समस्त सहायक अभियंताओं को भी भेज दी है।
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गर्मी के इस पीक सीजन (Peak Season) में जब बिजली की मांग अपने चरम पर होती है, ऐसे में संविदा लाइनमैनों की हड़ताल की चेतावनी PVVNL प्रबंधन के लिए खतरे की घंटी है। ये वही संविदा कर्मचारी हैं जो आंधी, तूफान, और चिलचिलाती धूप में लाइनें जोड़कर शहर को रोशन रखते हैं। 10-12 हजार की मामूली पगार में बिना किसी सरकारी वाहन, पेट्रोल भत्ते और सुरक्षा उपकरणों के काम करना किसी भी नजरिए से न्यायसंगत नहीं है।
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अब यह देखना दिलचस्प होगा कि PVVNL के आला अधिकारी अपनी हठधर्मिता छोड़कर इन शोषित कर्मचारियों की मांगों पर क्या कदम उठाते हैं, या फिर 7 दिन बाद मेरठ शहर को बिजली कर्मचारियों की हड़ताल और उसके कारण होने वाले पावर कट का खामियाजा भुगतना पड़ेगा।
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