मेरठ: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज इलाके में हाल ही में हुए भीषण अग्निकांड ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। इस दर्दनाक हादसे के बाद प्रदेश भर का प्रशासनिक अमला अचानक अलर्ट मोड पर आ गया है। इसी कड़ी में मेरठ जिला प्रशासन और पुलिस विभाग की नींद भी टूटी है। मंगलवार को मेरठ पुलिस की एक विशेष टीम ने शहर के सबसे बड़े एजुकेशन हब माने जाने वाले 'पीएल शर्मा रोड' (PL Sharma Road) स्थित विभिन्न कोचिंग सेंटरों पर अचानक सघन चेकिंग अभियान (Surprise Inspection) चलाया।READ ALSO:-वाहन मालिकों के लिए बड़ी खुशखबरी: 'PUCC 3.0' योजना के तहत BS6 गाड़ियों का PUC अब 3 साल तक रहेगा वैध; पुराने वाहनों पर कसेंगा शिकंजा
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इस छापेमारी में जो हकीकत सामने आई, वह न केवल हैरान करने वाली थी, बल्कि यह स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि चंद रुपयों के लालच में कोचिंग संचालक किस तरह हजारों मासूम छात्रों की जान के साथ सीधा खिलवाड़ कर रहे हैं।
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पीएल शर्मा रोड: सपनों का हब या बारूद का ढेर?

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मेरठ का पीएल शर्मा रोड इलाका छात्रों के लिए किसी मक्का-मदीना से कम नहीं है। यहाँ संकरी गलियों और पुरानी बहुमंजिला इमारतों में दर्जनों छोटे-बड़े कोचिंग सेंटर संचालित होते हैं। इन सेंटरों में दूर-दराज के गांवों और कस्बों से आए हजारों छात्र यूपीएससी (UPSC), आईआईटी (IIT-JEE), नीट (NEET) और बैंकिंग जैसी कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने आते हैं।
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माता-पिता अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य का सपना लिए अपनी गाढ़ी कमाई इन संस्थानों में जमा करते हैं। लेकिन बाहर से चमचमाते बोर्ड और होर्डिंग्स वाले इन कोचिंग सेंटरों के अंदर की सच्चाई बेहद डरावनी है। मंगलवार को पुलिस की जांच में यह साफ हो गया कि ये इमारतें शिक्षा के मंदिर कम और 'बारूद के ढेर' ज्यादा हैं, जहां एक छोटी सी चिंगारी भी किसी बड़े और दर्दनाक हादसे का रूप ले सकती है।
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चेकिंग अभियान: एसपी सिटी के नेतृत्व में पुलिस की रेड

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लखनऊ की घटना की पुनरावृत्ति मेरठ में न हो, यह सुनिश्चित करने के लिए एसपी सिटी श्री विनायक गोपाल भोंसले (SP City Vinayak Gopal Bhosale) ने स्वयं मोर्चा संभाला। उनके नेतृत्व में भारी पुलिस बल ने पीएल शर्मा रोड के कोचिंग हब में एक-एक कर कई संस्थानों का दरवाजा खटखटाया। इस दौरान पुलिस टीम ने इमारतों के बेसमेंट से लेकर ऊपरी मंजिलों तक चप्पे-चप्पे की तलाशी ली और सुरक्षा मानकों (Fire Safety Norms) को परखा।
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जांच के दौरान टीम को जो दृश्य देखने को मिले, वे रोंगटे खड़े करने वाले थे:

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1. फायर विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) गायब: किसी भी कमर्शियल इमारत, विशेषकर जहां छात्रों की भारी भीड़ जुटती है, वहां अग्निशमन विभाग से 'फायर एनओसी' (Fire NOC) लेना अनिवार्य है। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि जांच के दौरान पुलिस को एक भी ऐसा बड़ा कोचिंग सेंटर नहीं मिला जिसके पास वैध NOC हो। सभी सेंटर नियमों को ताक पर रखकर, प्रशासन की नाक के नीचे अवैध रूप से संचालित हो रहे थे।
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2. एक्सपायर हो चुके अग्निशमन यंत्र (Expired Fire Extinguishers): दिखावे के लिए कुछ संस्थानों ने दीवारों पर लाल रंग के अग्निशमन यंत्र टांग जरूर रखे थे, लेकिन जब पुलिस ने उनकी जांच की तो पता चला कि उनमें से अधिकांश की वैधता (Expiry Date) सालों पहले समाप्त हो चुकी है। वे गैस सिलेंडर अब महज लोहे का कबाड़ बन चुके थे। अगर आग लग जाए, तो ये उपकरण किसी काम के नहीं थे।
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3. लटकते हुए मौत के तार (Open Wiring & Short Circuit Risk): अधिकांश कोचिंग सेंटरों की कक्षाओं और गैलरी में बिजली के नंगे और खुले तार मकड़ी के जाले की तरह लटकते हुए पाए गए। एसी (AC) और भारी लाइट्स के लोड के कारण ये तार शॉर्ट सर्किट को खुला निमंत्रण दे रहे थे। लखनऊ अग्निकांड का मुख्य कारण भी शॉर्ट सर्किट ही बताया गया था, लेकिन मेरठ के संचालकों ने इससे कोई सबक नहीं लिया है।
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4. आपातकालीन निकास (Exit Point) का नामोनिशान नहीं: सबसे खतरनाक स्थिति इमारतों की बनावट को लेकर थी। इन सेंटरों में प्रवेश और निकास के लिए केवल एक ही संकरा रास्ता (Narrow Staircase) है। क्लासरूम के अंदर ठूंस-ठूंस कर छात्रों को बैठाया जाता है, लेकिन आपात स्थिति (Emergency) में बाहर निकलने के लिए कोई 'इमरजेंसी एग्जिट' या दूसरा रास्ता नहीं है। अगर मेन गेट के पास आग लग जाए, तो छात्रों के पास भागने का कोई विकल्प नहीं बचेगा और भगदड़ मचने से ही बड़ी जनहानि हो सकती है।
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एक्सपायर उपकरण मिले, फिर भी पुलिस रही मौन?

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इस पूरे चेकिंग अभियान का सबसे विडंबनापूर्ण पहलू पुलिस का रवैया रहा। इतनी भारी खामियां, एक्सपायर अग्निशमन यंत्र और बिना NOC के चल रहे सेंटरों को रंगे हाथों पकड़ने के बावजूद, मौके पर पुलिस ने किसी भी कोचिंग सेंटर को सील नहीं किया और न ही संचालकों पर तुरंत कोई दंडात्मक कार्रवाई की।
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इस 'मौन' पर सवाल उठने लाजमी हैं। जब पुलिस के सामने ही छात्रों की जिंदगी दांव पर लगी थी, तो केवल खानापूर्ति क्यों की गई?
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इस मामले पर एसपी सिटी विनायक गोपाल भोंसले ने अपना पक्ष रखते हुए बताया, "हमारा प्राथमिक उद्देश्य स्थिति का जायजा लेना था। हमने पाया है कि कई कोचिंग सेंटरों ने लखनऊ हादसे की खबर सुनने के बाद आनन-फानन में अपने पुराने अग्निशमन यंत्र बदलवाने शुरू कर दिए हैं। हालांकि, ये सेंटर बिना NOC के चल रहे हैं। हमने सभी खामियों की एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर ली है और इसे कार्रवाई के लिए सीधे 'अग्निशमन विभाग' (Fire Department) को सौंप दिया गया है।"
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पुलिस का तर्क है कि फायर सेफ्टी से जुड़े मामलों में पेनल्टी लगाने या बिल्डिंग को सील करने का तकनीकी और कानूनी अधिकार मुख्य रूप से फायर विभाग के पास होता है।
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आगे क्या? प्रशासन की सख्ती का इंतजार

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अब गेंद अग्निशमन विभाग और जिला प्रशासन के पाले में है। पुलिस द्वारा रिपोर्ट भेजे जाने के बाद यह उम्मीद की जा रही है कि प्रशासन जल्द ही इन लापरवाह कोचिंग सेंटरों के खिलाफ सख्त कदम उठाएगा।
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प्रशासन को तत्काल उठाने चाहिए ये कदम:

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    नोटिस और सीलिंग: जिन संस्थानों के पास NOC नहीं है, उन्हें नोटिस जारी कर एक निश्चित समय-सीमा दी जाए। यदि वे मानक पूरे नहीं करते हैं, तो उन्हें तुरंत सील किया जाए।
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    नियमित ऑडिट: फायर सेफ्टी ऑडिट केवल किसी बड़े हादसे के बाद होने वाली मौसमी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसे हर 6 महीने में अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए।
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    क्षमता का निर्धारण: एक क्लासरूम में कितने छात्र बैठेंगे, इसकी एक लिमिट तय होनी चाहिए ताकि आपात स्थिति में आसानी से निकासी (Evacuation) हो सके।
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हादसे का इंतजार या ठोस कार्रवाई?

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मेरठ का पीएल शर्मा रोड हो या दिल्ली का मुखर्जी नगर, हर जगह शिक्षा के नाम पर सुरक्षा से जो समझौता किया जा रहा है, वह एक टिक-टिक करते टाइम बम (Time Bomb) के समान है। लखनऊ के अलीगंज अग्निकांड ने एक ट्रेलर दिखा दिया है। यदि मेरठ प्रशासन और अग्निशमन विभाग अब भी केवल फाइलों और रिपोर्टों में उलझा रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब इस लापरवाही की कीमत किसी मासूम छात्र को अपनी जान देकर चुकानी पड़ेगी।
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कोचिंग संचालकों को भी यह समझना होगा कि छात्रों से ली जाने वाली भारी-भरकम फीस में से कुछ हिस्सा उनकी सुरक्षा पर खर्च करना कोई अहसान नहीं, बल्कि उनका कानूनी और नैतिक दायित्व है। अब देखना यह है कि फायर विभाग पुलिस की इस रिपोर्ट पर कितनी जल्दी और कितनी सख्त कार्रवाई करता है, या फिर यह चेकिंग अभियान भी समय के साथ फाइलों में धूल फांकने लगेगा।
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