मेरठ: उत्तर प्रदेश के मेरठ (Meerut) स्थित सेंट्रल मार्केट (Central Market) में इन दिनों हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं। दशकों से व्यापार कर रहे लोगों के ऊपर अचानक सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के आदेशों की ऐसी गाज गिरी है, जिसने न केवल उनका रोजगार छीन लिया है, बल्कि अब उनके सिर से छत भी छीनने की नौबत आ गई है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश और आवास विकास (Awas Vikas) की सीलिंग की कार्रवाई के विरोध में व्यापारियों का धरना प्रदर्शन बुधवार को लगातार पांचवें दिन भी पूरे आक्रोश के साथ जारी रहा।READ ALSO:-बाबा साहेब की 135वीं जयंती पर दिखी 'गंगा-जमुनी तहजीब'! अब्दुल्लापुर हुसैनी चौक पर शिया मुसलमानों ने शरबत बांटकर किया यात्रा का भव्य स्वागत
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व्यापारी अब अपनी दुकानों को तो छोड़ ही चुके हैं, लेकिन अब लड़ाई उनके घरों (Residential Properties) को बचाने की है। सड़क के बीचों-बीच टेंट लगाकर व्यापारी अपने पूरे परिवार, महिलाओं और मासूम बच्चों के साथ धरने पर बैठे हैं। हाथों में विरोध वाले बैनर और तख्तियां लिए ये लोग लगातार नारेबाजी कर रहे हैं। खबरीलाल (Khabreelal) की ग्राउंड रिपोर्ट में व्यापारियों का दर्द साफ छलक रहा है। उनका स्पष्ट कहना है, "हमारी दुकानें तो प्रशासन ने पहले ही बंद करा दी हैं और उन पर सील लगा दी है। हमारा रोजगार तो खत्म हो ही गया, लेकिन अब बात हमारे घरों तक आ गई है। हम अपने घरों को टूटने नहीं देंगे और इसका पुरजोर विरोध करेंगे।"
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धरने से राजनेता और जनप्रतिनिधि रहे नदारद, व्यापारियों ने खुद संभाला मोर्चा

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इस आंदोलन की सबसे खास बात यह रही कि पांचवें दिन का यह विरोध प्रदर्शन पूरी तरह से 'गैर-राजनीतिक' (Non-Political) रहा। पिछले चार दिनों से इस धरने में रोजाना तमाम राजनीतिक संगठनों और पार्टियों के जनप्रतिनिधि अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने पहुंच रहे थे। नेता यहां आकर भाषण देते थे और सत्तारूढ़ पार्टी पर जमकर बयानबाजी कर रहे थे।
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लेकिन, व्यापारियों को जल्द ही समझ आ गया कि यह मुद्दा राजनीति का अखाड़ा बन रहा है और उनकी मूल समस्या पीछे छूट रही है। व्यापारियों द्वारा किए गए कड़े विरोध और नेताओं को आईना दिखाने के बाद, बुधवार को धरने में कोई भी राजनीतिक पदाधिकारी या जनप्रतिनिधि नजर नहीं आया। पूरे बाजार में केवल पीड़ित व्यापारी वर्ग ही दिखाई दिया। व्यापारियों ने स्पष्ट कर दिया है कि यह उनके अस्तित्व की लड़ाई है, कोई राजनीतिक मंच नहीं।
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"हमारी पढ़ाई कौन कराएगा?" - हाथों में पोस्टर लिए सड़क पर उतरे मासूम बच्चे

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सीलिंग की इस निर्मम कार्रवाई का सबसे दुखद पहलू वह है जो मासूम बच्चों को झेलना पड़ रहा है। जहां एक तरफ व्यापारी परिवार सहित अपने घरों को बचाने के लिए बैठे हैं, वहीं उनके छोटे-छोटे बच्चे भी इस मुहिम में उनके साथ सड़क पर उतर आए हैं। इन बच्चों के हाथों में दिल झकझोर देने वाले पोस्टर हैं, जिन पर लिखा है- "हमारी पढ़ाई कौन कराएगा?"
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व्यापारियों ने अपनी व्यथा सुनाते हुए बताया कि इस सीलिंग की कार्रवाई में केवल दुकानें ही बंद नहीं हुई हैं, बल्कि सेंट्रल मार्केट इलाके में चलने वाले स्कूल (Schools) भी सील कर दिए गए हैं। अभिभावकों का कहना है कि उन्होंने इन स्कूलों में अपने बच्चों का एडमिशन कराया था और पूरे साल की भारी-भरकम फीस भी पहले ही जमा कर दी थी। अब अचानक स्कूल सील हो जाने से उनके बच्चों का भविष्य अधर में लटक गया है। न तो उनके पास पैसे वापस आ रहे हैं और न ही बच्चों की पढ़ाई हो पा रही है। रोजगार छिनने के बाद अब बच्चों के भविष्य पर भी ग्रहण लग गया है।
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क्या है 'सेटबैक' का नियम, जिसे लेकर मचा है पूरा बवाल?

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व्यापारियों के इस भारी विरोध की मुख्य वजह सुप्रीम कोर्ट का 'सेटबैक' (Setback) छोड़ने का आदेश है। सेटबैक का मतलब होता है वह खाली जगह जो किसी भी इमारत या मकान के निर्माण के समय सड़क और बाउंड्री वाल के बीच छोड़ी जानी अनिवार्य होती है। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि सेंट्रल मार्केट के सभी आवासीय और व्यावसायिक भवनों में मानकों के अनुरूप सेटबैक छोड़ा जाए।
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खास तौर पर जिन लोगों के बाजार के आसपास बहुत छोटे मकान हैं, उनके लिए यह आदेश किसी 'डेथ वारंट' से कम नहीं है। व्यापारियों ने प्रशासन की अव्यवहारिकता का उदाहरण देते हुए बताया कि, "यहां कई लोगों के पास मात्र 38 वर्ग मीटर के बहुत छोटे मकान हैं। अगर इन 38 मीटर के मकानों में भी हम नियमों के अनुसार डेढ़ (1.5) मीटर का सेटबैक आगे से छोड़ देंगे, तो पीछे मकान में रहने के लिए कितनी जगह बचेगी? क्या हम सड़क पर सोएंगे?" उनका कहना है कि इस सेटबैक को छोड़ने के लिए उन्हें अपने बने-बनाए पक्के मकानों को तोड़ना पड़ेगा, जो कि पूरी तरह से अन्यायपूर्ण और अव्यवहारिक है।
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क्या था सुप्रीम कोर्ट का पूरा आदेश और कैसे शुरू हुई सीलिंग? (Timeline of Events)

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मेरठ के इस सबसे बड़े व्यावसायिक संकट की शुरुआत कुछ ही दिन पहले हुई थी। पूरे घटनाक्रम और आदेशों की टाइमलाइन कुछ इस प्रकार है:
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    6 अप्रैल 2026: सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने एक जनहित याचिका या पुराने मामले पर सख्ती दिखाते हुए मेरठ आवास विकास परिषद को कड़ा आदेश जारी किया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि सेंट्रल मार्केट क्षेत्र में अवैध रूप से चल रही 44 व्यावसायिक संपत्तियों (Commercial Properties) को तुरंत सील किया जाए और उसकी विस्तृत रिपोर्ट कोर्ट में पेश की जाए।
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    8 अप्रैल 2026: सुप्रीम कोर्ट की फटकार और सख्त आदेश के बाद आवास विकास (Awas Vikas) और मेरठ विकास प्राधिकरण (MDA) की नींद टूटी। प्रशासन ने भारी पुलिस बल के साथ सेंट्रल मार्केट में धावा बोला और चिन्हित की गई सभी 44 संपत्तियों पर ताला जड़कर सील लगा दी। इसमें दुकानें, शोरूम और स्कूल तक शामिल थे।
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    9 अप्रैल 2026: आवास विकास ने अपनी अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) सुप्रीम कोर्ट में पेश कर दी कि 44 संपत्तियां सील कर दी गई हैं।
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    अगली सुनवाई का बड़ा झटका: इसके बाद हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने जो आदेश दिया, उसने पूरे सेंट्रल मार्केट की नींव हिला दी। कोर्ट ने आदेश दिया कि केवल 44 संपत्तियां ही नहीं, बल्कि उस क्षेत्र के सभी 859 आवासों (Residential properties) को 2 महीने के अंदर नियमों के अनुसार 'सेटबैक' (Setback) छोड़ना होगा।
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आगे क्या? (The Road Ahead)

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सुप्रीम कोर्ट के इस 2 महीने के अल्टीमेटम ने मेरठ के सेंट्रल मार्केट के हजारों बाशिंदों की रातों की नींद उड़ा दी है। 859 मकानों में सेटबैक छोड़ने का सीधा मतलब है कि लगभग पूरे इलाके में तोड़फोड़ (Demolition) होगी। दशकों से अपने घरों में रह रहे लोगों को अपने ही हाथों अपनी गाढ़ी कमाई से बनाए गए आशियाने तोड़ने पड़ेंगे।
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व्यापारी अब इस मामले में केंद्र और राज्य सरकार से हस्तक्षेप की गुहार लगा रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार को इस समस्या का कोई नीतिगत और मानवीय समाधान (Policy Solution) निकालना चाहिए, ताकि हजारों परिवारों को उजड़ने और बेघर होने से बचाया जा सके। जब तक कोई ठोस कानूनी राहत नहीं मिलती, तब तक मेरठ की सड़कों पर यह विरोध प्रदर्शन यूं ही जारी रहने के आसार हैं।
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