ख़बरीलाल डेस्क, मेरठ: मेरठ की सेंट्रल मार्केट में 44 संपत्तियों की सीलिंग के बाद आज (गुरुवार) पूरा शहर जहां 'मेरठ बंद' के तहत सड़कों पर उतरकर विरोध जता रहा है, वहीं दिल्ली के सुप्रीम कोर्ट से व्यापारियों के लिए एक और बड़ा झटका सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट में आज हुई अहम सुनवाई में शीर्ष अदालत ने यह बिल्कुल साफ कर दिया है कि शास्त्री नगर के 860 आवासीय भूखंडों में अब कोई भी कमर्शियल (व्यावसायिक) गतिविधि बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इस आदेश ने उन सैकड़ों व्यापारियों की नींद उड़ा दी है, जिनका पूरा जीवन इन प्रतिष्ठानों पर निर्भर था।Read also:-मेरठ में सीलिंग का 'तूफान': 44 संपत्तियों पर लगा ताला, विरोध में पूरा शहर बंद; डॉक्टरों की OPD ठप, भावुक हुआ किन्नर समाज, सड़कों पर पसरा सन्नाटा
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आज की सुनवाई में आवास विकास परिषद ने 44 संपत्तियों को सील करने की अपनी विस्तृत 'कम्प्लायंस रिपोर्ट' (अनुपालन रिपोर्ट) सुप्रीम कोर्ट में पेश की। अदालत ने सीलिंग की इस कार्रवाई पर कोई रोक नहीं लगाई है, जिससे स्पष्ट है कि जिन प्रतिष्ठानों पर ताले लग चुके हैं, वे फिलहाल नहीं खुलेंगे।
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सुप्रीम कोर्ट का आदेश: 2 महीने में पूरा करें 'सेटबैक', पास कराएं आवासीय नक्शे
\r\n\r\nसुप्रीम कोर्ट ने अपनी सुनवाई में स्पष्ट निर्देश दिया है कि जिन आवासीय प्लॉटों पर व्यावसायिक गतिविधियां चल रही हैं, उन्हें तत्काल प्रभाव से बंद किया जाए। इसके साथ ही, अदालत ने सभी भूखंड मालिकों को राहत के नाम पर सिर्फ एक मोहलत दी है—'सेटबैक' की कार्रवाई।
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कोर्ट ने आदेश दिया है कि अगले दो महीने (60 दिन) के भीतर सभी लोगों को अपने प्रतिष्ठानों में सेटबैक (सड़क से निर्माण की तय दूरी) की कार्रवाई पूरी करनी होगी। सबसे बड़ी शर्त यह है कि सेटबैक के बाद जो नक्शे पास होंगे, वे विशुद्ध रूप से 'आवासीय' (Residential) ही होंगे, कमर्शियल नहीं। यानी, व्यापारी वहां अपना घर तो बना सकेंगे, लेकिन व्यापार नहीं कर सकेंगे। इस मामले में अगली सुनवाई 14 अप्रैल को होगी, जिस पर अब पूरे शहर की निगाहें टिक गई हैं।
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व्यापारियों के साथ 'धोखा'? 70 करोड़ रुपए पर मंडराया बड़ा संकट
\r\n\r\nइस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा और दर्दनाक मोड़ है व्यापारियों के 70 करोड़ रुपए का फंस जाना। जब सुप्रीम कोर्ट ने पहले ध्वस्तीकरण का आदेश दिया था, तब आवास विकास के अधिकारियों ने व्यापारियों को 'समाधान' का सपना दिखाया था।
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अधिकारियों ने कहा था कि 36,000 रुपए प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से शमन शुल्क जमा करके आवासीय प्लॉट को कमर्शियल में बदला जा सकता है। अपनी रोजी-रोटी बचाने की जद्दोजहद में व्यापारियों ने अपनी जीवन भर की पूंजी लगा दी, जेवर बेच दिए और बैंक से कर्ज लेकर लगभग 70 करोड़ रुपए आवास विकास के खजाने में जमा करा दिए।
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लेकिन, आज सुप्रीम कोर्ट में जो हुआ, उसने व्यापारियों को अंदर तक तोड़ दिया है। सुनवाई के दौरान जब इन पैसों का जिक्र आया, तो आवास विकास के चेयरमैन ने कोर्ट में साफ तौर पर कह दिया कि "व्यापारियों ने अपनी मर्जी से यह पैसा दिया था।" विभाग के इस यू-टर्न ने व्यापारियों को अधर में लटका दिया है। जिन व्यापारियों की दुकानें बुधवार को सील हुईं, उनमें से कई ने यह शुल्क जमा कर रखा था। अब व्यापारियों का सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर दुकानें सील ही होनी थीं, तो 70 करोड़ रुपए क्यों वसूले गए? क्या आवास विकास ने यह बात सुप्रीम कोर्ट से छिपाई थी?
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मेरठ बंदी पर असर: अब क्या करेंगे व्यापारी?
\r\n\r\nसुप्रीम कोर्ट के आदेश पर आवास विकास द्वारा की गई कार्रवाई के विरोध में आज मेरठ के व्यापारी पूर्ण बंदी रखे हुए हैं। शहर के 665 से ज्यादा व्यापारिक संगठनों, डॉक्टरों (IMA) और अधिवक्ताओं का इस बंदी को खुला समर्थन मिला है। आज के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद व्यापारियों का आक्रोश और हताशा दोनों चरम पर पहुंचने की आशंका है।
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कल (बुधवार) सीलिंग की कार्रवाई के दौरान दहशत के मारे कई व्यापारी बेहोश तक हो गए थे। अब 860 प्लॉटों पर कमर्शियल एक्टिविटी बैन होने और 70 करोड़ रुपए डूबने के डर से यह आंदोलन और उग्र हो सकता है। देखना यह होगा कि आज के फैसले की कॉपी पढ़ने के बाद संयुक्त व्यापार संघ आगे की क्या रणनीति तय करता है।
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ख़बरीलाल फ्लैशबैक: एक नजर में समझिए पूरा विवाद (1978 से 2026 तक का सफर)
\r\n\r\nआखिर यह नौबत क्यों आई कि सुप्रीम कोर्ट को इतना सख्त दखल देना पड़ा? आइए, इस पूरे विवाद की टाइमलाइन को आसान शब्दों में समझते हैं:
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- \r\n वर्ष 1978 (शुरुआत): यूपी आवास विकास परिषद ने शास्त्रीनगर 'गृहस्थानम योजना' संख्या तीन लॉन्च की थी। इसमें शास्त्रीनगर सेक्टर 1 से 13 तक शामिल थे। योजना मूल रूप से आवासीय थी, लेकिन लोगों की सहूलियत के लिए कुछ दुकानों की व्यवस्था भी की गई थी।\r\n \r\n
- \r\n अगस्त 1986 (आवंटन): काजीपुर निवासी वीर सिंह को 288 वर्ग मीटर का भूखंड संख्या 661/6 आवंटित किया गया और 30 अगस्त को उन्हें इसका कब्जा दे दिया गया।\r\n \r\n
- \r\n शर्त जो बनी फंदा: इस आवंटन की 'फ्री-होल्ड डीड' में एक बेहद स्पष्ट शर्त थी - इस संपत्ति का उपयोग केवल और केवल 'आवासीय उद्देश्य' (घर बनाने) के लिए ही किया जा सकता है।\r\n \r\n
- \r\n अवैध निर्माण की नींव: यहीं से नियम टूटने शुरू हुए। व्यापारी नेता विनोद अरोड़ा ने पावर ऑफ अटॉर्नी की सहायता से उस आवासीय प्लॉट पर एक बड़ा कमर्शियल कॉम्प्लेक्स खड़ा कर दिया और उसमें 22 दुकानें बना लीं।\r\n \r\n
- \r\n सितंबर 2025 (पहला बड़ा एक्शन): इस अवैध निर्माण के खिलाफ एक लंबी कानूनी लड़ाई चली। आखिरकार, 17 सितंबर 2025 को कोर्ट ने भूखंड 661/6 सहित ऐसे सभी अवैध निर्माणों को ध्वस्त करने का आदेश सुना दिया।\r\n \r\n
- \r\n 25 अक्टूबर 2025 (बुलडोजर की कार्रवाई): प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए 22 दुकानों वाले उस कॉम्प्लेक्स को ढहा दिया।\r\n \r\n
- \r\n 27 जनवरी 2026 (सुप्रीम कोर्ट की एंट्री): मामला देश की सबसे बड़ी अदालत में पहुंचा। 27 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने पूरे सेंट्रल मार्केट क्षेत्र में आवासीय प्लॉटों पर चल रही सभी व्यावसायिक गतिविधियों को ध्वस्त करने का कड़ा आदेश दे दिया।\r\n \r\n
- \r\n धरना और 70 करोड़ का खेल: सुप्रीम कोर्ट के आदेश से घबराए व्यापारियों ने अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया। दबाव में आकर आवास विकास ने 'भू-उपयोग' बदलने का ऑफर दिया (36,000 रुपये प्रति वर्ग मीटर शुल्क)। व्यापारियों ने 70 करोड़ रुपये जमा कर दिए।\r\n \r\n
- \r\n 6 अप्रैल 2026 (सुप्रीम कोर्ट की फटकार): सुप्रीम कोर्ट में मामले की फिर सुनवाई हुई। कोर्ट ने पूर्व कमिश्नर हृषिकेश भास्कर यशोद से ध्वस्तीकरण रोकने के पुराने आदेश (जिसके तहत पैसे जमा कराए जा रहे थे) पर जवाब मांगा और कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने बिना किसी देरी के 44 संपत्तियों को तुरंत सील करने का आदेश दिया।\r\n \r\n
- \r\n 8 अप्रैल 2026 (सीलिंग): बुधवार को भारी पुलिस बल के बीच आवास विकास ने 44 संपत्तियों पर सरकारी ताले जड़ दिए।\r\n \r\n
- \r\n 9 अप्रैल 2026 (आज): सुप्रीम कोर्ट में आवास विकास ने रिपोर्ट पेश की। कोर्ट ने 860 प्लॉट पर कमर्शियल गतिविधि बैन कर दी और 2 महीने में आवासीय नक्शे पास कराने का आदेश दिया।\r\n \r\n
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अब पूरी तस्वीर 14 अप्रैल को होने वाली अगली सुनवाई में ही साफ हो पाएगी, लेकिन फिलहाल मेरठ के व्यापारियों के लिए यह दौर किसी भयानक दुःस्वप्न से कम नहीं है।
Sabse pehle comment karne wale banein.