उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर की धड़कन कहे जाने वाले 'सेंट्रल मार्केट' की सूरत इन दिनों पूरी तरह से बदल गई है। जहां कभी ग्राहकों की भारी भीड़, रंग-बिरंगी दुकानें और व्यापारिक चहल-पहल हुआ करती थी, वहां आज खौफ, मायूसी, और सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश नजर आ रहा है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की सख्ती और आवास विकास परिषद (Awas Vikas Parishad) की कार्रवाई के विरोध में व्यापारियों का अनिश्चितकालीन धरना आज चौथे दिन भी जारी रहा।READ ALSO:-मेरठ सेंट्रल मार्केट में सीलिंग का खौफ: तीसरे दिन भी सड़क पर डटे व्यापारी और निवासी, महिलाओं और बच्चियों ने 'पलायन' के पोस्टर लेकर लगाई योगी-मोदी से गुहार
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व्यापारियों के साथ-साथ उनके परिवार, महिलाएं और छोटे-छोटे बच्चे भी अब इस अस्तित्व की लड़ाई में सड़क पर उतर आए हैं। आलम यह है कि प्रशासन और सरकार से नाउम्मीद हो चुके व्यापारियों ने अब ईश्वरीय शक्ति की शरण ले ली है। आइए, एक-एक पहलू से समझते हैं कि आखिर मेरठ के इस सबसे पॉश और बड़े बाजार में 'पलायन' की नौबत क्यों आई, 70 करोड़ रुपये का विवाद क्या है, और 1990 से चला आ रहा यह पूरा मामला अब किस मुकाम पर खड़ा है।
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रविवार की ग्राउंड रिपोर्ट: बाजार ठप, ग्राहकों की जगह पुलिस और प्रदर्शनकारी

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रविवार का दिन सेंट्रल मार्केट के लिए व्यापार का सबसे मुख्य दिन माना जाता है। छुट्टी का दिन होने के कारण पूरे मेरठ और आस-पास के इलाकों से लोग यहां खरीदारी करने आते हैं। लेकिन इस रविवार की तस्वीर बिल्कुल जुदा थी।
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    ठप्प पड़ा व्यापार: मार्केट की आधी से ज्यादा दुकानें शटर गिराए हुए बंद पड़ी थीं। जिन इक्का-दुक्का व्यापारियों ने हिम्मत करके दुकानें खोली भी थीं, वहां ग्राहकों का पूरी तरह से सन्नाटा था। सीलिंग के खौफ और धरने के कारण लोग बाजार आने से कतरा रहे हैं।
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    सड़क पर गूंजा हनुमान चालीसा: अपनी दुकानों के सामने टेंट लगाकर बैठे व्यापारियों के साथ रविवार को उनके परिवार भी शामिल हो गए। महिलाओं और बच्चों ने मिलकर धरना स्थल पर 'हनुमान चालीसा' का सामूहिक पाठ शुरू कर दिया।
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    महिलाओं का दर्द और ईश्वर से गुहार: धरने पर बैठी महिलाओं का दर्द उनके शब्दों में साफ झलक रहा था। उनका कहना था, "संकट कटे मिटे सब पीरा, जो सुमिरे हनुमत बलवीरा... जब हमारी राज्य सरकार, स्थानीय प्रशासन और आवास विकास परिषद के अधिकारी हमारी कोई सुनवाई नहीं कर रहे हैं, तो अब हमारे पास बजरंग बली के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। वही हमारी सुरक्षा करेंगे और आवास विकास के अधिकारियों को सद्बुद्धि देंगे।"
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    32°C तापमान और बच्चों के हाथों में 'पलायन' के पोस्टर: विरोध प्रदर्शन का सबसे हृदयविदारक दृश्य वह था जब 32 डिग्री सेल्सियस की चिलचिलाती धूप और तपिश में छोटे-छोटे बच्चे सड़क पर उतरे। इन मासूमों के हाथों में 'पलायन' (Exodus) के पोस्टर थे। बच्चे देश के प्रधानमंत्री से गुहार लगा रहे थे, "प्रधानमंत्री जी, हमारी गुहार सुनें। हमारे बाजार, हमारी दुकानों और हमारे स्कूलों को बचा लें। हमें हमारा पुराना और सुरक्षित सेंट्रल मार्केट वापस कर दें।"
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व्यापारियों ने साफ कर दिया है कि जब तक सुप्रीम कोर्ट के आदेश में उनके पक्ष में कोई संशोधन नहीं होता या सरकार उन्हें लिखित आश्वासन नहीं देती, वे टेंट गाड़कर यहीं डटे रहेंगे।
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सियासी उबाल: पैदल मार्च की चेतावनी और डॉ. बाजपेयी की नसीहत

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सेंट्रल मार्केट का यह मुद्दा अब सिर्फ एक कानूनी या प्रशासनिक लड़ाई नहीं रह गया है, बल्कि इसने मेरठ की सियासत में भी भारी उबाल ला दिया है। विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक संगठन इस मुद्दे पर अपनी रोटियां सेंकने और व्यापारियों का साथ देने के लिए आगे आ रहे हैं।
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सचिन सिरोही की दिल्ली कूच की चेतावनी: हिंदूवादी नेता सचिन सिरोही अपने समर्थकों के साथ सेंट्रल मार्केट पहुंचे और व्यापारियों के धरने को अपना पूर्ण समर्थन दिया। उन्होंने मंच से हुंकार भरते हुए कहा कि व्यापारियों के साथ किसी भी कीमत पर अन्याय नहीं होने दिया जाएगा। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि व्यापारियों को उनकी दुकानें और प्रतिष्ठान वापस नहीं मिलते हैं, तो वे व्यापारियों को साथ लेकर मेरठ से दिल्ली तक एक विशाल पैदल यात्रा (Foot March) करेंगे और केंद्र सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाएंगे।
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डॉ. लक्ष्मीकांत बाजपेयी का संतुलित और स्पष्ट रुख: वहीं दूसरी ओर, मेरठ के दिग्गज भाजपा नेता और राज्यसभा सदस्य डॉ. लक्ष्मीकांत बाजपेयी का इस पूरे प्रकरण पर रुख काफी परिपक्व और स्पष्ट रहा। व्यापारियों के बीच न पहुंचने को लेकर उठ रहे सवालों और विपक्ष के हमलों का उन्होंने करारा जवाब दिया।
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    व्यापारियों की गुटबाजी: डॉ. बाजपेयी ने साफ कहा कि सेंट्रल मार्केट के व्यापारियों के बीच आपसी बंटवारा और गुटबाजी है। जब पहले टावर (कॉम्प्लेक्स 661/6) को ध्वस्त करने की बात चल रही थी, तब कुछ लोगों ने व्यापारियों को गुमराह किया था कि बाकी दुकानों पर कोई कार्रवाई नहीं होगी। इसी भ्रम के कारण जन प्रतिनिधियों और व्यापारियों के बीच दूरियां बढ़ीं।
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    राजनीति का अखाड़ा नहीं: उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि किसी के घर में दुख और रोजी-रोटी का संकट होने पर वहां जाकर राजनीति करना गलत है। वे व्यापारियों का समर्थन करते हैं, लेकिन वहां जाकर सियासी ड्रामा करने का उनका कोई इरादा नहीं है।
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    माई-बाप है न्यायपालिका: सांसद ने उम्मीद जताते हुए कहा कि अभी भी समाधान की आशा की किरण बाकी है। व्यापारियों को 2 महीने का समय मिला है। न्यायालय और सरकार दोनों 'माई-बाप' के समान हैं। वे नियमों के दायरे में रहते हुए उचित पैरवी के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट से समाधान की पूरी उम्मीद कर रहे हैं।
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आवास विकास बनाम व्यापारी: 70 करोड़ रुपये की 'वसूली' का रहस्य

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इस पूरे विवाद में जो सबसे बड़ा और उलझा हुआ पेंच है, वह है आवास विकास परिषद द्वारा व्यापारियों से वसूले गए 70 करोड़ रुपये। व्यापारियों का गुस्सा इसी बात को लेकर सातवें आसमान पर है कि जब सीलिंग होनी ही थी, तो उनसे करोड़ों रुपये क्यों ठगे गए?
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क्या है 70 करोड़ का गणित?

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    27 जनवरी 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि 6 सप्ताह के भीतर आवासीय जमीन पर चल रही सभी कमर्शियल (व्यावसायिक) गतिविधियों और प्रतिष्ठानों को ध्वस्त कर दिया जाए।
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    इस आदेश के बाद व्यापारियों में हड़कंप मच गया और उन्होंने अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया।
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    दबाव में आकर आवास विकास के अधिकारियों ने एक 'राहत' का रास्ता निकाला। उन्होंने एक आदेश जारी किया जिसमें कहा गया कि यदि व्यापारी 36,000 रुपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से 'शमन शुल्क' (Compounding Fee) जमा कर दें, तो उनके आवासीय प्लॉट के भू-उपयोग (Land Use) को कमर्शियल में बदला जा सकता है।
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    अपनी जीवन भर की पूंजी और रोजी-रोटी बचाने की आस में, व्यापारियों ने अपनी-अपनी दुकानों के क्षेत्रफल के अनुसार पैसे जुटाए। देखते ही देखते आवास विकास के खाते में लगभग 70 करोड़ रुपये जमा हो गए।
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सुप्रीम कोर्ट में क्यों छुपाई गई 70 करोड़ की बात? व्यापारियों ने 70 करोड़ रुपये देकर चैन की सांस ली ही थी कि 6 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट का नया हथौड़ा चल गया। कोर्ट ने 44 संपत्तियों को तुरंत सील करने का आदेश दे दिया। जब बुधवार को आवास विकास की टीम सीलिंग करने पहुंची, तो व्यापारियों का गुस्सा फूट पड़ा। व्यापारियों का सीधा सवाल था: "अगर आपने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ही सीलिंग करनी थी, तो हमसे 70 करोड़ रुपये भू-उपयोग बदलवाने के नाम पर क्यों वसूले गए? और सबसे बड़ी बात, आवास विकास ने सुप्रीम कोर्ट में यह बात क्यों नहीं बताई कि हमने व्यापारियों से करोड़ों रुपये का शमन शुल्क ले लिया है?"
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प्रशासन की सफाई: इस भारी विरोध और 70 करोड़ के सवाल पर आवास विकास के अधिकारी तो मौन साधे रहे, लेकिन एडीएम सिटी (ADM City) बृजेश कुमार सिंह ने स्थिति को संभालने की कोशिश की। उन्होंने एक अजीबोगरीब तर्क देते हुए कहा कि भू-उपयोग बदलवाने के लिए पैसा जमा करना एक 'अलग प्रक्रिया' है और सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया सीलिंग का आदेश एक 'अलग मामला' है। एडीएम ने स्पष्ट किया कि, "यदि कोई व्यापारी ऐसा है जो अब अपना भू-उपयोग नहीं बदलवाना चाहता और अपना जमा किया हुआ पैसा वापस लेना चाहता है, तो वह लिखित में दे सकता है। प्रशासन उसका पैसा वापस दिलाने में पूरा सहयोग करेगा।" लेकिन व्यापारियों के लिए यह कोई समाधान नहीं है; उन्हें अपना पैसा नहीं, बल्कि अपनी दुकानें और रोजगार चाहिए।
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आखिर क्यों हो रहा है सेंट्रल मार्केट पर एक्शन? (क्या है सेटबैक का नियम)

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सुप्रीम कोर्ट का यह डंडा सिर्फ एक दिन की उपज नहीं है। इसके पीछे अवैध निर्माण और नियमों की अनदेखी का एक लंबा इतिहास है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से 859 संपत्तियों पर बने अवैध 'सेटबैक' (Setback) को दो महीने के भीतर तोड़ने का आदेश दिया है।
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सेटबैक क्या होता है? नगर निगम और आवास विकास के बिल्डिंग बायलॉज (Building Bye-laws) के अनुसार, जब भी कोई इमारत (आवासीय या व्यावसायिक) बनाई जाती है, तो उस प्लॉट के चारों ओर (आगे, पीछे और दोनों तरफ) कुछ निश्चित खाली जगह छोड़नी अनिवार्य होती है। इसे ही सेटबैक कहते हैं। यह जगह हवा, रोशनी, पार्किंग और आपात स्थिति (जैसे फायर ब्रिगेड के आने) के लिए छोड़ी जाती है। मेरठ के सेंट्रल मार्केट में व्यापारियों ने नियमों को ताक पर रखते हुए इस खाली जगह (सेटबैक) पर भी पक्का निर्माण कर लिया और दुकानों का विस्तार कर लिया।
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सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार: 9 अप्रैल की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार और आवास विकास के अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा: "आप लोगों ने स्कूलों, अस्पतालों और यहां तक कि सरकारी बैंकों को भी ऐसी अवैध इमारतों से संचालित होने की अनुमति कैसे दे दी, जो पूरी तरह से गैर-कानूनी हैं और बिना इजाजत के सेटबैक कवर करके बनाई गई हैं?" कोर्ट की इसी सख्ती के बाद प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए और 6 अप्रैल को 44 संपत्तियों को सील करने का फरमान जारी कर दिया गया।
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फ्लैशबैक 1990: एक थप्पड़ की गूंज, जिसने लिखी इस बर्बादी की पटकथा

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सेंट्रल मार्केट की इस पूरी तबाही की जड़ें आज से 36 साल पहले, साल 1990 की एक घटना में छिपी हैं। यह जानना बेहद दिलचस्प है कि कैसे एक छोटे से विवाद ने इतने बड़े बाजार को आज सुप्रीम कोर्ट के कठघरे में ला खड़ा किया है।
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    अधीक्षण अभियंता से मारपीट (1990): बात साल 1990 की है। मेरठ आवास विकास को सूचना मिली थी कि सेंट्रल मार्केट के एक आवासीय भूखंड (प्लॉट संख्या 661/6) पर अवैध रूप से एक कमर्शियल कॉम्प्लेक्स का निर्माण किया जा रहा है। तत्कालीन अधीक्षण अभियंता अरविंद कुमार अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंचे और लेंटर डालने के काम को रुकवाने का प्रयास किया।
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    थप्पड़ कांड और FIR: काम रुकवाने पर स्थानीय व्यापारियों और अधिकारियों के बीच तीखी बहस हो गई। मामला इतना गरमा गया कि कुछ व्यापारियों ने गुस्से में आकर अधीक्षण अभियंता अरविंद कुमार को थप्पड़ जड़ दिया। इस घटना के बाद बवाल मच गया और नौचंदी थाने में सरकारी काम में बाधा डालने और मारपीट की नामजद FIR दर्ज कराई गई।
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    लंबी कानूनी लड़ाई: इस घटना के बाद आवास विकास ने इस अवैध कॉम्प्लेक्स को अपना 'ईगो' (अहंकार) का मुद्दा बना लिया। उन्होंने कई बार इसे गिराने की कोशिश की, लेकिन राजनीतिक दबाव और स्टे ऑर्डर के कारण अड़चनें आती रहीं। हार मानकर आवास विकास ने इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) में रिट दायर कर दी।
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    2014 से 2025 तक का सफर: सालों तक चली सुनवाई के बाद साल 2014 में हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि 2 महीने के भीतर इस अवैध इमारत को ढहाया जाए। व्यापारियों ने इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। करीब 10 साल तक देश की सबसे बड़ी अदालत में यह मामला चला।
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    अंततः गिरा 661/6 का कॉम्प्लेक्स: अंततः 17 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कॉम्प्लेक्स नंबर 661/6 सहित सभी अवैध निर्माणों को ध्वस्त करने का अंतिम आदेश दे दिया। इसी आदेश के अनुपालन में 25 अक्टूबर 2025 को 22 दुकानों वाले इस विवादित कॉम्प्लेक्स को जमींदोज कर दिया गया। और वहीं से शुरू हुई बाकी 859 संपत्तियों पर सीलिंग और ध्वस्तीकरण की यह खौफनाक श्रृंखला, जो आज पूरे बाजार के अस्तित्व को निगलने के लिए तैयार खड़ी है।
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आगे क्या है रास्ता?

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मेरठ का सेंट्रल मार्केट आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहां एक तरफ न्यायपालिका का सख्त डंडा है और दूसरी तरफ हजारों परिवारों के पेट का सवाल। व्यापारियों को ध्वस्तीकरण से 2 महीने की जो अस्थायी मोहलत मिली है, वह उनके लिए 'करो या मरो' की स्थिति है।
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अब सारा दारोमदार इस बात पर है कि क्या उत्तर प्रदेश सरकार और स्थानीय जनप्रतिनिधि (जैसे डॉ. लक्ष्मीकांत बाजपेयी) सुप्रीम कोर्ट के समक्ष व्यापारियों का पक्ष मजबूती से रख पाते हैं या नहीं? क्या 70 करोड़ रुपये का शमन शुल्क व्यापारियों की ढाल बनेगा या फिर यह महज एक सरकारी खजाने को भरने की चाल साबित होगा? आने वाले 60 दिन मेरठ के इस ऐतिहासिक बाजार का भविष्य तय करेंगे। फिलहाल, तपती सड़कों पर टेंट के नीचे गूंजता 'हनुमान चालीसा' और बच्चों के हाथों में 'पलायन' के पोस्टर, सिस्टम की विफलता की एक बेहद खौफनाक कहानी बयां कर रहे हैं।
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