सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के कड़े दिशा-निर्देशों के बाद आवासीय भूखंडों (Residential Plots) पर चल रही व्यावसायिक गतिविधियों और दुकानों को बंद करने की प्रशासनिक कार्रवाई तेज हो गई है। लेकिन इस कानूनी कार्रवाई ने एक बड़े मानवीय संकट को जन्म दे दिया है। सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन कर रही महिलाओं और स्थानीय निवासियों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे देश की सर्वोच्च अदालत के फैसले का पूरा सम्मान करते हैं। उनकी रोजी-रोटी का जरिया बनी इन दुकानों को वे खुद बंद करने को तैयार हैं, लेकिन प्रशासन द्वारा 'सेटबैक' (Setback) छोड़ने की जो शर्त थोपी जा रही है, वह किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी।READ ALSO:-आसमान पर पहुंचे सोने के दाम: अक्षय तृतीया से पहले खरीदारों को लगा बड़ा झटका, फटाफट चेक करें अपने शहर के लेटेस्ट रेट
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स्थानीय लोगों का दर्द और आक्रोश इस बात को लेकर है कि प्रशासन कानून के पालन के नाम पर उनके सिर से छत छीनने की तैयारी कर रहा है। 'खबरीलाल' की इस विस्तृत रिपोर्ट में जानिए आखिर क्या है यह पूरा विवाद और क्यों 40 साल पुराने इन मकानों पर बुलडोजर या हथौड़ा चलाना एक बड़ी त्रासदी को दावत दे सकता है।
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सेक्टर 2 का सबसे बड़ा संकट: 37 वर्ग मीटर के मकान और सेटबैक का अव्यावहारिक फरमान

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इस पूरे विवाद का केंद्र बिंदु सेक्टर 2 बना हुआ है। यहां के निवासियों की पीड़ा सबसे ज्यादा है और इसका एक बड़ा तकनीकी कारण भी है। दरअसल, सेक्टर 2 में अधिकांश मकान बेहद छोटे आकार के हैं। यहां कई परिवारों के पास केवल 37 वर्ग मीटर के क्षेत्रफल वाले भूखंड हैं, जिन पर उनके आशियाने बने हुए हैं।
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प्रशासन के नए नियमों और निर्देशों के तहत, यदि इन छोटे मकानों में व्यावसायिक गतिविधि बंद भी कर दी जाती है, तो भी उन्हें 1 मीटर का 'सेटबैक' (भवन के आगे या पीछे छोड़ी जाने वाली अनिवार्य खाली जगह) छोड़ना होगा। स्थानीय निवासियों का तर्क है कि 37 मीटर के कुल क्षेत्रफल वाले मकान में से अगर 1 मीटर जगह सेटबैक के लिए तोड़ दी गई, तो पीछे रहने के लिए जगह ही कितनी बचेगी? एक छोटे से कमरे और रसोई में गुजर-बसर कर रहे इन परिवारों के लिए एक मीटर का हिस्सा टूटना उनके पूरे घर के नक्शे और अस्तित्व को खत्म करने के बराबर है।
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"हम कानून नहीं तोड़ना चाहते, लेकिन बेघर होना भी मंजूर नहीं"

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सड़कों पर धरने पर बैठीं महिलाओं का साफ कहना है, "दुकान बंद कर देंगे, इसमें हमें कोई आपत्ति नहीं है। हम सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार अपनी दुकानें जो आवासीय प्लॉट में चल रही थीं, उनको बंद करने के लिए शत-प्रतिशत तैयार हैं। हम सिर्फ यह गुहार लगा रहे हैं कि हमारे मकानों में सेटबैक ना लिया जाए।" यह बयान इस बात का प्रमाण है कि नागरिक कानून का पालन करना चाहते हैं, लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों के अव्यावहारिक नियमों ने उन्हें सड़क पर उतरने को मजबूर कर दिया है।
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40 साल पुरानी इमारतें: एक ईंट खिसकी तो ढह जाएंगे आशियाने

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सेटबैक के इस विवाद में केवल जगह की कमी ही एकमात्र समस्या नहीं है, बल्कि इससे जुड़ा एक बेहद खतरनाक पहलू भी है। सेक्टर 2 में बने ये मकान कोई नए या आधुनिक तकनीक से बने निर्माण नहीं हैं। ये मकान लगभग 40 साल पुराने हैं। चार दशकों में इन मकानों की नींव, दीवारें और छतें समय की मार झेलकर कमजोर हो चुकी हैं।
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इंजीनियरिंग और निर्माण के जानकारों का भी मानना है कि इतनी पुरानी संरचनाओं (Old Structures) के साथ छेड़छाड़ करना बेहद खतरनाक हो सकता है। यदि प्रशासन ने सेटबैक छोड़ने के लिए इन 40 साल पुराने मकानों के आगे के हिस्से (Front Elevation) को तोड़ने की कोशिश की, तो पूरा का पूरा मकान भरभरा कर गिर सकता है।
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    नींव पर असर: पुराने मकानों की नींव एक-दूसरे से जुड़ी होती है। एक हिस्से पर हथौड़ा चलने से पूरे ढांचे में कंपन होगा, जिससे दरारें आ सकती हैं।
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    जानमाल का खतरा: यदि मकान गिरा, तो यह केवल ईंट और पत्थर का नुकसान नहीं होगा, बल्कि इसके मलबे में दबकर किसी बड़े हादसे की आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता।
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महिलाओं का यही खौफ उन्हें चैन से सोने नहीं दे रहा है। उनका कहना है कि "यदि 40 साल पुराने मकान को ऐसे तोड़ा जाएगा तो वह पूरा भी गिर सकता है।" ## आखिर कहां जाएंगे ये परिवार? मानवीय दृष्टिकोण की अनदेखी
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इस पूरी कार्रवाई में प्रशासन का रवैया तकनीकी रूप से सही हो सकता है, लेकिन इसमें मानवीय संवेदनाओं की भारी कमी नजर आ रही है। एक तरफ इन परिवारों से उनकी आजीविका का साधन छीना जा रहा है, क्योंकि वे अपनी छोटी-मोटी दुकानें बंद कर रहे हैं। दूसरी तरफ, अब उनके सिर से छत छीनने की तैयारी है।
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स्थानीय निवासियों के कुछ चुभते हुए सवाल:

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    आजीविका छिनने के बाद, अगर मकान भी टूट गया, तो हम अपने बच्चों का पेट कैसे पालेंगे और उन्हें लेकर कहां जाएंगे?
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    40 साल पहले जब ये मकान बन रहे थे, तब नक्शा पास करने वाले और सेटबैक का नियम देखने वाले अधिकारी कहां सो रहे थे?
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    क्या प्रशासन के पास इन बेघर होने वाले परिवारों के पुनर्वास (Rehabilitation) की कोई योजना है?
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क्या है सेटबैक नियम? (What is Setback Rule?)

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भवन निर्माण के नियमों के अनुसार, किसी भी प्लॉट की सीमा और उस पर बनाए जाने वाले भवन के बीच कुछ खाली जगह छोड़नी अनिवार्य होती है, जिसे 'सेटबैक' कहा जाता है। यह हवा, रोशनी और आपातकालीन स्थितियों (जैसे फायर ब्रिगेड की गाड़ी के आने-जाने) के लिए छोड़ा जाता है। हालांकि, दशकों पहले बने मकानों में अक्सर इस नियम की अनदेखी की गई थी और अब दशकों बाद इस नियम को सख्ती से लागू करना लाखों लोगों के लिए मुसीबत बन गया है।
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प्रशासन से संवाद और न्याय की आस: बीच का रास्ता निकालना जरूरी

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इस मामले में अब गेंद पूरी तरह से स्थानीय प्रशासन और विकास प्राधिकरण के पाले में है। 'खबरीलाल' का यह मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान होना चाहिए, लेकिन न्याय की कीमत किसी के आशियाने की तबाही नहीं हो सकती।
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प्रशासन को चाहिए कि वह सेक्टर 2 के इन प्रभावित निवासियों के साथ बैठे और एक ऐसा 'बीच का रास्ता' (Middle Ground) निकाले जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। जिन मकानों का क्षेत्रफल बेहद कम (जैसे 37 मीटर) है और जो 40 साल से अधिक पुराने हैं, उनके लिए सेटबैक के नियमों में विशेष छूट या कोई 'वन-टाइम सेटलमेंट' (One-Time Settlement) योजना लाई जानी चाहिए।
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जब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकलता, तब तक इन महिलाओं का संघर्ष सड़कों पर यूं ही जारी रहेगा। अब देखना यह है कि क्या सिस्टम की संवेदनाएं जागती हैं, या फिर 40 साल पुरानी इन दीवारों पर सेटबैक का निर्दयी हथौड़ा चलता है।
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