उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर का प्रमुख व्यापारिक केंद्र, 'सेंट्रल मार्केट' इन दिनों टावर और दुकानों के ध्वस्तीकरण (Demolition) की कार्रवाई को लेकर सुर्खियों में है। इस पूरे मामले में एक तरफ जहां व्यापारियों में रोष और असमंजस का माहौल है, वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। इसी बीच, राज्यसभा सदस्य और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता डॉ. लक्ष्मीकांत बाजपेयी ने सेंट्रल मार्केट में व्यापारियों के बीच न जाने को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने अपनी गैर-मौजूदगी की वजहों का खुलासा करते हुए विपक्ष पर भी जमकर निशाना साधा है।READ ALSO:-बिजनौर क्राइम: लूट का विरोध करने पर बुजुर्ग महिला को पत्थर से कुचला, 24 घंटे में पुलिस मुठभेड़ में कातिल जीशान गिरफ्तार, 'तीसरी आंख' (CCTV) ने खोला राज
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आइए, इस पूरे विवाद और डॉ. बाजपेयी के बयानों के प्रमुख बिंदुओं को विस्तार से समझते हैं:
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व्यापारियों की 'आपसी गुटबाजी' बनी दूरी की वजह

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डॉ. लक्ष्मीकांत बाजपेयी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनके सेंट्रल मार्केट न जाने का मुख्य कारण व्यापारियों के बीच चल रहा आपसी बंटवारा और गुटबाजी है। उन्होंने उस घटना का जिक्र किया जब पहले टावर को ध्वस्त करने की चर्चा चल रही थी। उस समय कुछ लोगों और व्यापारी गुटों ने यह दावा किया था कि कार्रवाई केवल एक टावर तक सीमित रहेगी और बाकी दुकानों पर कोई आंच नहीं आएगी।
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इस गलतफहमी और अलग-अलग दावों के कारण व्यापारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच आपसी विश्वास में कमी आई और विवाद की स्थिति पैदा हो गई। डॉ. बाजपेयी का मानना है कि जब तक प्रभावित पक्षों में एकजुटता नहीं होगी, तब तक किसी भी समस्या का ठोस समाधान निकालना मुश्किल होता है।
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2 महीने की मोहलत: समाधान की जगी 'आशा की किरण'

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व्यापारियों की बेचैनी के बीच एक राहत भरी खबर यह है कि उन्हें ध्वस्तीकरण की कार्रवाई से फिलहाल 2 महीने की मोहलत (Relief) मिल गई है। डॉ. बाजपेयी ने इस समय-सीमा को एक 'आशा की किरण' बताया है।
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    कानूनी लड़ाई की तैयारी: उन्होंने कहा कि इस 2 महीने के बहुमूल्य समय का उपयोग कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर लड़ाई लड़ने के लिए किया जाएगा।
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    सुप्रीम कोर्ट का रुख: जनता और व्यापारियों की ओर से राज्य सरकार और माननीय सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के समक्ष पुनर्विचार के लिए अपील दायर की जाएगी, ताकि व्यापारियों की आजीविका को बचाया जा सके।
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"सरकार और न्यायालय 'माई-बाप' के समान हैं"

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इस पूरे प्रकरण में व्यवस्था के प्रति अपना विश्वास जताते हुए डॉ. बाजपेयी ने एक भावुक लेकिन मजबूत बयान दिया। उन्होंने कहा कि "सरकार और न्यायालय दोनों ही जनता के लिए 'माई-बाप' (अभिभावक) के समान होते हैं।"
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उनका स्पष्ट संकेत था कि न्यायपालिका और प्रशासन से टकराव के बजाय संवाद का रास्ता अपनाया जाना चाहिए। वे उचित कानूनी विशेषज्ञों और प्रतिनिधियों के माध्यम से न्यायालय के सामने व्यापारियों का पक्ष दोबारा पूरी मजबूती से रखेंगे। उन्हें पूरी उम्मीद है कि न्यायालय इस मामले की विशेष परिस्थितियों (व्यापारियों के रोजगार और आजीविका) को ध्यान में रखते हुए नियमों के दायरे में कोई न कोई सकारात्मक समाधान जरूर निकालेगा।
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विपक्ष पर तीखा प्रहार: 'सियासी रोटियां सेंकना बंद करें'

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सेंट्रल मार्केट विवाद में जनप्रतिनिधियों के न पहुंचने को लेकर विपक्षी दलों द्वारा की जा रही आलोचनाओं का डॉ. बाजपेयी ने करारा जवाब दिया। उन्होंने इसे विशुद्ध रूप से 'राजनीतिक अवसरवादिता' करार दिया।
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    संवेदनशीलता की कमी: उन्होंने विपक्ष को नसीहत देते हुए कहा कि किसी के घर या व्यापार में आए संकट और दुख के समय वहां जाकर राजनीति करना पूरी तरह से गलत और अनैतिक है।
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    समर्थन बनाम राजनीति: डॉ. बाजपेयी ने अपनी मंशा साफ करते हुए कहा, "हम व्यापारियों का हर संभव समर्थन करने और उनकी मदद करने के लिए उनके पास जा सकते हैं, लेकिन इस संवेदनशील मुद्दे पर वहां जाकर राजनीति करने का हमारा कोई इरादा नहीं है और न ही ऐसा करना उचित है।"
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आगे का रास्ता क्या है?

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सेंट्रल मार्केट का यह विवाद अब एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है। 2 महीने का समय व्यापारियों और जनप्रतिनिधियों दोनों के लिए एक परीक्षा की तरह है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि डॉ. बाजपेयी और अन्य नेता किस प्रकार न्यायालय के समक्ष एक मजबूत अपील पेश करते हैं और क्या मेरठ के इन व्यापारियों को उनके 'माई-बाप' (सरकार और कोर्ट) से कोई स्थायी राहत मिल पाती है या नहीं।
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