मेरठ। सनातन धर्म में नवरात्रि का पर्व शक्ति की उपासना और आत्म-मंथन का सबसे पवित्र समय माना जाता है। विशेषकर 'गुप्त नवरात्रि' (Gupt Navratri) के पावन अवसर पर की गई साधना और सत्संग का फल कई गुना बढ़ जाता है। इसी आध्यात्मिक ऊर्जा और भक्ति भाव के साथ मेरठ के जागृति विहार एक्सटेंशन स्थित 'वेदांत आश्रम' के प्रांगण में इन दिनों भक्ति की अविरल गंगा बह रही है। वेदांत सत्संग समिति, मेरठ के तत्वावधान में आयोजित सात दिवसीय 'श्रीमद् देवी भागवत कथा सप्ताह' श्रद्धालुओं के लिए आस्था और ज्ञान का बड़ा केंद्र बन गया है।READ ALSO:-मुजफ्फरनगर में कुदरत का कहर: लगातार बारिश से भरभराकर ढहा कच्चा मकान, मलबे में दबकर 4 मासूमों समेत 5 की दर्दनाक मौत, गांव में पसरा मातम
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
रविवार, 19 जुलाई 2026 को कथा के चतुर्थ दिवस (शाम 5 से 7 बजे के सत्र में) परम पूज्य महामंडलेश्वर स्वामी अनंतानंद सरस्वती जी ने व्यासपीठ पर विराजमान होकर श्रीमद् देवी भागवत पुराण के गूढ़ रहस्यों और तात्विक ज्ञान का अद्भुत वर्णन किया। स्वामी जी ने कथा के माध्यम से गृहस्थ जीवन, वैराग्य, और सनातन परंपराओं के निर्वहन पर जो प्रकाश डाला, उसने वहां उपस्थित सैकड़ों श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। आइए जानते हैं कथा के चौथे दिन के मुख्य प्रसंग और स्वामी जी के अनमोल उपदेश।
\r\n\r\n

 

विज्ञापन
विज्ञापन
\r\n\r\n

शुकदेव-जनक संवाद: प्रवृत्ति और निवृत्ति धर्म का अद्भुत ज्ञान

\r\n\r\n
कथा की शुरुआत करते हुए पूज्य स्वामी अनंतानंद सरस्वती जी ने महर्षि वेदव्यास जी और उनके परम ज्ञानी पुत्र शुकदेव जी के एक अत्यंत प्रेरक प्रसंग का वर्णन किया। स्वामी जी ने बताया कि महर्षि व्यास जी चाहते थे कि उनका पुत्र शुकदेव गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करे और विवाह करे। लेकिन, जन्म से ही वैरागी स्वभाव वाले शुकदेव जी संसार के मोह-माया में नहीं बंधना चाहते थे।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
जब व्यास जी के लाख समझाने पर भी शुकदेव जी नहीं माने, तो महर्षि ने उन्हें मार्गदर्शन के लिए मिथिला नरेश महाराज जनक (विदेह) के पास भेजा। राजा जनक, जो महल में रहकर भी वैरागी थे (इसीलिए उन्हें विदेह कहा जाता था), उन्होंने शुकदेव जी को 'प्रवृत्ति' (संसार में रहकर कर्तव्यों का पालन करना) और 'निवृत्ति' (मोह-माया से मुक्त होकर ईश्वर में ध्यान लगाना) धर्म का वास्तविक अर्थ समझाया। जनक जी के इस तात्विक संवाद ने शुकदेव जी के मन की सभी शंकाओं का समाधान कर दिया। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी मनुष्य अनासक्त भाव से ईश्वर को प्राप्त कर सकता है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
\r\n

सृष्टि के प्रलय काल का दृश्य और ज्ञान की परंपरा

\r\n\r\n

कथा के अगले चरण में स्वामी जी ने देवी भागवत पुराण के उस अलौकिक प्रसंग का वाचन किया जब सृष्टि में महाप्रलय का समय आता है। चारों ओर अथाह जलराशि के बीच एक वटवृक्ष के पत्ते (वटपत्र) पर भगवान विष्णु बालमुकुंद (बाल कृष्ण) के रूप में शयन कर रहे थे। उस समय आदि शक्ति मां भगवती ने प्रकट होकर बालमुकुंद को अपने दोनों स्वरूपों—निराकार (अरूप) और साकार (सगुण)—का तात्विक ज्ञान दिया था।

\r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
स्वामी जी ने इस ज्ञान की पवित्र गुरु-शिष्य परंपरा (Knowledge Lineage) का वर्णन करते हुए बताया कि मां भगवती ने यह सर्वोच्च ज्ञान भगवान बालमुकुंद को दिया। बालमुकुंद (विष्णु) से यह ज्ञान ब्रह्मा जी तक पहुंचा। ब्रह्मा जी से महर्षि वेदव्यास, वेदव्यास से उनके पुत्र शुकदेव जी और शुकदेव जी से यह परम ज्ञान सूत जी तक प्रवाहित हुआ। आज वही ज्ञान कथा के माध्यम से हम सभी तक पहुंच रहा है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

मनुष्य के परम शत्रु और सबसे बड़ा मित्र कौन?

\r\n\r\n
आधुनिक जीवन की भागदौड़ और मानसिक तनाव के बीच शांति कैसे मिले, इस पर स्वामी अनंतानंद जी ने बहुत ही व्यावहारिक उपदेश दिए। उन्होंने कहा:
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
\r\n
"जो भी मनुष्य अपने जीवन में वास्तविक कल्याण (Salvation) चाहता है, उसे एकांत का सेवन करना चाहिए। एकांत में बैठकर वेदांत का चिंतन और अपनी आत्मा में रमण (आत्म-मंथन) करने से ही परम शांति मिलती है।"
\r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
स्वामी जी ने स्पष्ट किया कि बाहर कोई हमारा दुश्मन नहीं है। मनुष्य के परम शत्रु उसके भीतर ही बैठे हैं, और वे हैं—काम, क्रोध, लोभ और मोह। जो इन चार विकारों पर विजय पा लेता है, वही सच्चा साधक है। वहीं, उन्होंने 'संतोष' (Contentment) को मनुष्य का सबसे बड़ा और सच्चा मित्र बताया। जिसके पास संतोष है, उसे संसार की कोई भी कमी दुखी नहीं कर सकती।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

रागी और वैरागी: समाज के दो रूप

\r\n\r\n
संसार में मनुष्य की प्रवृत्तियों को समझाते हुए कथा व्यास ने कहा कि इस दुनिया में मुख्य रूप से दो ही प्रकार के लोग होते हैं—रागी (संसार से लगाव रखने वाले) और वैरागी (संसार से विरक्त)। प्रकारांतर से, इन दोनों श्रेणियों में भी 'ज्ञानी' और 'अज्ञानी' के भेद पाए जाते हैं। एक ज्ञानी गृहस्थ (रागी) भी ईश्वर को प्रिय हो सकता है, यदि वह अपने कर्तव्यों का सही ढंग से पालन करे। वहीं, अज्ञानी वैरागी भी भटक सकता है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

गृहस्थों के लिए पंचदेव उपासना और पंचयज्ञ का महत्व

\r\n\r\n
हिंदू धर्म (सनातन धर्म) में एक गृहस्थ के क्या कर्तव्य होने चाहिए, इसका बहुत ही सुंदर निरूपण स्वामी जी ने किया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक सनातन धर्मावलंबी को अपने दैनिक जीवन में दो कार्य अवश्य करने चाहिए:
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  1. \r\n
    पंचदेव उपासना: घर में प्रतिदिन सूर्य, गणेश, शिव, विष्णु और माता भगवती (दुर्गा) के किसी भी स्वरूप की आराधना जरूर होनी चाहिए। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है।
    \r\n
  2. \r\n
  3. \r\n
    पंचयज्ञ: गृहस्थ आश्रम को पवित्र रखने के लिए पांच नित्य यज्ञ बताए गए हैं—देवयज्ञ, ऋषियज्ञ, पितृयज्ञ, नृयज्ञ (अतिथि सत्कार/मनुष्य सेवा) और भूतयज्ञ (पशु-पक्षियों को भोजन देना)।
    \r\n
  4. \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
स्वामी जी ने भक्तों को सावधान करते हुए कहा कि फालतू की लौकिक चर्चाओं (गपशप) से केवल राग और द्वेष (Attachment and Aversion) बढ़ते हैं, जो अंततः हमारी ही आध्यात्मिक और मानसिक क्षति का कारण बनते हैं। इसलिए हमेशा भगवत नाम का स्मरण करना चाहिए।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

श्रद्धालुओं की भारी उमड़ी भीड़

\r\n\r\n
कथा के दौरान पूरा वेदांत आश्रम माता के जयकारों और तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा। कार्यक्रम में विधि-विधान से व्यासपीठ का पूजन श्री डी.एन. तिवारी द्वारा संपन्न किया गया। इस पावन अवसर पर वेदांत सत्संग समिति के अध्यक्ष अरविन्द नागर, चन्द्रकान्ता नेगी, वीरेंद्र कुमार, विनीत कुमार समेत अनेक गणमान्य भक्तजन उपस्थित रहे। कार्यक्रम की व्यवस्था और सूचना का प्रेषण समिति के मीडिया प्रभारी प्रियांक सिंघल द्वारा किया गया। यह देवी भागवत कथा सप्ताह आगामी दिनों में भी निरंतर जारी रहेगा।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
\r\n
डिस्क्लेमर (Disclaimer): यह न्यूज़ रिपोर्ट वेदांत सत्संग समिति, मेरठ के मीडिया प्रभारी द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति और आध्यात्मिक प्रवचनों पर आधारित है। कथा में वर्णित धार्मिक प्रसंग, मान्यताएं और उपदेश हिंदू धर्मग्रंथों (श्रीमद् देवी भागवत पुराण आदि) और परम पूज्य स्वामी जी के निजी व आध्यात्मिक विचारों पर आधारित हैं। हमारा उद्देश्य किसी भी धर्म या समुदाय की भावनाओं को आहत करना नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शांति और सकारात्मक संदेश का प्रसार करना है।
\r\n
विज्ञापन
विज्ञापन