मेरठ। आज के आधुनिक युग में जहां लोग घर के बने खाने से ज्यादा पैकेटबंद (Packaged) खाद्य पदार्थों पर भरोसा करने लगे हैं, वहीं उत्तर प्रदेश के मेरठ से एक ऐसा सनसनीखेज और घिनौना मामला सामने आया है जिसने ब्रांडेड कंपनियों के खोखले दावों की पोल खोल कर रख दी है। मेरठ के दौराला क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले अझौता गांव में एक प्रतिष्ठित और नामी कंपनी के आलू भुजिया के पैकेट के अंदर मरी हुई छिपकली का बच्चा मिलने से पूरे इलाके में हड़कंप मच गया है। इस घटना ने एक बार फिर से इस गंभीर बहस को जन्म दे दिया है कि क्या हम अपने बच्चों को स्नैक्स के नाम पर जहर परोस रहे हैं?READ ALSO:-मेरठ का रूह कंपा देने वाला कांड: इश्क की अंधी आग में जला 7 साल का मासूम, मां के आशिक ने अगवा कर नहर में फेंका
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कैसे हुआ इस डरावनी सच्चाई का खुलासा?

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यह हैरान कर देने वाला मामला दौराला क्षेत्र के अझौता गांव का है। गांव के ही रहने वाले एक आम नागरिक, आदिल ने अपनी रोजमर्रा की जिंदगी के तहत अपने छोटे बच्चों की जिद पूरी करने के लिए गांव की ही एक स्थानीय परचून की दुकान से महज 5 रुपये कीमत वाला एक आलू भुजिया का पाउच खरीदा था। आदिल को इस बात का जरा सा भी अंदाजा नहीं था कि जिस नमकीन को वह अपने बच्चों की खुशी के लिए ले जा रहे हैं, वह उनकी जान के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता है।
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घर पहुंचकर आदिल ने बच्चों को नमकीन का पैकेट खोलकर दे दिया। बच्चे बड़े चाव से उस आलू भुजिया को खा रहे थे। तभी अचानक परिवार के एक सदस्य की नजर पैकेट के अंदर मौजूद एक अजीब सी चीज पर पड़ी। जब उसे गौर से देखा गया, तो परिवार के लोगों के होश उड़ गए। नमकीन के उस मसालेदार मिश्रण के बीच एक मरी हुई छिपकली का बच्चा पड़ा हुआ था। छिपकली का शव भुजिया के मसाले में इस कदर लिपटा हुआ था कि पहली नजर में उसे पहचानना भी मुश्किल था।
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बाल-बाल बची मासूमों की जान

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जैसे ही परिवार ने पैकेट के अंदर मरी हुई छिपकली देखी, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्होंने तुरंत बच्चों के हाथों से पैकेट छीना और उन्हें नमकीन खाने से रोक दिया। आदिल ने घटना की जानकारी देते हुए बताया कि यह तो ईश्वर का शुक्र था कि उनकी नजर समय रहते उस मृत छिपकली पर पड़ गई। यदि कुछ पल और बीत जाते और बच्चे उस छिपकली या उसके आस-पास के संक्रमित हिस्से को खा लेते, तो इसका अंजाम बेहद भयानक हो सकता था।
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चिकित्सकों और विशेषज्ञों के अनुसार, छिपकली की त्वचा और शरीर में कई तरह के खतरनाक बैक्टीरिया और जहरीले तत्व (जैसे साल्मोनेला) पाए जाते हैं। एक मृत और सड़ चुकी छिपकली का अंश शरीर में जाने से फूड पॉइजनिंग, उल्टी, दस्त, तेज बुखार और कई मामलों में नर्वस सिस्टम के फेल होने जैसी जानलेवा स्थितियां पैदा हो सकती हैं। खासकर छोटे बच्चों का इम्यून सिस्टम कमजोर होता है, इसलिए उनके लिए यह एक जानलेवा खतरा साबित हो सकता था।
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ब्रांडेड कंपनियों की 'क्वालिटी कंट्रोल' पर उठे गंभीर सवाल

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इस घटना ने सिर्फ एक परिवार को ही नहीं, बल्कि पूरे गांव और इलाके के लोगों को डरा दिया है। सवाल यह उठता है कि जो कंपनियां हर साल करोड़ों रुपये अपने विज्ञापनों (Advertisements) पर खर्च करती हैं और 'हाइजीन' (Hygiene) यानी साफ-सफाई के बड़े-बड़े दावे करती हैं, उनके प्लांट से इस तरह की चूक कैसे हो सकती है?
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फूड पैकेजिंग प्लांट में आमतौर पर कई स्तरों पर सेंसर, मेटल डिटेक्टर और विजुअल चेकिंग की व्यवस्था होती है। इसके बावजूद एक छिपकली का नमकीन के पैकेट में पैक हो जाना कंपनी के क्वालिटी कंट्रोल और फूड सेफ्टी ऑडिट (Food Safety Audit) की गंभीर नाकामी को दर्शाता है।
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ग्रामीणों में भारी आक्रोश: सड़कों पर उतरा गुस्सा

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अझौता गांव में जैसे ही यह खबर आग की तरह फैली, ग्रामीणों की भीड़ आदिल के घर के बाहर जमा हो गई। उस नमकीन के पैकेट और उसमें पड़ी मृत छिपकली को देखकर लोगों में भारी आक्रोश पनप गया। ग्रामीणों ने संबंधित कंपनी और उसकी लापरवाही के खिलाफ जमकर अपना गुस्सा जाहिर किया।
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ग्रामीणों का स्पष्ट रूप से कहना है कि:

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    कंपनियां सिर्फ मुनाफा कमाने में लगी हैं और उन्हें आम जनता, खासकर बच्चों की सेहत से कोई सरोकार नहीं है।
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    गांव-देहात के इलाकों में अक्सर खराब गुणवत्ता वाला या एक्सपायरी डेट के करीब पहुंच चुका माल सप्लाई कर दिया जाता है।
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    ऐसी लापरवाही सिर्फ एक भूल नहीं, बल्कि सीधे तौर पर उपभोक्ताओं के जीवन के साथ एक जानलेवा खिलवाड़ है।
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खाद्य सुरक्षा विभाग (FSDA) से सख्त जांच की मांग

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इस सनसनीखेज खुलासे के बाद उपभोक्ता आदिल और सभी ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (FSDA) से इस मामले में तुरंत और सख्त हस्तक्षेप की मांग की है। उनकी प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं:
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    नमूने की जांच: उस दुकान से और कंपनी के उस पूरे बैच (Batch) के नमकीन के पैकेट जब्त किए जाएं और लैबोरेटरी (Lab) में उनकी विस्तृत जांच की जाए।
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    कंपनी पर एफआईआर (FIR): इस घोर लापरवाही के लिए जिम्मेदार फूड कंपनी के मालिकों, प्लांट मैनेजरों और वितरकों (Distributors) के खिलाफ आपराधिक लापरवाही का मुकदमा दर्ज किया जाए।
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    लाइसेंस रद्द करने की कार्रवाई: यदि जांच में कंपनी दोषी पाई जाती है, तो फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) के नियमों के तहत कंपनी का लाइसेंस तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाए।
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  6. \r\n
  7. \r\n
    नियमित चेकिंग अभियान: मेरठ और उसके आस-पास के ग्रामीण इलाकों में बिकने वाले सभी पैकेटबंद खाद्य पदार्थों की नियमित रूप से रैंडम सैंपलिंग और चेकिंग सुनिश्चित की जाए।
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उपभोक्ता अधिकारों के प्रति जागरूकता की जरूरत

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यह घटना हर उस माता-पिता के लिए एक बहुत बड़ा अलर्ट (Alert) है जो अपने बच्चों को बिना देखे बाहर के स्नैक्स, चिप्स या नमकीन खाने के लिए दे देते हैं। उपभोक्ताओं को यह समझना होगा कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (Consumer Protection Act) के तहत उन्हें सुरक्षित भोजन का अधिकार प्राप्त है। यदि किसी खाद्य पदार्थ में ऐसी कोई आपत्तिजनक या जानलेवा वस्तु मिलती है, तो उपभोक्ता सीधा कंज्यूमर कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं और भारी मुआवजे की मांग कर सकते हैं।
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आगे क्या?

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फिलहाल अझौता गांव का यह मामला पूरे दौराला क्षेत्र और मेरठ जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि मेरठ का खाद्य सुरक्षा विभाग इस शिकायत को कितनी गंभीरता से लेता है। क्या सिर्फ कागजी कार्रवाई करके मामले को रफा-दफा कर दिया जाएगा या फिर उस "प्रतिष्ठित" कंपनी के खिलाफ कोई ऐसी मिसाल कायम करने वाली कार्रवाई होगी, जिससे भविष्य में कोई भी कॉरपोरेट घराना आम आदमी की सेहत के साथ खेलने की जुर्रत न कर सके?
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जब तक इस मामले में कोई ठोस प्रशासनिक कार्रवाई नहीं होती, तब तक लोगों के मन में पैकेटबंद चीजों को लेकर बैठा यह डर आसानी से दूर नहीं होने वाला है। प्रशासन की चुप्पी और कार्रवाई की रफ्तार ही यह तय करेगी कि भारत में 'फूड सेफ्टी' सिर्फ एक नारा है या एक जमीनी हकीकत।
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