आधुनिक युद्ध अब केवल आसमान से गिरते बमों, लड़ाकू विमानों और मिसाइलों तक सीमित नहीं रह गए हैं। 21वीं सदी के युद्ध का सबसे बड़ा और घातक हथियार 'साइबर स्पेस' और 'कनेक्टिविटी' है। इस समय पूरी दुनिया की निगाहें मध्य पूर्व (Middle East) पर टिकी हैं, जहां अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच तनाव अपने चरम पर है। युद्ध की इस विभीषिका के बीच एक ऐसे खतरे ने जन्म ले लिया है, जिसकी गूंज न केवल शेयर बाजारों में, बल्कि आपके हाथ में मौजूद स्मार्टफोन तक सुनाई दे सकती है।READ ALSO:-बिजनौर में सनसनीखेज वारदात: नमाज पढ़ने निकले युवक का 50 फीट ऊंची पानी की टंकी पर लटकता मिला शव, सुसाइड नोट में लिखी बीमारी की बात
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यह खतरा है— ग्लोबल इंटरनेट क्राइसिस (Global Internet Crisis)। दुनिया भर के भू-राजनीतिक (Geopolitical) और तकनीकी विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ईरान के पास स्थित 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) में यदि युद्ध भड़कता है, तो इसका असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल की कीमतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया में इंटरनेट की रफ्तार थम सकती है। भारत, जो कि दुनिया की सबसे बड़ी डिजिटल अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, इस संभावित खतरे के 'रेड जोन' में खड़ा है।
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इस विस्तृत और गहन विश्लेषणात्मक रिपोर्ट में हम समझेंगे कि आखिर समुद्र के नीचे बिछी कुछ केबल्स कैसे पूरी दुनिया को चला रही हैं, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्यों इतना महत्वपूर्ण है, भारत के 23 लाख करोड़ रुपये के IT सेक्टर पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, और क्या वाकई हम एक 'डिजिटल ब्लैकआउट' की तरफ बढ़ रहे हैं।
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'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज': सिर्फ तेल ही नहीं, डेटा का भी महासागर (The Dual Chokepoint)

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ईरान और ओमान के बीच स्थित 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' एक बेहद संकरा जलमार्ग है, जो फारस की खाड़ी (Persian Gulf) को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। जब भी मध्य पूर्व में तनाव बढ़ता है, तो सबसे पहली चर्चा इसी जलडमरूमध्य की होती है।
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    एनर्जी चोकपॉइंट (Energy Chokepoint): दुनिया भर के अर्थशास्त्री इस रूट को लेकर इसलिए चिंतित रहते हैं क्योंकि वैश्विक आपूर्ति का लगभग 20% कच्चा तेल (Crude Oil) और 25% लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरती है। ईरान अक्सर इस रास्ते को ब्लॉक करने की धमकी देता रहता है।
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    डिजिटल चोकपॉइंट (Digital Chokepoint): लेकिन एक सच्चाई जो अक्सर आम जनता की नजरों से छिपी रहती है, वह यह है कि समुद्र की सतह पर जहां तेल के विशाल टैंकर तैरते हैं, उसी समुद्र की गहराई (Seabed) में फाइबर ऑप्टिक केबल्स का एक सघन जाल बिछा हुआ है। यह इलाका एशिया को मध्य पूर्व, अफ्रीका और यूरोप से जोड़ने वाला सबसे महत्वपूर्ण 'डेटा हाईवे' (Data Highway) है। अगर युद्ध के दौरान मिसाइल हमलों, पनडुब्बियों या नौसैनिक गतिविधियों से इन केबल्स को नुकसान पहुंचता है, तो डेटा का प्रवाह उसी तरह रुक जाएगा जैसे नस कटने पर खून का बहना।
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सैटेलाइट का भ्रम और सबमरीन फाइबर ऑप्टिक की हकीकत (The Reality of 97% Global Data)

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आम आदमी अक्सर यह सोचता है कि हम जो भी इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं, वह अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट्स (Satellites) के जरिए हम तक पहुंचता है। लेकिन यह आज के दौर का सबसे बड़ा तकनीकी भ्रम है।
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    समुद्र के नीचे बसा है इंटरनेट का संसार: हकीकत यह है कि दुनिया भर का 95% से 97% इंटरनेशनल डेटा ट्रांसफर अंतरिक्ष से नहीं, बल्कि समुद्र के नीचे बिछी 'सबमरीन कम्युनिकेशन केबल्स' (Submarine Communications Cables) के जरिए होता है। ये केबल्स इंसानी बाल से थोड़ी ही मोटी कांच की नलियों (Fiber Optics) से बनी होती हैं, जो प्रकाश (Light) की गति से डेटा को एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक ले जाती हैं।
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    स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की प्रमुख केबल्स: भारत और दक्षिण एशिया को यूरोप और मध्य पूर्व से जोड़ने वाली कई सबसे भारी क्षमता वाली केबल्स इसी रूट या इसके बेहद करीब से गुजरती हैं। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:
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      SEA-ME-WE (South East Asia–Middle East–Western Europe): यह केबल्स की एक पूरी सीरीज है (जैसे SEA-ME-WE 3, 4, 5 और आगामी 6), जो भारत के मुंबई और चेन्नई से होकर मध्य पूर्व होते हुए यूरोप जाती है।
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      AAE-1 (Asia Africa Europe-1): यह 25,000 किलोमीटर लंबी प्रणाली है जो हांगकांग से शुरू होकर भारत होते हुए यूरोप तक पहुंचती है।
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    5. \r\n
      EIG (Europe India Gateway): 15,000 किलोमीटर लंबी यह केबल ब्रिटेन से शुरू होकर जिब्राल्टर, मिस्र और अरब प्रायद्वीप होते हुए मुंबई में प्रवेश करती है।
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यदि होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर (Red Sea) के आसपास का क्षेत्र युद्ध की चपेट में आता है, तो इन तीनों प्रमुख 'डेटा धमनियों' के कटने का खतरा पैदा हो जाएगा।
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भारत के लिए यह 'रेड अलर्ट' क्यों है? (Why is India Highly Vulnerable?)

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भारत आज दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इंटरनेट उपयोगकर्ता देश है। डिजिटल इंडिया (Digital India) और यूपीआई (UPI) की क्रांति ने देश के सुदूर गांवों तक इंटरनेट को पहुंचा दिया है। लेकिन हमारी यह डिजिटल ताकत काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय बैंडविड्थ (International Bandwidth) पर निर्भर करती है।
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भौगोलिक निर्भरता (Geographical Dependency): भारत का अधिकांश अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट ट्रैफिक मुख्य रूप से दो बड़े समुद्री रास्तों से होकर जाता है:
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    पूर्वी तट (चेन्नई) से सिंगापुर होते हुए अमेरिका/जापान की ओर (Pacific Route)।
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    पश्चिमी तट (मुंबई) से अरब सागर और खाड़ी क्षेत्र होते हुए यूरोप और अमेरिका के पूर्वी तट की ओर (Middle East Route)।
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भारतीय कंपनियों, खासकर IT और सॉफ्टवेयर सेक्टर का सबसे बड़ा क्लाइंट बेस अमेरिका और यूरोप में है। इन क्लाइंट्स तक पहुंचने के लिए मुंबई से निकलने वाला डेटा सीधे मध्य पूर्व (Middle East) के इसी अशांत क्षेत्र से होकर गुजरता है। अगर यह रूट बाधित होता है, तो भारत का डिजिटल संपर्क पश्चिमी दुनिया से बुरी तरह प्रभावित हो सकता है।
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इंटरनेट की स्पीड और आम आदमी पर क्या होगा असर? (Impact on Latency and Speed)

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अब सवाल यह उठता है कि अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज या लाल सागर के पास ये केबल्स कट जाती हैं, तो आपके मोबाइल या ब्रॉडबैंड पर इसका क्या सीधा असर दिखेगा? इसका जवाब 'लेटेंसी' (Latency) और 'री-रूटिंग' (Rerouting) के विज्ञान में छिपा है।
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लेटेंसी (Latency) का बढ़ जाना

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लेटेंसी का मतलब है आपके डिवाइस से कोई कमांड (जैसे किसी वेबसाइट पर क्लिक करना) सर्वर तक जाने और वहां से डेटा वापस आने में लगने वाला समय (Data Travel Time)। इसे मिलीसेकंड (ms) में नापा जाता है।
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    री-रूटिंग का प्रभाव: अगर मध्य पूर्व का रास्ता बंद होता है, तो टेलीकॉम कंपनियों को अपना सारा ट्रैफिक लंबे 'पैसिफिक रूट' (सिंगापुर-जापान-अमेरिका-यूरोप) से डायवर्ट करना पड़ेगा। रास्ता लंबा होने के कारण डेटा को यात्रा करने में ज्यादा समय लगेगा, जिससे लेटेंसी बढ़ जाएगी।
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    बफरिंग और स्लो इंटरनेट: लेटेंसी बढ़ने का सीधा असर लाइव स्ट्रीमिंग और हेवी ग्राफिक्स वाले प्लेटफॉर्म्स पर पड़ेगा।
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      Netflix, YouTube, Instagram Reels जैसे प्लेटफॉर्म्स पर वीडियो प्ले होने में ज्यादा समय लगेगा और बफरिंग की समस्या आम हो जाएगी।
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      Video Calls (Zoom, Microsoft Teams, WhatsApp): वीडियो कॉलिंग के दौरान आवाज कट-कट कर आना, तस्वीर का चिपकना (Lag/Jitter) और कॉल ड्रॉप होने जैसी दिक्कतें बढ़ जाएंगी।
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      Cloud Services: गूगल ड्राइव, एडब्ल्यूएस (AWS) और माइक्रोसॉफ्ट एज्योर (Microsoft Azure) जैसी क्लाउड सेवाओं से फाइल डाउनलोड या अपलोड करने की स्पीड काफी धीमी पड़ सकती है।
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भारत के 23.48 लाख करोड़ के IT सेक्टर पर मंडराता वित्तीय संकट (Threat to the $250 Billion IT Sector)

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आम आदमी के लिए इंटरनेट स्लो होना केवल एक असुविधा हो सकती है, लेकिन भारत के सूचना प्रौद्योगिकी (IT) और आउटसोर्सिंग (BPO/KPO) सेक्टर के लिए यह जीवन और मरण का प्रश्न है।
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भारत का IT सेक्टर लगभग 250 बिलियन डॉलर (करीब 23.48 लाख करोड़ रुपये) का है, जो देश की जीडीपी (GDP) और रोजगार में एक बहुत बड़ा योगदान देता है। टीसीएस (TCS), इन्फोसिस (Infosys), विप्रो (Wipro), और एचसीएल (HCL) जैसी दिग्गज भारतीय कंपनियों के लाखों कर्मचारी दिन-रात अमेरिका और यूरोप के सर्वरों पर 'रियल-टाइम' (Real-time) काम करते हैं।
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    SLA (Service Level Agreement) टूटने का डर: IT कंपनियों का अपने विदेशी क्लाइंट्स के साथ कड़ा एग्रीमेंट होता है कि वे उन्हें 99.9% 'अप-टाइम' (Up-time) और लो-लेटेंसी कनेक्टिविटी देंगे। यदि केबल कटने से कनेक्टिविटी में बाधा आती है, तो भारतीय कंपनियां समय पर अपनी सेवाएं (जैसे सॉफ्टवेयर सपोर्ट, डेटा एनालिसिस) नहीं दे पाएंगी।
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    भारी पेनाल्टी (Financial Penalties): SLA टूटने की स्थिति में भारतीय कंपनियों को अपने क्लाइंट्स को लाखों-करोड़ों डॉलर की पेनाल्टी (जुर्माना) भरनी पड़ सकती है। लंबे समय तक समस्या बनी रहने पर क्लाइंट्स अपने कॉन्ट्रैक्ट किसी अन्य देश (जो इस रूट से प्रभावित न हो) की कंपनियों को शिफ्ट कर सकते हैं, जिससे भारत में नौकरियों पर संकट आ सकता है।
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बैंकिंग, रेमिटेंस और शेयर बाजार का जोखिम (Impact on Financial Markets & SWIFT)

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डेटा का प्रवाह रुकने का सीधा मतलब है 'पूंजी' (Capital) का प्रवाह रुकना। आज की बैंकिंग पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय डेटा केबल्स पर निर्भर है।
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    SWIFT ट्रांजैक्शन और एक्सपोर्ट-इंपोर्ट: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पैसे भेजने के लिए 'स्विफ्ट' (SWIFT) प्रणाली का उपयोग किया जाता है। यदि यूरोप या अमेरिका स्थित बैंकों से कनेक्टिविटी स्लो होती है, तो भारतीय व्यापारियों के पेमेंट अटक सकते हैं।
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    खाड़ी देशों से रेमिटेंस (Remittances from Gulf): मध्य पूर्व (UAE, सऊदी अरब, कतर आदि) में लाखों भारतीय कामगार रहते हैं, जो हर महीने भारत में अपने परिवारों को पैसा (Remittance) भेजते हैं। भारत दुनिया में सबसे ज्यादा रेमिटेंस प्राप्त करने वाला देश है। होर्मुज में तनाव से बैंकिंग सर्वर डाउन होने पर यह पैसे का लेन-देन भी धीमा पड़ सकता है।
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    हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग (High-Frequency Trading - HFT): शेयर बाजार (Stock Market) में आज इंसानों से ज्यादा कंप्यूटर एल्गोरिदम ट्रेडिंग करते हैं, जहां एक 'मिलीसेकंड' (Millisecond) की देरी का मतलब है करोड़ों रुपये का नुकसान। इंटरनेट की स्पीड में मामूली सा उतार-चढ़ाव भी बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) के बीच बड़े वित्तीय जोखिम खड़े कर सकता है।
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क्या इंटरनेट पूरी तरह से 'ब्लैकआउट' हो जाएगा? (Will there be a Total Blackout?)

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जब भी ऐसे संकट की बात आती है, तो सबसे डरावना सवाल यही होता है— क्या इंटरनेट पूरी तरह से बंद हो जाएगा? जवाब है: नहीं। 'टोटल ब्लैकआउट' (Total Blackout) की संभावना बेहद कम है। * इंटरनेट का 'स्पाइडर वेब' डिजाइन (Spider Web Design): इंटरनेट को मूल रूप से अमेरिकी रक्षा विभाग (DoD) ने इस तरह से डिजाइन ही किया था कि यदि युद्ध या परमाणु हमले में कोई एक नोड (Node) या रास्ता नष्ट हो जाए, तो सिस्टम क्रैश न हो। इंटरनेट एक 'मकड़ी के जाले' की तरह है।
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    डायनेमिक री-रूटिंग (Dynamic Rerouting): जब भी कोई एक सबमरीन केबल कटती है, तो राउटर्स (Routers) ऑटोमैटिक तरीके से डेटा के पैकेट्स को दूसरे उपलब्ध रास्तों (Alternate Paths) पर भेज देते हैं।
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    समस्या कहां है? (The Bottleneck): हालांकि इंटरनेट बंद नहीं होगा, लेकिन इसे आप एक 'ट्रैफिक जाम' की तरह समझ सकते हैं। मान लीजिए कि दिल्ली से मुंबई जाने वाला एक एक्सप्रेसवे अचानक बंद हो जाए, तो सारा ट्रैफिक छोटे और पतले स्टेट हाइवे पर आ जाएगा। गाड़ियां चलेंगी जरूर, लेकिन रेंग-रेंग कर। बिल्कुल यही स्थिति इंटरनेट की होगी। वैकल्पिक रास्तों पर ट्रैफिक का 'ओवरलोड' (Overload) हो जाएगा, जिससे स्पीड इतनी कम हो सकती है कि वह काम करने लायक न बचे।
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डिजिटल भविष्य को सुरक्षित करने की तैयारी: भारत और दुनिया के नए विकल्प (Mitigation and Future Readiness)

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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और लाल सागर में हूती विद्रोहियों (Houthi Rebels) द्वारा केबल्स को नुकसान पहुंचाने की हालिया घटनाओं ने पूरी दुनिया को जगा दिया है। अब भारत सहित कई देश 'सिंगल पॉइंट ऑफ फेलियर' (Single Point of Failure) से बचने के लिए अरबों डॉलर का निवेश कर रहे हैं।
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A. सैटेलाइट इंटरनेट बैकअप (Satellite Internet)

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इलॉन मस्क (Elon Musk) की स्टारलिंक (Starlink), अमेजन का प्रोजेक्ट कुइपर (Project Kuiper) और वनवेब (OneWeb) जैसी लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) सैटेलाइट इंटरनेट सेवाएं भविष्य के बैकअप के तौर पर उभर रही हैं। हालांकि वर्तमान में सैटेलाइट इंटरनेट फाइबर ऑप्टिक केबल्स के टेराबाइट्स (Terabytes) डेटा को पूरी तरह रिप्लेस नहीं कर सकता, लेकिन आपातकाल में यह सरकारी, सैन्य और कुछ हद तक कॉर्पोरेट संचार को चालू रखने के लिए 'संजीवनी' का काम कर सकता है। भारत में भी जल्द ही सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के विस्तार की उम्मीद है।
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B. नए और सुरक्षित समुद्री/स्थलीय रूट (New Terrestrial & Submarine Routes)

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डेटा ट्रैफिक को मध्य पूर्व के इस संवेदनशील 'डिजिटल चोकपॉइंट' से बचाने के लिए दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां (Google, Meta, Microsoft) नई केबल्स बिछा रही हैं।
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    इज़राइल-सऊदी अरब रूट: कुछ नई केबल्स का प्रस्ताव है जो लाल सागर या होर्मुज से जाने के बजाय, जमीन के रास्ते सऊदी अरब और इजराइल होते हुए यूरोप को जोड़ेंगी।
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    पैन-एशियन और पैसिफिक कनेक्टिविटी: भारत अपने पूर्वी तट (चेन्नई और अंडमान) के जरिए सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका की तरफ जाने वाली केबल्स (जैसे MIST, IAX/IEX) की क्षमता को भारी स्तर पर बढ़ा रहा है, ताकि यदि पश्चिमी रूट (अरब सागर) पर युद्ध भड़के, तो भारत का डेटा पूर्व की तरफ से सुरक्षित निकल सके।
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अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच बढ़ता भू-राजनीतिक (Geopolitical) तनाव अब सिर्फ जमीन, हवा या समुद्र की सतह का मुद्दा नहीं रह गया है। यह अब समुद्र की उन गहरी खाइयों तक पहुंच गया है जहां हमारी आधुनिक सभ्यता की डिजिटल नसें (Digital Nerves) बसती हैं।
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आज के दौर में 'डेटा' (Data) ही नया 'तेल' (Oil) है। जैसे तेल की आपूर्ति रुकने से दुनिया भर में हाहाकार मच जाता है, ठीक वैसे ही डेटा के रुकने से दुनिया की अर्थव्यवस्था कुछ ही घंटों में घुटनों पर आ सकती है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में यदि कोई भी बड़ी सैन्य भूल (Miscalculation) होती है, तो भारत के IT सेक्टर से लेकर आम आदमी के मोबाइल फोन तक, हर किसी को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। वर्तमान समय में, तेल की कीमतों में उछाल से ज्यादा, डिजिटल दुनिया का संभावित धीमा पड़ना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक गहरी चिंता का विषय बन चुका है। हमें यह समझना होगा कि हमारा 'वायरलेस वर्ल्ड' (Wireless World) दरअसल समुद्र के नीचे बिछे मजबूत तारों का मोहताज है।
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