बिजनौर/नजीबाबाद:
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इंटरनेट की दुनिया जितनी सुविधाजनक है, उतनी ही खतरनाक भी हो चुकी है। उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के नजीबाबाद (Najibabad) में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने पुलिस प्रशासन से लेकर आम जनता तक को हिला कर रख दिया है। एक रिटायर्ड शिक्षिका (Retired Teacher), जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों को शिक्षा देने में बिताई, अपने बुढ़ापे में एक हाई-टेक अंतरराष्ट्रीय साजिश का शिकार हो गईं।Read also:-पटरियों पर ख़त्म हुई 'सांसों' की डोर; दीपाली ने सुसाइड नोट में लिखा- 'मुझे मेरा कान्हा मिल गया', और सूर्यकांत ने पत्नी से कहा- 'तुम ही मेरा पहला प्यार हो'
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साइबर अपराधियों ने उन्हें 'डिजिटल अरेस्ट' (Digital Arrest) के नाम पर ऐसा डराया कि वह 5 दिनों तक अपने ही घर में कैद रहीं और डर के मारे अपनी जिंदगी भर की जमा-पूंजी—29 लाख रुपये—ठगों के हवाले कर दीं।
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बिजनौर पुलिस और साइबर सेल की संयुक्त कार्रवाई में इस मामले का पर्दाफाश हुआ है। जांच के तार भारत से हजारों किलोमीटर दूर कंबोडिया (Cambodia) तक जुड़े मिले हैं। पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए इस गिरोह के तीन शातिर सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया है, जो भारत में बैठकर इस अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट के लिए 'मनी म्यूल' (Money Mule) का काम कर रहे थे।
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इस विस्तृत रिपोर्ट में हम आपको बताएंगे कि आखिर कैसे एक वीडियो कॉल ने एक शिक्षिका की जिंदगी बदल दी, क्या है 'डिजिटल अरेस्ट' का यह नया पैंतरा, और पुलिस ने कैसे इन अपराधियों को दबोचा।
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खौफ की शुरुआत: वह मनहूस वीडियो कॉल

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यह कहानी नजीबाबाद थाना क्षेत्र के मुहल्ला हवेलीतलां की है। यहाँ की निवासी तोजीहा सुल्ताना, जो एक सेवानिवृत्त शिक्षिका हैं, अपने घर में शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत कर रही थीं।
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दिसंबर के आखिरी हफ्ते में, उनके फोन की घंटी बजी। यह कोई सामान्य कॉल नहीं थी, बल्कि एक वीडियो कॉल थी जिसने अगले 5 दिनों तक उनकी नींद हराम कर दी।
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ठगों की स्क्रिप्ट:

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    कॉल करने वाले ने सबसे पहले खुद को एक प्रतिष्ठित टेलीकॉम कंपनी का अधिकारी बताया।
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    उसने शिक्षिका से कहा, "मैडम, आपके आधार कार्ड पर एक सिम जारी किया गया है, जिसका इस्तेमाल मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध गतिविधियों में हो रहा है।"
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  • \r\n
    इससे पहले कि शिक्षिका कुछ समझ पातीं, कॉल को कथित तौर पर CBI (केंद्रीय जांच ब्यूरो) और मुंबई क्राइम ब्रांच को ट्रांसफर कर दिया गया।
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वर्दी का डर:

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वीडियो कॉल पर सामने वाला व्यक्ति पुलिस की वर्दी में बैठा था। पीछे का बैकग्राउंड किसी पुलिस स्टेशन जैसा दिख रहा था (जो असल में एक फेक सेटअप था)। उस फर्जी अधिकारी ने तोजीहा सुल्ताना को बताया कि उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हो चुका है और उन्हें अभी इसी वक्त 'डिजिटल अरेस्ट' किया जा रहा है।
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120 घंटे का 'डिजिटल टॉर्चर' (26 से 31 दिसंबर)

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साइबर अपराध की दुनिया में 'डिजिटल अरेस्ट' एक नया और बेहद खतरनाक ट्रेंड है। इसमें पीड़ित को शारीरिक रूप से थाने नहीं ले जाया जाता, बल्कि वीडियो कॉल के जरिए उन पर नजर रखी जाती है।
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तोजीहा सुल्ताना के साथ भी यही हुआ।

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    नजरबंदी: ठगों ने उन्हें आदेश दिया कि वे अपना वीडियो कैमरा बंद नहीं करेंगी। वे 24 घंटे स्काइप (Skype) या व्हाट्सएप वीडियो कॉल पर जुड़ी रहीं।
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  3. \r\n
    धमकी: उन्हें डराया गया कि अगर उन्होंने किसी को बताया या फोन काटा, तो पुलिस उनके घर आ जाएगी और उन्हें जेल में डाल देगी। उनके परिवार को भी नुकसान पहुंचाने की धमकी दी गई।
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    जांच का बहाना: ठगों ने कहा कि उनकी संपत्ति की जांच करनी होगी। इसके लिए उन्हें अपने बैंक खाते के पैसे 'वेरिफिकेशन' के लिए उनके द्वारा बताए गए खातों में ट्रांसफर करने होंगे।
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  6. \r\n
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डर के साये में जी रही शिक्षिका ने अपनी सुध-बुध खो दी। 26 दिसंबर से 31 दिसंबर के बीच, किस्तों में उन्होंने अपनी गाढ़ी कमाई के 29 लाख रुपये उन अनजान खातों में ट्रांसफर कर दिए। 31 दिसंबर के बाद जब संपर्क टूट गया और पैसे वापस नहीं आए, तब उन्हें अहसास हुआ कि वे लुट चुकी हैं।
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पुलिस इन्वेस्टिगेशन: जब तार जुड़े कंबोडिया से

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पीड़िता की तहरीर पर नजीबाबाद थाने में मुकदमा दर्ज किया गया। एसपी बिजनौर के निर्देश पर एक विशेष टीम और साइबर सेल को इस मामले के खुलासे के लिए लगाया गया।
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मनी ट्रेल (Money Trail) की जांच:

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पुलिस ने सबसे पहले उन बैंक खातों को खंगाला जिनमें पैसा ट्रांसफर किया गया था।
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    जांच में पता चला कि ये खाते गाजियाबाद और मुंबई के अलग-अलग बैंकों में थे।
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  • \r\n
    तकनीकी सर्विलांस (IP Address Tracking) से पता चला कि वीडियो कॉल और इंटरनेट कॉलिंग का ओरिजिन (Origin) कंबोडिया देश था।
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  • \r\n
    यह स्पष्ट हो गया कि मास्टरमाइंड विदेश में बैठे हैं, लेकिन भारत में उनके गुर्गे (Agents) मौजूद हैं जो बैंक खातों का इंतजाम करते हैं और पैसे को क्रिप्टो-करेंसी में बदल कर विदेश भेजते हैं।
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गिरफ्तारी: तीन शातिर ठग पुलिस के हत्थे चढ़े

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बिजनौर पुलिस ने इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस और मुखबिरों की सूचना के आधार पर छापेमारी की। पुलिस को बड़ी कामयाबी हाथ लगी और गिरोह के तीन सदस्य पकड़े गए।
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गिरफ्तार आरोपियों का प्रोफाइल:
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क्र.सं.
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आरोपी का नाम
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निवासी (पता)
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भूमिका (Role)
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1.
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अनिल कुमार
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ग्राम दुर्गागढ़, हरिद्वार (उत्तराखंड)
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बैंक खाते उपलब्ध कराना
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2.
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आफताब आलम
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दिलशाद कॉलोनी, पूर्वी दिल्ली
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कमीशन पर काम करना
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3.
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हरिओम वर्मा
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ग्राम नगला चक, पटियाली, कासगंज (यूपी)
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सिम और दस्तावेज जुटाना
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बरामदगी (Recovered Items):

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इनके पास से पुलिस को साइबर अपराध का जखीरा मिला है:
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    नकद: 29,600 रुपये।
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  • \r\n
  • \r\n
    मोबाइल फोन: 3 (जिनका इस्तेमाल ठगी के लिए होता था)।
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  • \r\n
    फर्जी आधार कार्ड: 6 (अलग-अलग नामों से बनाए गए)।
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  • \r\n
  • \r\n
    डेबिट कार्ड: 1 (पैसे निकालने के लिए)।
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  • \r\n
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ये फर्जी आधार कार्ड इस बात का सबूत हैं कि ये लोग फर्जी पहचान पर सिम कार्ड और बैंक खाते खुलवाते थे, जिन्हें बाद में साइबर ठगों को मोटे दाम पर बेचा जाता था।
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फरार आरोपियों की तलाश और पुलिस का बयान

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पुलिस पूछताछ में गिरफ्तार आरोपियों ने अपने गिरोह के अन्य सदस्यों के नाम भी उगले हैं।
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  • \r\n
    जसपाल सिंह रावत: निवासी दिल्ली।
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  • \r\n
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    इमरान: (अज्ञात, निवासी का पता लगाया जा रहा है)।
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  • \r\n
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नजीबाबाद पुलिस का कहना है कि ये दोनों फरार आरोपी इस चेन की अहम कड़ी हैं। जसपाल सिंह रावत संभवतः वह व्यक्ति है जो कंबोडिया में बैठे आकाओं के सीधे संपर्क में था।
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पुलिस अधीक्षक (SP) का बयान:

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"यह एक संगठित गिरोह है। कंबोडिया से वीडियो कॉल कर लोगों को डराया जाता है। भारत में मौजूद इनके साथी बैंक खाते मुहैया कराते हैं। गिरफ्तार आरोपियों को जेल भेज दिया गया है और फरार अभियुक्तों की तलाश में टीमें दबिश दे रही हैं। हम जल्द ही पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करेंगे।"
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विश्लेषण: क्या है 'डिजिटल अरेस्ट' और कंबोडिया कनेक्शन?

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बिजनौर की यह घटना कोई अकेली घटना नहीं है। पिछले कुछ महीनों में भारत में 'डिजिटल अरेस्ट' के मामले तेजी से बढ़े हैं। पाठकों को यह समझना जरूरी है कि यह पूरा खेल कैसे चलता है।
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कंबोडिया और म्यांमार की 'फ्रॉड फैक्ट्री':

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दक्षिण-पूर्वी एशियाई देश, खास तौर पर कंबोडिया, म्यांमार और लाओस, अब साइबर अपराध के नए गढ़ बन चुके हैं।
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    वहां भारतीय युवाओं को 'डाटा एंट्री' या 'कस्टमर सपोर्ट' की नौकरी का झांसा देकर बुलाया जाता है।
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  • \r\n
  • \r\n
    फिर उनका पासपोर्ट जब्त कर उन्हें बंधक बना लिया जाता है और जबरदस्ती साइबर ठगी करवाई जाती है।
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  • \r\n
  • \r\n
    इन्हें हिंदी और अंग्रेजी बोलने की ट्रेनिंग दी जाती है ताकि वे भारतीय पीड़ितों को आसानी से फंसा सकें।
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  • \r\n
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डिजिटल अरेस्ट (Digital Arrest) क्या है?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने 'मन की बात' कार्यक्रम में इसका जिक्र किया था।
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    कानून में 'डिजिटल अरेस्ट' जैसा कोई शब्द नहीं है।
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    भारतीय पुलिस, सीबीआई, ईडी या कस्टम विभाग कभी भी वीडियो कॉल पर पूछताछ नहीं करते।
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  • \r\n
    कोई भी जांच एजेंसी वीडियो कॉल पर पैसे ट्रांसफर करने के लिए नहीं कहती।
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  • \r\n
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ठग स्काइप (Skype) या व्हाट्सएप का इस्तेमाल करते हैं। वे पीछे एक नकली सेट बनाते हैं जो पुलिस थाने जैसा दिखता है। वे वर्दी पहनते हैं, वॉकी-टॉकी की आवाजें निकालते हैं और फर्जी आईडी कार्ड दिखाते हैं। यह सब इतना असली लगता है कि पढ़े-लिखे लोग, डॉक्टर और रिटायर्ड अफसर भी झांसे में आ जाते हैं।
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बचाव और सुरक्षा: अगर आपके पास आए ऐसी कॉल तो क्या करें?

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खबरीलाल अपने पाठकों को सतर्क करना चाहता है। आपकी सुरक्षा आपके हाथों में है। अगर आपको कभी ऐसा कॉल आए, तो इन बातों का ध्यान रखें:
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1. घबराएं नहीं (Don't Panic):
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ठगों का सबसे बड़ा हथियार आपका 'डर' है। वे आपको सोचने का समय नहीं देते। गहरी सांस लें और सोचें कि क्या पुलिस ऐसे काम करती है?
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2. कॉल काट दें (Disconnect):
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जैसे ही कोई वीडियो कॉल पर पुलिस बनकर पैसे मांगे, समझ जाएं कि यह फ्रॉड है। कॉल काट दें और उस नंबर को ब्लॉक कर दें।
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3. वीडियो शेयर न करें:
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कभी भी वीडियो कॉल पर अनजान लोगों के सामने न आएं। आपकी तस्वीर या वीडियो का इस्तेमाल वे डीपफेक (Deepfake) बनाने या ब्लैकमेल करने के लिए कर सकते हैं।
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4. '1930' पर कॉल करें:
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ठगी होने के तुरंत बाद या संदेह होने पर भारत सरकार की साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर कॉल करें। जितनी जल्दी आप शिकायत दर्ज कराएंगे, पैसे वापस मिलने की संभावना उतनी ही ज्यादा होगी। आप www.cybercrime.gov.in पर भी शिकायत कर सकते हैं।
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5. कोई भी एजेंसी पैसे नहीं मांगती:
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याद रखें, सीबीआई, ईडी, पुलिस या कोर्ट कभी भी ऑनलाइन पैसे ट्रांसफर करने को नहीं कहते। अगर कोई 'वेरिफिकेशन' के नाम पर पैसे मांगे, तो वह 100% ठग है।
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कानूनी पहलू: आरोपियों को क्या सजा होगी?

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गिरफ्तार किए गए अनिल कुमार, आफताब आलम और हरिओम वर्मा पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) और आईटी एक्ट (IT Act) की विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमा चलेगा।
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    धोखाधड़ी (Cheating): धारा 420 (पुराना IPC) / धारा 318 (BNS)।
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  • \r\n
  • \r\n
    कूटरचना (Forgery): फर्जी आधार कार्ड बनाने के लिए।
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  • \r\n
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    साजिश (Criminal Conspiracy): गिरोह बनाकर अपराध करने के लिए।
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  • \r\n
  • \r\n
    आईटी एक्ट: धारा 66C (पहचान की चोरी) और 66D (कंप्यूटर के जरिए धोखाधड़ी)।
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  • \r\n
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दोषी साबित होने पर इन आरोपियों को 7 साल से लेकर 10 साल तक की जेल हो सकती है। पुलिस अब इन पर गैंगस्टर एक्ट (Gangster Act) लगाने की भी तैयारी कर सकती है ताकि इनकी संपत्ति कुर्क की जा सके।
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समाज पर प्रभाव: बुजुर्ग क्यों बन रहे आसान निशाना?

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बिजनौर की घटना ने यह साबित किया है कि साइबर ठग अब 'सॉफ्ट टारगेट' यानी बुजुर्गों को निशाना बना रहे हैं।
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    टेक्नोलॉजी गैप: बुजुर्ग स्मार्टफोन्स का इस्तेमाल तो करते हैं, लेकिन उन्हें साइबर सुरक्षा की बारीकियों का पता नहीं होता।
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    अकेलापन: कई बार बच्चे बाहर रहते हैं, ऐसे में बुजुर्ग डर जाते हैं और किसी से सलाह नहीं ले पाते।
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    जीवन भर की कमाई: ठग जानते हैं कि रिटायरमेंट के बाद लोगों के पास पीएफ और ग्रेच्युटी का पैसा होता है।
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परिवारों के लिए सलाह:

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अपने घर के बुजुर्गों को साइबर फ्रॉड के बारे में बताएं। उन्हें समझाएं कि वीडियो कॉल पर कोई पुलिस वाला नहीं बनता। उनके बैंक ट्रांजेक्शन पर नजर रखें और उन्हें विश्वास दिलाएं कि वे किसी भी मुसीबत में पहले आपको बताएं।
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एक अधूरी जीत, असली जंग अभी बाकी

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बिजनौर पुलिस द्वारा तीन ठगों की गिरफ्तारी निश्चित रूप से एक सराहनीय कदम है। इससे स्थानीय स्तर पर काम कर रहे कई स्लीपर सेल का पर्दाफाश हुआ है। लेकिन, 29 लाख रुपये की वसूली और मुख्य सरगनाओं (जो कंबोडिया में बैठे हैं) तक पहुंचना अभी भी एक चुनौती है।
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जब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन कॉल सेंटर्स को बंद नहीं किया जाता और भारत में फर्जी सिम व बैंक खातों की सप्लाई चेन नहीं टूटती, तब तक तोजीहा सुल्ताना जैसे निर्दोष लोग शिकार बनते रहेंगे।
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खबरीलाल का सवाल:

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क्या हमारे बैंकों का सिस्टम इतना कमजोर है कि संदिग्ध ट्रांजेक्शन को तुरंत फ्लैग नहीं किया जा सकता? जब एक बुजुर्ग महिला के खाते से 5 दिन में 29 लाख निकल रहे थे, तो बैंक ने अलर्ट क्यों नहीं भेजा? यह जांच का विषय है।
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हम उम्मीद करते हैं कि नजीबाबाद पुलिस जल्द ही फरार आरोपियों को पकड़ेगी और पीड़िता को न्याय दिलाएगी।
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साइबर ठगी से बचने का 'सुरक्षा कवच'

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क्या करें (DOs)
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क्या न करें (DON'Ts)
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हेल्पलाइन 1930 पर तुरंत रिपोर्ट करें।
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अनजान वीडियो कॉल न उठाएं।
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अपने बैंक में लिमिट सेट करें।
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स्क्रीन शेयरिंग ऐप्स डाउनलोड न करें।
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'डिजिटल अरेस्ट' की बात को झूठ मानें।
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डरकर पैसे ट्रांसफर न करें।
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स्थानीय पुलिस को सूचित करें।
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अपना आधार/पैन नंबर शेयर न करें।
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सोशल मीडिया पर प्राइवेसी लगाएं।
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अनजान लिंक पर क्लिक न करें।
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FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न):

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Q: डिजिटल अरेस्ट क्या होता है?
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A: डिजिटल अरेस्ट एक तरह का स्कैम है जिसमें ठग खुद को पुलिस या सीबीआई बताकर वीडियो कॉल पर आपको घर में ही कैद रहने को कहते हैं और गिरफ्तारी के डर से पैसे मांगते हैं। असली पुलिस ऐसा कभी नहीं करती।
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Q: बिजनौर मामले में पैसे कहां गए?
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A: ठगी गई रकम गाजियाबाद और मुंबई के अलग-अलग बैंक खातों में भेजी गई थी, जिन्हें 'रेंटेड अकाउंट्स' या 'म्यूल अकाउंट्स' कहा जाता है।
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Q: अगर मेरे साथ ऐसा हो तो मैं क्या करूं?
\r\n\r\n
A: घबराएं नहीं। तुरंत कॉल काट दें। 1930 डायल करें और www.cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें। अपने बैंक को सूचित कर खाता फ्रीज करवाएं।
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Q: क्या पुलिस कंबोडिया जाकर उन्हें पकड़ सकती है?
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A: यह प्रक्रिया जटिल है। इसके लिए इंटरपोल (Interpol) और अंतरराष्ट्रीय संधियों की मदद लेनी पड़ती है। भारतीय पुलिस पहले भारत में मौजूद उनके सहयोगियों को पकड़ती है।
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