खबरीलाल न्यूज़ डेस्क, मेरठ:
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भारत में डॉक्टर बनने का सपना हर साल लाखों युवा देखते हैं, लेकिन साल 2026 का NEET-UG एग्जाम देश के शिक्षा इतिहास में एक बड़े काले धब्बे के रूप में दर्ज हो गया है। पेपर लीक, परीक्षा केंद्रों पर भारी धांधली, रातों-रात परीक्षा का रद्द होना और सिस्टम की घोर लापरवाही ने देश भर में कई होनहार छात्रों को गहरे अवसाद में धकेल दिया। इस अवसाद का खौफनाक नतीजा यह हुआ कि कई होनहार छात्रों ने मौत को गले लगा लिया।
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हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, अपने बच्चों को खो चुके माता-पिता ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को नाकाफी बताया है। उनका स्पष्ट कहना है कि सरकार छात्रों और अभिभावकों की मानसिक पीड़ा को समझने में पूरी तरह विफल रही है।
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​शनिवार को जब इस पूरे बवाल की नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी लेते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दिया, तो मीडिया और राजनीतिक गलियारों में तो हलचल मच गई, लेकिन उन घरों में आज भी खामोशी और मातम पसरा है, जिन्होंने इस 'सिस्टम की नाकामी' के कारण अपने बच्चों को हमेशा के लिए खो दिया। इन परिवारों का एक ही सवाल है— क्या एक मंत्री के कुर्सी छोड़ देने से सड़ा-गला सिस्टम सुधर जाएगा? क्या चंद लाख रुपयों का सरकारी मुआवजा उस सूनी गोद को फिर से भर पाएगा?
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​1. "इस्तीफा और मुआवजा हमारे बच्चों को वापस नहीं ला सकता"

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​बच्चों को खो चुके माता-पिता के लिए शिक्षा मंत्री का इस्तीफा किसी भी तरह से पर्याप्त नहीं है। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार, इन परिवारों का स्पष्ट कहना है कि सरकार और संबंधित एजेंसियों (NTA) ने कभी भी नीट परीक्षा देने वाले छात्रों के मानसिक तनाव, उनके अथक संघर्ष और उनके अभिभावकों के दर्द को समझने की कोशिश ही नहीं की।
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​उत्तर प्रदेश के खीरी जिले के रहने वाले एक 21 वर्षीय नीट अभ्यर्थी के पिता की आंखें आज भी अपने बेटे को याद कर नम हो जाती हैं। उनके बेटे ने मेडिकल में दाखिले के लिए यह तीसरी बार परीक्षा दी थी। लेकिन परीक्षा में हुई भारी गड़बड़ी और पेपर लीक की खबरों ने उस युवा मन को इस कदर तोड़ दिया कि मई के महीने में उसने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली।
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​पिता अपना दर्द बयां करते हुए भर्राए गले से कहते हैं, "आज भी मेरी पत्नी इस गहरे सदमे से उबर नहीं पाई है। वो दिन-रात बस बेटे को पुकारती रहती है, उसकी मानसिक स्थिति पूरी तरह बिगड़ चुकी है। सरकार का कोई भी मुआवजा या किसी बड़े मंत्री का इस्तीफा मेरे बेटे को वापस नहीं ला सकता। बेटे के जाने के बाद हमारी जिंदगी में जो खालीपन आ गया है, वो अब ताउम्र नहीं भरेगा।"
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​2. छात्रों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन और पुलिस की बर्बरता पर गहरा रोष

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​पीड़ित परिवारों में सिर्फ शिक्षा व्यवस्था को लेकर ही गुस्सा नहीं है, बल्कि राजधानी दिल्ली में न्याय मांग रहे निहत्थे छात्रों पर हुई पुलिसिया कार्रवाई को लेकर भी भारी आक्रोश है।
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​खीरी के उसी छात्र के पिता ने जंतर-मंतर पर डटे छात्रों के जज्बे की सराहना करते हुए कहा कि पुलिस की लाठियों और क्रूर मारपीट के बावजूद छात्र अपने हक के लिए अड़े रहे। उन्होंने कहा, "मुझे पूरी उम्मीद है कि सड़कों पर उतरा यह छात्र आंदोलन भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोकने में मददगार साबित होगा। अगर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने यह विरोध प्रदर्शन शुरू होने के तुरंत बाद इस्तीफा दे दिया होता और अपनी गलती मान ली होती, तो जंतर-मंतर पर हुई हिंसा को टाला जा सकता था और शायद कुछ और बच्चों की जान बच जाती।"
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​3. नागपुर की उस मां की पुकार: "दोषियों को मिले कड़ी से कड़ी सजा"

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​महाराष्ट्र के नागपुर में 20 मई को आत्महत्या करने वाली 18 साल की होनहार नीट अभ्यर्थी की मां का गुस्सा सातवें आसमान पर है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि शिक्षा मंत्री का इस्तीफा अपनी जगह है, लेकिन जो लोग असल में इस पेपर लीक माफिया का हिस्सा हैं, उन्हें सख्त सजा मिलनी चाहिए।
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​उन्होंने भावुक होते हुए कहा, "मैं उन सभी छात्रों को हाथ जोड़कर धन्यवाद देना चाहती हूं जिन्होंने मेरी बच्ची और बाकी पीड़ित बच्चों के लिए आवाज उठाई और पुलिस की क्रूर लाठियों का डटकर सामना किया। मैं बस यही चाहती हूं कि पेपर लीक करने वाले और छात्रों पर कार्रवाई का आदेश देने वाले लोगों को कड़ी सजा मिले।"
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​मृतक छात्रा के पिता ने कहा, "आज ऐसा लगता है कि थोड़ा न्याय मिला है। मंत्री के इस्तीफे से मेरी बेटी वापस तो नहीं आएगी, लेकिन कम से कम अब उसकी आत्मा को थोड़ी शांति जरूर मिलेगी।" जब उनसे मुआवजे के बारे में पूछा गया तो उनका जवाब दिल चीर देने वाला था। उन्होंने बताया कि बेटी की मौत के बाद उनके रिश्तेदारों ने उसकी पढ़ाई के लिए लिए गए भारी कर्ज को चुकाने में मदद की। अगर सरकार से कोई मुआवजा मिलता भी है, तो वे उससे बचा हुआ कर्ज ही चुकाएंगे। मृतक छात्रा की मां ने नागपुर में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शन में भी पूरे दमखम के साथ हिस्सा लिया था।
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​4. "सरकार ने अपनी गलती मानने में बहुत देर कर दी, यह दबाव का इस्तीफा है"

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​राजस्थान के कोटपूतली-बहरोड़ जिले के एक मृत नीट अभ्यर्थी के पिता ने पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता पर तीखे सवाल उठाए। उनका कहना है कि वातानुकूलित कमरों में बैठे नेताओं और नौकरशाहों को यह अंदाजा ही नहीं है कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के दौरान छात्रों को किस तरह के भयानक मानसिक दबाव, आर्थिक तंगी और पीड़ा से गुजरना पड़ता है।
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​उन्होंने तल्ख लहजे में कहा, "इतने बच्चों की मौत हो गई, लेकिन सरकार अपनी गलती मानने को तैयार ही नहीं थी। जब देश भर के छात्रों ने एकजुट होकर विरोध प्रदर्शन किया, पुलिस की लाठियां खाईं और जंतर-मंतर छोड़ने से साफ इनकार कर दिया, तब जाकर सरकार मानी।" पिता का यह भी मानना है कि धर्मेंद्र प्रधान ने स्वेच्छा से इस्तीफा नहीं दिया है, बल्कि देश के युवाओं के भारी दबाव के कारण उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा है।
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5. "मेरी बेटी की कोई गलती नहीं थी, वो सड़े हुए सिस्टम का शिकार हुई"

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​उत्तराखंड के देहरादून की रहने वाली 23 वर्षीय नीट अभ्यर्थी की मां के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। उनका मानना है कि सरकार द्वारा अपनी गलती स्वीकार करने में बहुत ज्यादा देर हो चुकी है, जिसकी कीमत उन्होंने अपनी बेटी की जान देकर चुकाई है।
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​उन्होंने रोते हुए कहा, "मेरी बेटी की मौत में उसकी कोई गलती नहीं थी। यह उसका मेडिकल प्रवेश का आखिरी मौका था। जब परीक्षा रद्द होने की बात सामने आई, तो वह गहरे अवसाद में चली गई। सरकार न तो मेरी बेटी का दर्द समझ सकती है और न ही हमारा। मुआवजा उसे वापस नहीं ला सकता, लेकिन यदि सरकार परीक्षा के ढांचे में ईमानदारी से सुधार (Systemic Reforms) करे, तो भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता है।"
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​6. 'वो हमारी इकलौती संतान थी... हमें मंत्री के इस्तीफे से क्या?'

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​ओडिशा के बरहामपुर शहर में पिछले ही सप्ताह अपनी जान देने वाली 20 साल की छात्रा की मां के लिए तो मानो दुनिया ही उजड़ गई है।
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​उन्होंने शून्य में घूरते हुए कहा, "वो हमारी इकलौती संतान थी। हमारे बुढ़ापे का एकमात्र सहारा। हमारे लिए इस बात से क्या ही फर्क पड़ता है कि शिक्षा मंत्री ने इस्तीफा दिया या नहीं? लेकिन, एक मां होने के नाते मैं चाहती हूं कि नीट जैसी अहम परीक्षा में सिर्फ और सिर्फ मेधावी छात्रों को ही प्रवेश मिलना चाहिए, न कि उन लोगों को जो गलत और भ्रष्ट तरीकों से परीक्षा पास करते हैं।"
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7. जब सुसाइड नोट हुआ वायरल: भाई को दिखी न्याय की उम्मीद

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​उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले में आत्महत्या करने वाली 19 वर्षीय छात्रा के भाई की पीड़ा यह बताती है कि यह लड़ाई सिर्फ छात्रों की नहीं, बल्कि पूरे परिवार की है। उनकी छोटी बहन ने नीट की पुनर्परीक्षा (Re-exam) देने के भारी दबाव के बीच आत्महत्या कर ली थी।
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​भाई ने बताया कि उनकी बहन का सुसाइड नोट, जिसमें उसने लिखा था कि 'मैं अब और बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगी', विरोध प्रदर्शन के दौरान सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुआ था। उन्होंने कहा, "कॉकरोज जनता पार्टी (CJP) के विरोध प्रदर्शन से लोगों को नीट उम्मीदवारों का दर्द समझने में मदद मिली है। आज मैं चैन से सो सकता हूं क्योंकि मुझे लगता है कि मेरी बहन को कुछ हद तक न्याय मिला है।"
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खबरीलाल का यह स्पष्ट मानना है कि NEET UG 2026 का यह पूरा प्रकरण देश के शिक्षा तंत्र पर एक बदनुमा दाग है। शिक्षा मंत्री का इस्तीफा राजनीतिक डैमेज कंट्रोल का एक छोटा सा हिस्सा हो सकता है, लेकिन जिन परिवारों ने अपने बच्चों को खोया है, उनके लिए न्याय अभी भी मीलों दूर है। जब तक परीक्षा प्रणाली पूरी तरह से पारदर्शी, जवाबदेह और भ्रष्टाचार मुक्त नहीं हो जाती, तब तक ऐसे इस्तीफे बेमानी रहेंगे। सरकार को अब कागजी वादों से बाहर निकलकर ठोस कदम उठाने होंगे ताकि भविष्य में किसी भी छात्र को अपने हक के लिए अपनी जान की बाजी न लगानी पड़े।
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