भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। आम आदमी और विशेषकर मध्यम वर्गीय (Middle Class) परिवारों के लिए बीमारी से ज्यादा खौफनाक बड़े अस्पतालों के भारी-भरकम बिल होते हैं। अक्सर देखा जाता है कि जब कोई व्यक्ति बीमार पड़ता है, तो अस्पताल में भर्ती होते ही उसके परिजनों की सबसे बड़ी चिंता यह शुरू हो जाती है कि अंत में बिल कितना बनेगा। कई बार इलाज के दौरान अप्रत्याशित खर्चे इतने बढ़ जाते हैं कि एक सामान्य परिवार की जीवन भर की जमापूंजी खत्म हो जाती है और उन्हें कर्ज तक लेना पड़ जाता है।
देश भर के निजी अस्पतालों में इलाज की दरों को लेकर व्याप्त इसी असमंजस और मनमानी को खत्म करने के लिए अब केंद्र सरकार ने एक बहुत बड़ा और सख्त कदम उठाया है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने मरीजों को राहत देने के उद्देश्य से Hospital Treatment Fee Display को लेकर नए निर्देश जारी किए हैं। केंद्र ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सख्त आदेश दिया है कि उनके यहां संचालित सभी अस्पतालों और क्लीनिकों में ट्रीटमेंट, ओपीडी और बाकी स्वास्थ्य सेवाओं की फीस बिल्कुल साफ तौर पर प्रदर्शित होनी चाहिए।
स्वास्थ्य सचिव का मुख्य सचिवों को सख्त पत्र इस व्यवस्था को पूरे देश में एक समान रूप से और सख्ती से लागू कराने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव पुण्य सलिला श्रीवास्तव ने सोमवार को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को एक विस्तृत पत्र लिखा है। उन्होंने अपने पत्र में राज्य के आला अधिकारियों से आग्रह किया है कि वे स्वास्थ्य संस्थानों में मौजूदा नियमों के अनुपालन की गहन समीक्षा करें।
उन्होंने यह सुनिश्चित करने को कहा है कि अस्पताल में प्रवेश करते ही इलाज से जुड़ी हर प्रकार की फीस की जानकारी मरीजों और उनके परिजनों को स्पष्ट रूप से दिखाई दे। इस बड़े कदम का प्राथमिक उद्देश्य देश के हेल्थकेयर सेक्टर में वित्तीय पारदर्शिता बढ़ाना है ताकि मरीज इलाज शुरू होने से पहले ही खर्च का अनुमान लगा सकें।
Follow the Khabreelal News channel on WhatsApp Join ›क्या कहता है क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स एक्ट? स्वास्थ्य मंत्रालय ने अपने इस आदेश को कानूनी आधार देते हुए क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स (रजिस्ट्रेशन एंड रेगुलेशन) एक्ट, 2010 और क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स (सेंट्रल गवर्नमेंट) रूल्स, 2012 का विशेष रूप से हवाला दिया है। इन केंद्रीय कानूनों के प्रावधानों के तहत, उन सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जहां यह एक्ट लागू है, स्वास्थ्य संस्थानों के लिए यह अनिवार्य है कि वे अपनी सेवाओं और सुविधाओं की दरें (Rate List) सार्वजनिक करें।
यह दर सूची अस्पताल के किसी ऐसे प्रमुख स्थान पर प्रदर्शित होनी चाहिए, जहां अस्पताल में आने वाले हर मरीज और उनके तीमारदार की नजर आसानी से पड़ सके। कोई भी अस्पताल इस जानकारी को छिपा कर या केवल मांग कर दिखाने की नीति पर काम नहीं कर सकता है।
🏪 आपके शहर के ऑफर
अंग्रेजी के साथ स्थानीय भाषा की अनिवार्यता अक्सर बड़े अस्पतालों में सूचनाएं केवल अंग्रेजी में होती हैं, जिसे समझना आम ग्रामीण या कम पढ़े-लिखे मरीजों के लिए मुश्किल होता है। इस समस्या को दूर करने के लिए मंत्रालय ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि फीस और चार्जेज से जुड़ी यह पूरी जानकारी अंग्रेजी भाषा के साथ-साथ राज्य की स्थानीय (रीजनल) भाषा में भी अनिवार्य रूप से उपलब्ध होनी चाहिए। इससे हर वर्ग के मरीज के लिए यह समझना बहुत आसान हो जाएगा कि उन्हें किस इलाज या टेस्ट के लिए वास्तव में कितने पैसे चुकाने होंगे।
बिलिंग विवादों और असमंजस में आएगी कमी केंद्र सरकार और स्वास्थ्य मंत्रालय का स्पष्ट मानना है कि इलाज की दरों की जानकारी सार्वजनिक रूप से डिस्प्ले होने से अस्पतालों के फाइनल बिल को लेकर होने वाले विवादों में भारी कमी आएगी। वर्तमान में इलाज के बाद अचानक बड़ा बिल थमा दिए जाने पर मरीजों और अस्पताल प्रबंधन के बीच अक्सर झगड़े और कानूनी विवाद देखने को मिलते हैं।
अब, जब मरीजों को अलग-अलग सेवाओं और सुविधाओं के संभावित खर्च की पूरी जानकारी पहले से मिल जाएगी, तो वे अपने बजट के अनुसार अस्पताल और इलाज के विकल्पों पर कहीं बेहतर तरीके से विचार कर सकेंगे। वे तय कर पाएंगे कि उन्हें अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार किस अस्पताल में इलाज कराना है।
विदेशी मरीजों (Medical Visa) के लिए विशेष निर्देश मंत्रालय ने केवल भारतीय नागरिकों तक ही इस पारदर्शिता को सीमित नहीं रखा है, बल्कि भारत में इलाज कराने आने वाले विदेशी मरीजों के अधिकारों का भी ध्यान रखा है। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से अनुरोध किया गया है कि वे अस्पतालों को प्रोत्साहित करें कि जो विदेशी मरीज मेडिकल वीजा (Medical Visa) या आयुष वीजा (Ayush Visa) पर भारत आते हैं, उनके लिए उपलब्ध ट्रीटमेंट पैकेज की दरें भी अस्पताल में प्रमुखता से प्रदर्शित की जाएं।
नियम लागू कराना राज्यों की जिम्मेदारी केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव ने अपने पत्र के अंत में इस बात पर जोर दिया है कि संविधान के अनुसार 'स्वास्थ्य' (Health) राज्य सूची का विषय है। ऐसे में इन पारदर्शी नियमों को धरातल पर लागू करने और उनका सख्ती से पालन सुनिश्चित कराने की पूरी जिम्मेदारी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के स्थानीय अधिकारियों की ही है।
मंत्रालय ने यह भी साफ किया कि जिन राज्यों में केंद्रीय क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स कानून लागू नहीं है, वहां भी स्वास्थ्य संस्थानों का नियमन राज्य के अपने स्थानीय नियमों के तहत किया जाता है। राज्य के उन स्थानीय नियमों में भी सेवा शुल्क प्रदर्शित करने से जुड़े अनिवार्य प्रावधान पहले से मौजूद हैं, जिनका अब अधिकारियों द्वारा कड़ाई से पालन कराया जाना चाहिए।
Sabse pehle comment karne wale banein.