उत्तर प्रदेश में दवा के कारोबार (Pharma Business) की आड़ में नशीले पदार्थों की तस्करी और नियमों की धज्जियां उड़ाने वालों के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है। प्रदेश में कोडीन युक्त कफ सिरप (Codeine Cough Syrup) के अवैध कारोबार का पर्दाफाश होने के बाद खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FSDA) विभाग पूरी तरह से एक्शन मोड में आ गया है। 'कोडीन कांड' ने न केवल सिस्टम की खामियों को उजागर किया, बल्कि यह भी बताया कि कैसे कागजों में हेराफेरी कर दवा के थोक लाइसेंस रेवड़ियों की तरह बांटे जा रहे थे।READ ALSO:-बिजनौर का 'रक्तचरित्र': जिस घर में गूंजने थी शहनाई, वहां भाई ने ही बिछा दी लाश; 4 लाख की सुपारी, जमीन की हवस और एक खौफनाक साजिश का 'द एंड'
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इस पर कड़ा संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश सरकार और औषधि आयुक्त डॉ. रोशन जैकब ने नियमों की पूरी किताब ही बदल डाली है। अब प्रदेश में थोक दवा लाइसेंस (Wholesale Drug License) हासिल करना आसान नहीं होगा। नए नियमों के तहत जियो टैगिंग (Geo-tagging) से लेकर कर्मचारियों की सैलरी स्लिप (Salary Slip) तक, हर दस्तावेज की बारीकी से जांच होगी। यह बदलाव केवल कागजी नहीं है, बल्कि धरातल पर दवा माफियाओं की कमर तोड़ने के लिए एक 'सर्जिकल स्ट्राइक' की तरह है।
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इस विस्तृत रिपोर्ट में हम आपको बताएंगे कि नए नियम क्या हैं, इनसे दवा व्यापारियों पर क्या असर पड़ेगा, और आखिर सरकार को इतना सख्त कदम क्यों उठाना पड़ा।
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1. क्यों पड़ी सख्त नियमों की जरूरत? कोडीन कांड का सच

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नियमों में बदलाव की जड़ में हाल ही में सामने आया 'कोडीन कफ सिरप प्रकरण' है। दरअसल, पिछले कुछ महीनों में यूपी के कई शहरों से भारी मात्रा में कोडीन युक्त कफ सिरप की खेप पकड़ी गई थी। जांच में पाया गया कि ये सिरप दवा की दुकानों के माध्यम से नशा करने वाले गिरोहों और युवाओं तक पहुंच रहे थे।
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हैरानी की बात यह थी कि जिन फर्मों के नाम पर ये खेप जा रही थी, उनमें से कई केवल कागजों पर चल रही थीं। लाइसेंस जारी करते समय ड्रग इंस्पेक्टरों और अधिकारियों ने न तो गोदामों की जांच की थी और न ही आवेदकों के पिछले रिकॉर्ड की।
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शिकायतों का अंबार: कोडीन प्रकरण के बाद शासन को ऐसी सैकड़ों शिकायतें मिलीं कि लाइसेंस जारी करने में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और नियमों की अनदेखी हो रही है। बिना भौतिक सत्यापन (Physical Verification) के लाइसेंस जारी किए जा रहे थे। इन शिकायतों की जांच अभी भी जारी है और माना जा रहा है कि इसकी जद में कई औषधि निरीक्षक (Drug Inspectors) और सहायक आयुक्त (Assistant Commissioners) आएंगे। इसी 'सिस्टम फेलियर' को रोकने के लिए औषधि आयुक्त डॉ. रोशन जैकब ने नए और अभेद्य नियम लागू किए हैं।
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2. अब 'हवा' में नहीं लटकेगी दुकान: जियो टैगिंग (Geo-Tagging) हुई अनिवार्य

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नए नियमों में सबसे बड़ा तकनीकी बदलाव जियो टैगिंग का है। अब तक होता यह था कि आवेदक किसी भी पते पर लाइसेंस ले लेता था और बाद में दुकान कहीं और चलाता था, या कई मामलों में दुकान अस्तित्व में ही नहीं होती थी।
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    जीपीएस लोकेशन: अब लाइसेंस आवेदन के समय संबंधित दुकान और गोदाम की जियो टैगिंग कराई जाएगी।
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    मौके पर मौजूदगी: केवल जीपीएस लोकेशन भेजना काफी नहीं होगा। आवेदक को प्रस्तावित परिसर (दुकान/गोदाम) पर खुद मौजूद रहना होगा और वहां से अक्षांश-देशांतर (Latitude-Longitude) के साथ विवरण देना होगा।
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    फायदा: इससे 'घोस्ट फर्म्स' (फर्जी कंपनियों) पर लगाम लगेगी। अधिकारी अपने कार्यालय में बैठकर डिजिटल मैप पर देख सकेंगे कि दुकान वास्तव में कहां स्थित है।
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3. अनुभव प्रमाण पत्र का 'फर्जीवाड़ा' खत्म: वेतन पर्ची (Pay Slip) का सबूत जरूरी

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फार्मा बिजनेस में लाइसेंस लेने के लिए 'अनुभव प्रमाण पत्र' (Experience Certificate) एक अहम दस्तावेज होता है। अब तक लोग किसी भी फर्म से फर्जी लेटरहेड पर अनुभव प्रमाण पत्र बनवा लेते थे। लेकिन अब यह रास्ता पूरी तरह बंद कर दिया गया है।
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अब क्या देना होगा सबूत?

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    सैलरी स्लिप (Pay Slip): आवेदक को अनुभव प्रमाण पत्र के साथ यह सबूत भी देना होगा कि जिस फर्म में उसने काम किया, वहां उसे वेतन मिलता था। इसके लिए पे-स्लिप या बैंक स्टेटमेंट देना अनिवार्य होगा।
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    फर्म का शपथ पत्र: अनुभव प्रमाण पत्र जारी करने वाली फर्म को भी एक शपथ पत्र (Affidavit) देना होगा। इसमें उन्हें बताना होगा कि उन्होंने संबंधित व्यक्ति को वेतन भुगतान किया है और उनका खुद का लाइसेंस वैध है।
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    उपस्थिति रजिस्टर: जरूरत पड़ने पर फर्म का अटेंडेंस रजिस्टर (Attendance Register) भी जांचा जाएगा।
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इनका अनुभव होगा अमान्य: नए आदेश में स्पष्ट किया गया है कि जिन फर्मों के लाइसेंस पूर्व में निरस्त हो चुके हैं या जिनके खिलाफ औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम या नारकोटिक्स एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज है, उनका जारी किया गया अनुभव प्रमाण पत्र वैध (Valid) नहीं माना जाएगा।
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4. रिहायशी इलाकों में नहीं चलेंगे गोदाम: लोकेशन पर सख्त पाबंदी

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अक्सर देखा जाता है कि लोग अपने घर के बेसमेंट या घनी आबादी वाले रिहायशी इलाकों में दवा का थोक गोदाम बना लेते हैं। इससे न केवल सुरक्षा का खतरा रहता है, बल्कि अवैध गतिविधियों की निगरानी भी मुश्किल होती है।
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    आवासीय मकानों पर रोक: औषधि निरीक्षक को जांच के समय यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रस्तावित प्रतिष्ठान किसी पूर्णतः आवासीय मकान (Residential House) या पूरी तरह से रिहायशी क्षेत्र में स्थित न हो।
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    कमर्शियल गतिविधि का सबूत: आवेदक को यह साबित करना होगा कि जिस जगह वह लाइसेंस मांग रहा है, वहां कमर्शियल गतिविधियों की अनुमति है।
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    पड़ोसियों का विवरण: आवेदन में आसपास की दुकानों और प्रतिष्ठानों का भी पूरा विवरण देना होगा, ताकि लोकेशन की सही स्थिति (Cross-verification) पता चल सके।
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5. किरायेनामा अब सादे कागज पर नहीं चलेगा

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दवा लाइसेंस के लिए फर्जी किरायेनामे (Rent Agreement) लगाकर लाइसेंस लेने की प्रथा पर भी रोक लगा दी गई है।
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    रजिस्टर्ड एग्रीमेंट: यदि दुकान और गोदाम आवेदक का खुद का नहीं है, तो उसे 100 रुपये के स्टाम्प पेपर पर बने नोटरी किरायेनामे के बजाय रजिस्टर्ड किरायानामा (Registered Rent Agreement) देना होगा। यह कानूनी रूप से अधिक बाध्यकारी होता है।
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    मालिक की सहमति: संपत्ति मालिक की स्पष्ट सहमति और स्वामित्व का प्रमाण भी संलग्न करना होगा।
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6. ड्रग इंस्पेक्टरों की मनमानी पर लगाम: 'एक बार में बतानी होंगी कमियां'

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अक्सर आवेदक शिकायत करते थे कि ड्रग इंस्पेक्टर बार-बार अलग-अलग कमियां निकालकर फाइल को लटकाते हैं। यह भ्रष्टाचार का एक बड़ा कारण था।
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पारदर्शिता के लिए नया प्रोटोकॉल:

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    वन टाइम ऑब्जेक्शन: औषधि निरीक्षकों को पोर्टल पर आए आवेदनों की जांच के बाद, सभी तरह की कमियां एक बार में ही बतानी होंगी। वे किस्तों में कमियां नहीं बता सकते।
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    स्पष्ट रिपोर्ट: किसी भी तरह की कमी पाए जाने पर निरीक्षक को उसका पूरा और स्पष्ट विवरण पोर्टल पर अपलोड करना होगा।
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    समय सीमा: जांच और रिपोर्ट लगाने की समय सीमा का कड़ाई से पालन करना होगा।
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7. सहायक आयुक्तों की जिम्मेदारी: 10% रैंडम ऑडिट (Random Audit) 

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नियम केवल जनता के लिए नहीं, बल्कि अधिकारियों के लिए भी सख्त हुए हैं। अब सहायक आयुक्त (Assistant Commissioner) आंख मूंदकर फाइल पास नहीं कर पाएंगे।
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    रैंडम वेरिफिकेशन: औषधि निरीक्षक द्वारा हर माह जारी किए गए या फॉरवर्ड किए गए लाइसेंसों में से 10 फीसदी की रैंडम जांच सहायक आयुक्त को खुद करनी होगी।
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    भौतिक सत्यापन (Physical Verification): सहायक आयुक्त को मौके पर जाकर देखना होगा कि इंस्पेक्टर ने जो रिपोर्ट दी है, वह सही है या नहीं।
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    लाइसेंस निरस्तीकरण: यदि रैंडम जांच के दौरान मौके पर कमियां पाई जाती हैं, तो तुरंत लाइसेंस निरस्त करने की प्रक्रिया शुरू होगी और संबंधित इंस्पेक्टर से जवाब-तलब किया जाएगा।
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8. प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों के लिए खास निर्देश

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कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर वाली कंपनियों के लिए भी नियमों को परिभाषित किया गया है।
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    प्रबंधकों की सूची: प्राइवेट लिमिटेड या लिमिटेड कंपनी को अपने सभी निदेशकों (Directors) और प्रबंधकों (Managers) की अद्यतन सूची जमा करनी होगी।
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    जिम्मेदार व्यक्ति (Person In-charge): दैनिक व्यवसाय और दवाओं के रखरखाव के लिए कौन व्यक्ति जिम्मेदार होगा, उसका नाम और शपथ पत्र अलग से देना होगा।
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9. 3 साल का इतिहास और नारकोटिक्स कनेक्शन की जांच

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नए आवेदन पत्र में अब आवेदक की 'कुंडली' खंगाली जाएगी।
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    शपथ पत्र: आवेदन पत्र में नाम, पता, मोबाइल नंबर, पैन कार्ड के साथ-साथ अब आवेदक का पिछले तीन वर्षों में किए गए व्यवसाय या पेशे के संबंध में शपथ पत्र लिया जाएगा।
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    ब्लैकलिस्टेड लोगों की एंट्री बैन: जांच में यह देखा जाएगा कि आवेदक या फर्म में शामिल पार्टनर में से कोई ऐसा व्यक्ति तो नहीं है, जिसका लाइसेंस पहले निरस्त हुआ हो या जो नारकोटिक्स एक्ट (NDPS Act) के तहत दोषी पाया गया हो। ऐसे लोगों को दोबारा लाइसेंस नहीं मिलेगा।
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10. इन्फ्रास्ट्रक्चर की कड़ी जांच: फ्रिज से लेकर बिजली तक

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दवाओं की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए स्टोरेज की स्थिति सबसे महत्वपूर्ण है।
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    कोल्ड चेन: परिसर में दवाओं की उपलब्धता के हिसाब से रेफ्रिजरेटर और कोल्ड रूम (Cold Room) की व्यवस्था अनिवार्य होगी।
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    पावर बैकअप: बिजली जाने पर दवाओं को खराब होने से बचाने के लिए जनरेटर या इनवर्टर की व्यवस्था का भौतिक सत्यापन किया जाएगा।
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    साफ-सफाई: गोदाम में नमी (Humidity) और तापमान (Temperature) को नियंत्रित करने के इंतजाम देखे जाएंगे।
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दवा बाजार पर इसका क्या असर होगा?

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'खबरिलाल' ने इस मुद्दे पर दवा व्यापार से जुड़े विशेषज्ञों और फार्मासिस्टों से बात की। इस नए आदेश के दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं:
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1. छोटे व्यापारियों के लिए चुनौती: नए नियम, विशेषकर 'रजिस्टर्ड किरायानामा' और 'कमर्शियल लोकेशन' की शर्त, छोटे पूंजी वाले दवा व्यापारियों के लिए मुश्किल खड़ी कर सकते हैं। थोक व्यापार शुरू करने की लागत (Initial Cost) बढ़ जाएगी।
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2. फार्मासिस्टों की मांग बढ़ेगी: चूंकि अब अनुभव प्रमाण पत्र और सैलरी स्लिप की जांच सख्त हो गई है, इसलिए डिग्री धारी और वास्तविक अनुभवी फार्मासिस्टों की मांग बाजार में बढ़ेगी। फर्जी सर्टिफिकेट के आधार पर लाइसेंस लेने वालों की छुट्टी हो जाएगी।
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3. भ्रष्टाचार में कमी: जियो टैगिंग और रैंडम ऑडिट से "इंस्पेक्टर राज" पर कुछ हद तक लगाम लगने की उम्मीद है। जब अधिकारी को पता होगा कि उसकी रिपोर्ट की 10% क्रॉस-चेकिंग हो सकती है, तो वह गलत रिपोर्ट लगाने से डरेगा।
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4. जनता की सुरक्षा: सबसे बड़ा लाभ आम जनता को होगा। कोडीन जैसी नशीली दवाओं की अवैध बिक्री पर रोक लगेगी, और बाजार में केवल जेनुइन और गुणवत्तापूर्ण दवाएं ही उपलब्ध होंगी।
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'स्वच्छ दवा व्यापार' की ओर एक बड़ा कदम

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उत्तर प्रदेश सरकार का यह कदम स्पष्ट संकेत देता है कि जन स्वास्थ्य (Public Health) के साथ खिलवाड़ अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। कोडीन प्रकरण ने जो दाग सिस्टम पर लगाया था, उसे धोने के लिए यह सख्त डिटर्जेंट जरूरी था। हालांकि, इन नियमों का पालन कराना भी अपने आप में एक चुनौती होगी। क्या विभाग के अधिकारी अपनी ही बिरादरी (इंस्पेक्टरों) पर नकेल कस पाएंगे? क्या जियो टैगिंग में तकनीकी छेड़छाड़ को रोका जा सकेगा? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।
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लेकिन फिलहाल, अगर आप यूपी में दवा का थोक व्यापार करने की सोच रहे हैं, तो अपने दस्तावेज दुरुस्त कर लें, क्योंकि अब "जुगाड़" से लाइसेंस नहीं मिलेगा।
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दवा जीवन रक्षक होती है, लेकिन गलत हाथों में यह नशा और मौत का सामान बन जाती है। सरकार की सख्ती स्वागत योग्य है, लेकिन यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि ईमानदारी से व्यापार करने वालों को इंस्पेक्टरों द्वारा अनावश्यक परेशान न किया जाए। पारदर्शिता दोनों तरफ से होनी चाहिए।
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(नोट: यह जानकारी उत्तर प्रदेश खाद्य एवं औषधि प्रशासन द्वारा जारी नवीनतम दिशा-निर्देशों पर आधारित है। लाइसेंस आवेदन से पहले विभागीय पोर्टल पर आधिकारिक अधिसूचना अवश्य चेक करें।)
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