उत्तर प्रदेश सरकार ने शिक्षा व्यवस्था को और भी पारदर्शी बनाने के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। राज्य के सभी राजकीय माध्यमिक विद्यालयों में 1 जुलाई से यूपी स्कूल प्रबंध समिति (SMC) का गठन होने जा रहा है। इस नई नीति के तहत अब सरकारी स्कूलों के संचालन की मुख्य जिम्मेदारी पेरेंट्स के हाथों में होगी। इसका मुख्य उद्देश्य बच्चों के बेहतर भविष्य का निर्माण करना और स्कूलों में जवाबदेही तय करना है।READ ALSO:-मेरठ में देह व्यापार का भंडाफोड़: कंकरखेड़ा के रोहटा रोड स्थित होटल में पुलिस की बड़ी रेड, 5 युवतियां और 6 पुरुष हिरासत में
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क्या है विद्यालय प्रबंध समिति (SMC) का नया नियम?
\r\n\r\nशिक्षा मंत्रालय ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ ही स्कूलों में समितियां बनाई जाएं। हालांकि, किन्हीं प्रशासनिक कारणों से इस प्रक्रिया में देरी हुई और काम समय पर पूरा नहीं हो सका।
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अब गर्मियों की छुट्टियों के बाद 1 जुलाई से स्कूल फिर से खुल रहे हैं। इसलिए अपर मुख्य सचिव पार्थ सारथी सेन शर्मा ने इस प्रक्रिया को तेजी से पूरा करने के सख्त निर्देश जारी किए हैं। राज्य के सभी स्कूलों को जल्द से जल्द कार्रवाई करनी होगी।
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75 फीसदी अभिभावकों की होगी यूपी स्कूल प्रबंध समिति में हिस्सेदारी
\r\n\r\nइस नई व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यूपी स्कूल प्रबंध समिति में 75 प्रतिशत सदस्य सीधे तौर पर बच्चों के माता-पिता या अभिभावक होंगे। सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि बच्चों के हित में फैसले लिए जाएं।
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यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि स्कूल के दैनिक कामकाज, विकास कार्यों और पढ़ाई-लिखाई से जुड़े महत्वपूर्ण फैसलों में पेरेंट्स की सीधी भागीदारी हो। इससे स्कूलों का प्रबंधन बेहतर होगा और शिक्षा विभाग पर निर्भरता कम होगी।
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महिला सशक्तिकरण: समिति में 50% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित
\r\n\r\nनई प्रबंध समिति में महिलाओं की भागीदारी पर विशेष जोर दिया गया है। नियमों के अनुसार, कुल सदस्यों में से कम से कम 50 प्रतिशत महिलाओं का होना अनिवार्य किया गया है। यह ग्रामीण क्षेत्रों में महिला सशक्तिकरण को भी बढ़ावा देगा।
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सबसे खास बात यह है कि इस समिति का अध्यक्ष भी अनिवार्य रूप से किसी अभिभावक को ही बनाया जाएगा। इससे विद्यालय के मैनेजमेंट पर पेरेंट्स का सीधा नियंत्रण और प्रभाव स्थापित होगा।
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छात्र संख्या के आधार पर तय होंगे समिति के सदस्य
\r\n\r\nसमिति के सदस्यों की संख्या पूरी तरह से स्कूल में नामांकित छात्र-छात्राओं की कुल संख्या पर निर्भर करेगी। इसके लिए शिक्षा विभाग ने स्पष्ट नियम बनाए हैं, ताकि सभी स्कूलों में एक समान व्यवस्था लागू हो सके।
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जिन स्कूलों में अधिकतम 100 छात्र हैं, वहां 15 सदस्य होंगे। 101 से 500 छात्रों वाले विद्यालय में 20 सदस्य नियुक्त होंगे। वहीं, 500 से अधिक विद्यार्थी वाले बड़े स्कूलों में कुल 25 सदस्य शामिल किए जाएंगे।
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यूपी स्कूल प्रबंध समिति में अन्य 25% सदस्य कौन होंगे?
\r\n\r\nयूपी स्कूल प्रबंध समिति में 75% अभिभावकों के अलावा शेष 25% सदस्य समाज के विभिन्न वर्गों से चुने जाएंगे। इनमें स्थानीय नगर निकाय या पंचायत के प्रतिनिधि मुख्य रूप से शामिल होंगे।
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इसके साथ ही, जाने-माने शिक्षाविद, विषय विशेषज्ञ, उसी स्कूल के पुराने छात्र (Alumni) और समाज के पिछड़े या वंचित वर्ग के प्रतिनिधियों को भी इस समिति का हिस्सा बनाया जाएगा। इससे समिति को हर क्षेत्र का अनुभव मिलेगा।
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दो नई उप-समितियां करेंगी स्कूल के विकास का काम
\r\n\r\nपूरे दो साल के कार्यकाल के दौरान यह समिति केवल कागजों तक सीमित नहीं रहेगी। स्कूल के बेहतर संचालन के लिए मुख्य समिति के नीचे दो विशेष उप-समितियां भी गठित की जाएंगी।
\r\n\r\nइनमें से एक भवन निर्माण उप-समिति होगी, जो स्कूल के इंफ्रास्ट्रक्चर और मरम्मत का ध्यान रखेगी। दूसरी शैक्षणिक उप-समिति होगी, जिसका मुख्य काम बच्चों की पढ़ाई की गुणवत्ता और शिक्षकों के प्रदर्शन पर नजर रखना होगा।
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उत्तर प्रदेश के राजकीय स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए यह सरकार का एक बेहद सराहनीय कदम है। यूपी स्कूल प्रबंध समिति में अभिभावकों को 75 प्रतिशत की बड़ी हिस्सेदारी मिलने से स्कूलों की कार्यप्रणाली में स्पष्ट रूप से पारदर्शिता आएगी। पेरेंट्स के सक्रिय होने से शिक्षकों की जवाबदेही बढ़ेगी और बच्चों की पढ़ाई की गुणवत्ता में निश्चित रूप से एक बड़ा सुधार देखने को मिलेगा।

Sabse pehle comment karne wale banein.