वृंदावन के संत प्रेमानंद जी महाराज आज के समय में लाखों लोगों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। उनका सरल जीवन, मधुर वाणी और राधा-कृष्ण के प्रति अटूट प्रेम उन्हें विश्वभर में प्रसिद्ध बनाता है। उत्तर प्रदेश के कानपुर के पास जन्मे प्रेमानंद जी महाराज का बचपन का नाम अनिरुद्ध कुमार पांडे था। उन्होंने बहुत कम उम्र में ही सांसारिक मोह-माया त्याग कर भक्ति के मार्ग को अपनाया। आज उनके सत्संग को सुनने के लिए दूर-दूर से भक्त वृंदावन आते हैं।READ ALSO:-राजू तालीकोटे का निधन: कन्नड़ अभिनेता को शूटिंग के दौरान आया हार्ट अटैक, शोक की लहर
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\r\nसंन्यास और वृंदावन की यात्रा
\r\nप्रेमानंद जी महाराज को बचपन से ही आध्यात्म की ओर गहरा झुकाव था। पाँचवी कक्षा से ही उन्होंने श्रीमद्भगवद् गीता का पाठ शुरू कर दिया था। मात्र 13 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने घर त्याग दिया। सबसे पहले वह सत्य की खोज में काशी (बनारस) पहुँचे, जहाँ उन्होंने कठोर साधना की। बाद में, शिव जी की कृपा से प्रेरित होकर, वह वृंदावन धाम आए। वृंदावन आकर उन्होंने अपना जीवन पूरी तरह से राधा रानी की भक्ति में समर्पित कर दिया, जहाँ उन्हें 'प्रेमानंद' नाम मिला।
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\r\nउनकी सरल शिक्षाओं का सार
\r\nप्रेमानंद जी महाराज के प्रवचन उनके गहन जीवन दर्शन और शास्त्रों की समझ पर आधारित होते हैं। वह प्रेम, वैराग्य (Renunciation), सत्य और निष्काम कर्म पर जोर देते हैं। वह भक्तों को नाम जप (भगवान के नाम का जाप) और सत्संग के महत्व को समझाते हैं। महाराज जी का मुख्य संदेश है कि भगवान का प्रेम निष्पक्ष होता है, और जीवन की कठिनाइयाँ प्रारब्ध (कर्मों के फल) का हिस्सा हैं। सच्चे प्रेम और समर्पण से ही शाश्वत आनंद प्राप्त किया जा सकता है।
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\r\nस्वास्थ्य और भक्तों का प्रेम
\r\nपिछले कुछ समय से प्रेमानंद जी महाराज स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं, उन्हें पॉलीसिस्टिक किडनी डिजीज नामक आनुवंशिक बीमारी है। डॉक्टर ने उन्हें कुछ साल पहले ही दो-ढाई साल की जिंदगी बताई थी, लेकिन उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा ने उन्हें मजबूती दी है। उनके पांच करीबी शिष्य (जिन्हें भक्त 'पांडव' कहते हैं) 24 घंटे उनकी देखभाल करते हैं। इस कठिन समय में भी, वह प्रतिदिन भोर में भक्तों को दर्शन और सत्संग देते हैं, जो उनकी अटूट भक्ति को दर्शाता है।
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