मेरठ: भारत में दो तरह के नागरिक बसते हैं। एक, जो ट्रैफिक सिग्नल पर रुकते हैं, हेलमेट पहनते हैं और गलती से नियम तोड़ने पर चुपचाप चालान भरते हैं। दूसरे, जिनके लिए शायद कोई नियम नहीं बना। अगर कोई अधिकारी उन्हें नियम याद दिलाने की हिम्मत कर भी ले, तो उसका हश्र वही होता है जो मेरठ के ट्रैफिक इंस्पेक्टर विनय कुमार शाही का हुआ। यह खबर सिर्फ एक चालान कटने या एक इंस्पेक्टर के हटने की नहीं है, बल्कि यह सवाल है कि क्या हमारी व्यवस्था सत्ता के आगे हमेशा घुटने टेक देगी?READ ALSO:-कफ सिरप से मौत का खौफ: IMA का मेडिकल स्टोर्स को अल्टीमेटम, "बिना पर्ची दवा बेची तो खैर नहीं!
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सीन 1: जब कानून ने अपना काम किया मेरठ का व्यस्त रेलवे रोड चौराहा। ट्रैफिक इंस्पेक्टर विनय कुमार शाही अपनी ड्यूटी कर रहे थे। एक बाइक सवार बिना हेलमेट और अधूरे कागजात के आता दिखा। शाही ने उसे रोका और नियमानुसार चालान की कार्रवाई शुरू की। यह किसी भी लोकतंत्र में एक सामान्य प्रक्रिया होनी चाहिए थी, लेकिन यहीं से कहानी ने एक कुरूप मोड़ ले लिया।
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सीन 2: "तुम जानते नहीं मैं कौन हूँ!" वाला ड्रामा बाइक सवार ने खुद को सत्ताधारी दल बीजेपी का कार्यकर्ता बताया। जब उसकी धौंस काम न आई, तो फोन घनघनाने लगे। कुछ ही मिनटों में, मानो पूरी पार्टी सड़क पर उतर आई हो। बीजेपी के पार्षद महोदय भी पहुंच गए। जब इंस्पेक्टर शाही ने दबाव में आने से इनकार करते हुए उनका भी चालान काट दिया, तो स्थिति विस्फोटक हो गई। सड़क पर 'पुलिस की गुंडागर्दी' के आरोप लगने लगे, हंगामा हुआ, नारेबाजी हुई और आम जनता को बंधक बनाकर ट्रैफिक जाम कर दिया गया। यह एक चालान का विरोध नहीं, बल्कि कानून को उसकी 'औकात' दिखाने का एक नग्न प्रदर्शन था।
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क्लाइमेक्स: जब सिस्टम ने घुटने टेक दिए जब सड़क पर ड्रामा अपने चरम पर था, तब बैकग्राउंड में फोन पर 'ऊपर' तक शिकायतें पहुंचाई जा रही थीं। बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं ने एसपी ट्रैफिक से बात की। दबाव काम कर गया। जिन अधिकारियों को अपने इंस्पेक्टर के साथ खड़ा होना चाहिए था, उन्होंने व्यवस्था को 'शांत' करने का सबसे आसान रास्ता चुना। देर रात, एक आदेश जारी हुआ और इंस्पेक्टर विनय कुमार शाही को उनके प्रभारी पद से हटा दिया गया। संदेश साफ था - अगर 'खास आदमी' को रोकोगे, तो यही अंजाम होगा।
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पीछे छूटे सवाल इस पूरी घटना के बाद बीजेपी कार्यकर्ता अपनी 'जीत' का जश्न मना रहे होंगे, लेकिन कुछ सवाल मेरठ की हवा में तैर रहे हैं:
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    क्या इस घटना के बाद कोई ट्रैफिक पुलिसकर्मी किसी सत्ताधारी पार्टी के कार्यकर्ता को नियम तोड़ने पर रोकने की हिम्मत करेगा?
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    क्या खाकी वर्दी का सम्मान केवल आम नागरिक के लिए है?
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    एक आम आदमी जो हजारों रुपये का चालान चुपचाप भरता है, उसे इस घटना को देखकर कैसा महसूस होगा?
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इंस्पेक्टर के खिलाफ पहले भी शिकायत की जा चुकी थी।
\r\nभाजपाइयों के हंगामा और विरोध प्रदर्शन के बाद मामला बढ़ गया और प्रभारी को पद से हटाए जाने के बाद ही मामला शांत हुआ। कुछ दिन पहले भी व्यापारी नेताओं और भाजपाइयों ने इंस्पेक्टर विनय कुमार शाही के खिलाफ प्रदर्शन किया था। चल रहे विवाद के चलते एसएसपी ने ट्रैफिक इंस्पेक्टर विनय कुमार शाही को प्रभारी पद से हटा दिया था।
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इंस्पेक्टर शाही पहले भी विवादों में रहे होंगे, लेकिन इस विशेष मामले में वह केवल अपनी ड्यूटी कर रहे थे। उनका हटना इस बात का प्रमाण है कि जब सत्ता और व्यवस्था का टकराव होता है, तो अक्सर जीत सत्ता की ही होती है, भले ही कानून हार जाए।
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