मेरठ (Meerut): उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में खाकी वर्दी को दागदार करने वाला एक बेहद संगीन मामला सामने आया है, जिसने पुलिस महकमे के साथ-साथ पूरे पश्चिमी यूपी की राजनीति में भूचाल ला दिया है। मेरठ में किसान नेता दिग्विजय भाटी और मोहित जाटव के साथ पुलिस द्वारा की गई कथित बर्बर मारपीट और 'थर्ड डिग्री' दिए जाने के मामले में अब पुलिस प्रशासन ने कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। मेरठ जिले की कमान संभालते ही नए एसएसपी (SSP) बीबीजीटीएस मूर्ति ने 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाते हुए बड़ी कार्रवाई की है। इस हाई-प्रोफाइल मामले में घिरे इंस्पेक्टर सिविल लाइंस और एसओजी (SOG) प्रभारी अखिलेश गौड़ को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है।READ ALSO:[-मेरठ में युवा ब्राह्मण समाज का ऐतिहासिक शंखनाद: जातिगत आरक्षण, राजनीतिक उपेक्षा और दमनकारी नीतियों के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का ऐलान
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यह कार्रवाई सिर्फ एक पुलिसकर्मी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे महकमे के लिए एक कड़ा संदेश है कि सत्ता का दुरुपयोग और आम नागरिक या नेताओं के साथ अमानवीय व्यवहार किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इस घटना ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों के गुस्से को भड़का दिया है, जिसके चलते अब बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन की तैयारियां शुरू हो गई हैं।
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नए कप्तान का 'सिंघम' अवतार: पहले दिन ही आठ लाइन हाजिर, अब निलंबन

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मेरठ पुलिस महकमे में पिछले कुछ दिनों से चल रही उथल-पुथल के बीच नए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) बीबीजीटीएस मूर्ति ने अपना कार्यभार संभाला। चार्ज लेते ही उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती सिविल लाइंस थाने में किसान नेताओं के साथ हुई मारपीट का मामला था। इस मामले की गंभीरता को समझते हुए उन्होंने पहले ही दिन कड़े तेवर दिखाए। शुरुआती कार्रवाई करते हुए उन्होंने तत्काल प्रभाव से सिविल लाइन थाने के 8 पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर कर दिया था। उस वक्त इस सूची में एसओजी प्रभारी अखिलेश गौड़ का नाम भी शामिल था।
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हालांकि, मामला इतने पर ही शांत नहीं हुआ। घटना की गंभीरता और लगातार बढ़ रहे जनआक्रोश को देखते हुए मामले की उच्च स्तरीय जांच शुरू की गई। रविवार आते-आते यह साफ हो गया कि पुलिस महकमे को अपनी साख बचाने और न्याय सुनिश्चित करने के लिए और भी कड़े कदम उठाने होंगे। इसी कड़ी में रविवार को अखिलेश गौड़ को पूरी तरह से निलंबित (Suspend) कर दिया गया। एसएसपी कार्यालय से जारी एक आधिकारिक प्रेसनोट में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि इंस्पेक्टर अखिलेश गौड़ को उनके कर्तव्यों के निर्वहन में घोर लापरवाही, उदासीनता और स्वेच्छाचारिता बरतने के गंभीर आरोपों के चलते निलंबित किया गया है।
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क्या था पूरा मामला और कैसे शुरू हुआ विवाद?

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यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब किसान नेता दिग्विजय भाटी और उनके साथी मोहित जाटव को पुलिस हिरासत में लिया गया था। आरोप है कि एसएसपी दफ्तर और थाने के भीतर पुलिसकर्मियों ने अपनी हदों को पार करते हुए इन नेताओं के साथ अमानवीय व्यवहार किया। परिजनों और समर्थकों का सीधा आरोप है कि दोनों नेताओं को 'थर्ड डिग्री' दी गई और उन्हें बुरी तरह से पीटा गया।
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पुलिस कस्टडी में हुई इस बर्बरता का परिणाम यह हुआ कि दिग्विजय भाटी की हालत गंभीर हो गई। वर्तमान में वह मेरठ के एक निजी अस्पताल में भर्ती हैं, जहां डॉक्टरों की निगरानी में उनका सघन इलाज चल रहा है। उनके शरीर पर चोट के गहरे निशान पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। जैसे ही यह खबर अस्पताल से बाहर निकली और सोशल मीडिया के माध्यम से किसानों तक पहुंची, वैसे ही पूरे मेरठ शहर और आसपास के ग्रामीण इलाकों में तनाव का माहौल पैदा हो गया।
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डीआईजी सहारनपुर की जांच रिपोर्ट बनी निलंबन का आधार

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इस हाई-प्रोफाइल मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवालों को देखते हुए जांच का जिम्मा वरिष्ठ अधिकारियों को सौंपा गया। बताया जा रहा है कि डीआईजी (DIG) सहारनपुर को इस मामले की निष्पक्ष जांच करने की जिम्मेदारी दी गई थी। सूत्रों के अनुसार, डीआईजी सहारनपुर की ओर से सौंपी गई विस्तृत जांच रिपोर्ट और शनिवार देर रात तक इस मामले में दर्ज किए गए विभिन्न गवाहों और पीड़ितों के बयानों के बाद ही पुलिस प्रशासन बैकफुट पर आया।
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जांच रिपोर्ट में प्रथम दृष्टया यह बात सामने आई कि पुलिसकर्मियों ने अपनी शक्तियों का बेजा इस्तेमाल किया और कानून की रक्षा करने के बजाय खुद कानून तोड़ा। इसी रिपोर्ट को आधार बनाकर नए कप्तान ने अखिलेश गौड़ के खिलाफ निलंबन की यह बड़ी विभागीय कार्रवाई की है। यह माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में जांच के दायरे में कुछ अन्य पुलिसकर्मी भी आ सकते हैं और उन पर भी गाज गिरना तय है।
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राजनैतिक उबाल: सपा नेताओं और विधायकों ने खोला मोर्चा

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इस घटना ने केवल प्रशासनिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि राजनैतिक गलियारों में भी भारी उथल-पुथल मचा दी है। पश्चिमी यूपी हमेशा से ही किसान राजनीति का मुख्य केंद्र रहा है। समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) के नेताओं ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया है। सरधना से सपा विधायक अतुल प्रधान और उनके समर्थकों ने पुलिस की इस बर्बरता के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
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अतुल प्रधान सहित भारतीय किसान यूनियन (भाकियू - BKU) के कई अन्य प्रमुख नेताओं ने एसएसपी कार्यालय पर डेरा डाल दिया था। उनकी स्पष्ट मांग थी कि केवल लाइन हाजिर करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि मारपीट में शामिल सभी आरोपी पुलिसकर्मियों के खिलाफ नामजद एफआईआर (FIR) दर्ज की जाए और उन्हें तुरंत निलंबित कर जेल भेजा जाए। राजनैतिक दबाव और विपक्ष के कड़े रुख ने भी प्रशासन को त्वरित कार्रवाई करने पर मजबूर किया है। सपा नेताओं का कहना है कि प्रदेश में 'पुलिस राज' हावी है और आम आदमी तथा किसानों की आवाज को जूतों के दम पर कुचला जा रहा है।
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सड़कों पर उतरेगा किसानों का सैलाब: सोमवार को विशाल पैदल मार्च का ऐलान

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किसान नेताओं दिग्विजय भाटी और मोहित जाटव के साथ हुए इस दुर्व्यवहार ने किसान संगठनों को आर-पार की लड़ाई के मूड में ला दिया है। भारतीय किसान यूनियन (BKU) सहित क्षेत्र के कई अन्य छोटे-बड़े किसान संगठनों ने पुलिस प्रशासन के खिलाफ खुला मोर्चा खोल दिया है।
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किसानों के समर्थन में अब 'गुर्जर महासंघ' भी खुलकर मैदान में आ गया है। गुर्जर बिरादरी और किसानों का यह गठजोड़ पुलिस प्रशासन के लिए एक बड़ी कानून व्यवस्था की चुनौती बन गया है। इस पूरी घटना और पुलिसिया रवैये के विरोध में किसान संगठनों और गुर्जर महासंघ ने संयुक्त रूप से सोमवार को एक विशाल 'पैदल मार्च' की घोषणा की है।
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इस पैदल मार्च का उद्देश्य पुलिस प्रशासन पर दबाव बनाना है ताकि उन सभी पुलिसकर्मियों को सजा मिल सके जो इस अमानवीय कृत्य में शामिल थे। किसानों का कहना है कि जब तक सभी दोषी पुलिसकर्मियों पर आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं हो जाता, तब तक उनका यह आंदोलन शांत नहीं होगा।
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आगे क्या? मेरठ पुलिस के लिए बड़ी चुनौती

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नए एसएसपी बीबीजीटीएस मूर्ति के लिए यह समय किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। एक तरफ उन्हें अपने ही विभाग के अनुशासनहीन पुलिसकर्मियों पर नकेल कसनी है, तो दूसरी तरफ भड़के हुए किसानों और राजनैतिक दलों को शांत करना है। अखिलेश गौड़ का निलंबन भले ही तात्कालिक तौर पर आक्रोश को कुछ कम कर दे, लेकिन सोमवार को होने वाला पैदल मार्च यह तय करेगा कि हालात किस दिशा में जाते हैं। प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं और शहर में भारी पुलिस बल तैनात किया गया है ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटा जा सके।
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इस पूरी घटना ने एक बार फिर से पुलिस सुधार और हिरासत में होने वाली हिंसा (Custodial Violence) को लेकर एक राष्ट्रव्यापी बहस को जन्म दे दिया है। देखना यह होगा कि मेरठ पुलिस अपने ऊपर लगे इस बदनुमा दाग को कैसे धो पाती है और पीड़ित किसान नेताओं को किस हद तक न्याय मिल पाता है।
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