वीकेंड पार्टी और जश्नों में पी जाने वाली आपकी पसंदीदा व्हिस्की और रम एफएसएसएआई (FSSAI) की लैब टेस्टिंग में 'घटिया' (Sub-Standard) साबित हुई हैं। प्राकृतिक तरीके से शराब को मैच्योर करने के बजाय, कंपनियों ने लागत बचाने के लिए सीधे 'केमिकल फ्लेवर' की मिलावट कर डाली।
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राष्ट्रीय डेस्क (फूड एंड बेवरेज न्यूज़): देश में बिकने वाले खाद्य पदार्थों और पेय पदार्थों की शुद्धता तय करने वाले शीर्ष नियामक, भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने भारतीय शराब उद्योग (Indian Liquor Industry) में एक बड़ा भंडाफोड़ किया है। जो व्हिस्की और रम ब्रांड्स दशकों से भारतीयों की पहली पसंद बने हुए थे, वे गुणवत्ता के मानकों पर बुरी तरह फेल हो गए हैं।READ ALSO:-शिवभक्तों के स्वागत में आसमान से बरसेंगे फूल: योगी सरकार 9 और 10 अगस्त को पश्चिमी UP के 7 जिलों में हेलिकॉप्टर से करेगी पुष्पवर्षा; देखें पूरा शेड्यूल
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एफएसएसएआई ने सख्त कार्रवाई करते हुए देश के कुछ सबसे प्रतिष्ठित शराब ब्रांड्स—जिनमें ओल्ड मोंक (Old Monk), रॉयल चैलेंज (Royal Challenge), एंटीक्विटी ब्लू (Antiquity Blue) और बैगपाइपर (Bagpiper) शामिल हैं—के चुनिंदा वेरिएंट्स की बिक्री पर तुरंत प्रभाव से प्रतिबंध लगा दिया है। रॉयटर्स की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के आधार पर सामने आई इस खबर ने शराब के शौकीनों और पूरे कॉर्पोरेट जगत में हड़कंप मचा दिया है।
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क्या है पूरा मामला? कैसे पकड़ा गया कंपनियों का यह 'फ्लेवर घोटाला'?

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शराब निर्माण की सदियों पुरानी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त प्रक्रिया यह कहती है कि किसी भी अच्छी व्हिस्की या रम का असली स्वाद, रंग और सुगंध उसके कच्चे माल (जैसे गन्ने का शीरा, माल्ट या अंगूर) और उसे लकड़ी के विशेष पीपों (Oak Casks) में सालों तक सहेज कर रखने (Maturation/Aging) से आता है।
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लेकिन FSSAI की प्रयोगशालाओं में हुई गहन जांच में एक चौंकाने वाला सच सामने आया:
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    केमिकल शॉर्टकट: जांच में पता चला कि ये नामी कंपनियां शराब को प्राकृतिक तरीके से बैरल में स्टोर करने की लंबी और महंगी प्रक्रिया से बच रही थीं। इसके बजाय, वे बेस अल्कोहल में सीधे कृत्रिम (Artificial) 'रम फ्लेवर' और 'व्हिस्की फ्लेवर' रसायन (Chemicals) मिला रही थीं।
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    नियमों की धज्जियां: एफएसएसएआई ने अपने आधिकारिक बयान में स्पष्ट रूप से कहा है कि दुनिया भर में शराब बनाने की ऐसी कोई वैध प्रक्रिया मौजूद ही नहीं है, जहाँ रम में अलग से रम का कृत्रिम फ्लेवर या व्हिस्की में व्हिस्की का सिंथेटिक स्वाद जोड़ा जाए।
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    'सब-स्टैंडर्ड' घोषित: नियमों के इस सीधे उल्लंघन और ग्राहकों की सेहत व भरोसे के साथ खिलवाड़ करने के कारण, नियामक ने इन सभी उत्पादों को ‘सब-स्टैंडर्ड’ (Sub-Standard) यानी बेहद घटिया दर्जे का करार दिया है।
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किन दिग्गजों पर गिरी है एफएसएसएआई की गाज? (Banned Brands List)

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इस कड़े प्रतिबंध का असर भारत की शीर्ष शराब निर्माता कंपनियों पर पड़ा है। वर्तमान में यह बैन मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में स्थित विशिष्ट मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों द्वारा बनाए गए उत्पादों पर लागू किया गया है:
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कंपनी का नाम (Manufacturer)
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प्रभावित ब्रांड्स और वेरिएंट्स
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राज्य जहाँ कार्रवाई हुई
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यूनाइटेड स्पिरिट्स (Diageo India)
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• एंटीक्विटी ब्लू व्हिस्की (Antiquity Blue)
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• रॉयल चैलेंज व्हिस्की (Royal Challenge)
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मध्य प्रदेश
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इनब्रू बेवरेजेज (Inbrew Beverages)
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• बैगपाइपर डीलक्स व्हिस्की (Bagpiper Deluxe)
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• ओल्ड कास्क डीलक्स XXX रम (Old Cask Deluxe)
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मध्य प्रदेश
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मोहन रॉकी स्प्रिंगवॉटर (Mohan Rocky)
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• ओल्ड मोंक रम (Old Monk - 3 अलग-अलग वेरिएंट्स)
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महाराष्ट्र
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नोट: FSSAI की इस कार्रवाई के बाद, अन्य राज्यों के खाद्य सुरक्षा विभाग भी सतर्क हो गए हैं और आने वाले दिनों में देश भर के अन्य प्लांटों में भी सैंपलिंग अभियान तेज किया जा सकता है।
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आखिर कंपनियों ने क्यों किया ऐसा? (मुनाफे का गणित)

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आपके मन में यह सवाल उठ रहा होगा कि इतने बड़े और स्थापित ब्रांड्स आखिर अपने नाम और साख के साथ ऐसा रिस्क क्यों लेंगे? इसका सीधा जवाब है— कॉर्पोरेट मुनाफा और लागत में भारी कटौती (Cost Cutting)।
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    समय की बचत: असली व्हिस्की और रम को मैच्योर होने में न्यूनतम 1 से 3 साल (या उससे अधिक) का समय लगता है। वहीं, आर्टिफिशियल फ्लेवर मिलाकर शराब रातों-रात तैयार कर ली जाती है।
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    भंडारण (Storage) का खर्च: सालों तक शराब को लकड़ी के महंगे पीपों (Casks) में बड़े-बड़े वेयरहाउस में सुरक्षित रखना पड़ता है, जिसमें भारी लागत आती है। केमिकल मिलाने से वेयरहाउसिंग का करोड़ों का खर्च बच जाता है।
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    कच्चे माल की चोरी: भारतीय खाद्य सुरक्षा मानकों के तहत शराब में केवल प्राकृतिक स्वाद बढ़ाने वाले तत्वों की ही अनुमति है। लेकिन प्राकृतिक अर्क (Natural Extracts) महंगे होते हैं, जबकि लेबोरेटरी में तैयार प्रकृति के समान दिखने वाले रसायन (Nature-identical chemicals) बेहद सस्ते होते हैं।
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इन कंपनियों ने अधिक से अधिक मार्जिन कमाने के लालच में उपभोक्ताओं को असली के नाम पर 'नकली स्वाद' वाली शराब परोसनी शुरू कर दी।
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पेप्सी और रेड बुल के बाद शराब सेक्टर की बारी!

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FSSAI का यह कदम अचानक नहीं उठाया गया है, बल्कि यह देश में फूड एंड बेवरेज सेक्टर को साफ-सुथरा बनाने के एक बड़े अभियान का हिस्सा है। नियामक अब बाजार में बिकने वाले हर उस उत्पाद पर पैनी नजर रख रहा है, जो अपने लेबल के जरिए ग्राहकों को भ्रमित करता है या झूठे दावे करता है।
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    एनर्जी ड्रिंक्स पर एक्शन: हाल ही में एफएसएसएआई ने दिग्गज कंपनियों पेप्सी (Pepsi) और रेड बुल (Red Bull) को सख्त निर्देश जारी किए थे। नियामक ने कहा था कि उच्च कैफीन वाले पेय पदार्थों को 'एनर्जी ड्रिंक' (Energy Drink) के रूप में प्रमोट करना बंद किया जाए, क्योंकि वे वास्तव में केवल कैफीन युक्त पेय (Caffeinated Beverages) हैं।
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    कंपनियों द्वारा इन आदेशों को टालने या कानूनी रास्तों से बचने की तमाम कोशिशों के बावजूद एफएसएसएआई अपने सख्त रुख पर अड़ा रहा। अब शराब कंपनियों पर हुई इस कार्रवाई ने यह साबित कर दिया है कि नियामक किसी भी सेक्टर के बड़े प्लेयर्स को बख्शने के मूड में नहीं है।
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आगे क्या? ग्राहकों के लिए इसका क्या मतलब है?

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इस बड़े खुलासे के बाद उपभोक्ताओं के मन में कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। फिलहाल, जिन फैक्ट्रियों में कृत्रिम फ्लेवर के इस्तेमाल की पुष्टि हुई है, उनके मौजूदा स्टॉक को बाजार से वापस मंगाने (Recall) की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।
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ग्राहकों के लिए सलाह: उपभोक्ताओं को जागरूक रहने की आवश्यकता है। हालांकि शराब की बोतलों के लेबल पर अक्सर बारीक अक्षरों में निर्माण सामग्री लिखी होती है, लेकिन आम ग्राहक 'नेचर-आइडेंटिकल फ्लेवर' जैसे तकनीकी शब्दों को नहीं समझ पाता। एफएसएसएआई की इस कार्रवाई से भविष्य में शराब के लेबल्स पर अधिक पारदर्शिता देखने को मिल सकती है।
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यह देखना दिलचस्प होगा कि डियाजियो और मोहन मीकिन (ओल्ड मोंक की मूल कंपनी) जैसी दिग्गज कंपनियां एफएसएसएआई के इस फैसले को कोर्ट में चुनौती देती हैं या अपनी उत्पादन प्रक्रिया में सुधार कर दोबारा असली स्वाद के साथ बाजार में वापसी करती हैं। तब तक के लिए, आपकी पसंदीदा रम और व्हिस्की के इन खास वेरिएंट्स का स्वाद बाजार से गायब रहने वाला है।
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