उत्तर प्रदेश (विशेषकर नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद और लखनऊ) के रियल एस्टेट बाजार (Real Estate Market) में बिल्डरों की मनमानी और छिपे हुए शुल्कों (Hidden Charges) से त्रस्त फ्लैट खरीदारों को अब एक बड़ा 'कानूनी कवच' मिल गया है। उत्तर प्रदेश भू-संपदा विनियामक प्राधिकरण (UP RERA) ने घर खरीदारों के हितों की रक्षा के लिए नियमों में 10वां बड़ा संशोधन किया है।READ ALSO:-LPG गैस सिलेंडर उपभोक्ताओं के लिए बड़ा अलर्ट: अब बिना DAC (OTP) के नहीं मिलेगी गैस, घर बैठे ऐसे करें अपना कोड जेनरेट
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अक्सर यह देखा जाता था कि जब भी कोई उपभोक्ता अपना फ्लैट किसी कारणवश बेचना चाहता था या किसी दुखद घटना के बाद संपत्ति को अपने वारिस के नाम ट्रांसफर करना चाहता था, तो बिल्डर 'ट्रांसफर फीस' (Transfer Charges) के नाम पर उनसे लाखों रुपये की अवैध वसूली करते थे। मजबूरी में फंसे खरीदार को यह रकम चुकानी ही पड़ती थी। लेकिन, अब यूपी रेरा ने इस खुली लूट पर हमेशा के लिए पूर्णविराम लगा दिया है।
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पारिवारिक सदस्यों के नाम ट्रांसफर पर सिर्फ 1000 रुपये (Relief for Legal Heirs)
\r\n\r\nनए प्रावधानों के तहत सबसे बड़ी मानवीय राहत उन परिवारों को दी गई है, जिन्होंने अपने किसी प्रियजन (फ्लैट के मूल मालिक) को खो दिया है। पहले, मूल आवंटी (Allottee) की मृत्यु के बाद जब उसका परिवार फ्लैट को अपने नाम (विधिक उत्तराधिकारी) ट्रांसफर करवाता था, तब भी संवेदनहीन बिल्डर उनसे हजारों-लाखों रुपये की प्रोसेसिंग फीस ऐंठते थे।
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लेकिन, 25 मार्च 2026 से लागू हुए नए नियम के अनुसार:
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- \r\n यदि फ्लैट मालिक की मृत्यु हो जाती है और वह संपत्ति उसके परिवार के सदस्य (विधिक वारिस) के नाम ट्रांसफर की जाती है, तो बिल्डर अब प्रोसेसिंग फीस के नाम पर अधिकतम 1000 रुपये से ज्यादा एक भी पैसा नहीं वसूल सकेगा।\r\n \r\n
- \r\n आवश्यक दस्तावेज: इस पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए मृतक का मृत्यु प्रमाण पत्र (Death Certificate), एसडीएम (SDM) या जिलाधिकारी (DM) द्वारा जारी किया गया वैध उत्तराधिकार प्रमाण पत्र (Succession Certificate) और परिवार के अन्य सभी कानूनी वारिसों की अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC - No Objection Certificate) बिल्डर को जमा करना होगा।\r\n \r\n
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थर्ड पार्टी को फ्लैट बेचने पर 25,000 रुपये की कैपिंग (Third-Party Transfer Fee)
\r\n\r\nरियल एस्टेट मार्केट में जब भी कोई व्यक्ति अपना निर्माणाधीन या बिना रजिस्ट्री वाला फ्लैट किसी तीसरे व्यक्ति (गैर-पारिवारिक सदस्य) को बेचता था (जिसे रीसेल या ट्रांसफर कहा जाता है), तो बिल्डर वर्ग फुट (Per Sq. Ft.) के हिसाब से मनमानी फीस वसूलते थे। यह रकम 50,000 रुपये से लेकर 2,00,000 रुपये तक कुछ भी हो सकती थी। कई बार तो बिल्डर तब तक ट्रांसफर के कागजों पर साइन नहीं करते थे, जब तक उन्हें मुंहमांगी रकम न मिल जाए।
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अब यूपी रेरा ने इस पर सख्त 'कैपिंग' (Capping) लगा दी है। नए नियम के तहत, अगर आप अपना फ्लैट किसी गैर-पारिवारिक व्यक्ति को बेचते हैं, तो बिल्डर किसी भी हाल में 25,000 रुपये से अधिक का ट्रांसफर शुल्क नहीं ले सकेगा। इस एक फैसले से रीसेल मार्केट (Resale Market) में भारी उछाल आने की उम्मीद है और खरीदार-विक्रेता दोनों को मोलभाव के मानसिक तनाव से मुक्ति मिलेगी।
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कागजी कार्रवाई और कानूनी झंझटों से भी मिली मुक्ति
\r\n\r\nयूपी रेरा के इस 10वें संशोधन में केवल फीस ही कम नहीं की गई है, बल्कि कागजी कार्रवाई (Paperwork) को भी बेहद आसान बना दिया गया है। पहले जब भी कोई फ्लैट ट्रांसफर होता था, तो बिल्डर पुरानी 'बिल्डर-बायर एग्रीमेंट' (BBA) को रद्द करके एक नया एग्रीमेंट तैयार करवाते थे। इस प्रक्रिया में खरीदार का समय, नई स्टाम्प ड्यूटी और कानूनी खर्च बहुत ज्यादा आता था।
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अब नए नियमों के तहत ट्रांसफर के लिए कोई नया एग्रीमेंट (New Agreement) बनाने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं होगी। अब सिर्फ मौजूदा एग्रीमेंट में ही नए खरीदार (Transferee) का नाम और बदलाव दर्ज (Endorse) कर दिया जाएगा। इससे पूरी प्रक्रिया तेज, सस्ती और पारदर्शी हो जाएगी।
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सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक: अनरजिस्टर्ड प्रोजेक्ट (Unregistered Projects) वालों को मिली संजीवनी
\r\n\r\nयूपी रेरा ने इस संशोधन के जरिए प्रदेश के उन लाखों बायर्स को भी संजीवनी दी है जो 'अनरजिस्टर्ड प्रोजेक्ट्स' में अपना जीवन भर की गाढ़ी कमाई फंसा कर बैठे थे।
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क्या थी पुरानी समस्या? रेरा (RERA) का मूल नियम यह था कि यह केवल उन प्रोजेक्ट्स पर लागू होता था जो रेरा में विधिवत पंजीकृत (Registered) थे। इसका फायदा उठाकर कई धोखेबाज बिल्डर जानबूझकर अपने प्रोजेक्ट को रेरा में रजिस्टर ही नहीं कराते थे। जब ये बिल्डर बायर्स के साथ धोखाधड़ी करते (जैसे- पजेशन न देना, सुविधाएं न देना), तो बायर चाहकर भी यूपी रेरा में अपनी शिकायत दर्ज नहीं करा पाता था, क्योंकि पोर्टल अनरजिस्टर्ड प्रोजेक्ट की शिकायत स्वीकार ही नहीं करता था। ऐसे बायर्स को मजबूरन सिविल कोर्ट या कंज्यूमर कोर्ट के लंबे और खर्चीले चक्कर काटने पड़ते थे।
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नया बदलाव (रेगुलेशन 24 और 47 में संशोधन): अब यूपी रेरा ने इस बड़े कानूनी लूपहोल को खत्म कर दिया है।
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- \r\n नए नियम के अनुसार, अब अनरजिस्टर्ड प्रोजेक्ट के खरीदार भी यूपी रेरा में सीधे अपनी शिकायत दर्ज करा सकेंगे। * रेरा चेयरमैन के अनुसार, इन शिकायतों को दर्ज करने के लिए बहुत जल्द ही UP RERA के आधिकारिक पोर्टल पर एक विशेष सुविधा 'फॉर्म-M' (Form-M) शुरू की जा रही है।\r\n \r\n
- \r\n जैसे ही कोई बायर इस फॉर्म के जरिए अनरजिस्टर्ड प्रोजेक्ट की शिकायत करेगा, रेरा प्राधिकरण न केवल बायर को न्याय दिलाएगा, बल्कि उस डिफॉल्टर बिल्डर के खिलाफ प्रोजेक्ट को रजिस्टर न कराने के जुर्म में भारी जुर्माना और सख्त कानूनी कार्रवाई भी करेगा।\r\n \r\n
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UP RERA चेयरमैन संजय भूसरेड्डी का कड़ा संदेश
\r\n\r\nइन ऐतिहासिक बदलावों की रूपरेखा तैयार करने वाले UP RERA के चेयरमैन संजय भूसरेड्डी (Sanjay Bhoosreddy) ने इस फैसले पर स्पष्ट करते हुए कहा कि, "रियल एस्टेट सेक्टर में घर खरीदार (Consumer) सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। हमारा मुख्य उद्देश्य बिल्डर और बायर के बीच एक संतुलित, पारदर्शी और भरोसेमंद माहौल बनाना है। नए प्रावधान शिकायत निवारण प्रक्रिया (Grievance Redressal Mechanism) को पहले से कहीं ज्यादा पारदर्शी, कुशल और उपभोक्ता हितैषी (Consumer-Friendly) बनाएंगे।"
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उन्होंने आगे कहा कि रेगुलेशन 24 और 47 में किए गए ये संशोधन उन सभी बिल्डरों के लिए एक स्पष्ट संदेश हैं जो नियमों की आड़ में उपभोक्ताओं का आर्थिक और मानसिक शोषण करते थे।
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25 मार्च 2026 से उत्तर प्रदेश के रियल एस्टेट क्षेत्र में लागू हुए ये नए नियम निश्चित रूप से घर खरीदारों के लिए एक मील का पत्थर साबित होंगे। फ्लैट ट्रांसफर फीस की स्पष्ट सीमा तय होने और अनरजिस्टर्ड प्रोजेक्ट्स को भी जवाबदेही के दायरे में लाने से प्रदेश में बिल्डरों की तानाशाही पर रोक लगेगी और आम आदमी का रेरा जैसी संस्थाओं पर भरोसा और अधिक मजबूत होगा।
Sabse pehle comment karne wale banein.