पटना:
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राजनीति में वादे तो बहुत होते हैं, लेकिन कुछ वादे ऐसे होते हैं जो सिर्फ चुनावी माहौल ही नहीं, बल्कि राज्य की आर्थिक बुनियाद को भी हिलाने की क्षमता रखते हैं। तेजस्वी यादव का 'हर परिवार को एक सरकारी नौकरी' का वादा कुछ ऐसा ही है। यह राजनीतिक रूप से एक मास्टरस्ट्रोक हो सकता है, लेकिन जब हम इसके आर्थिक पक्ष का एक्स-रे करते हैं, तो कुछ चौंकाने वाले और गंभीर सवाल सामने आते हैं।Read also:-ब्रेकिंग: तेजस्वी यादव का सबसे बड़ा चुनावी वादा! 'हर परिवार को एक सरकारी नौकरी' का ऐलान
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सबसे पहले, वादे का आर्थिक बोझ समझिए
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यह सिर्फ एक वादा नहीं, यह एक ऐसा ऐलान है जो बिहार के पूरे बजट को बौना साबित कर सकता है। आइए आंकड़ों से समझते हैं:
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    बिहार में कुल परिवार (लगभग): 3.5 करोड़
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    वादा: 3.5 करोड़ सरकारी नौकरियां
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    बिहार का कुल बजट (2024-25): लगभग 2.79 लाख करोड़ रुपये
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अब अगर हम एक बहुत ही न्यूनतम औसत वेतन (चपरासी से लेकर अधिकारी तक) ₹25,000 प्रति माह भी मान लें, तो एक साल में एक कर्मचारी पर खर्च होगा ₹3 लाख।
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खर्चे का कुल गणित: 3,50,00,000 (कर्मचारी) x ₹3,00,000 (सालाना वेतन) = ₹10,50,00,00,00,00,000
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यानी, इस वादे को पूरा करने के लिए सिर्फ वेतन पर सालाना 10.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक का खर्च आएगा। यह राशि बिहार के कुल बजट से तीन गुना से भी ज्यादा है। ऐसे में सवाल उठता है कि बाकी विकास कार्यों, शिक्षा, स्वास्थ्य और योजनाओं के लिए पैसा कहां से आएगा?
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बिहार में रोजगार की जमीनी हकीकत
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यह वादा उस राज्य में किया गया है जहां रोजगार की स्थिति पहले से ही चिंताजनक है।
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    कुल आबादी का मात्र 4.92% हिस्सा ही रोजगार में है।
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    इसमें से भी सिर्फ 1.57% लोगों के पास ही सरकारी नौकरी है।
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    राज्य की 7% से भी कम आबादी ग्रेजुएट है, जो उच्च पदों के लिए एक बड़ी चुनौती है।
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RJD का राजनीतिक दांव और बचाव
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जब RJD से इस वादे की व्यावहारिकता पर सवाल किया जाता है, तो वे अपने 17 महीने के उपमुख्यमंत्री कार्यकाल का हवाला देते हैं। उनका तर्क है कि उस छोटे से कार्यकाल में 5 लाख नौकरियां दी गईं, जो यह साबित करता है कि उनकी मंशा और क्षमता दोनों है। वे इसे "असंभव" कहने वालों को चुनौती दे रहे हैं कि वे अवसर मिलने पर इसे संभव करके दिखाएंगे।
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निष्कर्ष: तेजस्वी का यह वादा बिहार के करोड़ों लोगों की सबसे बड़ी उम्मीद यानी 'सरकारी नौकरी' पर सीधा निशाना साधता है। यह राजनीतिक रूप से बेहद शक्तिशाली है। लेकिन, आर्थिक हकीकत की कसौटी पर यह लगभग असंभव दिखाई देता है। अब यह बिहार के वोटर को तय करना है कि वह इस 'सुनहरे सपने' पर भरोसा करता है या आर्थिक हकीकत को प्राथमिकता देता है।
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