Anil Kumar Sharma, Special Correspondent-धामपुर (उत्तर प्रदेश): भारत का इतिहास उन महान विभूतियों की गाथाओं से भरा पड़ा है, जिन्होंने न केवल देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, बल्कि देश की सांस्कृतिक और भाषाई अस्मिता को भी अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए जीवन पर्यंत संघर्ष किया। ऐसे ही महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और 'हिंदी के पुरोधा' माने जाने वाले राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन की जयंती धामपुर में अत्यंत भाव-विभोर और श्रद्धापूर्ण वातावरण में मनाई गई।READ ALSO:-"मैं चाहता हूं मेरी आत्मा भटकती रहे, पत्नी मेरी लाश को हाथ न लगाए..." सहारनपुर में बॉडी बिल्डर क्लर्क के खौफनाक अंत की पूरी कहानी
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उत्तर प्रदेश युवा साहित्यकार संघ के तत्वावधान में इस पावन अवसर पर एक भव्य और भावनात्मक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम संघ के अध्यक्ष एडवोकेट हरिकांत शर्मा के निज निवास पर आयोजित हुआ, जहां साहित्य, कला और देशभक्ति का एक अद्भुत संगम देखने को मिला। इस काव्यात्मक श्रद्धांजलि सभा ने न केवल राजर्षि टंडन के आदर्शों को जीवंत किया, बल्कि हिंदी भाषा के प्रति उनके अतुलनीय योगदान को भी रेखांकित किया।
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राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन: हिंदी के सच्चे सेवक
\r\n\r\nकार्यक्रम की शुरुआत में महान स्वतंत्रता सेनानी राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन के जीवन और उनके संघर्षों पर प्रकाश डाला गया। राजर्षि टंडन का नाम भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। उन्होंने अपना पूरा जीवन राष्ट्र की सेवा और हिंदी भाषा को उसका उचित सम्मान दिलाने में समर्पित कर दिया था। संविधान सभा में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिलाने में उनकी भूमिका सबसे अहम मानी जाती है। धामपुर में आयोजित यह गोष्ठी उनके इसी भाषाई प्रेम और राष्ट्रभक्ति को समर्पित थी। वक्ताओं ने याद दिलाया कि कैसे टंडन जी ने अंग्रेजी मानसिकता का विरोध करते हुए भारतीय संस्कृति और स्वदेशी भाषाओं को अपनाने पर जोर दिया था।
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सरस्वती वंदना और कार्यक्रम का शुभारंभ
\r\n\r\nकाव्य गोष्ठी का विधिवत शुभारंभ मुख्य अतिथि, जाने-माने साहित्यकार डॉ. सारंग देश असीम की गरिमामयी उपस्थिति में हुआ। जब मुख्य अतिथि ने अपना आसन ग्रहण किया, तो पूरा वातावरण साहित्यिक ऊर्जा से भर उठा। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत विद्या की देवी के स्मरण से होती है, इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए कार्यक्रम के प्रारंभ में मां शारदा (सरस्वती) के सम्मान में अत्यंत मधुर और सुरीली 'सरस्वती वंदना' प्रस्तुत की गई। इस वंदना ने वहां उपस्थित सभी श्रोताओं और कवियों के मन में एक आध्यात्मिक और रचनात्मक ऊर्जा का संचार कर दिया।
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कवियों का जमावड़ा: गूंजी हिंदी की महिमा और देशभक्ति के स्वर
\r\n\r\nसरस्वती वंदना के उपरांत मंच कवियों और शायरों को सौंप दिया गया। एक से बढ़कर एक रचनाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से महफिल को ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया।
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- \r\n डॉ. अनिल शर्मा 'अनिल' की प्रस्तुति: कार्यक्रम के सर्वप्रथम कवि के रूप में डॉ. अनिल शर्मा 'अनिल' ने जब माइक संभाला, तो उन्होंने हिंदी भाषा के गौरव को अपनी पंक्तियों में पिरोकर श्रोताओं के सामने प्रस्तुत किया। उन्होंने बहुत ही ओजस्वी स्वर में कहा:\r\n\r\n
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\r\n"हमारी शान है हिंदी, हमारी आन है हिंदी, हमारा मान है हिंदी, हमारा अभिमान है हिंदी।" इन पंक्तियों को सुनकर पूरा प्रांगण तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। उनकी इस कविता ने राजर्षि टंडन के उस सपने को साकार रूप में प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने हिंदी को हर भारतीय के स्वाभिमान से जोड़ा था।\r\n \r\n - \r\n डॉ. सुरेंद्र राजपूत का काव्यात्मक पाठ: इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए वरिष्ठ कवि डॉ. सुरेंद्र राजपूत ने ज्ञान और विद्या की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए अपनी सुंदर रचना पढ़ी। उन्होंने मां सरस्वती के खजाने की विशेषता बताते हुए कहा:\r\n\r\n
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\r\n"मेरी शारदे मां का भंडार है निराला, जो-जो खर्च बढ़ाते हैं, बढ़ता है भंडार निराला।" उनकी इस रचना ने श्रोताओं को यह संदेश दिया कि विद्या और ज्ञान ही संसार का एकमात्र ऐसा धन है, जो बांटने से कभी कम नहीं होता, बल्कि निरंतर बढ़ता रहता है।\r\n \r\n - \r\n अन्य कवियों की शानदार प्रस्तुतियां: गोष्ठी में केवल एक रस या विषय नहीं था, बल्कि विविधताओं से भरी कविताएं सुनने को मिलीं। प्रसिद्ध कवि राजकुमार वर्मा, मशहूर शायर और कवि वीरेंद्र बेताब, तथा कवि अजय पाल शर्मा सहित कई अन्य रचनाकारों ने अपनी-अपनी बेहतरीन प्रस्तुतियां दीं। वीरेंद्र बेताब की शायरी ने जहां लोगों को गहराई से सोचने पर मजबूर किया, वहीं अजय पाल शर्मा की कविताओं ने समाज की वास्तविकताओं को आइना दिखाया। हर प्रस्तुति के बाद श्रोताओं की 'वाह-वाह' ने कवियों का उत्साह दोगुना कर दिया।\r\n \r\n
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मुख्य अतिथि का संबोधन: 'मातृभाषा की एकरूपता'
\r\n\r\nकाव्य पाठ के समापन अवसर पर मुख्य अतिथि डॉ. सारंग देश असीम ने अपने संबोधन से सभी का दिल जीत लिया। उन्होंने राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए मातृभाषा की शक्ति और उसकी वैज्ञानिकता पर जोर दिया।
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डॉ. असीम ने कहा, "हमारी मातृभाषा हिंदी की सबसे बड़ी विशेषता और इसकी वैज्ञानिकता यह है कि इसे लिखने, पढ़ने और बोलने में एकरूपता है। हम जो बोलते हैं, वही लिखते हैं और जो लिखते हैं, वही पढ़ते हैं। यही सरलता और स्पष्टता इसे विश्व की अन्य भाषाओं से अलग और महान बनाती है।" उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे अपनी मातृभाषा पर गर्व करें और इसे दैनिक जीवन में अधिक से अधिक प्रयोग में लाएं।
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कुशल संचालन और प्रबुद्ध श्रोताओं की उपस्थिति
\r\n\r\nइस भव्य और सफल कार्यक्रम का कुशल संचालन उत्तर प्रदेश युवा साहित्यकार संघ के अध्यक्ष एडवोकेट हरिकांत शर्मा ने किया। उनकी मंच संचालन की शैली, कवियों का परिचय देने का तरीका और बीच-बीच में कही गई साहित्यिक टिप्पणियों ने दर्शकों को अंत तक बांधे रखा।
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किसी भी कवि सम्मेलन या काव्य गोष्ठी की सफलता उसके श्रोताओं पर निर्भर करती है। धामपुर के इस कार्यक्रम को भव्यता और सार्थकता प्रदान करने में वहां उपस्थित प्रबुद्ध श्रोताओं का बहुत बड़ा योगदान रहा। इस अवसर पर शहर के कई गणमान्य नागरिक और साहित्य प्रेमी मौजूद रहे। प्रमुख श्रोताओं में विभूति कांत शर्मा, इंदुकांत शर्मा, संजय 'बिल्लू', कौशल शर्मा, सीमा अग्रवाल और केशव कांत आदि उपस्थित रहे। इन सभी की उत्साहजनक उपस्थिति और दाद देने की कला ने कार्यक्रम को एक ऐतिहासिक सफलता में बदल दिया।
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राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन की जयंती पर धामपुर में आयोजित यह काव्य गोष्ठी मात्र एक रस्मी कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह हिंदी साहित्य के संवर्धन और संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। एडवोकेट हरिकांत शर्मा और उत्तर प्रदेश युवा साहित्यकार संघ का यह प्रयास निश्चित रूप से समाज में, विशेषकर युवा पीढ़ी में, अपनी भाषा और अपने महापुरुषों के प्रति सम्मान की भावना को और अधिक सुदृढ़ करेगा। ऐसी गोष्ठियां यह सिद्ध करती हैं कि आज के डिजिटल युग में भी साहित्य, कविता और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की ललक लोगों में जीवित है।
Sabse pehle comment karne wale banein.