मेरठ (ब्यूरो), 15 दिसंबर 2025: उत्तर प्रदेश के पश्चिमी हिस्सों में सस्ते और सुलभ न्याय की आस लगाए करोड़ों लोगों की आवाज़ एक बार फिर बुलंद हुई है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) की एक खंडपीठ (Circuit Bench) को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में स्थापित करने की करीब सात दशक पुरानी मांग ने फिर से रफ़्तार पकड़ ली है। सोमवार को मेरठ में आयोजित एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम में वकीलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, राजनीतिक दलों और शैक्षणिक संगठनों ने एक सुर में केंद्र और राज्य सरकार से इस मांग को तत्काल पूरा करने का आह्वान किया।READ ALSO:-मेरठ के दिल 'बेगमपुल' में जन सुविधा कार्य में रोड़ा: शौचालय निर्माण रोकने पर व्यापार संघ का फूटा गुस्सा, पुलिस-प्रशासन से की शिकायत; स्वीकृत सरकारी काम में बाधा डालने का आरोप
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विभिन्न संगठनों द्वारा जारी एक संयुक्त प्रेस वक्तव्य में इस बात पर गहरा क्षोभ व्यक्त किया गया कि भौगोलिक और जनसांख्यिकीय रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण होने के बावजूद, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के निवासी दशकों से अपने ही राज्य में न्याय पाने के लिए सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय करने को मजबूर हैं।
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70 साल पुराना दर्द और 'न्यायिक दूरी' का दंश
\r\n\r\nमेरठ में जुटे आंदोलनकारियों ने स्पष्ट किया कि यह मांग कोई नई नहीं है, बल्कि पिछले लगभग 70 वर्षों से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोग इसके लिए संघर्ष कर रहे हैं। संगठनों का तर्क है कि भौगोलिक, ऐतिहासिक और जनसांख्यिकीय दृष्टिकोण से यह क्षेत्र भारत का विशालतम प्रदेश बनने की क्षमता रखता है, लेकिन न्यायिक उपेक्षा का शिकार है।
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प्रेस वक्तव्य का मुख्य केंद्र बिंदु 'न्यायिक दूरी' और कनेक्टिविटी का मुद्दा रहा। वकीलों और सामाजिक संगठनों ने आंकड़ों के जरिए समझाया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के निवासियों के लिए न्याय प्राप्त करना कितना कठिन और खर्चीला हो गया है।
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दूरी का चौंकाने वाला गणित: आंदोलनकारियों ने तुलनात्मक आंकड़े पेश करते हुए बताया कि मेरठ से इलाहाबाद स्थित मुख्य उच्च न्यायालय की दूरी लगभग 650 किलोमीटर है। एक वादी या प्रतिवादी के लिए इतनी लंबी यात्रा करना, वहां रुकना और वकीलों का खर्च उठाना आर्थिक रूप से कमर तोड़ने वाला होता है।
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इसके विपरीत, संगठनों ने तर्क दिया कि लखनऊ खंडपीठ से इलाहाबाद की दूरी केवल 250 किलोमीटर है और यहां तक कि पड़ोसी राज्य राजस्थान में जयपुर खंडपीठ की दूरी भी महज 350 किलोमीटर है। ऐसे में पश्चिमी यूपी के लोगों को 650 किलोमीटर दूर न्याय के लिए भेजना उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन जैसा है।
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'देरी से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर'
\r\n\r\nसंयुक्त बयान में जोर देकर कहा गया कि लंबी दूरी, यात्रा में लगने वाला अत्यधिक समय और भारी-भरकम खर्च के कारण क्षेत्र के गरीब और मध्यमवर्गीय लोगों के लिए न्याय पाना एक सपना बनकर रह गया है। कई बार लोग संसाधनों की कमी के कारण अपने केस ही छोड़ देते हैं।
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वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान स्थिति में 'देरी से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है' (Justice delayed is justice denied) वाली कहावत पश्चिमी उत्तर प्रदेश के संदर्भ में पूरी तरह चरितार्थ हो रही है। न्यायिक विलंब यहां के निवासियों की नियति बन चुकी है।
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जनसंख्या का भारी दबाव और व्यापक समर्थन
\r\n\r\nबेंच की स्थापना के पक्ष में जनसांख्यिकीय तर्क भी जोरदार तरीके से रखे गए। वक्तव्य के अनुसार, पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कुल जनसंख्या लगभग 25 करोड़ है। इस विशाल क्षेत्र के करीब 22 जिलों की लगभग 8 करोड़ आबादी को अपने कानूनी मामलों के लिए सीधे इलाहाबाद उच्च न्यायालय पर निर्भर रहना पड़ता है। इतने बड़े जनसंख्या घनत्व वाले क्षेत्र के लिए एक अलग बेंच का होना नितांत आवश्यक है।
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15 दिसंबर के इस कार्यक्रम में समाज के हर वर्ग का प्रतिनिधित्व देखने को मिला। वकीलों के अलावा छात्र संगठनों, मजदूर यूनियनों, व्यापारी मंडलों और विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया। सभी ने एक स्वर में संकल्प लिया कि जब तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खंडपीठ की स्थापना की मांग पूरी नहीं हो जाती, उनका संघर्ष जारी रहेगा।
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विकास और न्याय के लिए बेंच जरूरी
\r\n\r\nसंगठनों का स्पष्ट मत है कि खंडपीठ की स्थापना केवल वकीलों की मांग नहीं है, बल्कि यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक विकास के हित में है। इससे लोगों को शीघ्र, सुलभ और सस्ता न्याय मिल सकेगा। आंदोलनकारियों ने सरकार से आग्रह किया है कि वह इस ऐतिहासिक और जायज मांग पर तुरंत विचार करे और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के करोड़ों लोगों को शीघ्र न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस कदम उठाए।
Sabse pehle comment karne wale banein.