मेरठ (20 दिसंबर 2025): उत्तर प्रदेश को 'वन ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी' बनाने के सपने की नींव जिन औद्योगिक गलियारों (Industrial Corridors) पर टिकी है, उनकी राह में जमीनी विवादों के कांटे बिछ गए हैं। उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवेज औद्योगिक विकास प्राधिकरण (UPEIDA) द्वारा प्रदेश में तैयार किए गए 6 प्रमुख एक्सप्रेसवे के किनारे 27 जनपदों में औद्योगिक शहर बसाने की योजना है। लेकिन, मेरठ समेत कई जिलों में जमीन की उपलब्धता सरकार के लिए सिरदर्द बन गई है।READ ALSO:-हरियाणा में खूनी खेल: रोहतक में हिमांशु भाऊ और सन्नी रिटोली गैंग के बीच भीषण गैंगवॉर, एक की मौत, दो घायल
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ताजा मामला मेरठ का है, जहां गंगा एक्सप्रेसवे (Ganga Expressway) के किनारे विकसित होने वाले औद्योगिक गलियारे के लिए जमीन खरीद की प्रक्रिया अपने अंतिम और सबसे कठिन चरण में फंस गई है। शासन ने अधिकारियों को 31 जनवरी तक का अल्टीमेटम दिया है, लेकिन मौके के हालात बता रहे हैं कि यह डेडलाइन मिस होना लगभग तय है। विवादित जमीनों के कारण प्रशासन अब सीधी खरीद (Direct Purchase) की बजाय लंबी और जटिल 'अधिग्रहण प्रक्रिया' (Acquisition Process) की ओर बढ़ने को मजबूर हो गया है।
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मेरठ में जमीन का गणित: लक्ष्य और हकीकत
\r\n\r\nमेरठ, जो देश के सबसे लंबे एक्सप्रेसवे में से एक 'गंगा एक्सप्रेसवे' का शुरुआती पॉइंट है, यहां औद्योगिक संभावनाओं का बड़ा केंद्र बनने जा रहा है। सरकार की योजना यहां कुल 506 हेक्टेयर में औद्योगिक गलियारा बसाने की है, जिसे दो चरणों में पूरा किया जाना है।
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प्रथम चरण की स्थिति (Phase-1 Status)
\r\n\r\nपहले चरण में मेरठ की सदर और खरखौदा तहसील के दो प्रमुख गांवों—बिजौली और खरखौदा—की 214 हेक्टेयर जमीन को चिह्नित किया गया था।
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- \r\n कुल लक्ष्य: 214 हेक्टेयर\r\n \r\n
- \r\n अब तक उपलब्धि: 182 हेक्टेयर (किसानों से खरीद + सरकारी भूमि पुनर्ग्रहण)\r\n \r\n
- \r\n फंसी हुई जमीन: 27 हेक्टेयर (जिसका बैनामा नहीं हो पा रहा)\r\n \r\n
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प्रशासन ने अब तक सराहनीय काम करते हुए 175 हेक्टेयर जमीन सीधे किसानों से खरीद ली है और 7 हेक्टेयर सरकारी जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराकर वापस लिया है। लेकिन असली खेल अब शुरू हुआ है, जहां बची हुई 27 हेक्टेयर जमीन का पेंच सुलझने का नाम नहीं ले रहा।
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31 जनवरी की डेडलाइन: मिशन इंपॉसिबल?
\r\n\r\nलखनऊ से स्पष्ट आदेश हैं कि 31 जनवरी तक औद्योगिक गलियारे की 100% जमीन यूपीडा के नाम होनी चाहिए। लेकिन मेरठ प्रशासन के लिए यह लक्ष्य 'मिशन इंपॉसिबल' जैसा लग रहा है।
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क्यों फंसा है पेंच?
\r\n\r\nअधिकारियों के अनुसार, जो 27 हेक्टेयर जमीन बची है, उसमें से 25 हेक्टेयर जमीन गंभीर विवादों में घिरी है।
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- \r\n पारिवारिक विवाद: कई जमीनों पर भाइयों या परिवार के बीच बंटवारे को लेकर झगड़े हैं।\r\n \r\n
- \r\n कोर्ट केस: कुछ खसरों पर न्यायालय में स्वामित्व को लेकर मुकदमे चल रहे हैं।\r\n \r\n
- \r\n दस्तावेजी कमियां: कई किसानों के पास जमीन के पुख्ता कागज नहीं हैं, जिससे सीधी रजिस्ट्री (बैनामा) संभव नहीं है।\r\n \r\n
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तहसील प्रशासन पिछले कई महीनों से इन किसानों के साथ बैठकें कर रहा है, लेकिन आपसी सहमति नहीं बन पा रही है। अधिकारियों का मानना है कि जनवरी के अंत तक सीधी खरीद के माध्यम से मुश्किल से 2 हेक्टेयर जमीन ही और मिल पाएगी, बाकी 25 हेक्टेयर के लिए कानून का डंडा ही चलाना पड़ेगा।
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प्रशासन का 'प्लान-B': अधिग्रहण और सोशल ऑडिट
\r\n\r\nजब सीधी बातचीत के रास्ते बंद हो गए, तो जिलाधिकारी डॉ. वी.के. सिंह ने 'प्लान-B' एक्टिवेट कर दिया है। यह प्लान है—भूमि अधिग्रहण अधिनियम (Land Acquisition Act) के तहत जमीन लेना।
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क्या है नई प्रक्रिया?
\r\n\r\nजिला प्रशासन ने अक्टूबर महीने से ही अधिग्रहण की तैयारी शुरू कर दी थी।
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- \r\n एजेंसी का चयन: शुक्रवार को प्रशासन ने एक बड़ा कदम उठाते हुए 'प्रोब रिसर्च एंड सोशल डेवलपमेंट' (रोहिणी, दिल्ली) नामक एजेंसी का चयन किया है।\r\n \r\n
- \r\n सामाजिक समाघात (Social Impact Assessment - SIA): यह एजेंसी प्रभावित क्षेत्र में जाकर सर्वे करेगी कि जमीन अधिग्रहण का समाज पर क्या असर पड़ेगा। यह अधिग्रहण कानून के तहत एक अनिवार्य प्रक्रिया है।\r\n \r\n
- \r\n धारा-4 की घोषणा: प्रशासन ने प्रभावित क्षेत्र के लिए धारा-4 की घोषणा कर दी है, जिसका मतलब है कि सरकार ने आधिकारिक तौर पर जमीन लेने की मंशा जाहिर कर दी है। अब इस जमीन की खरीद-फरोख्त पर रोक लग जाएगी।\r\n \r\n
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जिलाधिकारी डॉ. वी.के. सिंह ने स्पष्ट किया, "औद्योगिक गलियारे के प्रथम चरण की शेष जमीन के लिए अधिग्रहण की प्रक्रिया चल रही है। विवाद के चलते उक्त भूमि की सीधी खरीद संभव नहीं हो पा रही है, इसलिए वैधानिक प्रक्रिया अपनाई जा रही है।"
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गंगा एक्सप्रेसवे: औद्योगिक क्रांति की रीढ़
\r\n\r\nइस पूरे विवाद की जड़ में 594 किलोमीटर लंबा गंगा एक्सप्रेसवे है, जो मेरठ को प्रयागराज से जोड़ता है। यह एक्सप्रेसवे प्रदेश के 12 जनपदों से होकर गुजरता है।
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- \r\n योजना: सरकार की मंशा है कि एक्सप्रेसवे सिर्फ वाहनों के लिए न हो, बल्कि इसके किनारे उद्योग धंधे पनपें।\r\n \r\n
- \r\n मेरठ का महत्व: चूंकि मेरठ इस एक्सप्रेसवे का नोड (Node) है और एनसीआर (NCR) के करीब है, इसलिए निवेशक यहां सबसे ज्यादा रुचि दिखा रहे हैं। लॉजिस्टिक्स, वेयरहाउसिंग, टेक्सटाइल और ऑटोमोबाइल सेक्टर के लिए मेरठ पहली पसंद है।\r\n \r\n
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यही कारण है कि सरकार मेरठ में जमीन अधिग्रहण में एक दिन की भी देरी नहीं चाहती। लेकिन, पुराने भूमि विवादों ने रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है।
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सीधी खरीद बनाम अधिग्रहण: क्या अंतर है?
\r\n\r\nआम पाठकों के लिए यह समझना जरूरी है कि प्रशासन 'सीधी खरीद' से 'अधिग्रहण' पर क्यों शिफ्ट हुआ।
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- \r\n सीधी खरीद (Direct Purchase/Mutual Agreement): इसमें सरकार और किसान आमने-सामने बैठकर रेट तय करते हैं। किसान अपनी मर्जी से रजिस्ट्री करता है और तुरंत पैसा (मुआवजा) खाते में आ जाता है। यह प्रक्रिया तेज होती है। सरकार सर्किल रेट से 4 गुना तक मुआवजा देती है।\r\n \r\n
- \r\n अधिग्रहण (Acquisition): जब किसान बेचने को तैयार न हो या जमीन पर विवाद हो, तो सरकार कानून का इस्तेमाल करती है। इसमें धारा 4, 11, 19 आदि की लंबी प्रक्रिया होती है। आपत्तियां सुनी जाती हैं। पैसा कोर्ट या ट्रिब्यूनल में जमा होता है। यह प्रक्रिया काफी लंबी और जटिल होती है।\r\n \r\n
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चूंकि 25 हेक्टेयर जमीन पर मालिकाना हक (Title) साफ नहीं है, इसलिए सरकार किसी एक व्यक्ति को पैसा नहीं दे सकती। अधिग्रहण के जरिए सरकार जमीन कब्जे में लेगी और मुआवजे की राशि ट्रिब्यूनल में जमा करा देगी, जो फैसला होने पर असली मालिक को मिलेगी।
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भविष्य की राह: कब शुरू होंगे उद्योग?
\r\n\r\nमौजूदा हालात को देखते हुए लगता है कि मेरठ के औद्योगिक गलियारे को पूरी जमीन मिलने में अभी 3 से 4 महीने का और समय लग सकता है।
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- \r\n सर्वे रिपोर्ट: सोशल इंपैक्ट सर्वे की रिपोर्ट आने में कम से कम एक महीना लगेगा।\r\n \r\n
- \r\n सुनवाई: इसके बाद जनसुनवाई होगी।\r\n \r\n
- \r\n कब्जा: अंत में धारा-19 के तहत कब्जा लिया जाएगा।\r\n \r\n
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हालांकि, 182 हेक्टेयर जमीन पहले ही यूपीडा को मिल चुकी है। उम्मीद है कि सरकार विवादित हिस्सों को छोड़कर, उपलब्ध जमीन पर इन्फ्रास्ट्रक्चर (सड़क, बिजली, पानी) का काम शुरू कर सकती है, ताकि निवेशकों को 2026 के मध्य तक प्लॉट आवंटित किए जा सकें।
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विकास के लिए कड़े फैसलों की घड़ी
\r\n\r\nमेरठ का यह घटनाक्रम बताता है कि भारत में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए जमीन जुटाना आज भी सबसे बड़ी चुनौती है। 31 जनवरी की डेडलाइन भले ही मिस हो जाए, लेकिन प्रशासन द्वारा शुरू की गई अधिग्रहण प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि प्रोजेक्ट रुकेगा नहीं।
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किसानों के लिए भी यह सोचने का विषय है कि आपसी विवादों के कारण वे न तो जमीन का उपयोग कर पा रहे हैं और न ही मुआवजे का। ऐसे में सरकारी अधिग्रहण शायद उस गतिरोध को तोड़ने का एकमात्र उपाय है, जो वर्षों से चला आ रहा है। अब देखना होगा कि दिल्ली की एजेंसी कितनी जल्दी अपनी रिपोर्ट सौंपती है और प्रशासन कितनी तेजी से विवादित 27 हेक्टेयर जमीन पर अपना बोर्ड लगा पाता है।
Sabse pehle comment karne wale banein.