मेरठ: अक्सर हम फिल्मों में देखते हैं कि कैसे युद्ध के सायरन बजते ही शहर की बत्तियां गुल हो जाती हैं, लोग बंकरों की तरफ भागते हैं और आसमान से मौत बरसती है। लेकिन, उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में यह नजारा हकीकत के बेहद करीब दिखाई दिया। मौका था 'ब्लैकआउट मॉक ड्रिल' (Blackout Mock Drill) का, जिसने कुछ पलों के लिए देखने वालों की सांसें थाम दीं।READ ALSO:-मेरठ में हाई-वोल्टेज ड्रामा: सॉफ्टवेयर इंजीनियर पति ने 'लाइव लोकेशन' से बेनकाब की बेवफा पत्नी, होटल के कमरे में प्रेमी संग मिली इंश्योरेंस मैनेजर
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नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती और उत्तर प्रदेश दिवस (UP Diwas) के अवसर पर शासन के कड़े निर्देशों के तहत, मेरठ के ऐतिहासिक डीएन इंटर कॉलेज (DN Inter College) के मैदान में एक व्यापक मॉक ड्रिल का आयोजन किया गया। इसका उद्देश्य जनता को यह सिखाना था कि अगर कभी देश पर हवाई हमला (Air Strike) हो जाए या युद्ध जैसी आपातकालीन स्थिति बन जाए, तो नागरिक अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा कैसे करें।
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इस विस्तृत रिपोर्ट में हम आपको इस ड्रिल के एक-एक पल का आंखों देखा हाल बताएंगे, साथ ही जानेंगे कि प्रशासन, पुलिस और सिविल डिफेंस ने मिलकर इस 'युद्ध' को कैसे जीता। इसके अलावा, इस लेख के अंत में हम आपको उन जीवन रक्षक उपायों के बारे में विस्तार से बताएंगे जो ऐसी किसी भी आपदा में आपके काम आ सकते हैं।
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वो 10 मिनट: जब थम गई शहर की रफ्तार

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दोपहर का वक्त था, डीएन कॉलेज का मैदान छात्रों, एनसीसी कैडेट्स, पुलिस अधिकारियों और आम जनता से भरा हुआ था। सब कुछ सामान्य लग रहा था, लेकिन तभी फिजा में एक तीखी और डरावनी आवाज गूंजी— 'हवाई हमले का सायरन'।
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 मॉक ड्रिल शुरु होने से पहले तैयार खड़ा एक दस्ता।

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सायरन बजते ही क्या हुआ?

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जैसे ही सायरन की ऊंची-नीची आवाज (Wailing Sound) गूंजी, मानो पूरे क्षेत्र में करंट दौड़ गया। यह खतरे का संकेत था।
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    अंधेरा (Blackout): सायरन बजते ही बिजली विभाग ने पूरे इलाके की बिजली काट दी। दिन के उजाले में भी एक प्रतीकात्मक अंधेरा और सन्नाटा छा गया।
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    भगदड़ और बचाव: जो लोग मैदान में खड़े थे, वे तुरंत सुरक्षित स्थानों की ओर भागे। निर्देशों का पालन करते हुए, कई लोग वहीं जमीन पर पेट के बल लेट गए और अपने हाथों से सिर को ढक लिया। यह बम धमाकों से बचने की सबसे प्राथमिक तकनीक है।
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    हवाई हमले का सिमुलेशन: ड्रिल को वास्तविक रूप देने के लिए 'हवाई जहाज से बम गिराने' जैसे साउंड इफेक्ट्स और नियंत्रित विस्फोटों का इस्तेमाल किया गया। धमाकों की आवाज ने वहां मौजूद लोगों के रोंगटे खड़े कर दिए।
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यह पूरा दृश्य इतना जीवंत था कि अगर किसी को मॉक ड्रिल की जानकारी न होती, तो वह इसे असली हमला समझ बैठता।
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बचाव कार्य: जब रक्षक बने देवदूत

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जैसे ही 'बमबारी' रुकी और सायरन की आवाज थमी, दूसरा चरण शुरू हुआ— रेस्क्यू ऑपरेशन (Rescue Operation)। यह वह समय था जब सिविल डिफेंस (नागरिक सुरक्षा), दमकल विभाग (Fire Department), स्वास्थ्य विभाग और पुलिस के जवानों ने अपनी फुर्ती दिखाई।
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बिल्डिंग से रेस्क्यू

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मॉक ड्रिल का सबसे रोमांचक हिस्सा वह था जब 'बमबारी' के कारण एक इमारत में प्रतीकात्मक आग लग गई और कुछ लोग ऊपरी मंजिल पर फंस गए।
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    दमकल की एंट्री: सायरन बजाते हुए दमकल की गाड़ियां मौके पर पहुंचीं। चंद मिनटों में पानी की बौछारें शुरू हो गईं।
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    स्लाइडिंग रेस्क्यू: सिविल डिफेंस और फायर ब्रिगेड के जवानों ने रस्सियों और सीढ़ियों की मदद से बिल्डिंग में फंसे 'घायलों' (डमी और वॉलंटीयर्स) को सुरक्षित नीचे उतारा।
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    स्ट्रेचर का प्रदर्शन: एनसीसी कैडेट्स और स्वास्थ्य कर्मियों ने दिखाया कि कैसे मलबे के बीच से घायलों को स्ट्रेचर पर लिटाकर एंबुलेंस तक पहुंचाया जाता है।
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इंप्रोवाइज्ड स्ट्रेचर (जुगाड़ से जीवन रक्षा)

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इस ड्रिल में एक बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी दी गई— 'इंप्रोवाइज्ड स्ट्रेचर' बनाना। अधिकारियों ने दिखाया कि अगर इमरजेंसी में स्ट्रेचर न हो, तो कैसे दो शर्ट (Shirts) और दो डंडों (Bamboo sticks) की मदद से तुरंत एक मजबूत स्ट्रेचर तैयार किया जा सकता है। यह तकनीक आपदा के समय किसी की जान बचा सकती है।
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अधिकारियों की मौजूदगी और शासन का संदेश

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इस महत्वपूर्ण आयोजन की निगरानी जिले के शीर्ष अधिकारी कर रहे थे। प्रशासन यह सुनिश्चित करना चाहता था कि तैयारी में कोई कमी न रहे।
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मौजूद दिग्गज अधिकारी:

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    एडीएम फाइनेंस: सूर्यकांत त्रिपाठी (नोडल अधिकारी)
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    एडीएम सिटी: बृजेश कुमार सिंह
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    एसपी ट्रैफिक: राघवेंद्र कुमार मिश्र
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    मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO): डॉ. अशोक कटारिया
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    सिटी मजिस्ट्रेट: नवीन श्रीवास्तव
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इसके अलावा सिविल डिफेंस के वरिष्ठ पदाधिकारी और वार्डन भी अपनी पूरी वर्दी में मुस्तैद दिखे।
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क्या कहा अधिकारियों ने?  

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एडीएम फाइनेंस सूर्यकांत त्रिपाठी, जो इस कार्यक्रम के नोडल अधिकारी भी थे, ने बताया:
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"शासन के निर्देश पर आयोजित यह ब्लैकआउट मॉक ड्रिल पूरी तरह सफल रही। इसका मुख्य उद्देश्य जनता को सजग करना है। युद्ध या आपदा बताकर नहीं आती, लेकिन हमारी तैयारी ही हमारा सबसे बड़ा हथियार है। आज हमने देखा कि कैसे विभिन्न विभाग—पुलिस, स्वास्थ्य, फायर और बिजली विभाग—एक साथ मिलकर काम करते हैं।"
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आखिर क्या होता है 'ब्लैकआउट'? (What is a Blackout?)

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आम जनता के मन में यह सवाल अक्सर उठता है कि युद्ध के समय लाइटें क्यों बंद की जाती हैं। इस ड्रिल के दौरान एसपी ट्रैफिक राघवेंद्र कुमार मिश्र ने इसे बहुत सरल शब्दों में समझाया।
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तकनीकी पहलू: ब्लैकआउट एक आपातकालीन सुरक्षा प्रोटोकॉल है। जब दुश्मन देश के लड़ाकू विमान (Fighter Jets) या ड्रोन रात के समय हमला करने आते हैं, तो वे शहर की रोशनी (Lights) को निशाना बनाते हैं। रोशनी से उन्हें आबादी वाले क्षेत्रों, पुलों, कारखानों और सरकारी इमारतों की पहचान करने में मदद मिलती है।
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ब्लैकआउट के फायदे:

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    कैमफ्लाज (Camouflage): पूरा शहर अंधेरे में डूब जाने से ऊपर से (आसमान से) कुछ भी दिखाई नहीं देता।
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    भ्रम: दुश्मन के पायलट भ्रमित हो जाते हैं और सटीक निशाना नहीं लगा पाते।
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    जनहानि में कमी: बम आबादी वाले इलाकों के बजाय खाली मैदानों में गिरने की संभावना बढ़ जाती है, जिससे जान-माल का नुकसान कम होता है।
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हवाई हमले के दौरान क्या करें: एडीएम सिटी की 6 सूत्रीय गाइडलाइन

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मॉक ड्रिल का असली मकसद सिर्फ प्रदर्शन करना नहीं, बल्कि जन-जागरूकता (Public Awareness) था। एडीएम सिटी बृजेश कुमार सिंह ने वहां मौजूद लोगों और मीडिया के माध्यम से पूरी जनता को एक 'सेफ्टी प्रोटोकॉल' समझाया। यह जानकारी हर नागरिक के लिए बेहद कीमती है।
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यहाँ विस्तार से उन निर्देशों को समझाया गया है:

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(1) पूर्ण अंधेरा (Total Darkness)

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    निर्देश: सायरन बजते ही अपने घर, दुकान या प्रतिष्ठान की हर छोटी-बड़ी लाइट तुरंत बंद कर दें।
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    क्यों: एक जलता हुआ बल्ब भी कई किलोमीटर ऊपर से दुश्मन के लिए 'टारगेट' बन सकता है। यहाँ तक कि मोबाइल की टॉर्च भी बाहर इस्तेमाल न करें।
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(2) खिड़कियों और दरवाजों को ढकना

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    निर्देश: अपने घरों के शीशे वाली खिड़कियों और दरवाजों को मोटे काले परदों या चादरों से पूरी तरह ढक लें।
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    सावधानी: अगर कांच की खिड़कियां हैं, तो उन पर टेप (Tape) चिपका दें ताकि धमाके की कंपन (Shockwave) से कांच टूटकर आपको घायल न करे।
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(3) आपातकालीन प्रकाश (Emergency Light)

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    निर्देश: केवल बहुत जरूरी होने पर ही घर के अंदर बहुत धीमी रोशनी (जैसे मोमबत्ती या ढकी हुई टॉर्च) का इस्तेमाल करें।
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    शर्त: यह रोशनी किसी भी हाल में घर से बाहर नहीं दिखनी चाहिए।
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(4) सुरक्षित कमरा (Safe Room)

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    निर्देश: परिवार के सभी सदस्य घर के सबसे सुरक्षित और अंदरूनी कमरे में इकट्ठे हो जाएं।
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    टिप: बेसमेंट सबसे सुरक्षित जगह होती है। अगर बेसमेंट नहीं है, तो सीढ़ियों के नीचे या घर के बीच वाले कमरे में शरण लें। छतों और बालकनी से दूर रहें।
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(5) वाहन चालकों के लिए नियम

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    निर्देश: अगर आप सड़क पर गाड़ी चला रहे हैं और सायरन बज जाए, तो तुरंत गाड़ी को सड़क किनारे खड़ा कर दें।
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    कड़ी चेतावनी: गाड़ी की हेडलाइट और टेललाइट तुरंत बंद कर दें। गाड़ी के अंदर भी लाइट न जलाएं। गाड़ी से बाहर निकलकर किसी सुरक्षित स्थान (गड्ढे या इमारत की ओट) में छिप जाएं।
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(6) आधिकारिक सूचना का पालन

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    निर्देश: अफवाहों पर ध्यान न दें। सिविल डिफेंस, पुलिस या प्रशासन द्वारा लाउडस्पीकर या रेडियो पर दिए जा रहे निर्देशों का ही पालन करें। जब तक 'ऑल क्लियर' (All Clear) का सायरन न बजे, बाहर न निकलें।
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सिविल डिफेंस: वो 'अनसंग हीरोज' जो आपदा में सबसे पहले आते हैं

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मेरठ के डीएन कॉलेज में हुई इस ड्रिल में सिविल डिफेंस (नागरिक सुरक्षा) के स्वयंसेवकों की भूमिका सबसे अहम थी। सफेद वर्दी और पीली हेलमेट पहने ये वॉलंटीयर्स आपदा प्रबंधन की रीढ़ माने जाते हैं।
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क्या है सिविल डिफेंस? यह नागरिकों का एक ऐसा संगठन है जो युद्ध या आपदा के समय प्रशासन की मदद करता है। इनका काम हथियार चलाना नहीं, बल्कि:
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    घायलों को प्राथमिक चिकित्सा (First Aid) देना।
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    आग बुझाना।
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    मलबे में दबे लोगों को निकालना।
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    लोगों के मन से डर और दहशत को निकालना (Psychological Support)।
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इस ड्रिल के दौरान उन्होंने दिखाया कि कैसे सीमित संसाधनों में भी धैर्य और तकनीक से जान बचाई जा सकती है।
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चिकित्सा और आग से सुरक्षा: ड्रिल के अन्य प्रमुख पहलू

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सिर्फ ब्लैकआउट ही नहीं, ड्रिल में बम धमाकों के बाद की स्थितियों से निपटने का भी प्रशिक्षण दिया गया।
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फायर सेफ्टी (Fire Safety): बम गिरने से अक्सर आग लग जाती है। दमकल विभाग ने दिखाया कि:
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    तेल (Oil) से लगी आग पर पानी नहीं डालना चाहिए।
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    गैस सिलेंडर की आग को गीले बोरे से कैसे बुझाएं।
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    भीड़भाड़ वाले इलाके में लगी आग को कैसे नियंत्रित करें।
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मेडिकल इमरजेंसी (Medical Emergency): मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. अशोक कटारिया की टीम ने 'ट्राज' (Triage) का प्रदर्शन किया। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें घायलों को उनकी चोट की गंभीरता के आधार पर अलग-अलग किया जाता है—किसे पहले इलाज चाहिए और किसे बाद में। यह युद्ध के समय अस्पतालों में अफरा-तफरी रोकने के लिए बहुत जरूरी है।
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तैयारी ही बचाव है

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मेरठ में आयोजित यह मॉक ड्रिल महज एक रस्म अदायगी नहीं थी, बल्कि यह बदलते दौर की चुनौतियों के प्रति एक चेतावनी और तैयारी थी। आज की दुनिया में जिओ-पॉलिटिकल तनाव (Geo-political tension) और आतंकी हमलों के खतरे को देखते हुए, हर नागरिक का प्रशिक्षित होना जरूरी है।
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डीएन कॉलेज के मैदान से उठा सायरन का शोर अब शांत हो चुका है, लेकिन उसका संदेश स्पष्ट है— "सावधान रहें, सुरक्षित रहें और प्रशासन के साथ सहयोग करें।" प्रशासन की यह पहल निश्चित रूप से सराहनीय है, जिसने न केवल सरकारी तंत्र की जंग लगी मशीनरी को तेल-पानी देकर दुरुस्त किया, बल्कि आम जनता के अंदर भी सुरक्षा का आत्मविश्वास जगाया।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

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Q1: ब्लैकआउट मॉक ड्रिल क्यों की जाती है?
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Ans: यह जनता और प्रशासन को हवाई हमलों या युद्ध जैसी स्थिति के लिए तैयार करने के लिए की जाती है, ताकि आपातकाल में घबराहट (Panic) न हो और जान-माल का नुकसान कम से कम हो।
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Q2: हवाई हमले का सायरन कैसा होता है?
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Ans: हवाई हमले का सायरन आमतौर पर लहरदार (Wailing tone) होता है, जो 2-3 मिनट तक ऊंची और नीची आवाज में बजता है। 'ऑल क्लियर' का सायरन एक सीधी सपाट टोन (Flat tone) में बजता है।
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Q3: अगर मैं घर से बाहर हूँ और सायरन बज जाए तो क्या करूँ?
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Ans: तुरंत निकटतम इमारत में शरण लें। अगर खुले मैदान में हैं, तो जमीन पर पेट के बल लेट जाएं और हाथों से सिर को ढक लें। दौड़ें नहीं, क्योंकि इससे आप गिर सकते हैं या भगदड़ मच सकती है।
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Q4: ब्लैकआउट के दौरान घर में क्या सावधानियां बरतें?
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Ans: सभी लाइटें बंद करें, गैस रेगुलेटर बंद कर दें, कांच की खिड़कियों से दूर रहें और रेडियो पर समाचार सुनें।
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Q5: क्या यह ड्रिल असली खतरे के कारण हुई थी?
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Ans: नहीं, यह 'नेताजी सुभाष चंद्र बोस जयंती' और 'यूपी दिवस' के अवसर पर शासन के निर्देशानुसार आयोजित एक पूर्व-नियोजित (Pre-planned) अभ्यास था। वर्तमान में कोई प्रत्यक्ष खतरा नहीं है।
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