उत्तर प्रदेश की ऐतिहासिक और क्रांतिकारी धरती मेरठ, जहाँ से 1857 की क्रांति का बिगुल बजा था, आज एक बार फिर एक नई सामाजिक और राजनीतिक क्रांति का गवाह बनी। दिनांक 29 जनवरी 2026 को शहर के हृदय स्थल में स्थित एन.एस.एस. इण्टर कॉलेज (N.A.S. Inter College) के प्रांगण में 'युवा ब्राह्मण समाज संगठन (ट्रस्ट)' के बैनर तले एक विशाल और निर्णायक बैठक का आयोजन किया गया।READ ALSO:-मौत का 'Video Note': मेरठ में कर्ज के नागपाश ने ली गोविंद की जान, कैमरा ऑन कर बोला- 'अब मैं जी नहीं पाऊंगा..मरने से पहले बनाए 3 वीडियो
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यह बैठक सामान्य नहीं थी। यह बैठक उस दबे हुए आक्रोश का ज्वालामुखी थी जो पिछले कई दशकों से सामान्य वर्ग (General Category) और विशेषकर ब्राह्मण समाज के सीने में धधक रहा है। बैठक का मुख्य केंद्र बिंदु माननीय सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) का वह हालिया फैसला था, जिसके तहत यू.जी.सी. (UGC) के एक विवादास्पद आदेश—जिसे समाज ने "काला कानून" की संज्ञा दी है—पर रोक लगा दी गई है।
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वक्ताओं ने मंच से दो टूक शब्दों में कहा कि न्यायपालिका ने तो न्याय कर दिया, लेकिन कार्यपालिका (सरकार) की नीयत पर उन्हें अब भी संदेह है। इतिहास का हवाला देते हुए समाज के प्रबुद्ध जनों ने चेतावनी दी कि यदि वोट बैंक की राजनीति के चलते सरकार ने कोर्ट के फैसले को पलटने की कोशिश की, तो इस बार परिणाम गंभीर होंगे।
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महा-बैठक का आगाज और उद्देश्य
\r\n\r\nएन.एस.एस. इण्टर कॉलेज का हॉल खचाखच भरा था। युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक, हर किसी के चेहरे पर एक ही सवाल था—"आखिर कब तक?" बैठक पूर्व निर्धारित कार्यक्रमानुसार संपन्न हुई। इसकी अध्यक्षता संगठन की स्थाई समिति के वरिष्ठ और सम्मानित सदस्य श्री जितेन्द्र गौतम जी ने की, जबकि मंच का कुशल संचालन स्थाई समिति के ही सदस्य श्री अजय शर्मा जी ने किया।
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इस बैठक का उद्देश्य केवल विरोध प्रदर्शन करना नहीं था, बल्कि समाज को एक नई दिशा देना और एक "प्रेशर ग्रुप" (Pressure Group) के रूप में स्थापित करना था। चर्चा का विषय स्पष्ट था—स्वर्ण समाज के अस्तित्व की रक्षा और भेदभावपूर्ण कानूनों का विरोध।
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सुप्रीम कोर्ट को धन्यवाद, सरकार को चेतावनी
\r\n\r\nबैठक के पहले सत्र में संगठन के अध्यक्ष श्री कुलदीप शर्मा ने अपने विचार रखे। उन्होंने सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट के प्रति आभार व्यक्त किया। कुलदीप शर्मा ने कहा:
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\r\n\r\n\r\n"हम माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आभारी हैं कि उन्होंने यू.जी.सी. के काले कानून पर रोक लगा दी है। हम उन्हें धन्यवाद देते हैं।"\r\n
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लेकिन उनकी बात यहीं खत्म नहीं हुई। उन्होंने सरकार की कार्यप्रणाली पर गहरा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि केवल रोक लगाना ही काफी नहीं है। सरकार को उन अधिकारियों और नीति-निर्माताओं की पहचान करनी चाहिए जो समाज को बांटने वाले ऐसे आदेश पारित करते हैं। उन्होंने मांग की:
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\r\n\r\n\r\n"सरकार से अनुरोध है कि वह ऐसे समाज बांटने वाले आदेशों को लागू करने वालों के विरुद्ध न्यायसंगत और कठोर कार्यवाही करे, ताकि भविष्य में कोई भी संस्थान ऐसे कार्य करने का दुस्साहस न कर सके।"\r\n
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यह बयान दर्शाता है कि संगठन अब केवल रक्षात्मक (Defensive) मुद्रा में नहीं है, बल्कि आक्रामक (Aggressive) होकर जवाबदेही तय करना चाहता है।
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"न्याय या अन्याय?" - झूठे मुकदमों का दर्दनाक सच
\r\n\r\nबैठक का सबसे संवेदनशील और रोंगटे खड़े कर देने वाला हिस्सा वह था जब संचालन कर रहे श्री अजय शर्मा ने माइक संभाला। उन्होंने स्वर्ण समाज की पीड़ा को एक ऐसे उदाहरण के साथ रखा, जिसने वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम कर दीं।
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अजय शर्मा ने कहा कि स्वर्ण समाज ने आज तक कभी किसी दूसरी जाति का अपमान नहीं किया और न ही कभी किसी का विरोध किया। लेकिन इसके बदले उन्हें क्या मिला? उन्होंने कहा:
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\r\n\r\n\r\n"कुछ जाति विशेष के लोग व्यक्तिगत द्वेष (Personal Grudge) की भावना रखते हुए स्वर्ण वर्ग, और विशेषकर ब्राह्मणों को चिह्नित (Target) करके आरोप लगाने शुरू कर देते हैं।"\r\n
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केस स्टडी: 'तिवारी जी' के खोए हुए 20 साल
\r\n\r\nअजय शर्मा ने सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक हालिया मामले का जिक्र किया, जो व्यवस्था के मुंह पर एक तमाचा है। उन्होंने बताया:
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\r\n\r\n\r\n"एक तिवारी जी का मामला सामने आया। उन्हें एक झूठे केस में फंसाया गया। वे 20 साल तक जेल में सड़ते रहे। 20 साल बाद अदालत ने उन्हें बाइज्जत बरी किया और कहा कि उन पर लगे आरोपों के कोई पुख्ता सबूत नहीं मिले, इसलिए उन्हें बरी किया जाता है।"\r\n
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यहाँ अजय शर्मा ने एक ऐसा प्रश्न पूछा जिसका उत्तर शायद किसी सरकार के पास नहीं है:
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\r\n\r\n\r\n"परन्तु क्या उनके जीवन के वो महत्वपूर्ण 20 साल वापस हो सकते हैं? जवानी जेल में कट गई, परिवार बिखर गया। ऐसे कानूनों का पुरजोर विरोध होना चाहिए जो बिना सबूत के किसी की जिंदगी बर्बाद कर दें।"\r\n
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यह तर्क सीधे तौर पर एस.सी./एस.टी. एक्ट के कथित दुरुपयोग और कानूनी जटिलताओं की ओर इशारा करता है, जिसे लेकर सामान्य वर्ग में भारी रोष है।
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इतिहास की परछाई - 2018 का डर और भविष्य की रणनीति
\r\n\r\nबैठक की अध्यक्षता कर रहे श्री जितेन्द्र गौतम जी ने अपने संबोधन में परिपक्वता और दूरदर्शिता का परिचय दिया। उन्होंने समाज को "अति-उत्साह" से बचकर "सतर्क" रहने की सलाह दी।
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"कोर्ट कुछ नहीं कर पाती..."
\r\n\r\nजितेन्द्र गौतम ने याद दिलाया कि हम सुप्रीम कोर्ट के आभारी जरूर हैं, लेकिन हमें अतीत को नहीं भूलना चाहिए। उनका इशारा संभवतः 2018 के घटनाक्रम की ओर था जब सुप्रीम कोर्ट ने एस.सी./एस.टी. एक्ट में कुछ सुरक्षात्मक बदलाव किए थे, लेकिन केंद्र सरकार ने अध्यादेश लाकर उसे पलट दिया था।
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उन्होंने चेतावनी दी:
\r\n\r\n\r\n\r\n\r\n"हम सभी स्वर्ण समाज को यह ध्यान रखना चाहिए कि पहले भी एक बार ऐसा हो चुका है कि सरकार बाद में कानून बना देती है, जिसके बाद कोर्ट भी कुछ नहीं कर पाती।"\r\n
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बहिष्कार का संकल्प
\r\n\r\nजितेन्द्र गौतम ने स्पष्ट रणनीति बताई:
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\r\n\r\n\r\n"अतः हम लोगों को एकजुट रहकर ऐसा माहौल बनाना चाहिए कि यदि कोई सरकार आगे ऐसा कानून लाती है, तो हम उस पार्टी का पूर्ण बहिष्कार कर सकें। भेदभाव वाले कानून देश और समाज दोनों के लिए घातक होते हैं। इनका विरोध अति आवश्यक है।"\r\n
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यह बयान राजनीतिक दलों के लिए खतरे की घंटी है। ब्राह्मण समाज, जो अक्सर ओपिनियन मेकर (Opinion Maker) की भूमिका में होता है, यदि सामूहिक बहिष्कार की राह पर चल पड़ा, तो चुनावी समीकरण बिगड़ सकते हैं।
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"करो या मरो" - मंत्री पुनीत शर्मा की हुंकार
\r\n\r\nयुवा ब्राह्मण समाज संगठन के मंत्री श्री पुनीत शर्मा ने युवाओं में जोश भरते हुए कहा कि अब चुप बैठने का समय चला गया है। उन्होंने समाज को "विषाक्त" और "वैमनस्य" बढ़ाने वाले कानूनों के खिलाफ खड़ा होने का आह्वान किया।
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पुनीत शर्मा ने एक कड़ा प्रस्ताव रखा:
\r\n\r\n\r\n\r\n\r\n"समाज को एकजुट होकर यह निर्णय लेना चाहिए कि आगे भी किसी भी पार्टी की सरकार समाज में विद्वेष की भावना बढ़ाने का कानून बनाती है, तो उस पार्टी का पूर्ण बहिष्कार किया जाए।"\r\n
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पुनीत शर्मा का यह बयान स्पष्ट करता है कि संगठन अब किसी भी राजनीतिक दल का "परमानेंट वोट बैंक" नहीं रहा। जो उनके हितों की रक्षा करेगा, वही उनका समर्थन पाएगा।
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"हम आज भी गुलाम हैं" - आर.के. पंचौरी का विस्फोटक भाषण
\r\n\r\nबैठक में सबसे तीखा और आक्रामक भाषण वरिष्ठ सदस्य श्री आर.के. पंचौरी जी का रहा। उन्होंने वर्तमान परिस्थितियों की तुलना अंग्रेजों की गुलामी से कर दी।
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मंगल पांडे और आजादी
\r\n\r\nवधौरी जी ने गर्व और पीड़ा के मिश्रित भाव से कहा:
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\r\n\r\n\r\n"क्या आज हम वाकई आजाद हैं? अंग्रेजों के टाइम में मंगल पांडे ने आजादी की चिंगारी जलाई थी और देश को आजादी दिलवाई। लेकिन आज हम उस समय से भी ज्यादा गुलाम हैं।"\r\n
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उनका तर्क था कि जिस समाज ने देश को आजाद कराने में सबसे बड़ा बलिदान दिया, आज उसी समाज को हाशिये पर धकेल दिया गया है।
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आरक्षण का गणित और मेधावी छात्रों की हत्या
\r\n\r\nवधौरी जी ने शिक्षा व्यवस्था में आरक्षण की विसंगतियों पर गहरा चोट किया। उन्होंने कहा:
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\r\n\r\n\r\n"यदि हमने मंडल कमीशन का सही समय पर और सही तरीके से विरोध किया होता, तो आज यह दिन नहीं देखना पड़ता। आज हमारे स्वर्ण समाज के बच्चों को 90% अंक लाने पर भी एडमिशन नहीं मिलता, जबकि दलितों को 25-30% अंकों पर भी प्रवेश मिल जाता है।"\r\n
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यह मुद्दा केवल मेरठ का नहीं, बल्कि पूरे देश के सामान्य वर्ग के छात्रों का दर्द है। वधौरी जी ने इसे "प्रतिभा की हत्या" करार दिया।
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शंकराचार्य का अपमान
\r\n\r\nउन्होंने धार्मिक भावनाओं को भी स्पर्श किया। उन्होंने कहा:
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\r\n\r\n\r\n"वर्तमान में ब्राह्मणों का व्यापक उत्पीड़न हो रहा है। इसका ताजा उदाहरण शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद व उनके साथियों का उत्पीड़न और विरोध कार्यवाही है।"\r\n
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बच्चों के मन में बैठा डर - प्रशांत कौशिक की चिंता
\r\n\r\nजहां अन्य वक्ता राजनीतिक और कानूनी पहलुओं पर बोल रहे थे, वहीं श्री प्रशांत कौशिक ने मुद्दे के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पक्ष को रखा।
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उन्होंने कहा कि आपसी मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन जब कानून एक पक्षीय हो जाता है, तो वह समाज को तोड़ देता है। प्रशांत कौशिक ने कहा:
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\r\n\r\n\r\n"अपमान या आपस में मतभेद किसी के साथ हो सकता है। परन्तु कानूनी रूप से किसी को हथियार देना न्यायोचित नहीं है। इससे बच्चों के मन में भय का वातावरण बन रहा है। यह एक संक्रमण काल है।"\r\n
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जनप्रतिनिधियों को अल्टीमेटम
\r\n\r\nउन्होंने एक व्यावहारिक सुझाव दिया:
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\r\n\r\n\r\n"जनप्रतिनिधियों (सांसदों/विधायकों) को प्रस्ताव बनाकर दिया जाए कि आप ऐसे मुद्दों का संसद में विरोध करें, अन्यथा स्वर्ण समाज आप लोगों को वोट नहीं करेगा।"\r\n
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"तलवार अभी भी लटकी है" - पं. अश्वनी कौशिक
\r\n\r\nबैठक में पं. अश्वनी कौशिक ने यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने कहा कि हमें कोर्ट के स्टे (Stay) से खुश होकर बैठना नहीं है।
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उन्होंने चेतावनी दी:
\r\n\r\n\r\n\r\n\r\n"माननीय न्यायालय ने रोक लगाकर थोड़ा सुकून दिया है, परन्तु स्वर्ण समाज पर तलवार अभी भी लटकी हुई है। सरकार ऐसे कानून से स्वर्ण समाज को डराकर रख रही है।"\r\n
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उनकी रणनीति स्पष्ट थी—सतत संघर्ष।
\r\n\r\n\r\n\r\n\r\n"हम लोगों को एकजुट होकर इस आंदोलन को अभी जारी रखना होगा। हमें छोटी-छोटी बैठकें करके अलख जलाए रखनी है।"\r\n
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एकजुटता का प्रदर्शन
\r\n\r\nयह बैठक केवल कुछ नेताओं का जमावड़ा नहीं थी, बल्कि इसमें समाज के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व था। वक्ताओं ने एक सुर में आंदोलन को जारी रखने का समर्थन किया।
\r\n\r\nअपने विचार व्यक्त करने वाले अन्य प्रमुख वक्ताओं में शामिल थे:
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- \r\n गणेश दत्त शर्मा\r\n \r\n
- \r\n विशाल त्यागी\r\n \r\n
- \r\n भूषण शर्मा (अध्यक्ष, नवीन सब्जी मण्डी) - जो व्यापारी वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।\r\n \r\n
- \r\n डा. गजेन्द्र कुमार शर्मा\r\n \r\n
- \r\n ललित कौशिक\r\n \r\n
- \r\n ऋषभ पराशर (एडवोकेट) - जिन्होंने कानूनी पहलुओं पर प्रकाश डाला।\r\n \r\n
- \r\n गिरीश भारद्वाज, सौरभ दिवाकर, सिद्धांत भारद्वाज, विजय शर्मा, और श्रीकान्त पाण्डेय।\r\n \r\n
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बैठक में इनकी रही विशेष उपस्थिति: मुख्य रूप से श्री अशोक शर्मा, हिमांशु, अनुपम, राजू, विपिन, मनीष शर्मा, सुरेन्द्र शर्मा, डा. रविकान्त सरल, अनिल सहरावत, संजय वाजपेयी, हिमांशु शर्मा, सुरेन्द्र पं., विशाल शर्मा, आनन्द भारद्वाज, जितेन्द्र आदि उपस्थित रहे।
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मेरठ से उठी चिंगारी कहां तक जाएगी?
\r\n\r\nएन.एस.एस. इण्टर कॉलेज में संपन्न हुई यह बैठक कई मायनों में ऐतिहासिक रही। इसने स्पष्ट कर दिया है कि स्वर्ण समाज अब "मौन दर्शक" नहीं बना रहेगा।
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बैठक के प्रमुख निष्कर्ष (Key Takeaways):
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- \r\n न्यायपालिका पर भरोसा: सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का स्वागत, लेकिन विधायी पलटवार का डर।\r\n \r\n
- \r\n सरकार से मोहभंग: यदि तुष्टिकरण की राजनीति जारी रही, तो सत्ता परिवर्तन की धमकी।\r\n \r\n
- \r\n सामाजिक एकता: ब्राह्मण और अन्य स्वर्ण जातियों का ध्रुवीकरण।\r\n \r\n
- \r\n कानूनी सुधार की मांग: बिना जांच गिरफ्तारी और झूठे मुकदमों (जैसे तिवारी जी का केस) पर रोक लगाने की मांग।\r\n \r\n
- \r\n शिक्षा में मेरिट: आरक्षण की विसंगतियों पर खुलकर चर्चा।\r\n \r\n
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आज की यह बैठक मेरठ और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नए समीकरण का संकेत दे रही है। जिस तरह से स्वर्ण समाज, विशेषकर युवा ब्राह्मण वर्ग, सरकारी नीतियों और आरक्षण के रोस्टर सिस्टम को लेकर मुखर हो रहा है, यह आगामी चुनावों के लिए राजनीतिक दलों के लिए खतरे की घंटी हो सकती है। "नोट (NOTA) या बहिष्कार" का नारा अब दबी जुबान से नहीं, बल्कि मंचों से दिया जा रहा है। 2026 की शुरुआत में ही इस तरह के तेवर बताते हैं कि सामाजिक न्याय की परिभाषा को लेकर संघर्ष अभी लंबा चलेगा।
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मेरठ के जाग्रति विहार क्षेत्र (और ब्रह्मपुरी कार्यालय क्षेत्र) में हुई यह बैठक केवल एक चर्चा नहीं, बल्कि एक चेतावनी थी। संगठन ने साफ कर दिया है कि वे न तो झुकेंगे और न ही डरेंगे। अब देखना यह होगा कि सरकार और स्थानीय जनप्रतिनिधि इस आक्रोश को कैसे शांत करते हैं।
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मेरठ के एन.एस.एस. इण्टर कालिज में 29 जनवरी 2026 को युवा ब्राह्मण समाज संगठन की अहम बैठक संपन्न हुई। बैठक में सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूजीसी के विवादित नियमों पर रोक लगाने का स्वागत किया गया, लेकिन साथ ही वक्ताओं ने सरकार को चेतावनी दी कि यदि समाज को बांटने वाले कानून बनते रहे, तो संबंधित राजनीतिक दलों का पूर्ण बहिष्कार किया जाएगा। बैठक में झूठे केसों (SC/ST एक्ट के दुरुपयोग के आरोप) और आरक्षण के कारण प्रतिभा के हनन पर भी गहरा आक्रोश व्यक्त किया गया। जितेन्द्र गौतम और पुनीत शर्मा ने समाज को एकजुट रहने का आह्वान किया।
\r\n\r\nसंगठन के मंत्री पुनीत शर्मा ने अंत में सभी का धन्यवाद किया और यह संकल्प दोहराया कि यह लड़ाई तब तक जारी रहेगी जब तक समाज को "भयमुक्त" वातावरण और "समान अधिकार" नहीं मिल जाते।
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(नोट: यह विस्तृत रिपोर्ट 29 जनवरी 2026 को मेरठ में जारी प्रेस विज्ञप्ति और वहां व्यक्त किए गए विचारों के आधार पर तैयार की गई है।)
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