Meerut News: मेरठ के विकास को रफ्तार देने वाली दो सबसे महत्वपूर्ण परियोजनाएं—रिंग रोड (Ring Road) और बिजली बंबा बाईपास (Bijli Bamba Bypass)—एक बार फिर धन की कमी के चलते अटक गई हैं। शासन से फंड मिलने में हो रही देरी को देखते हुए अब इन दोनों प्रोजेक्ट्स को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP Model) के तहत बनाने की संभावना तलाशी जा रही है।Read also:-मेरठ का इंतज़ार खत्म: बुलेट जैसी रफ़्तार से दौड़ने को तैयार 'नमो भारत', दिसंबर में इन दो तारीखों पर टिकी सबकी नज़रें
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मेरठ कमिश्नर ने इस दिशा में नए सिरे से सर्वे करने का आदेश दिया है। अगर यह योजना सफल होती है, तो निजी निवेशक इन सड़कों का निर्माण करेंगे और बदले में उन्हें टोल वसूली या एफएआर (FAR) में छूट जैसे लाभ दिए जाएंगे।
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क्यों पड़ी PPP मॉडल की जरूरत?
\r\n\r\nमेरठ विकास प्राधिकरण (MDDA) और लोक निर्माण विभाग (PWD) के सामने सबसे बड़ी बाधा 'बजट' बनकर खड़ी है।
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- \r\n रिंग रोड का खर्च: बुलंदशहर-हापुड़ हाईवे से जुर्रानपुर रेलवे लाइन और दिल्ली रोड होते हुए दून बाईपास तक रिंग रोड बनाने के लिए करीब 15 हेक्टेयर जमीन की जरूरत है।\r\n \r\n
- \r\n जमीन की कीमत: इस जमीन को खरीदने में लगभग 162 करोड़ रुपये खर्च होंगे।\r\n \r\n
- \r\n निर्माण लागत: सड़क, 10 अंडरपास, 3-4 फ्लाईओवर, नाले और विद्युतीकरण के लिए अलग से 300 करोड़ रुपये की जरूरत है।\r\n \r\n
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मेडा (MDDA) के पास जमीन खरीदने के लिए अपने कोष से केवल 100 करोड़ रुपये की व्यवस्था है। बाकी 62 करोड़ रुपये और निर्माण के 300 करोड़ रुपये (कुल 362 करोड़) शासन से मिलने थे। लेकिन अभी तक शासन से न तो पैसा आया है और न ही कोई स्वीकृति पत्र।
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बिजली बंबा बाईपास पर भी संकट
\r\n\r\nदूसरी ओर, शहर के व्यस्ततम रास्तों में से एक बिजली बंबा बाईपास के चौड़ीकरण पर भी लगभग 200 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। स्पष्ट है कि शासन स्तर से इतनी बड़ी धनराशि (दोनों प्रोजेक्ट्स के लिए करीब 500-600 करोड़) मिलना मुश्किल लग रहा है। इसी वजह से शासन ने इन दोनों मार्गों को पीपीपी मॉडल (PPP Model) पर बनाने के निर्देश दिए थे, जिसके बाद अब सर्वे शुरू किया गया है।
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पीपीपी मॉडल में क्या होगा खास?
\r\n\r\nअगर ये प्रोजेक्ट्स पीपीपी मॉडल पर जाते हैं, तो इसके दो मुख्य पहलू होंगे:
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- \r\n निवेशक का खर्च: पूरी परियोजना की लागत कोई निजी कंपनी या निवेशक वहन करेगा।\r\n \r\n
- \r\n राजस्व मॉडल: इसके बदले में निवेशक को टोल टैक्स वसूलने का अधिकार दिया जा सकता है। या फिर, उसे एफएआर (Floor Area Ratio) में छूट और भू-उपयोग परिवर्तन (Land Use Change) शुल्क में रियायत देकर भरपाई की जा सकती है।\r\n \r\n
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12 साल से 'हवा में लटका' है ओवरब्रिज
\r\n\r\nमेरठ में सरकारी लेत-लतीफी का सबसे बड़ा उदाहरण वह ओवरब्रिज है, जो पिछले 12 सालों से अधूरा पड़ा है।
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- \r\n 2011 में शिलान्यास: जब इसकी नींव रखी गई थी, तब समझौता हुआ था कि रेलवे पुल बनाएगा, मेडा जमीन खरीदेगा और पीडब्ल्यूडी सड़क बनाएगा।\r\n \r\n
- \r\n रेलवे ने किया काम: रेलवे ने अपने हिस्से का ओवरब्रिज बनाकर तैयार कर दिया।\r\n \r\n
- \r\n मेडा की नाकामी: मेडा एप्रोच रोड के लिए जमीन नहीं खरीद पाया। जमीन न मिलने से पीडब्ल्यूडी ने सड़क नहीं बनाई। नतीजा यह हुआ कि पुल आज भी हवा में लटका हुआ है और इसका कोई उपयोग नहीं हो पा रहा है।\r\n \r\n
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फाइलों में दौड़ते रहे प्रस्ताव
\r\n\r\nइस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए पिछले एक दशक में कई 'फॉर्मूले' निकाले गए, लेकिन सब फेल रहे:
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- \r\n पहले NHAI से संपर्क किया गया, लेकिन जमीन खरीद की शर्त पर उन्होंने हाथ खड़े कर दिए।\r\n \r\n
- \r\n पीडब्ल्यूडी ने 300 करोड़ का प्रस्ताव भेजा, जिसे शासन ने मना कर दिया।\r\n \r\n
- \r\n फिर बिजली बंबा चौड़ीकरण का प्रस्ताव भेजा गया, वह भी निरस्त हो गया।\r\n \r\n
- \r\n हाल ही में 24 मीटर चौड़ी सड़क बनाने का प्रस्ताव बना, जिसमें मेडा को 100 करोड़ और शासन को 62 करोड़ देने थे, लेकिन यह फाइल भी ठंडे बस्ते में चली गई।\r\n \r\n
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मेरठ की जनता लंबे समय से रिंग रोड और जाम मुक्त बाईपास का सपना देख रही है। सरकारी खजाने में कमी के कारण अब पीपीपी मॉडल ही आखिरी उम्मीद बची है। कमिश्नर के आदेश के बाद उम्मीद जगी है कि शायद निजी निवेश के जरिए इस 12 साल पुराने गतिरोध को तोड़ा जा सकेगा और शहर को जाम से मुक्ति मिलेगी।
Sabse pehle comment karne wale banein.