मेरठ (Meerut), 24 मार्च 2026: उत्तर प्रदेश में भीषण गर्मी का मौसम शुरू हो चुका है। ऐसे समय में जब बिजली की मांग (Power Demand) अपने चरम पर जाने वाली है, पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (PVVNL) के मेरठ स्थित मुख्यालय से एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आई है। विभाग की रीढ़ कहे जाने वाले संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों (Outsource Employees) ने विभागीय अधिकारियों और ठेकेदार कंपनियों की मिलीभगत के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया है।READ ALSO:-मेरठ में खाकी पर हमला: थाने में हिस्ट्रीशीटर का 'खूनी' ड्रामा, महिलाओं ने फाड़ी लेडी कांस्टेबल की वर्दी; जानिए पुलिस स्टेशन का पूरा खौफनाक मंजर
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लंबे समय से अपने हकों के लिए संघर्ष कर रही 'निविदा-संविदा कर्मचारी सेवा समिति (पंजीकृत)' ने मंगलवार को सीधे पीवीवीएनएल के प्रबंध निदेशक (Managing Director) को एक चेतावनी भरा मांग-पत्र (पत्रांक NSEWA: 15/PHL/2026) सौंपा है। इस पत्र में स्पष्ट कर दिया गया है कि यदि अधिकारियों ने अपनी मनमानी नहीं रोकी और आउटसोर्स कर्मचारियों को 'मशीन' समझना बंद नहीं किया, तो कर्मचारी किसी भी क्षण 'कार्य बहिष्कार' (हड़ताल/Strike) पर चले जाएंगे। इस अल्टीमेटम ने न केवल मेरठ, बल्कि पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ऊर्जा विभाग में हड़कंप मचा दिया है।
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अल्टीमेटम का खाका: क्या है 'निविदा-संविदा कर्मचारी सेवा समिति' का मांग-पत्र?
\r\n\r\nसमिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष भूपेन्द्र सिंह, राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष विनोद कुमार, राष्ट्रीय महामंत्री अमित खारी और पश्चिमांचल अध्यक्ष सचिन सिंह के नेतृत्व में सौंपे गए इस ज्ञापन में कर्मचारियों की चार प्रमुख और सबसे ज्वलंत समस्याओं को उठाया गया है। संगठन का आरोप है कि उन्होंने समय-समय पर पत्रों के माध्यम से उच्चाधिकारियों को इन समस्याओं से अवगत कराया है, लेकिन 'अधिकारियों और ठेकेदारों के गठजोड़' के कारण इन शिकायतों को हमेशा रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया।
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कर्मचारियों का यह गुस्सा अचानक नहीं फूटा है, बल्कि यह सालों से चले आ रहे ईपीएफ (EPF) घोटालों, बिना भत्ते के अतिरिक्त काम के दबाव और नौकरी से निकाले जाने के डर का परिणाम है। आइए, संगठन द्वारा उठाए गए चारों प्रमुख बिंदुओं का गहराई से विश्लेषण करते हैं।
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विवाद नंबर 1: दागी कंपनी पर मेहरबानी—मवाना व सरधना देहात के टेंडर का खेल
\r\n\r\nइस पूरे विवाद की सबसे बड़ी जड़ ठेका प्रथा (Outsourcing System) और उसमें पनप रहा भ्रष्टाचार है। संगठन ने मवाना और सरधना देहात क्षेत्रों में 'P.R. और मबेरिक पावर सॉल्यूशन' (P.R. & Maverick Power Solution) नामक कंपनी को दिए गए नए अनुबंध (Tender) पर कड़ी आपत्ति जताई है।
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कर्मचारियों का ईपीएफ और ईएसआई घोटाला
\r\n\r\nसमिति का सीधा आरोप है कि इस कंपनी का पिछला ट्रैक रिकॉर्ड बेहद दागी रहा है। पूर्व में भी जब इस कंपनी के पास ठेका था, तब इसने कर्मचारियों के खून-पसीने की कमाई से ईपीएफ (EPF), ईएसआई (ESI) और वेतन की भारी कटौती की, लेकिन वह पैसा कर्मचारियों के खातों में सही तरीके से जमा नहीं हुआ। संविदा कर्मचारियों के लिए यह आर्थिक शोषण का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है।
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अधिकारियों की मिलीभगत का पर्दाफाश
\r\n\r\nहैरानी की बात यह है कि ऐसा नहीं है कि विभाग के अधिकारियों को इस कंपनी की काली करतूतों का पता नहीं है। संगठन ने अपने पत्र में स्पष्ट रूप से 'पत्रांक संख्या 3764' (दिनांक 16/03/2026) का हवाला दिया है। यह आदेश खुद अधिशासी अभियंता (दक्षिण 11 केवी) द्वारा जारी किया गया था, जिसमें कंपनी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए थे।
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लेकिन, निचले स्तर की इस रिपोर्ट और कर्मचारियों के विरोध को दरकिनार करते हुए, उच्चाधिकारियों ने फिर से उसी दागी कंपनी को टेंडर सौंप दिया। यह सीधा-सीधा आउटसोर्स कर्मचारियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।
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\r\n\r\n\r\nसंगठन की दो-टूक चेतावनी: "यदि इस नए अनुबंध की आड़ में किसी भी पुराने संविदा कर्मचारी को काम से हटाया गया (Retrenchment), तो ऐसी स्थिति में पश्चिमांचल के सभी संविदा कर्मचारी तत्काल प्रभाव से कार्य बहिष्कार पर चले जाएंगे।"\r\n
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विवाद नंबर 2: 'असेसड बिलिंग' का तुगलकी फरमान और लाइनमैनों का शोषण
\r\n\r\nदूसरा सबसे बड़ा मुद्दा वह आदेश है, जिसने लाइनमैनों के बीच सबसे ज्यादा आक्रोश पैदा किया है। 18 मार्च 2026 को अधीक्षण अभियंता (मेरठ शहर) ने पत्रांक 8618 जारी कर एक नया फरमान सुना दिया। इस पत्र में बाकायदा लाइनमैनों के नाम लिखकर उन्हें 'असेसड बिलिंग' (Assessed Billing - अनुमानित बिलिंग या मीटर रीडिंग के आधार पर बिलिंग) का कार्य करने का आदेश दिया गया है।
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अनुबंध का खुला उल्लंघन
\r\n\r\nआउटसोर्स कर्मचारियों का साफ कहना है कि उनका अनुबंध (Agreement) केवल बिजली की लाइनों और उपकेंद्रों के 'अनुरक्षण कार्य' (Maintenance & Fault Repair) के लिए हुआ है। उनका काम खंभों पर चढ़कर फॉल्ट ठीक करना, जर्जर तार बदलना और निर्बाध बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करना है। राजस्व वसूली या बिलिंग करना मीटर रीडर या विभागीय क्लर्क का काम है। लाइनमैन से क्लर्क या मीटर रीडर का काम लेना उनके सेवा अनुबंध का सीधा उल्लंघन है।
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संसाधनों का टोटा और जान का जोखिम
\r\n\r\nएक तरफ उपकेंद्रों पर पहले से ही कर्मचारियों की भारी कमी है, जिसके कारण एक लाइनमैन को दिन-रात कई फीडरों का भार संभालना पड़ता है। उस पर से बिलिंग का काम थोपना मानसिक प्रताड़ना है।
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समिति ने इस मुद्दे पर अपनी शर्तें साफ कर दी हैं:
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- \r\n विभागीय सिम कार्ड: यदि विभाग को लाइनमैन से बिलिंग करानी ही है, तो उन्हें तुरंत कॉर्पोरेट/विभागीय सिम कार्ड और स्मार्टफ़ोन दिया जाए। कर्मचारी अपने निजी डेटा और फोन से सरकारी काम नहीं करेंगे।\r\n \r\n
- \r\n पेट्रोल भत्ता (Petrol Allowance): बिलिंग के लिए गांव-गांव और मोहल्ले-मोहल्ले घूमने के लिए लाइनमैन अपनी जेब से पेट्रोल का खर्च क्यों उठाएं? विभाग उन्हें पेट्रोल का पैसा दे।\r\n \r\n
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\r\n\r\n\r\nअल्टीमेटम: "अन्यथा की स्थिति में कोई भी कर्मचारी असेसड बिलिंग नहीं करेगा। अगर किसी कर्मचारी पर इस कार्य के लिए दबाव बनाया जाता है, तो सभी संविदा कर्मचारी कार्य बहिष्कार के लिए विवश होंगे।"\r\n
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विवाद नंबर 3: मैनपावर की भारी कमी—एक लाइनमैन पर कई फीडरों का बोझ
\r\n\r\nविद्युत दुर्घटनाओं (Electrical Accidents) का सबसे बड़ा कारण उपकेंद्रों पर मैनपावर की कमी होती है। जब एक ही लाइनमैन पर तीन-चार फीडरों (Feeders) को संभालने का दबाव होता है, तो थकान और शटडाउन (Shutdown) में मिसकम्युनिकेशन के कारण अक्सर जानलेवा हादसे हो जाते हैं, जिनमें संविदा कर्मचारियों को अपनी जान गंवानी पड़ती है।
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समिति ने मांग की है कि वर्तमान में जो नए अनुबंध किए गए हैं, उनमें प्रत्येक बिजलीघर पर 'फीडर की संख्या के अनुपात में' पर्याप्त कर्मचारियों की नियुक्ति की जाए। ठेकेदार अक्सर पैसा बचाने के लिए 10 लोगों का काम 5 लोगों से करवाते हैं। संगठन ने चेतावनी दी है कि किसी भी सूरत में कर्मचारियों की संख्या घटाई न जाए और उनसे केवल अनुबंध के अनुसार ही काम लिया जाए।
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विवाद नंबर 4: 'फेशियल अटेंडेंस' की शर्त—लॉगिन/लॉगआउट तो होगा, लेकिन 8 घंटे की ड्यूटी पर
\r\n\r\nउत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPPCL) के अध्यक्ष महोदय ने हाल ही में एक आदेश जारी किया है कि सभी आउटसोर्स कर्मचारियों की हाजिरी (Attendance) अब अनिवार्य रूप से 'फेशियल रिकग्निशन सिस्टम' (Facial Attendance) के माध्यम से लॉगिन और लॉगआउट के जरिए लगेगी। इसका उद्देश्य 'फर्जी कर्मचारियों' (Ghost workers) को रोकना है।
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स्वागत के साथ संगठन का बड़ा 'मास्टरस्ट्रोक'
\r\n\r\nसमिति ने फेशियल अटेंडेंस का विरोध नहीं किया है, बल्कि इसे एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हुए विभाग को श्रम कानूनों (Labor Laws) का आईना दिखा दिया है।
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संगठन का तर्क है कि संविदा कर्मचारियों को 'बंधुआ मजदूर' समझा जाता है। उनसे 12-12 या 16-16 घंटे काम लिया जाता है, रात-बिरात फॉल्ट ठीक करने के लिए जगाया जाता है, लेकिन वेतन केवल 8 घंटे का मिलता है।
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समिति की मांगें:
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- \r\n शिफ्ट में ड्यूटी: समस्त बिजलीघरों पर अनुबंध और श्रम नियमों के अनुसार 8-8 घंटे की स्पष्ट शिफ्ट में ड्यूटी लगाई जाए।\r\n \r\n
- \r\n 8 घंटे की लिमिट: किसी भी कर्मचारी से 8 घंटे से अधिक ड्यूटी न ली जाए। चूंकि अब फेशियल अटेंडेंस से 'लॉगआउट' का समय दर्ज होगा, तो अतिरिक्त समय की चोरी नहीं की जा सकेगी।\r\n \r\n
- \r\n ओवरटाइम का भुगतान (Overtime Pay): यदि किसी विशेष परिस्थिति या बड़े ब्रेकडाउन (Breakdown) के कारण विभाग कर्मचारी को 8 घंटे से ज्यादा रोकता है, तो उस अतिरिक्त समय (Overtime) के लिए उन्हें तय मानकों के अनुसार अतिरिक्त मानदेय का नकद भुगतान किया जाए।\r\n \r\n
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सत्ता के गलियारों तक गूंज: शासन और जनप्रतिधियों को भेजा गया पत्र
\r\n\r\nयह मामला अब केवल पीवीवीएनएल के विक्टोरिया पार्क मुख्यालय तक सीमित नहीं रह गया है। निविदा-संविदा कर्मचारी सेवा समिति ने इस लड़ाई को आर-पार का बनाते हुए अपने मांग-पत्र की प्रतियां (Copies) लखनऊ से लेकर दिल्ली तक सत्ता के शीर्ष बैठे लोगों को भेज दी हैं, ताकि बाद में कोई यह न कह सके कि विभाग को हड़ताल की पूर्व सूचना नहीं दी गई थी।
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पत्र की प्रतिलिपि (CC) निम्नलिखित महत्वपूर्ण हस्तियों और अधिकारियों को भेजी गई है:
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- \r\n अध्यक्ष महोदय (Chairman), उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPPCL), शक्ति भवन, लखनऊ।\r\n \r\n
- \r\n माननीय ऊर्जा मंत्री (Energy Minister), उत्तर प्रदेश सरकार।\r\n \r\n
- \r\n श्री अरुण गोविल जी (Hon'ble MP), सांसद, मेरठ-हापुड़ लोकसभा क्षेत्र।\r\n \r\n
- \r\n मुख्य अभियंता (Chief Engineer), मेरठ क्षेत्र (प्रथम व द्वितीय), विक्टोरिया पार्क, मेरठ।\r\n \r\n
- \r\n अधीक्षण अभियंता (Superintending Engineer), विद्युत नगरीय वितरण खंड, मेरठ शहर (स्कीम-7 रंगोली)।\r\n \r\n
- \r\n समस्त जिला अध्यक्ष, निविदा-संविदा कर्मचारी सेवा समिति, पश्चिमी उत्तर प्रदेश।\r\n \r\n
- \r\n समस्त दैनिक समाचार पत्र एवं मीडिया।\r\n \r\n
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खासकर सांसद अरुण गोविल और ऊर्जा मंत्री को इस मामले में लपेटने का मतलब है कि कर्मचारी अब सीधे राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। यदि मेरठ जैसे महत्वपूर्ण वीवीआईपी (VVIP) जिले में बिजली आपूर्ति ठप होती है, तो इसका सीधा असर सरकार की छवि पर पड़ेगा।
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तुलनात्मक विश्लेषण: स्थायी कर्मचारी बनाम संविदा कर्मचारी
\r\n\r\nइस विवाद की जड़ को समझने के लिए हमें यह देखना होगा कि एक ही पोल पर चढ़कर एक जैसा जोखिम उठाने वाले स्थायी और संविदा कर्मचारियों के बीच कितना बड़ा फासला है।
\r\n\r\n| \r\n सुविधा का प्रकार \r\n | \r\n \r\n स्थायी/नियमित लाइनमैन (Regular) \r\n | \r\n \r\n संविदा/आउटसोर्स लाइनमैन (Outsource) \r\n | \r\n
| \r\n वेतन (Salary) \r\n | \r\n \r\n ₹35,000 से ₹60,000+ (सरकारी भत्तों सहित) \r\n | \r\n \r\n मात्र ₹8,000 से ₹12,000 (ठेकेदार की दया पर) \r\n | \r\n
| \r\n नौकरी की सुरक्षा \r\n | \r\n \r\n पूर्ण रूप से सुरक्षित (सरकारी नौकरी) \r\n | \r\n \r\n कोई सुरक्षा नहीं, ठेकेदार जब चाहे निकाल दे \r\n | \r\n
| \r\n ईपीएफ/पेंशन \r\n | \r\n \r\n जीपीएफ/एनपीएस की सुविधा \r\n | \r\n \r\n ईपीएफ कटता है, लेकिन जमा होने की गारंटी नहीं \r\n | \r\n
| \r\n दुर्घटना बीमा/कवर \r\n | \r\n \r\n लाखों का सरकारी मुआवजा और अनुकंपा नौकरी \r\n | \r\n \r\n ठेकेदार द्वारा नाममात्र का मुआवजा (अक्सर कानूनी लड़ाई) \r\n | \r\n
| \r\n कार्य के घंटे \r\n | \r\n \r\n तय समय और अतिरिक्त भत्ते \r\n | \r\n \r\n 24x7 ड्यूटी, कोई अतिरिक्त मानदेय (Overtime) नहीं \r\n | \r\n
यह तालिका स्पष्ट करती है कि विभाग पूरी तरह से इन 'सस्ते मजदूरों' के भरोसे चल रहा है। ऐसे में 'असेसड बिलिंग' जैसा अतिरिक्त काम थोपना उनके घावों पर नमक छिड़कने जैसा है।
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जनता पर क्या होगा असर? (Public Impact Analysis)
\r\n\r\nबिजली विभाग के संविदा कर्मचारी अगर हड़ताल पर जाते हैं, तो इसका सीधा और सबसे भयानक असर आम जनता, किसानों और उद्योगों पर पड़ेगा।
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- \r\n शहरी जीवन अस्त-व्यस्त: मेरठ शहर एक बड़ा औद्योगिक और शैक्षणिक हब है। गर्मियों में एसी, कूलर और पंखों के कारण लोड बढ़ जाता है। ऐसे में ट्रांसफार्मर फुंकने या जंपर कटने की घटनाएं आम होती हैं। लाइनमैन के हड़ताल पर होने से ये छोटे फॉल्ट भी घंटों तक ठीक नहीं होंगे, जिससे भयंकर 'ब्लैकआउट' की स्थिति पैदा हो सकती है।\r\n \r\n
- \r\n जल संकट (Water Crisis): बिजली कटने का सीधा असर पानी की सप्लाई पर पड़ता है। नगर निगम के ट्यूबवेल ठप हो जाएंगे, जिससे हाहाकार मच सकता है।\r\n \r\n
- \r\n किसानों को नुकसान: देहात क्षेत्रों (जैसे मवाना और सरधना) में नलकूप (Tube-wells) चलने बंद हो जाएंगे, जिससे रबी/जायद की फसलों की सिंचाई बुरी तरह प्रभावित होगी।\r\n \r\n
- \r\n इंडस्ट्रीज पर मार: परतापुर, मवाना रोड और स्पोर्टिंग गुड्स इंडस्ट्री (खेल का सामान बनाने वाले उद्योग) को बिना बिजली के करोड़ों का नुकसान झेलना पड़ सकता है।\r\n \r\n
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ठेका प्रथा का मकड़जाल और श्रम कानूनों की धज्जियां
\r\n\r\nउत्तर प्रदेश में पिछले डेढ़ दशक में ऊर्जा विभाग में नई भर्तियों पर अघोषित रोक लगाकर पूरे सिस्टम को आउटसोर्सिंग के हवाले कर दिया गया है। ठेकेदार कंपनियां (Agencies) टेंडर तो ले लेती हैं, लेकिन वे श्रम कानूनों (Labor Code) की खुलेआम धज्जियां उड़ाती हैं।
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- \r\n Minimum Wages Act: कई एजेंसियों द्वारा न्यूनतम वेतन कानून का पालन नहीं किया जाता है। कर्मचारियों को 'टेक होम सैलरी' बहुत कम मिलती है।\r\n \r\n
- \r\n Contract Labour (Regulation and Abolition) Act, 1970: इस कानून के तहत ठेकेदार को कर्मचारियों के स्वास्थ्य और सुरक्षा की जिम्मेदारी लेनी होती है, लेकिन सेफ्टी किट, ग्लव्स, और हेलमेट के नाम पर कर्मचारियों को केवल खानापूर्ति दी जाती है।\r\n \r\n
- \r\n ईपीएफओ (EPFO) के नियमों के अनुसार पीएफ जमा न करना एक दंडनीय अपराध है, लेकिन मवाना-सरधना में पी.आर. और मबेरिक पावर सॉल्यूशन जैसी कंपनियों पर आरोप लगने के बाद भी कार्रवाई न होना, 'सिस्टम' की नाकामी को दर्शाता है।\r\n \r\n
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आगे की राह: क्या एमडी निकालेंगे कोई बीच का रास्ता?
\r\n\r\nअब पूरी स्थिति पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड के एमडी और ऊर्जा मंत्री के विवेक पर निर्भर करती है। 'निविदा-संविदा कर्मचारी सेवा समिति' के राष्ट्रीय अध्यक्ष भूपेन्द्र सिंह और उनके पदाधिकारियों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अब झूठे आश्वासनों से मानने वाले नहीं हैं।
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संभावित परिदृश्य (Future Scenarios):
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- \r\n वार्ता और समाधान: पीवीवीएनएल प्रबंधन तत्काल प्रभाव से समिति के पदाधिकारियों को बातचीत के लिए बुलाए। असेसड बिलिंग के आदेश को वापस ले या उसके लिए अलग से बजट/पेट्रोल भत्ते का प्रावधान करे। साथ ही, दागी कंपनी के टेंडर की उच्च स्तरीय जांच के आदेश दे।\r\n \r\n
- \r\n दमनकारी नीति: यदि प्रबंधन एस्मा (ESMA) या पुलिस बल का प्रयोग कर कर्मचारियों की आवाज दबाने की कोशिश करता है, तो यह आंदोलन पूरे प्रदेश (UPPCL) में फैल सकता है।\r\n \r\n
- \r\n न्यायिक हस्तक्षेप: यदि मामला नहीं सुलझता है, तो ईपीएफ घोटाले और 8 घंटे की ड्यूटी को लेकर कर्मचारी लेबर कोर्ट या हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।\r\n \r\n
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मेरठ के विक्टोरिया पार्क से उठी यह चिंगारी केवल एक जिले का मुद्दा नहीं है; यह पूरे उत्तर प्रदेश के लाखों आउटसोर्स बिजली कर्मचारियों की पीड़ा का प्रतीक है। जब एक कर्मचारी अपनी जान हथेली पर रखकर 11,000 वोल्ट की लाइन पर काम करता है, तो उसे कम से कम उचित वेतन, सम्मान और सुरक्षा का अधिकार तो मिलना ही चाहिए। सरकार को चाहिए कि वह ठेकेदारों के एकाधिकार को तोड़कर इन कर्मचारियों के लिए एक पारदर्शी 'समान काम-समान वेतन' (Equal Pay for Equal Work) या स्थायीकरण की स्पष्ट नीति बनाए।
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(समिति ने पत्र के अंत में एक बहुत ही महत्वपूर्ण और सकारात्मक सामाजिक संदेश भी दिया है: "राष्ट्रहित में बिजली बचायें, समय से विद्युत बिल भुगतान करें।" यह दर्शाता है कि कर्मचारी विभाग के हितैषी हैं, बशर्ते विभाग भी उनके हितों की रक्षा करे।)
Sabse pehle comment karne wale banein.