मेरठ शहर इन दिनों नगर निगम के गृहकर (House Tax) बिलों को लेकर एक बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक विवाद के केंद्र में है। जीआईएस (GIS) सर्वे के आधार पर जारी किए गए बिलों ने शहर के 3.50 लाख भवन स्वामियों की रातों की नींद उड़ा दी है। विडंबना यह है कि नगर निगम उन सुविधाओं का भी टैक्स वसूल रहा है जो जनता तक पहुंची ही नहीं हैं। इस मुद्दे ने अब नगर निगम प्रशासन और पार्षदों के बीच एक सीधी जंग का रूप ले लिया है।READ ALSO:-मेरठ: 'सच्ची मोहब्बत' का दर्दनाक अंत या नशे का शिकंजा? इंस्टाग्राम पर 'RIP' लिखकर युवक ने लगाया मौत को गले, पुलिस और परिजनों के दावों में उलझी गुत्थी
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जीआईएस सर्वे की पोल खुली: 1 लाख भवन कागजों पर गायब

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नगर निगम ने शहर के भवनों का आकलन करने के लिए अत्याधुनिक जीआईएस सर्वे कराया था। मुख्य कर निर्धारण अधिकारी एसके गौतम के अनुसार, सर्वे में कुल 4.49 लाख भवन चिह्नित किए गए थे। लेकिन जब भौतिक सत्यापन (Physical Verification) शुरू हुआ, तो पता चला कि करीब 1 लाख भवन असल में मौजूद ही नहीं हैं।
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इसके बावजूद, जिन 3.50 लाख लोगों को बिल भेजे गए हैं, उनमें से अधिकांश में भारी त्रुटियां हैं। कई लोगों का टैक्स 500 रुपये से बढ़कर सीधे 5000 रुपये तक पहुंच गया है। बिना किसी पूर्व सूचना या माप-जोख के भेजे गए इन भारी-भरकम बिलों ने जनता में आक्रोश भर दिया है।
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पार्षदों का गंभीर आरोप: "पैसे दो और टैक्स कम कराओ"

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नगर निगम के गलियारों में इन दिनों एक नया 'खेल' चर्चा में है। भाजपा पार्षद अनुज वशिष्ठ और दीपक वर्मा ने निगम प्रशासन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि निगम के कुछ कर्मचारी और बिचौलिए (Middlemen) सक्रिय हैं, जो भवन स्वामियों से 'सुविधा शुल्क' (रिश्वत) लेकर उनका टैक्स कम करने का वादा कर रहे हैं।
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पार्षदों का दावा है कि जो लोग ईमानदारी से टैक्स भरने आ रहे हैं, उन्हें घंटों लाइनों में खड़ा किया जाता है, जबकि 'सुविधा शुल्क' देने वालों के बिलों में रातों-रात संशोधन हो जाता है। पार्षदों ने चेतावनी दी है कि यदि यह मनमानी और वसूली बंद नहीं हुई, तो वे सड़कों पर उतरकर निगम मुख्यालय का घेराव करेंगे।
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सुविधाओं के नाम पर 'लूट': सीवर नहीं पर सीवर टैक्स जारी

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मेरठ के कई वार्ड ऐसे हैं जहाँ आज तक न तो सीवर लाइन बिछी है और न ही नगर निगम की जलापूर्ति पाइपलाइन पहुँची है। लोग निजी सबमर्सिबल पंपों पर निर्भर हैं। बावजूद इसके, जारी किए गए बिलों में सीवर टैक्स और जलकर (Water Tax) जोड़कर भेजा गया है।
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पार्षद पंकज गोयल का कहना है कि यह जनता के साथ सरासर धोखाधड़ी है। यदि नगर निगम ईमानदारी से और पारदर्शी तरीके से टैक्स का निस्तारण करे, तो निगम की आय 60 करोड़ से बढ़कर 200 करोड़ रुपये हो सकती है। लेकिन फिलहाल, अधिकारी केवल कागजी खानापूर्ति और वसूली में व्यस्त हैं।
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प्रशिक्षण की कमी और महापौर की नाराजगी

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बढ़ते विवाद को देखते हुए महापौर हरिकांत अहलूवालिया ने निगम अधिकारियों के प्रति सख्त नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने शास्त्रीनगर, कंकरखेड़ा और मुख्यालय में विशेष कैंप लगाने के निर्देश दिए हैं। हालांकि, इन कैंपों की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है।
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नगर निगम ने आपत्तियों के समाधान के लिए 100 अस्थायी कर्मचारियों को तैनात किया है, लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि इन कर्मचारियों को गृहकर की नियमावली का कोई प्रशिक्षण नहीं दिया गया है। जब भवन स्वामी अपनी आपत्ति लेकर पहुँचते हैं, तो कर्मचारी उन्हें कोई ठोस समाधान देने के बजाय अगले पटल पर भेज देते हैं।
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प्रशासन का पक्ष: लापरवाही पर होगी कार्रवाई

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बढ़ते दबाव के बीच अपर नगर आयुक्त लवी त्रिपाठी ने मामले को शांत करने की कोशिश की है। उन्होंने कहा कि गृहकर की विसंगतियों को दूर करने की जिम्मेदारी मुख्य कर निर्धारण अधिकारी को सौंपी गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि:
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    भवन स्वामियों की आपत्तियों का त्वरित समाधान किया जाएगा।
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    सर्वे की त्रुटियों को दूर करने के लिए विशेष टीमें बनाई गई हैं।
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    जो कर्मचारी भ्रष्टाचार या लापरवाही में लिप्त पाए जाएंगे, उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई होगी।
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समाधान की उम्मीद या अंतहीन इंतजार?

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मेरठ नगर निगम के गृहकर का यह विवाद केवल वित्तीय मामला नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक पारदर्शिता पर भी सवालिया निशान है। जनता चाहती है कि उनसे केवल उसी सुविधा का पैसा लिया जाए जो उन्हें मिल रही है। फिलहाल, निगम के कैंपों और मुख्यालय पर जुटी भीड़ इस बात का प्रमाण है कि जीआईएस सर्वे एक बड़ी विफलता साबित हुआ है।
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