मेरठ (स्पेशल डेस्क):
\r\n\r\n
किसी भी शहर का विकास उसकी सड़कों, उसकी कनेक्टिविटी और उसके यातायात प्रबंधन की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रमुख शहर और 'क्रांतिधरा' के नाम से मशहूर मेरठ, पिछले कुछ वर्षों में इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में तेजी से आगे बढ़ा है। रैपिड रेल हो, एक्सप्रेस-वे हो या फिर इनर रिंग रोड, शहर की सूरत बदल रही है। लेकिन, जब बात शहर के अंदरूनी हिस्सों और पुरानी समस्याओं के समाधान की आती है, तो प्रशासनिक लापरवाही और 'प्लानिंग के अभाव' की पुरानी तस्वीर उभरकर सामने आ जाती है।READ ALSO:-मेरठ स्कूल अपडेट: कड़ाके की ठंड पर प्रशासन का बड़ा फैसला, 9वीं तक बढ़ाई गई छुट्टियां, बोर्ड छात्रों के लिए बदला गया समय
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
ताजा मामला शहर के दो बेहद व्यस्त मार्गों—बागपत रोड और रेलवे रोड—को जोड़ने वाले नवनिर्मित 'लिंक रोड' का है। जिस सड़क की कल्पना इसलिए की गई थी कि वह जनता को जाम से मुक्ति दिलाएगी, उनका समय बचाएगी और ईंधन की खपत कम करेगी, आज वही सड़क आधिकारिक उद्घाटन से पहले ही 'जाम का नया केंद्र' बन गई है। यह रिपोर्ट न केवल एक सड़क की बदहाली की कहानी है, बल्कि यह उस सिस्टम की पोल खोलती है जहां करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी आम आदमी को सिवाय धूल, धक्के और जाम के कुछ नहीं मिलता।
\r\n\r\n

 

विज्ञापन
विज्ञापन
\r\n\r\n

लिंक रोड - उम्मीद बनाम हकीकत:-

\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

दशकों पुरानी मांग और चंद सेकेंड का सपना

\r\n\r\n
मेरठ के लोग जानते हैं कि बागपत रोड और रेलवे रोड शहर की दो प्रमुख धमनियां हैं। इन दोनों सड़कों के बीच सीधा संपर्क न होने के कारण दशकों से लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा था।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
यदि किसी को बागपत रोड से रेलवे रोड जाना होता था, तो उनके पास केवल दो ही विकल्प थे:
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  1. \r\n
    नेशनल हाईवे-58 का लंबा चक्कर: वाहन चालकों को शहर के बाहर निकलकर नेशनल हाईवे का रुख करना पड़ता था, जो न केवल समय बर्बाद करता था बल्कि दूरी भी बढ़ा देता था।
    \r\n
  2. \r\n
  3. \r\n
    शहर का भीतरी जाल: दूसरा विकल्प फुटबॉल तिराहे से होकर रेलवे रोड चौराहे की तरफ जाना था। यह रास्ता संकरा होने के साथ-साथ हमेशा जाम से भरा रहता है।
    \r\n
  4. \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
स्थानीय निवासियों, व्यापारियों और नौकरीपेशा लोगों की सालों से यह मांग थी कि इन दोनों सड़कों को जोड़ने के लिए एक 'लिंक रोड' बनाया जाए। प्रशासन ने सुध ली, फाइलें चलीं, बजट पास हुआ और काम शुरू हुआ। दावा किया गया कि जो दूरी तय करने में 20 से 30 मिनट लगते थे, इस लिंक रोड के बन जाने के बाद वह महज 'चंद सेकेंड' या एक-दो मिनट में तय हो जाएगी। यह सपना सुहावना था, लेकिन धरातल पर उतरते ही यह सपना प्रशासनिक बदनियती की भेंट चढ़ गया।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

आधिकारिक रूप से 'बंद', लेकिन व्यवहारिक रूप से 'चोक'

\r\n\r\n
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आधिकारिक तौर पर अभी तक इस लिंक रोड को आम जनता के लिए खोला नहीं गया है। न फीता कटा है, न कोई उद्घाटन समारोह हुआ है। लेकिन, जनता की मजबूरी और प्रशासन की अनदेखी के चलते यह रोड चालू हो चुकी है। हर रोज हजारों दोपहिया और चार पहिया वाहन यहां से गुजर रहे हैं।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
परिणाम? एक ऐसा जाम, जो खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। वाहनों का दबाव इतना बढ़ गया है कि कच्ची-पक्की सड़क और अधूरे निर्माण के बीच गाड़ियां रेंगने को मजबूर हैं। यह स्थिति तब है जब सड़क पूरी तरह चालू नहीं है; सोचिए जब इसे आधिकारिक रूप से खोल दिया जाएगा, तब बिना ट्रैफिक प्लान के यहां क्या मंजर होगा?
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

प्लानिंग का अभाव - MEDA और ट्रैफिक पुलिस की नाकामी

\r\n\r\n
इस पूरी अव्यवस्था की जड़ में अगर कोई एक शब्द है, तो वह है—'बैड प्लानिंग' (Bad Planning)। मेरठ विकास प्राधिकरण (MEDA) और शहर का ट्रैफिक डिपार्टमेंट, दोनों ही इस मोर्चे पर पूरी तरह विफल साबित हुए हैं।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

1. प्रवेश और निकास द्वार की तकनीकी खामी

\r\n\r\n
इंजीनियरिंग का एक सामान्य नियम है कि किसी भी लिंक रोड के जंक्शन (Junction) को बनाते समय वहां के ट्रैफिक फ्लो और टर्निंग रेडियस (Turning Radius) का ध्यान रखा जाए। लेकिन यहां ऐसा लगता है कि नक्शा बनाते समय जमीनी हकीकत को नजरअंदाज कर दिया गया।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
लिंक रोड के बागपत रोड वाले हिस्से पर जो प्रवेश और निकासी द्वार बनाया गया है, उसके ठीक सामने सड़क का 'डिवाइडर' (Divider) आ रहा है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  • \r\n
    समस्या क्या है? डिवाइडर ठीक सामने होने के कारण, लिंक रोड से बाहर निकलने वाले वाहनों को सही दिशा में मुड़ने के लिए पर्याप्त जगह (Cut) नहीं मिलती।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    परिणाम: वाहन चालक शॉर्टकट अपनाने के चक्कर में गलत दिशा (Wrong Side) से ड्राइविंग करते हैं या डिवाइडर के बीच से जबरन गाड़ियां निकालते हैं। इससे बागपत रोड के मुख्य यातायात पर ब्रेक लगता है और देखते ही देखते लंबी कतारें लग जाती हैं।
    \r\n
  • \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

ट्रैफिक प्लान का न होना (Zero Traffic Management Plan)

\r\n\r\n
किसी भी नए रूट को शुरू करने से पहले एक 'ट्रैफिक सर्कुलेशन प्लान' तैयार किया जाता है। इसमें यह तय होता है कि:
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  • \r\n
    कौन सा हिस्सा वन-वे (One-way) होगा?
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    भारी वाहनों का प्रवेश कब होगा?
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    सिग्नल कहां लगेंगे?
    \r\n\r\n
    समन्वय की कमी
    \r\n
  • \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
ऐसा प्रतीत होता है कि MEDA (जो सड़क बना रहा है) और ट्रैफिक पुलिस (जिसे यातायात संभालना है) के बीच कोई संवाद नहीं है। ट्रैफिक पुलिस का कहना है कि सड़क अभी हैंडओवर नहीं हुई है, जबकि जनता पिस रही है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

निर्माण कार्य - दो माह से 'तारीख पर तारीख'

\r\n\r\n
अक्टूबर का महीना था जब मेरठ विकास प्राधिकरण ने इस प्रोजेक्ट के लिए कमर कसी थी। लिंक रोड के रास्ते में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए दो महत्वपूर्ण संपत्तियां खरीदी गईं:
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  1. \r\n
    एक निजी मकान: जो सड़क के एलाइनमेंट के बीच में आ रहा था।
    \r\n
  2. \r\n
  3. \r\n
    हॉस्पिटल का एक हिस्सा: जिसे तोड़कर सड़क चौड़ी की जानी थी।
    \r\n
  4. \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
अक्टूबर में खरीद प्रक्रिया पूरी हो गई। उम्मीद जगी कि अब काम बुलेट ट्रेन की रफ्तार से होगा। लेकिन हुआ इसके विपरीत।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

सैन्य क्षेत्र की दीवार और सुस्त रफ्तार

\r\n\r\n
संपत्ति खरीदने के बाद, पहले सैन्य क्षेत्र (Cantt Area) से जुड़ी दीवार के निर्माण का पेंच फंसा रहा। चूंकि मेरठ का एक बड़ा हिस्सा छावनी क्षेत्र है, इसलिए सेना की जमीन या दीवार से जुड़े निर्माण कार्यों में विशेष अनुमति और मापदंडों की आवश्यकता होती है। इस प्रक्रिया में लंबा समय लगा।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
उसके बाद, हॉस्पिटल वाली जगह पर सड़क निर्माण के नाम पर मलबा पड़ा रहा। आज स्थिति यह है कि दो महीने बीत जाने के बाद भी काम 'अटका' हुआ है। मशीनें कभी चलती हैं, कभी बंद रहती हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि ठेकेदार और अधिकारी जानबूझकर लेटलतीफी कर रहे हैं, जिसका खामियाजा जनता भुगत रही है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

हादसों का आमंत्रण और सुरक्षा राम भरोसे

\r\n\r\n
सड़क का मतलब केवल डामर बिछाना नहीं होता, बल्कि एक सुरक्षित यात्रा का वातावरण देना भी होता है। लेकिन रेलवे रोड-बागपत रोड लिंक रोड फिलहाल 'हादसों का हॉटस्पॉट' बनता जा रहा है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

1. रोज होती हैं भिड़ंत और झगड़े

\r\n\r\n
चूंकि डिवाइडर कट गलत जगह पर है और ट्रैफिक पुलिस नदारद है, इसलिए वाहनों की आमने-सामने की भिड़ंत (Head-on collisions) का खतरा बना रहता है। स्थानीय दुकानदारों के अनुसार, दिन में कई बार वाहन चालकों के बीच तू-तू मैं-मैं होती है। कई बार नौबत मारपीट तक आ जाती है। यह अराजकता का माहौल वहां रहने वाले लोगों के लिए मानसिक तनाव का कारण बन गया है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

2. नाम मात्र की पुलिस व्यवस्था

\r\n\r\n
इतने महत्वपूर्ण रूट पर, जहां दो मुख्य मार्ग मिल रहे हैं, वहां व्यवस्था के नाम पर क्या है? — सिर्फ एक ट्रैफिक होमगार्ड।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
यह हास्यास्पद है कि हजारों वाहनों के दबाव को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन ने केवल एक होमगार्ड की ड्यूटी लगाई है। वह होमगार्ड भी अक्सर बेबस नजर आता है, क्योंकि न तो लोग उसकी सुनते हैं और न ही उसके पास चालान करने या कार्रवाई करने का कोई ठोस अधिकार होता है। यहां कम से कम एक सब-इंस्पेक्टर और चार सिपाहियों की स्थायी पिकेट होनी चाहिए थी।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

3. अंधेरे का साम्राज्य

\r\n\r\n
शाम ढलते ही यह लिंक रोड 'भूतहा रास्ते' में तब्दील हो जाता है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  • \r\n
    स्ट्रीट लाइट्स नदारद: अभी तक इस रूट पर प्रकाश व्यवस्था (Street Lights) का कोई इंतजाम नहीं किया गया है।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    सुरक्षा का खतरा: अंधेरा होने के कारण लूटपाट, छीनैती और महिलाओं के साथ छेड़छाड़ जैसी घटनाओं की आशंका बनी रहती है।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    प्लान का अभाव: नियमानुसार सड़क निर्माण के साथ ही इलेक्ट्रिक पोल्स और वायरिंग का काम होना चाहिए था। लेकिन MEDA के पास अभी तक इसका कोई स्वीकृत प्लान सामने नहीं आया है। जब अधिकारियों से पूछा जाता है कि लाइट कब लगेगी, तो वे गोलमोल जवाब देकर पल्ला झाड़ लेते हैं।
    \r\n
  • \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

'क्रांति पथ' - इतिहास को संजोने का सपना भी धूल में

\r\n\r\n
इस लिंक रोड का महत्व केवल यातायात तक सीमित नहीं था। इसे मेरठ की पहचान और गौरव के साथ जोड़ा गया था। इस पूरे रूट को 'क्रांति पथ' का नाम दिया गया था। यह नाम अपने आप में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की गूंज समेटे हुए है, जिसकी शुरुआत मेरठ की धरा से हुई थी।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

राज्यसभा सांसद डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी की परिकल्पना

\r\n\r\n
यह प्रोजेक्ट राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ नेता डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी की निगरानी में शुरू हुआ था। उनकी मंशा थी कि यह सड़क केवल आवागमन का साधन न बने, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक 'ओपन एयर म्यूजियम' (Open Air Museum) की तरह काम करे।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

दीवार नहीं, यह 'इतिहास का कैनवास' थी

\r\n\r\n
योजना के अनुसार, लिंक रोड के एक तरफ मौजूद लंबी सैन्य दीवार को एक कैनवास के रूप में इस्तेमाल किया जाना था। इस पर 'क्रांति गाथा' उकेरी जानी थी।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  • \r\n
    पेंटिंग और म्यूरल्स: दीवार पर ऐसी पेंटिंग्स बनाई जानी थीं जो 10 मई 1857 की क्रांति को दर्शातीं।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    वीरों का सम्मान: मेरठ के स्थानीय स्वतंत्रता सेनानी, कोतवाल धनसिंह गुर्जर से लेकर मंगल पांडे और अन्य गुमनाम नायकों के चित्रों और उनकी कहानियों को यहां स्थान मिलना था।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    आजादी का संघर्ष: देश की आजादी में मेरठ की भूमिका को शब्दों और चित्रों के माध्यम से बताया जाना था, ताकि यहां से गुजरने वाला हर व्यक्ति अपने इतिहास पर गर्व कर सके।
    \r\n
  • \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

विभाग के पास 'नो अपडेट'

\r\n\r\n
दुर्भाग्यवश, जैसे सड़क का काम अटका है, वैसे ही इतिहास को संजोने का यह काम भी फाइलों में दफन है। न तो दीवार पर प्लास्टर हुआ है, न ही कलाकारों का चयन। विभाग के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि 'क्रांति गाथा' कब लिखी जाएगी। क्या यह केवल एक चुनावी घोषणा थी, या अधिकारी जनप्रतिनिधियों के सपनों को पलीता लगाने पर तुले हैं? यह एक बड़ा सवाल है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

अब आगे क्या? (What Needs to Be Done)

\r\n\r\n
मेरठ की जनता अब और इंतजार के मूड में नहीं है। समस्या विकराल हो चुकी है और इसके तत्काल समाधान की आवश्यकता है। शहरी नियोजन विशेषज्ञों और स्थानीय बुद्धिजीवियों के अनुसार, निम्नलिखित कदम तुरंत उठाए जाने चाहिए:
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  1. \r\n
    तत्काल ट्रैफिक मार्शल की तैनाती: जब तक स्थायी पुलिस चौकी नहीं बनती, पीक आवर्स (सुबह और शाम) में कम से कम 4-5 ट्रैफिक मार्शलों की तैनाती की जाए जो मैनुअली ट्रैफिक को रेगुलेट करें।
    \r\n
  2. \r\n
  3. \r\n
    अस्थायी डिवाइडर प्रबंधन: बागपत रोड के जंक्शन पर अस्थायी बैरिकेडिंग करके 'लेफ्ट टर्न' और 'राइट टर्न' को चैनल किया जाए ताकि वाहन आपस में न टकराएं।
    \r\n
  4. \r\n
  5. \r\n
    सोलर लाइट्स का विकल्प: जब तक बिजली के खंभे नहीं लगते, अस्थायी रूप से सोलर लाइट्स या हैलोजन लाइट्स लगाकर रोशनी की व्यवस्था की जाए।
    \r\n
  6. \r\n
  7. \r\n
    डेडलाइन तय हो: MEDA के उपाध्यक्ष और जिलाधिकारी को संयुक्त रूप से निरीक्षण कर निर्माण कार्य पूरा करने की एक सख्त 'डेडलाइन' (Deadline) निर्धारित करनी चाहिए।
    \r\n
  8. \r\n
  9. \r\n
    जनता से संवाद: ट्रैफिक डायवर्जन का प्लान बनाकर उसे अखबारों और सोशल मीडिया के माध्यम से जनता तक पहुंचाया जाए।
    \r\n
  10. \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

विकास या विनाश का कारण?

\r\n\r\n
मेरठ का यह लिंक रोड इस बात का जीता-जागता सबूत है कि अच्छी नियत से शुरू की गई योजना भी अगर खराब क्रियान्वयन (Execution) का शिकार हो जाए, तो वह जनता के लिए वरदान के बजाय अभिशाप बन जाती है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
जहां एक ओर सरकार स्मार्ट सिटी की बात करती है, वहीं दूसरी ओर बुनियादी ट्रैफिक प्लानिंग का अभाव इन दावों की पोल खोलता है। सवाल सिर्फ जाम का नहीं है, सवाल उस कीमती वक्त का है जो इस जाम में बर्बाद हो रहा है, उस ईंधन का है जो धुएं में उड़ रहा है, और उस सुरक्षा का है जो अंधेरे में कहीं खो गई है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
अब देखना यह है कि क्या कुंभकर्णी नींद में सोया प्रशासन जागता है, या फिर मेरठ की जनता को अभी और कितने दिन इस 'जाम पथ' पर रेंगना पड़ेगा। 'क्रांति पथ' का नाम सार्थक तब होगा जब यहां से गुजरने वाले को क्रांति का गर्व महसूस हो, न कि जाम की घुटन।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

प्रमुख बिंदु एक नजर में (Key Highlights)

\r\n\r\n\r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n
\r\n
समस्या क्षेत्र
\r\n
\r\n
वर्तमान स्थिति
\r\n
\r\n
प्रभाव
\r\n
\r\n
ट्रैफिक प्लानिंग
\r\n
\r\n
शून्य (Zero)
\r\n
\r\n
भीषण जाम, वाहन रेंगने को मजबूर
\r\n
\r\n
सुरक्षा
\r\n
\r\n
कोई स्ट्रीट लाइट नहीं
\r\n
\r\n
रात में दुर्घटना और अपराध का भय
\r\n
\r\n
प्रवेश द्वार
\r\n
\r\n
गलत डिवाइडर प्लेसमेंट
\r\n
\r\n
गलत दिशा से ड्राइविंग, झगड़े
\r\n
\r\n
पुलिस बल
\r\n
\r\n
केवल 1 होमगार्ड
\r\n
\r\n
व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त
\r\n
\r\n
निर्माण कार्य
\r\n
\r\n
2 महीने से धीमा
\r\n
\r\n
धूल, गड्ढे और मलबा
\r\n
\r\n
क्रांति पथ प्रोजेक्ट
\r\n
\r\n
कोई अपडेट नहीं
\r\n
\r\n
इतिहास संजोने का काम ठप
\r\n
विज्ञापन
विज्ञापन