पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जिसे अक्सर अपराध की खबरों के लिए सुर्खियों में देखा जाता है, ने पिछले कुछ दिनों में एक दिल दहला देने वाली वारदात देखी। सरधना थाना क्षेत्र के कपसाड़ गांव की घटना ने न केवल एक परिवार को उजाड़ा, बल्कि पूरे प्रशासनिक अमले की नींद हराम कर दी। सुनीता की निर्मम हत्या और रूबी के अपहरण की गुत्थी पुलिस के लिए साख का सवाल बन गई थी। लेकिन कहते हैं न कि कानून के हाथ लंबे होते हैं। इस कहावत को मेरठ पुलिस ने महज 60 घंटों में सच कर दिखाया।READ ALSO:-Meerut Kapsad Murder Case: पारस सोम 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेजा गया; कोर्ट में बोला- 'मैं बेकसूर हूं', रूबी का बयान सीलबंद
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रविवार का दिन मेरठ के इतिहास में दर्ज हो गया। छुट्टी का दिन होने के बावजूद कचहरी परिसर किसी युद्ध के मैदान जैसा लग रहा था। भारी बूटों की धमक, सायरन की गूंज और पुलिस की गाड़ियों का काफिला—सब कुछ यह बताने के लिए काफी था कि पुलिस ने एक बड़ी मछली को जाल में फंसा लिया है। यह रिपोर्ट उस 60 घंटे के 'ऑपरेशन हंट' की है, जिसने अपराधियों के मन में खौफ और जनता के मन में कानून के प्रति विश्वास को दोबारा जगाया है।
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आइये, सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं कि आखिर 85 घंटे के अल्टीमेटम के बीच पुलिस ने कैसे रचा यह चक्रव्यूह और कोर्ट रूम के अंदर उस 30 मिनट में क्या हुआ।
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रविवार का दिन और कचहरी का 'संडे सस्पेंस'

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आमतौर पर रविवार का दिन वकीलों और जजों के लिए आराम का दिन होता है। अदालतें बंद रहती हैं, पक्षियों की चहचहाहट के अलावा कचहरी परिसर में सन्नाटा पसरा रहता है। लेकिन 12 जनवरी 2026 (काल्पनिक सन्दर्भ तिथि) का रविवार सामान्य नहीं था।
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किले में तब्दील हुआ परिसर

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सुबह के करीब 11 बजे से ही मेरठ कचहरी के आसपास हलचल तेज हो गई थी।
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    अभूतपूर्व सुरक्षा: कचहरी के गेट नंबर 1 से लेकर हवालात तक, हर जगह खाकी वर्दी का पहरा था। सीओ सरधना आशुतोष कुमार और सीओ सिविल लाइन अभिषेक तिवारी ने खुद कमान संभाल रखी थी। उनकी मौजूदगी यह बताने के लिए काफी थी कि पुलिस कोई भी रिस्क नहीं लेना चाहती।
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    माहौल में तनाव: वहां से गुजर रहे आम नागरिक और इक्का-दुक्का वकील भी यह देखकर हैरान थे। सवाल हवा में तैर रहे थे—"क्या कोई बड़ा आतंकी पकड़ा गया है?" या "क्या किसी गैंगवार की आशंका है?" लेकिन हकीकत यह थी कि यह तैयारी उस 'पारस सोम' के लिए थी, जिसने पिछले तीन दिनों से पूरे मेरठ जोन की पुलिस को नचा रखा था।
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आरोपी की एंट्री: मफलर, चादर और खौफ

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दोपहर के वक्त पुलिस की बोलेरो गाड़ी कचहरी परिसर में दाखिल हुई। उसके आगे और पीछे वज्र वाहन चल रहे थे। गाड़ी रुकी और उसमें से एक शख्स को नीचे उतारा गया।
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    हुलिया: अगर आप उसे पहली नजर में देखते, तो पहचानना मुश्किल था कि यह वही पारस सोम है जिसकी तलाश में 12 टीमें लगी थीं। उसने पहचान छिपाने और शायद ठंड से बचने के लिए चेहरे पर मफलर लपेटा हुआ था। शरीर पर एक पुरानी चादर ओढ़ रखी थी। उसकी चाल में वो हेकड़ी गायब थी जो अपराध करते वक्त रही होगी। अब उसकी चाल में डर और हड़बड़ाहट थी।
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वो एक वाक्य जिसने सबका ध्यान खींचा

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जैसे ही पुलिस उसे लेकर कोर्ट रूम की सीढ़ियों की तरफ बढ़ी, मीडिया के कैमरों ने उसे घेर लिया। फ्लैशलाइट्स की चमक ने उसकी आंखों को चौंधिया दिया। पत्रकार सवाल पूछ रहे थे—"पारस, रूबी कहां है?", "तुमने सुनीता को क्यों मारा?", "तुम्हारे साथ और कौन था?"
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पहले तो वह खामोश रहा, सिर झुकाए चलता रहा। लेकिन जैसे ही उसे लगा कि अब वह न्यायिक हिरासत में जाने वाला है, उसका धैर्य जवाब दे गया। सन्नाटे को चीरते हुए उसने मीडिया और पुलिस के सामने गिड़गिड़ाते हुए कहा:
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"मैंने हत्या नहीं की... मुझे बचा लीजिए।"
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यह एक वाक्य बेहद महत्वपूर्ण है। अपराध मनोविज्ञान (Criminal Psychology) के नजरिए से देखें तो यह बचने का एक पैंतरा भी हो सकता है और अपने किए पर पछतावे का डर भी। लेकिन वहां मौजूद वकीलों और पुलिस अधिकारियों के चेहरे पर कोई भाव नहीं था। उन्हें पता था कि सबूत इस बयान से कहीं ज्यादा भारी हैं।
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अल्टीमेटम की घड़ी - 85 घंटे बनाम 60 घंटे

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इस पूरी कहानी का सबसे रोमांचक पहलू 'समय' (Time) था। घटना के बाद कपसाड़ गांव में मातम और गुस्सा दोनों चरम पर थे। पीड़ित परिवार और गुस्साए ग्रामीणों ने पुलिस प्रशासन के सामने एक लकीर खींच दी थी।
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वो 85 घंटे की चुनौती

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परिजनों ने दो टूक शब्दों में कहा था, "हमें 85 घंटे के भीतर रिजल्ट चाहिए। अगर हमारी बेटी नहीं मिली और कातिल नहीं पकड़ा गया, तो हम वो करेंगे जिसकी गूंज लखनऊ तक जाएगी।" यह अल्टीमेटम मेरठ पुलिस के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था।
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    सामाजिक दबाव: एक महिला की हत्या और दूसरी का अपहरण—यह पुलिस की कार्यशैली पर बड़ा प्रश्नचिह्न था।
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    राजनीतिक सरगर्मी: विपक्षी दल इस मुद्दे को लपकने के लिए तैयार बैठे थे।
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    पुलिस का इकबाल: अगर पुलिस फेल होती, तो अपराधियों के हौसले बुलंद हो जाते।
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पुलिस का जवाब: एक्शन स्पीक्स लाउडर

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डीआईजी कलानिधि नैथानी और एसएसपी विपिन ताडा ने इस चुनौती को स्वीकार किया। उन्होंने अपनी टीमों को स्पष्ट निर्देश दिए—"सोना मना है।" नतीजा सबके सामने है। अल्टीमेटम खत्म होने से 25 घंटे पहले, यानी वारदात के महज 60 घंटे के भीतर पुलिस ने 'मिशन अकंप्लिश्ड' (Mission Accomplished) का संदेश दे दिया। डीआईजी ने प्रेस वार्ता में गर्व के साथ कहा, "अपराधी चाहे कितना भी शातिर हो, कानून की पकड़ से तेज नहीं भाग सकता।"
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'ऑपरेशन हंट' - 12 टीमें, 4 राज्य और तकनीकी जांच

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पारस सोम कोई साधारण अपराधी की तरह एक जगह छिपा नहीं बैठा था। वह लगातार अपनी लोकेशन बदल रहा था। उसे पकड़ने के लिए मेरठ पुलिस ने जो जाल बिछाया, वह किसी थ्रिलर फिल्म की स्क्रिप्ट जैसा है।
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1. 500 सीसीटीवी कैमरों का स्कैन

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पुलिस के पास शुरुआती सुराग बहुत कम थे। ऐसे में 'तीसरी आंख' यानी सीसीटीवी ही सबसे बड़ा सहारा बनी।
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    रूट मैपिंग: पुलिस की आईटी सेल ने कपसाड़ गांव से निकलने वाले हर रास्ते को मैप किया। सरधना, मुजफ्फरनगर, खतौली, हरिद्वार और रुड़की तक के रास्तों पर लगे करीब 500 सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली गई।
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    मैन्युअल मेहनत: यह काम आसान नहीं था। घंटों की फुटेज को फास्ट फॉरवर्ड और स्लो मोशन में देखना, संदिग्ध गाड़ियों के नंबर नोट करना और फिर उन्हें वेरीफाई करना—इसमें दर्जनों पुलिसकर्मी दिन-रात लगे रहे। इसी फुटेज ने पुलिस को बताया कि आरोपी किस दिशा में भागा है।
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2. चार राज्यों में दबिश (Inter-State Raid)

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एसपी सिटी और एसपी देहात के नेतृत्व में 12 विशेष टीमों (SOG और सर्विलांस सहित) का गठन किया गया। इन टीमों ने आरोपी को सांस लेने का मौका नहीं दिया।
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    उत्तर प्रदेश: मेरठ के अलावा मुजफ्फरनगर और शामली के हर संभावित ठिकाने पर रेड मारी गई।
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    उत्तराखंड: सर्विलांस की लीड मिली कि वह पहाड़ों की तरफ भागा है। टीमें तुरंत हरिद्वार और रुड़की के लिए रवाना हुईं।
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    दिल्ली और हरियाणा: आरोपी के कुछ पुराने संपर्कों को खंगालने के लिए पुलिस दिल्ली और हरियाणा भी पहुंची।
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3. रूबी की सकुशल वापसी (The Rescue)

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इस पूरे ऑपरेशन की सबसे बड़ी सफलता आरोपी की गिरफ्तारी से ज्यादा अपहृत रूबी की बरामदगी थी। पुलिस ने उसे उत्तराखंड के रुड़की से सकुशल बरामद (Rescue) किया। अगर पुलिस थोड़ी भी देर करती, तो शायद रूबी के साथ भी कोई अनहोनी हो सकती थी। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, आरोपी उसे कहीं और शिफ्ट करने की फिराक में था, लेकिन उससे पहले ही पुलिस ने उसे दबोच लिया।
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शनिवार की रात से जेल तक का सफर

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गिरफ्तारी के बाद का घटनाक्रम भी कम नाटकीय नहीं था। पुलिस आरोपी को लेकर बेहद सतर्क थी।
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शनिवार रात: पूछताछ का दौर

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गिरफ्तारी के बाद पारस को किसी स्थानीय थाने में रखने के बजाय सीधे पुलिस लाइन स्थित क्राइम ब्रांच के दफ्तर लाया गया।
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    वजह: सुरक्षा और गोपनीयता। पुलिस नहीं चाहती थी कि कोई भीड़ थाने का घेराव करे या आरोपी को मीडिया के सामने पहले ही एक्सपोज किया जाए।
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    पूछताछ: पूरी रात पुलिस अधिकारियों ने उससे कड़ाई से पूछताछ की। सूत्रों का कहना है कि उसने हत्या के पीछे की वजह, फरार होने का प्लान और मददगारों के नामों का खुलासा किया है, जिसे पुलिस चार्जशीट में इस्तेमाल करेगी।
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रविवार सुबह: मेडिकल और कानूनी प्रक्रिया

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रविवार की सुबह उसका जिला अस्पताल में मेडिकल परीक्षण कराया गया। यह सुनिश्चित किया गया कि उसे कोई चोट नहीं है, ताकि मानवाधिकार हनन का कोई आरोप पुलिस पर न लगे।
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शाम 5:15 बजे: जेल की सलाखों के पीछे

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कोर्ट में पेशी और रिमांड की औपचारिकताएं पूरी होने के बाद, शाम करीब सवा पांच बजे उसे चौधरी चरण सिंह जिला कारागार (District Jail) ले जाया गया।
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    मुलाएजा बैरक: वरिष्ठ जेल अधीक्षक डॉ. वीरेश राज शर्मा ने पुष्टि की कि पारस को जेल में दाखिल कर लिया गया है। चूंकि यह मामला हाई-प्रोफाइल है, उसे सामान्य कैदियों के साथ नहीं रखा गया। उसे 'मुलाएजा बैरक' (Quarantine/Observation Barrack) में रखा गया है, जहां नए कैदियों की निगरानी की जाती है और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है।
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प्रशासन का मानवीय चेहरा

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अपराध के बाद पुलिस का काम सिर्फ डंडा चलाना नहीं, बल्कि पीड़ितों के आंसू पोंछना भी होता है। मेरठ प्रशासन ने इस मामले में संवेदनशीलता की मिसाल पेश की है।
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10 लाख का मरहम

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घटना के तुरंत बाद डीएम वीके सिंह और एसएसपी विपिन ताडा खुद पीड़ित परिवार के घर पहुंचे।
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    संवाद: उन्होंने बंद कमरे में परिवार का दर्द सुना और उन्हें भरोसा दिलाया कि दोषी को बख्शा नहीं जाएगा।
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    सहायता: सरकार की ओर से पीड़ित परिवार को तत्काल 10 लाख रुपये का चेक आर्थिक सहायता के तौर पर सौंपा गया। हालांकि किसी की जान की कीमत पैसों से नहीं आंकी जा सकती, लेकिन यह राशि परिवार को कानूनी लड़ाई और जीवन यापन में संबल देगी।
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    सुरक्षा का वादा: परिवार को डर था कि आरोपी पक्ष के लोग उन पर हमला कर सकते हैं। इसे देखते हुए पुलिस ने पीड़ित परिवार को सुरक्षा कवर (Security Cover) देने के निर्देश दिए हैं।
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पुलिस की सफलता के 5 बड़े कारण

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    त्वरित नेतृत्व: डीआईजी और एसएसपी स्तर के अधिकारी एसी कमरों से बाहर निकलकर ग्राउंड जीरो पर मॉनिटरिंग कर रहे थे।
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    तकनीक का इस्तेमाल: केवल मुखबिरों के भरोसे न रहकर इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस और सीसीटीवी डेटा का बेहतरीन इस्तेमाल किया गया।
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    टीम वर्क: 12 टीमों के बीच सटीक समन्वय (Coordination) था। जब एक टीम रुड़की में थी, तो दूसरी दिल्ली में—सब एक-दूसरे से जुड़े थे।
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    दबाव का सकारात्मक उपयोग: पुलिस ने जनता के अल्टीमेटम को निगेटिव लेने के बजाय उसे एक चुनौती के रूप में लिया।
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    गोपनीयता: ऑपरेशन की भनक मीडिया या अपराधियों को नहीं लगने दी गई, जिससे आरोपी सतर्क नहीं हो पाया।
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इंसाफ की पहली सीढ़ी

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पारस सोम की गिरफ्तारी के साथ ही इस केस का पहला अध्याय समाप्त हो गया है। पुलिस ने अपना काम बखूबी किया है। 60 घंटे का यह ऑपरेशन भविष्य में पुलिस ट्रेनिंग के लिए एक केस स्टडी बन सकता है।
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लेकिन, असली लड़ाई अब शुरू होगी—अदालत में। पारस का यह कहना कि "मैंने हत्या नहीं की", इस बात का संकेत है कि वह कानूनी दांव-पेच का सहारा लेगा। अब जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष (Prosecution) की है कि वे पुख्ता सबूत, फोरेंसिक रिपोर्ट और गवाहों के बयानों के आधार पर उसे कड़ी से कड़ी सजा दिलाएं।
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कपसाड़ के लोगों और पीड़ित परिवार के लिए यह गिरफ्तारी एक मरहम की तरह है। लेकिन पूरा न्याय तभी मिलेगा जब सुनीता के हत्यारे को उसके किए की सजा मिलेगी और रूबी फिर से एक सामान्य जीवन जी सकेगी।
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