मेरठ, उत्तर प्रदेश: मेरठ के जागृति विहार एक्सटेंशन इलाके से स्वास्थ्य सेवाओं की घोर लापरवाही का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहां के भाग्यश्री अस्पताल (Bhagyshree Hospital) के स्टाफ ने एक ढाई साल के बच्चे की आँख के ऊपर लगी चोट पर टांके लगाने या सही मेडिकल इलाज देने के बजाय, घाव को बंद करने के लिए फैवीक्विक (Feviquick) नामक सुपर ग्लू का इस्तेमाल कर दिया।READ ALSO:-निर्णायक मुकाबले से पहले टीम इंडिया को तगड़ा झटका! कप्तान शुभमन गिल बाहर, गुवाहाटी टेस्ट में पंत करेंगे कप्तानी
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इस खतरनाक और गैर-जिम्मेदाराना कार्रवाई से न केवल बच्चे को असहनीय दर्द हुआ, बल्कि उसके स्वास्थ्य पर भी गंभीर खतरा मंडरा गया। परिजनों की शिकायत के बाद, मेरठ के सीएमओ (CMO) डॉ. अशोक कटारिया ने मामले की जांच के लिए टीम गठित करने का आदेश दिया है।
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क्या है पूरा मामला?

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जागृति विहार एक्सटेंशन में रहने वाले फाइनेंसर सरदार जसप्रिंदर सिंह और इरविन कौर का ढाई साल का बेटा मनराज सिंह सोमवार रात को खेलते समय घर की टेबल के कोने से टकरा गया। मनराज की आईब्रो के ठीक नीचे घाव हो गया, जिससे तेज़ी से खून बहने लगा।
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घबराए हुए माता-पिता मनराज को पास के भाग्यश्री अस्पताल ले गए। पिता जसप्रिंदर सिंह ने बताया कि इमरजेंसी में कोई डॉक्टर मौजूद नहीं था, सिर्फ अस्पताल का स्टाफ था। उन्होंने स्टाफ से किसी तरह खून रोकने के लिए पट्टी या कोई उपाय करने को कहा।
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स्टाफ ने मंगाया फैवीक्विक और दिया अजीब तर्क

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जसप्रिंदर सिंह के मुताबिक, स्टाफ ने उनसे फैवीक्विक लाने के लिए कहा। यह सोचकर कि शायद किसी उपकरण को ठीक करने के लिए ग्लू मंगाया जा रहा है, उन्होंने तुरंत फैवीक्विक लाकर दे दिया। लेकिन स्टाफ ने ग्लू का पैकेट फाड़कर सीधे मनराज की चोट पर लगाने की कोशिश की।
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जब माता-पिता ने उन्हें रोका, तो स्टाफ का जवाब हैरान करने वाला था। स्टाफ ने कहा: "घबराइए मत। चेहरे पर चोट है। इसका ऐसे ही इलाज होता है। मेरे बेटे को भी चोट लगी थी, तो यही किया था।" यह दावा करते हुए स्टाफ ने बच्चे की स्किन पर फैवीक्विक डाल दिया। 
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बच्चे की चीख और रात भर दर्द

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मां इरविन कौर ने बताया कि चोट पर फैवीक्विक डालते ही मनराज इतनी तेज़ चिल्लाया, जैसे उसकी जान ही निकल गई हो। दो मिनट में खून बहना तो बंद हो गया, क्योंकि स्किन चिपक गई थी, लेकिन बच्चे का दर्द कम नहीं हुआ। स्टाफ ने दर्द की वजह 'घाव का ताजा होना' और 'डर' बताया।
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बच्चे को घर लाने के बाद उसने रात भर कुछ खाया-पीया नहीं और दर्द के मारे रोता रहा। किसी तरह पेन किलर खिलाकर रात बिताई गई।
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दूसरे डॉक्टर ने किया सही इलाज

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अगले दिन सुबह परिजन मनराज को लोकप्रिय हॉस्पिटल ले गए, जहाँ उन्होंने डॉ. सिद्वार्थ से पूरी घटना बताई। डॉक्टर ने इस लापरवाही पर परिजनों को भी फटकारा और कहा कि बच्चा कोई 'सामान' नहीं है, जिसे फैवीक्विक से चिपकाया जाए।
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डॉ. सिद्वार्थ ने तुरंत मनराज के घाव को दोबारा खोला, जिसके अंदर से कांच के टुकड़ों जैसे कण (संभवतः फैवीक्विक के सूखे हुए अंश) निकले। डॉक्टर ने बताया कि इन्हीं कणों के कारण बच्चे का दर्द कम नहीं हो रहा था। लगभग तीन घंटे की प्रक्रिया में डॉक्टर ने ग्लू के कणों को निकालकर घाव पर चार टांके लगाए और पट्टी की। इस सही इलाज के बाद बच्चे को आराम मिला।
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सीएमओ ने दिए जांच के आदेश
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मनराज के पिता जसप्रिंदर सिंह ने बताया कि फैवीक्विक लगाने के बाद स्टाफ ने बच्चे को टिटनेस (Tetanus) का इंजेक्शन भी नहीं लगाया, जो चोट के मामले में अनिवार्य होता है। अगले दिन जब उन्होंने भाग्यश्री अस्पताल जाकर स्टाफ से इस गलत इलाज का विरोध किया, तो स्टाफ ने बहस करते हुए कहा कि उन्होंने "सही किया है"।
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इसके बाद, पीड़ित परिवार ने तुरंत मेरठ के सीएमओ डॉ. अशोक कटारिया से लिखित शिकायत की। डॉ. कटारिया ने कहा है कि कुछ मामलों में 'स्किन एडहेसिव्स' (skin adhesives) का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन फैवीक्विक जैसी चीजें खतरनाक हैं। उन्होंने एक सर्जन को शामिल करते हुए एक जांच टीम गठित की है। जांच के आधार पर दोषी स्टाफ और अस्पताल के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। 
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मेरठ के भाग्यश्री अस्पताल में ढाई साल के बच्चे की आंख के ऊपर लगी चोट को रोकने के लिए स्टाफ ने फैवीक्विक लगा दिया, जिससे बच्चे को असहनीय दर्द हुआ। दूसरे अस्पताल में डॉक्टर ने घाव खोलकर फैवीक्विक के कण निकाले और टांके लगाए। परिजनों की शिकायत के बाद सीएमओ ने इस मेरठ अस्पताल फैवीक्विक लापरवाही की जांच के आदेश दिए हैं।
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