मेरठ (क्राइम रिपोर्टर): उत्तर प्रदेश पुलिस की टैगलाइन है- "सुरक्षा आपकी, संकल्प हमारा", लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में खाकी वर्दी ने इस संकल्प को तार-तार कर दिया है। शहर में कानून के रक्षकों ने ही कानून की धज्जियां उड़ाते हुए एक ऐसी वारदात को अंजाम दिया, जिसने पूरे पुलिस महकमे को शर्मसार कर दिया है। मामला मेरठ के लोहियानगर और लिसाड़ीगेट क्षेत्र का है, जहाँ लुटेरे कोई और नहीं बल्कि थाने की चौकी पर तैनात दो दरोगा (Sub-Inspectors) निकले।Read also:-मेरठ का 'मौत का नाला': थाने के सामने तैरती मिली ‘सिस्टम’ की लाश, 5 साल में 38 चिराग बुझने के बाद भी नहीं जागा नगर निगम
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इन दरोगाओं ने न केवल एक सूत कारोबारी को अवैध रूप से उठाया, बल्कि उसे पुलिस चौकी के भीतर बंधक बनाकर रखा और एनकाउंटर का डर दिखाकर 21 लाख रुपये की "फिरौती" वसूल ली। जब यह मामला एसएसपी तक पहुँचा, तो पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया।
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मुखबिर की सूचना और लालच का खेल
\r\n\r\nघटना की शुरुआत एक ‘टिप’ (सूचना) से हुई। लोहियानगर थाने के अंतर्गत आने वाली बिजली बंबा चौकी पर तैनात दरोगा लोकेंद्र साहू और मुकेश कुमार को अपने मुखबिरों से खबर मिली थी कि लिसाड़ीगेट थाना क्षेत्र के गोला कुआं इलाके में रहने वाले एक सूत कारोबारी के घर बड़ी रकम आई है। मुखबिर ने बताया था कि यह पैसा हवाला का हो सकता है और रकम करीब 1 करोड़ रुपये है।
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आमतौर पर ऐसी सूचना मिलने पर पुलिस को उच्च अधिकारियों को सूचित करना होता है और कानूनी प्रक्रिया के तहत छापेमारी करनी होती है। लेकिन, यहाँ दोनों दरोगाओं की नीयत डोल गई। वर्दी की हनक और लालच के नशे में चूर होकर उन्होंने कानून को अपनी जेब में रख लिया और खुद ही ‘फैसला’ करने निकल पड़े।
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दहशत की वो रात: घर में दबिश और अपहरण जैसा माहौल
\r\n\r\nतीन दिन पहले, दरोगा लोकेंद्र और मुकेश अपनी टीम के साथ गोला कुआं स्थित कारोबारी के घर जा धमके। वहां पहुंचते ही उन्होंने पूरे परिवार को दहशत में डाल दिया। पुलिसिया रौब झाड़ते हुए उन्होंने कारोबारी पर आरोप लगाया कि उसके पास हवाला का 1 करोड़ रुपया आया है।
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कारोबारी और उसके परिवार ने लाख मिन्नतें कीं, यह समझाने की कोशिश की कि उनका पैसा उनके legitimate (वैध) व्यापार का है, लेकिन दरोगाओं ने एक न सुनी। वे कारोबारी को घर से उठाकर बिजली बंबा चौकी ले आए। यह गिरफ्तारी नहीं थी, बल्कि वर्दी की आड़ में किया गया एक तरह का अपहरण था, क्योंकि न तो कोई एफआईआर दर्ज थी और न ही किसी अधिकारी को इसकी सूचना दी गई थी।
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चौकी के अंदर 'काल कोठरी' का मंजर
\r\n\r\nपुलिस चौकी, जो लोगों की मदद के लिए होती है, उस रात कारोबारी के लिए यातना गृह बन गई।
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- \r\n अवैध हिरासत: कारोबारी को करीब डेढ़ दिन (36 घंटे) तक चौकी में अवैध रूप से बंधक बनाकर रखा गया।\r\n \r\n
- \r\n संपर्क तोड़ा: उसका मोबाइल छीन लिया गया और परिवार के किसी भी सदस्य को उससे मिलने नहीं दिया गया। परिवार बाहर परेशान था और अंदर कारोबारी जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा था।\r\n \r\n
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सर्विस पिस्टल और एनकाउंटर की धमकी: हद तो तब हो गई जब दोनों दरोगाओं ने अपनी सरकारी सर्विस पिस्टल निकाल ली। सूत्रों के मुताबिक, दरोगाओं ने पिस्टल कारोबारी की कनपटी पर रखते हुए कहा, "अगर पैसे नहीं दिए, तो यहीं एनकाउंटर कर देंगे और दिखा देंगे कि तुम भागने की कोशिश कर रहे थे।" यह धमकी किसी अपराधी की नहीं, बल्कि राज्य की पुलिस के उन अधिकारियों की थी, जिनके कंधों पर स्टार लगे थे।
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20 लाख की डील और जान की कीमत
\r\n\r\nमौत को सामने देख कारोबारी टूट गया। दरोगाओं ने शुरुआत में मोटी रकम मांगी, लेकिन अंत में सौदा 20 से 21 लाख रुपये पर तय हुआ। अपनी जान बचाने के लिए कारोबारी ने अपने परिवार और परिचितों से संपर्क कर पैसों का इंतजाम कराया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 20 लाख रुपये नकद दरोगा लोकेंद्र साहू और मुकेश को सौंपे गए। पैसे हाथ में आते ही दरोगाओं का लहजा बदल गया। उन्होंने धमकी देते हुए कारोबारी को चौकी से छोड़ दिया और कहा कि अगर किसी को बताया, तो झूठे मुकदमों में सड़ा देंगे।
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जब सब्र का बांध टूटा: शिकायत और खुलासा
\r\n\r\nकारोबारी डरा हुआ था, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। उसने रिहा होने के बाद सीधे पुलिस के आला अधिकारियों का दरवाजा खटखटाया। मामला जब एसपी सिटी आयुष विक्रम सिंह के संज्ञान में आया, तो उन्हें भी पहले यकीन नहीं हुआ कि उनके ही विभाग के दरोगा ऐसा कर सकते हैं।
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गोपनीय जांच: एसपी सिटी ने तुरंत एक गोपनीय जांच टीम गठित की।
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- \r\n पीड़ित के बयानों की तस्दीक की गई।\r\n \r\n
- \r\n चौकी के सीसीटीवी फुटेज (यदि उपलब्ध थे) और ड्यूटी रजिस्टर खंगाले गए।\r\n \r\n
- \r\n मोबाइल लोकेशन और कॉल डिटेल्स की जांच हुई।\r\n \r\n
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जांच में दूध का दूध और पानी का पानी हो गया। यह पुष्टि हो गई कि कारोबारी को अवैध रूप से उठाया गया था और उससे पैसे वसूले गए थे।
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एसएसपी का एक्शन: 'वर्दी का सम्मान सबसे ऊपर'
\r\n\r\nजांच रिपोर्ट जैसे ही एसएसपी (Senior Superintendent of Police) अविनाश पांडेय की मेज पर पहुंची, उन्होंने जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाते हुए तुरंत कार्रवाई की।
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कठोर निर्णय:
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- \r\n निलंबन (Suspension): मंगलवार सुबह ही दरोगा लोकेंद्र साहू और मुकेश कुमार को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया गया।\r\n \r\n
- \r\n मुकदमा (FIR): दोनों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act), रंगदारी (Extortion), अवैध हिरासत और जान से मारने की धमकी देने की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है।\r\n \r\n
- \r\n SHO पर गाज: थाने के प्रभारी निरीक्षक (SHO) योगेश चंद्र को भी लापरवाही और पर्यवेक्षण में कमी (Lack of Supervision) का दोषी मानते हुए लाइन हाजिर/निलंबित कर दिया गया है और उनके खिलाफ विभागीय जांच (Departmental Inquiry) बैठा दी गई है। एसएसपी का मानना है कि यह संभव नहीं है कि चौकी पर इतना बड़ा खेल हो रहा हो और थाना प्रभारी को भनक तक न हो।\r\n \r\n
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आरोपी दरोगा फरार: पुलिस ही पुलिस को ढूंढ रही
\r\n\r\nइस मामले का सबसे दिलचस्प और शर्मनाक पहलू यह है कि मुकदमा दर्ज होने और निलंबन की खबर मिलते ही दोनों आरोपी दरोगा (लोकेंद्र और मुकेश) भूमिगत (Underground) हो गए हैं। जो पुलिस कल तक अपराधियों को ढूंढती थी, आज वही पुलिस अपनी ही वर्दी पहनने वाले भगोड़ों को तलाश रही है।
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सूत्रों के अनुसार, पुलिस की कई टीमें उनकी तलाश में दबिश दे रही हैं। चर्चा यह भी है कि मामले के शुरुआती दौर में उन्हें पूछताछ के लिए रोका गया था, लेकिन वे चकमा देकर भागने में सफल रहे।
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एसएसपी का बयान: "हवाला का नहीं था पैसा"
\r\n\r\nएसएसपी अविनाश पांडेय ने मीडिया से बात करते हुए स्थिति स्पष्ट की:
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\r\n\r\n\r\n"हमें सूचना मिली थी कि पुलिसकर्मी बनकर कुछ लोगों ने व्यापारी से 21 लाख रुपये लूटे हैं। जब गहराई से जांच कराई गई, तो पता चला कि यह काम किसी बाहरी अपराधी का नहीं, बल्कि हमारे ही विभाग के दो दरोगाओं का है। उन्होंने हवाला के पैसे का झूठा डर दिखाकर यह वसूली की थी। जांच में पाया गया कि व्यापारी का पैसा उसके कारोबार का था, न कि हवाला का। ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों के लिए पुलिस विभाग में कोई जगह नहीं है। दोनों फरार हैं, लेकिन जल्द ही सलाखों के पीछे होंगे।"\r\n
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खाकी पर गहराता अविश्वास
\r\n\r\nमेरठ की यह घटना कई गंभीर सवाल खड़े करती है:
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- \r\n शक्ति का दुरुपयोग: जब पुलिस को सर्विस पिस्टल जनता की रक्षा के लिए दी जाती है, तो उसका उपयोग उगाही के लिए कैसे हो सकता है?\r\n \r\n
- \r\n सिस्टम की विफलता: एक व्यापारी को 36 घंटे तक चौकी में रखा जाता है, और उच्च अधिकारियों को इसकी खबर तक नहीं होती। क्या थाना स्तर पर मॉनिटरिंग सिस्टम पूरी तरह फेल है?\r\n \r\n
- \r\n व्यापारियों में डर: मेरठ, जो एक बड़ा व्यापारिक केंद्र है, वहां अगर व्यापारी पुलिस से ही सुरक्षित नहीं होंगे, तो वे कारोबार कैसे करेंगे?\r\n \r\n
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जनता की राय: स्थानीय व्यापार मंडल ने इस घटना पर गहरा रोष व्यक्त किया है। व्यापारियों का कहना है कि अगर पुलिस ही डकैत बन जाएगी, तो हम किसके पास जाएंगे? इस घटना ने सूत कारोबारियों के बीच भय का माहौल पैदा कर दिया है।
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मेरठ का यह कांड यह साबित करता है कि पुलिस सुधार (Police Reforms) की आवश्यकता कितनी अधिक है। हालांकि, एसएसपी अविनाश पांडेय और एसपी सिटी आयुष विक्रम सिंह द्वारा की गई त्वरित कार्रवाई सराहनीय है, जिसने यह संदेश दिया है कि वर्दी अपराध करने का लाइसेंस नहीं है। अब देखना यह होगा कि फरार दरोगा कब तक पुलिस की गिरफ्त में आते हैं और क्या पीड़ित व्यापारी को उसकी गाढ़ी कमाई के 21 लाख रुपये वापस मिल पाते हैं।
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यह घटना एक सबक है कि भ्रष्टाचार दीमक की तरह सिस्टम को खोखला कर रहा है, और इसे मिटाने के लिए सिर्फ निलंबन नहीं, बल्कि कठोरतम सजा की जरूरत है।
Sabse pehle comment karne wale banein.