मेरठ, उत्तर प्रदेश | 21 फरवरी 2026 इतिहास गवाह है कि जब भी उत्तर प्रदेश के मेरठ से कोई वैचारिक या सामाजिक चिंगारी उठती है, तो उसकी आंच दिल्ली के सत्ता के गलियारों तक जरूर पहुंचती है। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की जन्मस्थली रही यह 'क्रांतिधरा' आज एक बार फिर सुलग रही है। लेकिन इस बार यह लड़ाई किसी विदेशी हुकूमत के खिलाफ नहीं, बल्कि अपने ही देश की व्यवस्था, नीतियों और उन संगठनों के खिलाफ है, जिन्हें सवर्ण समाज अब तक अपना हितैषी मानता आया था।READ ALSO:-दिल्ली-मेरठ के बीच खत्म हुई दूरियां: 22 फरवरी को PM मोदी करेंगे 'नमो भारत' के पूरे 82 KM कॉरिडोर का महा-उद्घाटन, महज 55 मिनट में सराय काले खां से मोदीपुरम
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शनिवार को मेरठ में 'युवा ब्राह्मण समाज संगठन' ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत जी के हालिया बयानों और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की विवादित नई नीतियों के खिलाफ सीधा और खुला मोर्चा खोल दिया है। यह विरोध केवल एक कागज के टुकड़े (ज्ञापन) तक सीमित नहीं है; इसने उस दबे हुए ज्वालामुखी को हवा दे दी है जो सवर्ण युवाओं के मन में आरक्षण की विसंगतियों और बेरोजगारी को लेकर लंबे समय से खदबदा रहा था।
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शंकर आश्रम का वो घटनाक्रम: जब अपनों के ही दरवाजे पर गूंजे विरोध के स्वर

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मेरठ स्थित प्रांतीय मुख्यालय 'शंकर आश्रम' हमेशा से शांति, समन्वय और राष्ट्रवाद की रणनीतियों का केंद्र रहा है। लेकिन 21 फरवरी का दिन इस आश्रम के लिए असहज करने वाला साबित हुआ। पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत युवा ब्राह्मण समाज संगठन के सैकड़ों कार्यकर्ता और पदाधिकारी शंकर आश्रम पहुंचे।
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संघ प्रमुख से संवाद की थी उम्मीद: संगठन का मूल उद्देश्य संघ प्रमुख मोहन भागवत जी से सीधे मिलकर अपनी पीड़ा और समाज की चिंताओं को उनके समक्ष रखना था। युवाओं को उम्मीद थी कि 'हिंदू एकता' की बात करने वाला संघ उनकी मेधा (Merit) के साथ हो रहे अन्याय पर उनका साथ देगा। लेकिन शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात न हो पाने के कारण युवाओं का धैर्य जवाब दे गया।
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नारेबाजी और ज्ञापन: आश्रम के बाहर माहौल पूरी तरह से गर्मा गया। सवर्ण युवाओं ने अपनी मांगों के समर्थन में और व्यवस्था के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। अंततः, भारी गहमागहमी के बीच प्रतिनिधिमंडल ने संघ के क्षेत्रीय कार्यालय प्रमुख दशरथ जी को संघ प्रमुख के नाम संबोधित एक विस्तृत और कड़े शब्दों वाला ज्ञापन सौंपा।
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आंदोलन का नेतृत्व करने वाले प्रमुख चेहरे

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इस पूरे घटनाक्रम में जिन चेहरों ने आगे बढ़कर नेतृत्व किया, वे समाज के प्रबुद्ध और युवा वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं:
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    कुलदीप शर्मा - अध्यक्ष, युवा ब्राह्मण समाज संगठन (जिन्होंने पूरे आंदोलन की रूपरेखा तैयार की)
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    जितेंद्र गौतम - वरिष्ठ सदस्य, स्थाई समिति (जिनके उग्र बयानों ने प्रशासन की नींद उड़ाई)
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    पुनीत शर्मा - संगठन मंत्री (जिन्होंने युवाओं को लामबंद किया)
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    डॉ. आर.के. पचौरी - वैचारिक मार्गदर्शक
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    सौरभ दिवाकर शर्मा - युवा नेता
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    आनंद भारद्वाज - रणनीतिकार
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    रवि मिश्रा - मीडिया समन्वय
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ज्ञापन का 'पोस्टमार्टम': आखिर क्या हैं सवर्ण समाज की पीड़ा के 3 मुख्य कारण?

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संगठन द्वारा सौंपे गए ज्ञापन को केवल एक शिकायत पत्र कहना गलत होगा। यह दरअसल एक 'चार्जशीट' है जो मौजूदा सरकार और संघ की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े करती है। इसमें मुख्य रूप से तीन बिंदुओं पर फोकस किया गया है:
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1. UGC की नीतियां: "यह मेधा की हत्या है"

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विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश और संकाय (Faculty) भर्ती को लेकर लाए गए नए ड्राफ्ट/नियमों को संगठन ने सवर्ण छात्रों के भविष्य पर सीधा कुठाराघात बताया है।
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    योग्यता बनाम तुष्टिकरण: ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि सरकार 'सबका साथ, सबका विकास' का नारा देती है, लेकिन जब बात शिक्षा और रोजगार की आती है, तो मेरिट (योग्यता) को दरकिनार कर दिया जाता है।
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    भविष्य पर संकट: युवाओं का कहना है कि 90% से अधिक अंक लाने वाला एक सामान्य वर्ग का छात्र दर-दर भटकने को मजबूर है, जबकि कम अंकों वाले अभ्यर्थियों को केवल जातिगत आधार पर प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश मिल रहा है। इसे उन्होंने 'ब्रेन ड्रेन' (प्रतिभा पलायन) का सबसे बड़ा कारण बताया है।
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2. आरक्षण की विसंगतियां: 70 साल का विश्लेषण और 'आर्थिक आधार' की हुंकार

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आरक्षण के मुद्दे पर ज्ञापन में बेहद तार्किक और ऐतिहासिक संदर्भों का सहारा लिया गया है। संगठन ने संघ को उसी के पुराने बयानों की याद दिलाते हुए घेरा:
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    बाबा साहेब का मूल विजन: संगठन ने स्पष्ट किया कि संविधान के निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने आरक्षण को मात्र 10 वर्षों के लिए एक अस्थायी व्यवस्था के रूप में प्रस्तावित किया था, ताकि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को मुख्यधारा में लाया जा सके।
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    धनकुबेरों का कब्जा: 7 दशकों बाद सच्चाई यह है कि आरक्षण का लाभ उसी वर्ग के 'क्रीमी लेयर' (मलाईदार परत) तक सीमित रह गया है जो पहले ही संपन्न हो चुके हैं। वास्तविक शोषित वर्ग आज भी झोपड़ियों में है।
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    गरीब सवर्ण का क्या दोष?: सबसे बड़ा सवाल उठाया गया है कि एक गरीब ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य परिवार के बच्चे का क्या दोष है? क्या केवल एक 'सवर्ण जाति' में जन्म लेने के कारण उसे जीवन भर अवसरों से वंचित रखा जाएगा?
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    प्रमुख मांग: आरक्षण का आधार तत्काल प्रभाव से 'जाति' को हटाकर 'आर्थिक स्थिति' (Economic Status) किया जाए। डिजिटल इंडिया के दौर में जहां हर व्यक्ति की आय का डेटा सरकार के पास है, वहां जातिगत आधार अप्रासंगिक हो चुका है।
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3. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की विचारधारा पर सीधा प्रहार

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यह शायद सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट है। सवर्ण समाज, जो ऐतिहासिक रूप से संघ का कोर बेस माना जाता है, अब उसी की नीतियों से खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है।
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    युवा ब्राह्मण समाज ने संघ प्रमुख को याद दिलाया कि RSS का मूल मंत्र 'समरसता, समानता और हिंदू एकता' है।
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    ज्ञापन में कड़े शब्दों में लिखा गया: "आप केवल संघ के प्रमुख नहीं हैं; आप समाज और ब्राह्मण कुल के भी मार्गदर्शक माने जाते हैं। यदि आप भी राजनीतिक दलों की तरह 'वोट बैंक' की राजनीति के दबाव में आकर तुष्टिकरण का मौन समर्थन करेंगे, तो राष्ट्रहित और धर्म की रक्षा के लिए कौन खड़ा होगा?"
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प्रशासन के उड़े होश: 'काली बनियान' और पीएम मोदी की रैली

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संघ कार्यालय पर प्रदर्शन तो सिर्फ एक झांकी थी, असली तस्वीर ने पुलिस प्रशासन और खुफिया तंत्र (Intelligence Agencies) में हड़कंप मचा दिया है। ज्ञापन सौंपने के तुरंत बाद संगठन की स्थाई समिति के वरिष्ठ सदस्य जितेंद्र गौतम ने मीडिया के कैमरों के सामने एक ऐसा ऐलान किया जिसने शासन की नींद उड़ा दी है।
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क्या है 'काली बनियान' का संकल्प? जितेंद्र गौतम ने कड़कती आवाज में घोषणा की:

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"हम कोई राजनीतिक दल नहीं हैं जो सिर्फ बयानबाजी करेंगे। कल इसी मेरठ की धरती पर माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की एक विशाल रैली होने जा रही है। हमारे संगठन के सैकड़ों कार्यकर्ता इस रैली में 'काली बनियान' पहनकर शामिल होंगे। यह कोई सामान्य विरोध नहीं होगा। काली बनियान इस बात का प्रतीक है कि इस व्यवस्था ने सवर्ण समाज के युवाओं को मानसिक और आर्थिक रूप से 'निर्वस्त्र' कर दिया है। हम काले झंडे लहराकर दिल्ली के तख्त को यह अहसास कराएंगे कि अब सवर्ण समाज और अधिक उपेक्षा बर्दाश्त नहीं करेगा।"
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प्रशासनिक चुनौती: प्रधानमंत्री की सुरक्षा (SPG) और स्थानीय प्रशासन के लिए यह सबसे बड़ा सिरदर्द बन गया है। लाखों की भीड़ में काले कपड़े या बनियान पहने युवाओं को रोकना या उन्हें चिन्हित करना एक लॉजिस्टिक नाइटमेयर (Logistic Nightmare) है। पुलिस को डर है कि यदि इस दौरान कोई टकराव हुआ, तो रैली का नैरेटिव पूरी तरह से 'सवर्ण बनाम सरकार' में बदल जाएगा।
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उत्तर प्रदेश और देश की राजनीति पर इसका प्रभाव (Macro Impact)

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2026 के इस राजनीतिक परिदृश्य में मेरठ की यह घटना कोई छिटपुट विरोध नहीं है। इसके सामाजिक और राजनीतिक निहितार्थ बहुत गहरे हैं।
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1. कोर वोट बैंक का खिसकना (The Dilemma of the Core Voter)

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भारतीय जनता पार्टी (BJP) और RSS का उदय सवर्ण जातियों (विशेषकर ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य) के अटूट समर्थन के बिना संभव नहीं था। पिछले कुछ वर्षों से संघ और भाजपा ने दलितों और ओबीसी (OBC) वर्गों को अपने पाले में लाने के लिए आक्रामक रणनीतियां अपनाई हैं। सवर्ण समाज को लगने लगा है कि उन्हें 'टेकन फॉर ग्रांटेड' (हल्के में) लिया जा रहा है। उनका यह सोचना है कि "हम जाएं तो जाएं कहां?" इसी मजबूरी का फायदा उठाकर नीतियां उनके खिलाफ बनाई जा रही हैं।
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2. जातिगत जनगणना बनाम आर्थिक न्याय

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एक तरफ विपक्ष लगातार 'जातिगत जनगणना' (Caste Census) की मांग कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ युवा ब्राह्मण समाज जैसे संगठन 'आर्थिक न्याय' की बात कर रहे हैं। यह एक नया नैरेटिव सेट कर रहा है: जाति नहीं, वर्ग देखो। अगर यह आंदोलन जोर पकड़ता है, तो सरकार दोहरे दबाव में आ जाएगी।
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3. युवा असंतोष और बेरोजगारी

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इस पूरे आंदोलन की जड़ में केवल जाति नहीं, बल्कि बेरोजगारी है। सरकारी नौकरियां लगातार कम हो रही हैं, संविदा (Contract) पर काम बढ़ रहा है, और बची हुई नौकरियों में आरक्षण की नीतियां सवर्ण युवाओं को हाशिए पर धकेल रही हैं। यह गुस्सा अब ज्वालामुखी बनकर फूट रहा है।
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4. संघ के समन्वय मॉडल पर सवाल

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RSS हमेशा से जातियों के बीच पुल बनाने का काम करता आया है। लेकिन अब स्थिति यह है कि अगर संघ सवर्णों की मांग मानता है तो पिछड़ा वर्ग नाराज होगा, और अगर पिछड़ों की बात करता है तो उसका अपना वैचारिक ढांचा (सवर्ण समाज) दरकने लगेगा। यह संघ के लिए 'कैच-22' (Catch-22) की स्थिति है।
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आगे क्या? क्या 'काली बनियान' बनेगी बदलाव का प्रतीक?

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आज मेरठ के शंकर आश्रम से उठी यह आवाज यह साबित करती है कि भारत के सामाजिक-राजनीतिक ढांचे में एक बड़ा भूचाल आने वाला है। 'युवा ब्राह्मण समाज संगठन' ने अपनी मंशा स्पष्ट कर दी है—वे अब खामोश नहीं बैठेंगे।
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सबकी निगाहें अब कल होने वाली प्रधानमंत्री की रैली पर टिक गई हैं:
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    क्या प्रशासन इन युवाओं को रैली स्थल तक पहुंचने से रोक पाएगा?
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    क्या 'काली बनियान' वाला यह प्रतीकात्मक विरोध राष्ट्रीय स्तर पर एक नए 'सवर्ण आंदोलन' (Savarna Movement) का रूप ले लेगा?
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    और सबसे बड़ा सवाल—क्या संघ प्रमुख और सरकार इस आक्रोश को शांत करने के लिए कोई बीच का रास्ता निकालेंगे?
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वक्त का पहिया तेजी से घूम रहा है और मेरठ की धरती एक बार फिर इतिहास रचने के मुहाने पर खड़ी है।
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