हापुड़ (उत्तर प्रदेश): उत्तर प्रदेश के जनपद हापुड़ की शांत सड़कें आज एक बार फिर नारों की गूँज और पुलिस के बूटों की थाप से दहल उठीं। यह कोई चुनावी रैली नहीं थी, न ही कोई धार्मिक जुलूस; यह शोषित क्रांति दल (SKD) के उन कार्यकर्ताओं का 'रणघोष' था जो पिछले चार साल से न्याय की चौखट पर सिर पटक रहे हैं।READ ALSO:-बिजनौर सड़क हादसा: मौत का 'डिवाइडर' और NH-74 का खूनी खेल; भागूवाला टोल प्लाजा के पास हरिद्वार के व्यक्ति की दर्दनाक मौत
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आज जब SKD के कार्यकर्ता पूर्व जिला अध्यक्ष केपी सिंह के नेतृत्व में पुलिस अधीक्षक (SP) कार्यालय का घेराव करने निकले, तो उन्हें रोकने के लिए प्रशासन ने पूरी ताकत झोंक दी। आवास विकास कॉलोनी के मुख्य मार्ग पर जो दृश्य दिखा, उसने लोकतंत्र और पुलिसिया तंत्र के बीच के घर्षण को सरेआम उजागर कर दिया। तीखी नोकझोंक, धक्का-मुक्की और अधिकारियों की आंखों में आंखें डालकर हक मांगते युवाओं ने यह साफ कर दिया कि 'दबाने' की राजनीति अब और नहीं चलेगी।
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घटना का सजीव चित्रण: जब रणक्षेत्र बनी आवास विकास कॉलोनी
\r\n\r\nगुरुवार का सूरज अभी ढला भी नहीं था कि हापुड़ की आवास विकास कॉलोनी में तनाव के बादल छा गए। शोषित क्रांति दल ने पहले ही ऐलान कर दिया था कि वे पुलिस की 'मनमानी' और 'अपराधियों के साथ साठगांठ' के खिलाफ कप्तान का दरवाजा खटखटाएंगे।
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पुलिस का चक्रव्यूह और केपी सिंह की घेराबंदी
\r\n\r\nजैसे ही सूचना मिली कि कार्यकर्ता कूच करने वाले हैं, नगर कोतवाली पुलिस और भारी फोर्स ने पूर्व जिला अध्यक्ष केपी सिंह के आवास को चारों तरफ से घेर लिया। यह एक ऐसी स्थिति थी जहां एक नागरिक को उसके अपने ही घर में नजरबंद करने की कोशिश की गई। लेकिन 'क्रांति' को दीवारों में कैद करना मुश्किल था। राष्ट्रीय अध्यक्ष रविकांत के कड़े संदेश के बाद केपी सिंह और उनके समर्थक वहीं धरने पर बैठ गए। नारों की गूँज ने पुलिस की घेराबंदी में दरार पैदा कर दी।
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सीधी भिड़ंत
\r\n\r\nधरने के कुछ समय बाद, जब कार्यकर्ताओं का हुजूम 'जुलूस' की शक्ल में एसपी ऑफिस की ओर बढ़ा, तो आवास विकास के मुख्य मार्ग पर नगर कोतवाली प्रभारी विनोद कुमार पांडे ने भारी पुलिस बल के साथ रास्ता रोक लिया। यहाँ संवाद कम और विवाद ज्यादा हुआ। पुलिस ने बैरिकेडिंग का सहारा लिया, तो कार्यकर्ताओं ने इसे 'लोकतंत्र की हत्या' करार दिया। तीखी नोकझोंक के बीच कार्यकर्ता और पुलिस आमने-सामने थे।
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नेतृत्व की हुंकार: "लोकतंत्र को कुचल रही है खाकी"
\r\n\r\nइस हंगामे के बीच शोषित क्रांति दल के नेताओं के बयानों ने आग में घी का काम किया।
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- \r\n वरिष्ठ कार्यकर्ता अजब सिंह ने गरजते हुए कहा, "आज हापुड़ में जो दिख रहा है, वह पुलिस का खौफ नहीं, बल्कि उनकी विफलता है। पुलिस तंत्र के दम पर लोकतंत्र को कुचला जा रहा है। जिस व्यक्ति पर हमला हुआ, उसे ही जेल भेज देना कौन सा न्याय है? हम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे।"\r\n \r\n
- \r\n अभिषेक लंकेश ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़े प्रहार करते हुए कहा, "हमारा रास्ता रोकने से पुलिस की मनमानी पर पर्दा नहीं गिरेगा। अब पर्दा उठ चुका है। न्याय तो हम लेकर रहेंगे, चाहे इसके लिए हमें कोई भी कीमत चुकानी पड़े। खाकी की लाठियां हमारे हौसलों को नहीं तोड़ सकतीं।"\r\n \r\n
- \r\n दीपक बौद्ध की चेतावनी ने प्रशासन के माथे पर बल ला दिए। उन्होंने सीधे शब्दों में कहा, "आज हम यहाँ रुके हैं, लेकिन अगर 3 दिन के भीतर हमारी मांगें नहीं मानी गईं, तो अगला पड़ाव हापुड़ नहीं, बल्कि लखनऊ की सिग्नेचर बिल्डिंग (यूपी पुलिस मुख्यालय) होगी। हम वहां डेरा डालेंगे और देखेंगे कि न्याय कैसे नहीं मिलता।"\r\n \r\n
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2021 की वह खूनी रात और पुलिस का 'जादुई' खेल
\r\n\r\nआखिर क्यों हापुड़ की पुलिस इस मामले को दबाना चाहती है? इसके लिए हमें 4 साल पीछे जाना होगा। मामला थाना धौलाना के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र का है।
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हमलावरों का आतंक और केपी सिंह का संघर्ष
\r\n\r\nसाल 2021 में, शोषित क्रांति दल के तत्कालीन जिला अध्यक्ष केपी सिंह पर उनके घर में घुसकर कुछ दबंगों और 'सामंती' विचारधारा के लोगों ने कातिलाना हमला किया था। केपी सिंह ने तहरीर दी थी कि उन पर जानलेवा हमला हुआ और उनके साथ लूटपाट भी की गई।
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- \r\n मुकदमा अपराध संख्या: 516/21 (थाना धौलाना)।\r\n \r\n
- \r\n पुलिस की 'कलाकारी': कार्यकर्ताओं का आरोप है कि पुलिस ने आरोपियों को पकड़ने के बजाय पीड़ित केपी सिंह को ही जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया।\r\n \r\n
- \r\n मुख्य आरोपी को संरक्षण: सबसे बड़ा विवाद विशाल नाम के अभियुक्त को लेकर है। SKD का दावा है कि विशाल इस पूरे हमले का मास्टरमाइंड था, लेकिन पुलिस ने चार्जशीट से उसका नाम गायब कर दिया। यही नहीं, लूट की संगीन धाराओं को भी केस से हटा दिया गया ताकि आरोपियों को आसानी से जमानत मिल सके और वे समाज में बेखौफ घूम सकें।\r\n \r\n
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4. मांग पत्र (Memorandum): एसपी के नाम ज्ञापन और सीओ ट्रैफिक का आश्वासन
\r\n\r\nकाफी हंगामे और सड़क पर ही चली घंटों की बहस के बाद, प्रशासन ने बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की। पुलिस अधीक्षक के नाम एक मांग पत्र सीओ ट्रैफिक राहुल यादव को सौंपा गया।
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SKD की प्रमुख मांगें:
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- \r\n मुकदमा संख्या 516/21 में मुख्य अभियुक्त विशाल का नाम तत्काल प्रभाव से जोड़ा जाए।\r\n \r\n
- \r\n एफआईआर से हटाई गई लूट की धाराओं को पुनः बहाल किया जाए।\r\n \r\n
- \r\n केस की निष्पक्ष जांच किसी उच्च स्तरीय एजेंसी से कराई जाए, क्योंकि स्थानीय पुलिस पर पक्षपात के आरोप हैं।\r\n \r\n
- \r\n पीड़ित केपी सिंह पर किए गए फर्जी मुकदमों और पुलिसिया प्रताड़ना की जांच हो।\r\n \r\n
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सीओ राहुल यादव ने आश्वासन दिया कि ज्ञापन को सक्षम अधिकारियों तक पहुँचाया जाएगा और नियमानुसार उचित कार्रवाई की जाएगी।
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5. सांगठनिक शक्ति: ये रहे आंदोलन के मुख्य चेहरे
\r\n\r\nइस प्रदर्शन ने शोषित क्रांति दल की सांगठनिक मजबूती को भी दर्शाया। राष्ट्रीय अध्यक्ष रविकांत के नेतृत्व में एकजुट हुए कार्यकर्ताओं में युवा जोश और न्याय की तड़प साफ दिखी। मौके पर मुख्य रूप से: अमरपाल सिंह, नरेश भाटी, मोनू जाटव, नितिन, सूरज, मनीष, जसवंत, पप्पू, इंदर, लालू, सतीश आज़ाद, ऋषभ समेत सैकड़ों कार्यकर्ता मौजूद रहे, जिन्होंने पुलिसिया कार्रवाई के खिलाफ हुंकार भरी।
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क्यों जरूरी है यह न्याय?
\r\n\r\nहापुड़ की यह घटना केवल एक संगठन का विरोध प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था के उन 'ब्लैक होल्स' की ओर इशारा करती है जहाँ गरीब और शोषित पक्ष का न्याय फाइलों में ही दम तोड़ देता है।
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- \r\n पुलिसिया साठगांठ का खतरा: यदि 4 साल तक एक केस की जांच 'प्रचलित' रहती है और मुख्य आरोपी का नाम तक नहीं बढ़ता, तो यह पुलिस की कार्यक्षमता पर बड़ा प्रश्नचिह्न है।\r\n \r\n
- \r\n सामंती सोच बनाम संवैधानिक अधिकार: पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस तरह के संघर्ष अक्सर देखने को मिलते हैं जहाँ दबंग पक्ष पुलिस पर दबाव बनाकर पीड़ित को ही दोषी ठहराने की कोशिश करता है।\r\n \r\n
- \r\n आंदोलन की राह: शोषित क्रांति दल ने 3 दिन का समय देकर यह स्पष्ट कर दिया है कि वे अब और प्रतीक्षा करने के मूड में नहीं हैं। यदि मांगें पूरी नहीं होती हैं, तो लखनऊ में होने वाला प्रदर्शन योगी सरकार के 'जीरो टॉलरेंस' दावों के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।\r\n \r\n
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न्याय या संघर्ष?
\r\n\r\nहापुड़ पुलिस के लिए आने वाले 72 घंटे बेहद महत्वपूर्ण हैं। केपी सिंह का मामला अब केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह एक राजनीतिक और सामाजिक प्रतिष्ठा का सवाल बन चुका है। शोषित क्रांति दल के कार्यकर्ताओं ने यह साबित कर दिया है कि वे 'खाकी' के डर से अपने घर में बैठने वाले नहीं हैं।
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प्रशासन को चाहिए कि वे फाइलों से धूल हटाएं और दूध का दूध, पानी का पानी करें। अगर विशाल मुख्य अभियुक्त है, तो उसका नाम मुकदमे में क्यों नहीं है? अगर लूट हुई थी, तो धाराएं क्यों हटाई गईं? इन सवालों के जवाब ही हापुड़ की सड़कों पर शांति बहाल कर सकते हैं।
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Sabse pehle comment karne wale banein.