मेरठ। पर्यावरण को बचाने और पेड़ों की कटाई को कम करने के लिए मेरठ नगर निगम एक बड़ा कदम उठाने जा रहा है। शहर के सूरजकुंड और रिठानी श्मशान घाटों में अत्याधुनिक 'ग्रीन क्रिमिटोरियम' (हरित शव दाह गृह) का निर्माण किया जाएगा। यह एक नई तकनीक है, जिसमें दाह संस्कार के लिए पारंपरिक लकड़ी के साथ गो-काष्ठ (गाय के गोबर से बनी लकड़ी) का इस्तेमाल होगा। अधिकारियों का दावा है कि इस विधि से लकड़ी की खपत में 85 प्रतिशत तक की कमी आएगी।READ ALSO:-मेरठ में मामूली कहासुनी पर खूनी संघर्ष: रास्ता न देने पर चला विवाद, 20 हमलावरों ने की ताबड़तोड़ फायरिंग
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कैसे काम करेगी यह नई तकनीक?
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यह तकनीक एक भट्टी की तरह काम करती है। इसमें एक बंद चैंबर होता है, जिसके भीतर ग्रिल के साथ एक प्लेटफॉर्म बना होता है।
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    कम लकड़ी में अधिक ऊर्जा: दाह संस्कार के लिए गो-काष्ठ और लकड़ी को इसी प्लेटफॉर्म पर रखा जाएगा। आग को तेज करने के लिए एक पंप के जरिए हवा दी जाएगी, ठीक उसी तरह जैसे चूल्हे में फूंकनी से हवा दी जाती है।
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    जल्द होगा अंतिम संस्कार: मोटी धातु की चादर से ढके होने के कारण ऊर्जा बाहर नहीं निकलेगी, जिससे कम लकड़ी का इस्तेमाल होगा। इस पूरी प्रक्रिया में केवल एक से डेढ़ घंटा लगेगा, जबकि पारंपरिक विधि में दो से तीन घंटे का समय लगता है।
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    क्षमता: एक मशीन पर एक दिन में लगभग 5 से 6 शवों का अंतिम संस्कार किया जा सकेगा।
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पर्यावरण को होंगे ये बड़े फायदे
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    लकड़ी की बचत: एक शव के अंतिम संस्कार में अभी जहां 3-4 क्विंटल लकड़ी लगती है, वहीं इस नई तकनीक से सिर्फ 50 किलो लकड़ी और 1.5 से 2 क्विंटल गो-काष्ठ का ही उपयोग होगा।
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    कार्बन उत्सर्जन में कमी: यह डिकार्बोनीजेशन फिल्ट्रेशन टेक्नोलॉजी पर आधारित है, जिससे कार्बन उत्सर्जन में 80 प्रतिशत तक की कमी आने का दावा किया गया है।
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    गोबर का उपयोग: हरित शव दाह गृह के लिए गो-काष्ठ बनाने की मशीन कान्हा उपवन में लगाई जाएगी, जहां लगभग 2500 गोवंशी हैं। इससे हर दिन निकलने वाले लगभग 20 टन गोबर का सही निस्तारण हो सकेगा।
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प्रोजेक्ट की लागत और आगे की योजना
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मुख्य अभियंता प्रमोद कुमार सिंह ने बताया कि सूरजकुंड में इस प्रोजेक्ट की लागत 4.68 करोड़ और रिठानी में 2.73 करोड़ रुपये आएगी। इसमें मशीनों की लागत भी शामिल है। यह प्रस्ताव शासन को भेजा गया है और मंजूरी मिलते ही टेंडर प्रक्रिया शुरू की जाएगी। जो कंपनी संचालन का काम संभालेगी, उसे अगले 5 साल तक इसके रखरखाव की जिम्मेदारी भी दी जाएगी। नगर आयुक्त सौरभ गंगवार ने कहा कि यह परियोजना पर्यावरण संरक्षण और पेड़ों की कटान कम करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
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