मेरठ (उत्तर प्रदेश): किसी भी शहर की अर्थव्यवस्था उसकी औद्योगिक इकाइयों की धड़कन पर निर्भर करती है। और जब इन इकाइयों को ऊर्जा देने वाला ईंधन ही खत्म हो जाए, तो शहर की रफ्तार का थमना तय है। उत्तर प्रदेश के प्रमुख औद्योगिक और ऐतिहासिक शहर मेरठ में इन दिनों कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है। मेरठ में पिछले कुछ समय से चल रहे एलपीजी (LPG) गैस सिलेंडर के संकट ने अब एक नया और खतरनाक मोड़ ले लिया है।READ ALSO:-बिजनौर: गश्त पर निकले 'खाकी' के वीर को आया साइलेंट अटैक, ऑन ड्यूटी दरोगा सुनील कुमार का निधन, महकमे में पसरा मातम
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प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद आम आदमी की रसोई (घरेलू गैस सिलेंडर) तक तो गैस पहुंचने लगी है, लेकिन शहर का व्यापारिक और औद्योगिक ढांचा कमर्शियल गैस सिलेंडरों (Commercial Gas Cylinders) की भारी किल्लत के कारण चरमरा गया है। हालत यह है कि विश्व प्रसिद्ध मेरठ का कैंची उद्योग हो, पेट्रोमेक्स कारखाने हों, सर्राफा बाजार हो या फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान रखने वाला खेल (Sports) उद्योग—सभी जगह मशीनों का शोर थम गया है और भट्टियां ठंडी पड़ गई हैं। हजारों मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
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आइए, मेरठ के इस गंभीर औद्योगिक और व्यावसायिक संकट का गहराई से विश्लेषण करते हैं और समझते हैं कि कैसे एक 'सिस्टम फेलियर' ने पूरे शहर की अर्थव्यवस्था को घुटनों पर ला दिया है।
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कैसे शुरू हुआ यह हाहाकार? (गैस किल्लत का फ्लैशबैक)
\r\n\r\nबीते एक सप्ताह से मेरठ की सड़कों पर गैस उपभोक्ताओं की लंबी कतारें, जाम और हंगामा एक आम बात बन गई थी। शुरुआत में यह संकट घरेलू और कमर्शियल दोनों तरह के सिलेंडरों पर था।
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सर्वर क्रैश और E-KYC का झंझट
\r\n\r\nइस पूरे बवाल की जड़ तकनीकी खामी और तेल कंपनियों के नए नियम थे।
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- \r\n बुकिंग सिस्टम फेल: ऑनलाइन गैस बुकिंग का सर्वर अचानक धड़ाम हो गया। मोबाइल ऐप्स और आईवीआरएस (IVRS) सिस्टम से बुकिंग होना बंद हो गई।\r\n \r\n
- \r\n मैन्युअल बुकिंग पर केवाईसी का ग्रहण: जब लोग गैस एजेंसियों और गोदामों पर लाइन लगाकर मैन्युअल (पर्ची कटवाकर) बुकिंग कराने पहुंचे, तो कंपनियों ने 'ई-केवाईसी' (E-KYC - Know Your Customer) को अनिवार्य कर दिया। बिना फिंगरप्रिंट या बायोमेट्रिक सत्यापन के सिलेंडर देने से मना कर दिया गया।\r\n \r\n
- \r\n सड़कों पर उतरा गुस्सा: सिस्टम की इस दोहरी मार से त्रस्त होकर उपभोक्ता सड़कों पर उतर आए। कई जगह चक्का जाम हुआ।\r\n \r\n
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घरेलू मोर्चे पर राहत, कमर्शियल की अनदेखी
\r\n\r\nहालात बेकाबू होते देख जिला प्रशासन और शासन को सख्त कदम उठाने पड़े। जनहित को सर्वोपरि रखते हुए प्रशासन ने तत्काल प्रभाव से केवाईसी की अनिवार्यता में ढील दी और घरेलू उपभोक्ताओं के लिए ऑफलाइन डिलीवरी सुचारू करवाई। नतीजा यह हुआ कि घरों में चूल्हे तो जल गए, लेकिन इस पूरी प्रशासनिक कवायद में 'कमर्शियल गैस उपभोक्ताओं' (19 किलो वाले नीले/व्यावसायिक सिलेंडर) को पूरी तरह से भुला दिया गया। आज स्थिति यह है कि एजेंसियां कमर्शियल सिलेंडर की सप्लाई देने में हाथ खड़े कर रही हैं।
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मेरठ की औद्योगिक पहचान और गैस पर उसकी निर्भरता
\r\n\r\nमेरठ कोई आम शहर नहीं है। यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख औद्योगिक हब (Industrial Hub) है। यहां के उत्पाद पूरी दुनिया में निर्यात होते हैं। पिछले एक दशक में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (विशेषकर NGT - National Green Tribunal) की सख्ती के कारण, मेरठ की अधिकांश फैक्ट्रियों ने कोयले, लकड़ी और डीजल (Diesel Generators) का उपयोग बंद कर दिया है।
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प्रदूषण से बचने के लिए लाखों रुपये खर्च करके उद्योगों को क्लीन एनर्जी यानी एलपीजी (LPG) और पीएनजी (PNG) पर शिफ्ट किया गया था। हाई-हीट (High Heat), धातु पिघलाने (Metal Melting), मोल्डिंग (Molding) और जनरेटर चलाने के लिए अब कमर्शियल एलपीजी ही एकमात्र सहारा है। ऐसे में कमर्शियल गैस की सप्लाई रुकने का सीधा मतलब है—फैक्ट्री के गेट पर ताला लगना।
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ग्राउंड जीरो रिपोर्ट: किस कलस्टर का क्या है हाल?
\r\n\r\nकमर्शियल गैस की इस किल्लत ने किसी एक व्यापार को नहीं, बल्कि मेरठ के पूरे औद्योगिक इकोसिस्टम को झकझोर कर रख दिया है। आइए विभिन्न कलस्टर्स (Industrial Clusters) के कारोबारियों और अध्यक्षों की जुबानी उनका दर्द समझते हैं।
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A. कैंची कलस्टर (Scissors Industry): रमजान के महीने में टूट गई उम्मीदें
\r\n\r\nमेरठ की कैंची को 'भौगोलिक संकेत' (GI Tag) प्राप्त है। पूरे देश के दर्जी मेरठ की कैंची का लोहा मानते हैं। लेकिन आज यह लोहा बिना आग के ठंडा पड़ा है।
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- \r\n क्यों चाहिए गैस? कैंची के निर्माण में सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है लोहे की 'टेम्परिंग' (Tempering) करना, उसे भट्टी में तपाना और वेल्डिंग (Welding) करना। यह सारा काम गैस की तेज आंच पर ही संभव है।\r\n \r\n
- \r\n कारोबारियों का दर्द: कैंची कलस्टर मेरठ के उपाध्यक्ष शरीफ अहमद बेहद निराशा के साथ बताते हैं, "कैंची निर्माण में करीब 17 अलग-अलग तरह के काम सीधे तौर पर गैस पर ही निर्भर हैं। कमर्शियल सिलेंडर ना मिल पाने के कारण यह सारा काम रुक गया है। कारखानों में सन्नाटा पसरा है।"\r\n \r\n
- \r\n रमजान का झटका: शरीफ अहमद आगे बताते हैं कि रमजान के इस पवित्र महीने में कपड़ों की सिलाई का काम चरम पर होता है, जिससे कैंची की मांग कई गुना बढ़ जाती है। "यह मेरे जीवन का शायद पहला मौका है, जब रमजान के पीक सीजन में काम और प्रोडक्शन बढ़ने के बजाए शून्य पर आ गया है। ऑर्डर पेंडिंग पड़े हैं और हम ग्राहकों को माल नहीं दे पा रहे हैं।"\r\n \r\n
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B. पेट्रोमेक्स और मेटल कलस्टर: 5000 से ज्यादा कामगारों की रोजी-रोटी पर संकट
\r\n\r\nपेट्रोमेक्स, गैस स्पेयर पार्ट्स और मेटल (धातु) के पुर्जे बनाने में मेरठ का बड़ा नाम है। यह उद्योग पूरी तरह से 'हाई हीट' (High Heat) पर चलता है।
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- \r\n क्यों चाहिए गैस? पीतल, तांबे और लोहे को पिघलाने, मोल्ड (सांचे) में ढालने और गैस के स्पेयर पार्ट्स बनाने के लिए भयंकर तापमान की आवश्यकता होती है, जो केवल कमर्शियल एलपीजी भट्टियों से ही हासिल किया जाता है।\r\n \r\n
- \r\n कारोबारियों का दर्द: पेट्रोमेक्स गैस स्पेयर मैन्युफैक्चरिंग एंड ट्रेडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष मोहम्मद साजिद सैफी ने स्थिति की भयावहता बताते हुए कहा, "काम बुरी तरह प्रभावित ही नहीं, बल्कि ठप हो चुका है। माल पिघलाने और लोहे को तपाने का काम गैस के बिना असंभव है।"\r\n \r\n
- \r\n रोजगार पर असर: साजिद सैफी ने जो आंकड़े दिए, वे डराने वाले हैं। "मेरठ में इस काम से जुड़ी लगभग 350 से 400 यूनिट्स (कारखाने) हैं। एक यूनिट पर औसतन 10-15 कारीगर और मजदूर काम करते हैं। इस गैस संकट के कारण 5,000 से ज्यादा कर्मचारियों का रोजगार छिन गया है। अगर काम नहीं होगा, तो फैक्ट्री मालिक मजदूरों को दिहाड़ी कैसे देगा?"\r\n \r\n
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C. सर्राफा बाजार (Bullion Market): सोने की चमक पड़ी फीकी
\r\n\r\nमेरठ का सर्राफा बाजार (Jewelry Market) उत्तर भारत के सबसे बड़े स्वर्ण आभूषण बाजारों में से एक है। यहां सिर्फ जेवर बिकते नहीं हैं, बल्कि बड़े पैमाने पर बनाए जाते हैं।
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- \r\n क्यों चाहिए गैस? सोने और चांदी जैसी बहुमूल्य धातुओं को गलाने (Melting), तार खींचने, मीनाकारी करने और जेवरों को जोड़ने (Soldering) के लिए एक समान और प्रदूषण रहित लौ (Flame) की जरूरत होती है। इसके लिए ज्वैलर्स कमर्शियल गैस सिलेंडरों का ही इस्तेमाल करते हैं।\r\n \r\n
- \r\n कारोबारियों का दर्द: इंडियन बुलियन ट्रेड कॉर्पोरेशन के निदेशक आशुतोष अग्रवाल ने बताया कि सर्राफा बाजार में एलपीजी की बहुत भारी खपत है। "यहां के एक बड़े प्रतिष्ठान पर प्रतिदिन लगभग 1 किलोग्राम सोने से जूलरी तैयार होती है। इस प्रक्रिया में हर सप्ताह कम से कम दो बड़े कमर्शियल सिलेंडरों की खपत होती है।"\r\n \r\n
- \r\n आर्थिक नुकसान: अग्रवाल चेतावनी देते हुए कहते हैं, "सिलेंडर ना मिलने के कारण कारीगर खाली बैठे हैं। ऑर्डर पूरे नहीं हो रहे हैं। सोने-चांदी का काम बंदी की कगार पर आ गया है, जिससे न केवल मालिकों का बल्कि दिहाड़ी पर काम करने वाले स्वर्णकारों (सुनारों) की जीविका भी खतरे में पड़ गई है।"\r\n \r\n
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D. खेल उद्योग (Sports Goods) और अन्य कारखाने
\r\n\r\nक्रिकेट बैट, पैड, गेंद, और एथलेटिक्स का सामान बनाने में मेरठ का कोई सानी नहीं है। यहां प्लास्टिक, रबड़ और मेटल का भी बड़ा कारोबार है।
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- \r\n क्यों चाहिए गैस? रबड़ को पकाने (Vulcanization), प्लास्टिक को मोल्ड करने और जनरेटर चलाने के लिए गैस की जरूरत है।\r\n \r\n
- \r\n कारोबारियों का दर्द: प्रमुख स्पोर्ट्स कारोबारी सुमनेश अग्रवाल स्पष्ट करते हैं कि गैस की किल्लत ने बहुआयामी नुकसान किया है। "प्रदूषण विभाग (NGT) की सख्ती के बाद सभी इंडस्ट्रीज में पुराने डीजल जेनरेटर सेट हटाकर एलपीजी और सीएनजी जेनरेटर लगाए गए थे। अब गैस ही नहीं है तो पावर कट के दौरान फैक्ट्रियां कैसे चलें? इसके अलावा हाई-हीट वाले जितने भी काम थे, वे सब रुक गए हैं।"\r\n \r\n
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मजदूरों का दर्द: "चूल्हा जल रहा है, पर पकाने को राशन नहीं"
\r\n\r\nइस पूरे संकट का सबसे स्याह पहलू वह मजदूर वर्ग है जो रोज़ कुआं खोदता है और रोज़ पानी पीता है। प्रशासन ने घरों तक गैस पहुंचा कर यह तो सुनिश्चित कर दिया कि लोगों के घरों में चूल्हे जल सकें, लेकिन जब फैक्टरियां ही बंद हैं, तो उन चूल्हों पर पकाने के लिए राशन कहां से आएगा?
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- \r\n दिहाड़ी मजदूरों की दुर्दशा: कैंची कलस्टर और पेट्रोमेक्स कारखानों में काम करने वाले अधिकांश मजदूर पीस-रेट (Piece-rate) या दिहाड़ी पर काम करते हैं। यानी जितना माल बनाएंगे, उतने पैसे मिलेंगे। पिछले कई दिनों से कारखाने बंद होने के कारण उनकी आमदनी शून्य हो गई है।\r\n \r\n
- \r\n पलायन का डर: अगर यह स्थिति अगले एक-दो सप्ताह और खिंचती है, तो कई मजदूरों के सामने पलायन करने या कर्ज लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। रमजान और आने वाले ईद के त्योहार के कारण मजदूरों को अतिरिक्त पैसों की जरूरत होती है, लेकिन यहां तो मूल वेतन के ही लाले पड़ गए हैं।\r\n \r\n
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सप्लाई चेन का टूटना: एक गैस सिलेंडर, सैकड़ों प्रभाव
\r\n\r\nकमर्शियल गैस सिर्फ एक ईंधन नहीं है; यह एक पूरी सप्लाई चेन (Supply Chain) का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
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- \r\n कच्चा माल सप्लायर: जब फैक्ट्रियां माल नहीं बना रही हैं, तो वे कच्चा माल (लोहा, पीतल, प्लास्टिक) भी नहीं खरीद रही हैं।\r\n \r\n
- \r\n ट्रांसपोर्टर: माल न बनने से ट्रकों और लोडर गाड़ियों के पहिए भी थम गए हैं, जिससे ट्रांसपोर्ट सेक्टर को नुकसान हो रहा है।\r\n \r\n
- \r\n होलसेल व्यापारी: मेरठ से माल दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और विदेशों में जाता है। कमर्शियल गैस की किल्लत के कारण एक्सपोर्ट ऑर्डर्स (Export Orders) कैंसिल होने का खतरा मंडराने लगा है, जिससे देश को विदेशी मुद्रा का भी नुकसान हो सकता है।\r\n \r\n
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प्रशासन से कारोबारियों की अपील और आगे का रास्ता
\r\n\r\nव्यापारी वर्ग हमेशा से अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहा है, लेकिन आज मेरठ का व्यापारी खुद को बेबस महसूस कर रहा है। सभी औद्योगिक कलस्टरों और व्यापारिक संगठनों ने जिला प्रशासन, राज्य सरकार और पेट्रोलियम मंत्रालय से तत्काल राहत की मांग की है।
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प्रमुख मांगें:
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- \r\n कमर्शियल सिलेंडरों का कोटा तय हो: जिस तरह घरेलू उपभोक्ताओं के लिए तत्काल व्यवस्था की गई, उसी तरह उद्योगों को बचाने के लिए कमर्शियल सिलेंडरों की आपूर्ति के लिए एक विशेष इमरजेंसी कोटा (Emergency Quota) जारी किया जाए।\r\n \r\n
- \r\n केवाईसी और सर्वर इश्यू का स्थायी समाधान: तेल कंपनियों (IOCL, BPCL, HPCL) के सर्वर की क्षमता बढ़ाई जाए और कमर्शियल उपभोक्ताओं के लिए ई-केवाईसी की प्रक्रिया को फिलहाल स्थगित किया जाए या इसे सरल बनाया जाए।\r\n \r\n
- \r\n प्राथमिकता के आधार पर वितरण: उद्योगों को ब्लैक-मार्केटिंग (कालाबाजारी) से बचाने के लिए प्रशासन अपनी देखरेख में फैक्ट्रियों तक सीधे कमर्शियल सिलेंडर पहुंचाने की व्यवस्था करे।\r\n \r\n
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समय रहते चेतने की जरूरत
\r\n\r\nमेरठ में गैस का यह संकट सिर्फ एक स्थानीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह एक 'केस स्टडी' है कि कैसे एक छोटे से तकनीकी ग्लिच (Tech Glitch) या नीतिगत बदलाव से पूरी औद्योगिक व्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह सकती है।
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सुई से लेकर तलवार तक, और कैंची से लेकर क्रिकेट बैट तक बनाने वाला मेरठ आज एक कमर्शियल गैस सिलेंडर के लिए मोहताज है। अगर जल्द ही सरकार और तेल कंपनियों ने मिलकर इस समस्या का कोई ठोस तकनीकी और जमीनी समाधान नहीं निकाला, तो मेरठ के उद्योगों को जो आर्थिक घाटा होगा, उसकी भरपाई करने में सालों लग जाएंगे। शासन को यह समझना होगा कि फैक्ट्रियों की चिमनियों से निकलने वाला धुआं ही वास्तव में विकास और रोजगार का प्रतीक है।
Sabse pehle comment karne wale banein.