मेरठ (Meerut News): मेरठ के शास्त्री नगर स्थित प्रतिष्ठित सेंट्रल मार्केट (Central Market) के अस्तित्व पर अब तक का सबसे बड़ा संकट मंडरा रहा है। दशकों से आवासीय भूखंडों पर चल रहे करोड़ों के व्यापारिक साम्राज्यों की नींव हिल चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने 17 दिसंबर, 2024 के अपने ऐतिहासिक फैसले को आधार बनाते हुए अब शेष बचे अवैध निर्माणों पर भी ध्वस्तीकरण की कार्रवाई के संकेत दे दिए हैं।READ ALSO:-मेरठ समाचार: 'पुलिस के सामने ही नियमों की धज्जियां उड़ा रहे टेम्पो चालक', बेगम पुल व्यापार संघ के पूर्व अध्यक्ष ने SSP और DM से की लिखित शिकायत
\r\n\r\n\r\n\r\n
आज, 5 फरवरी 2026 को, पूरे बाजार में एक अजीब सी खामोशी है। यह खामोशी उस तूफान से पहले की है, जिसकी आहट 27 जनवरी, 2026 को सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद सुनाई दी थी। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि अवैध निर्माण, चाहे वह कितना भी पुराना क्यों न हो, उसे वैधता नहीं दी जा सकती।
\r\n\r\n 
सुप्रीम कोर्ट का नवीनतम फरमान: 27 जनवरी, 2026
\r\n\r\nबीती 27 जनवरी, 2026 को सुप्रीम कोर्ट में सेंट्रल मार्केट से जुड़े मामले की महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कानून का उल्लंघन करके खड़े किए गए ढांचे ध्वस्त किए जाने चाहिए।
\r\n\r\n\r\n\r\n
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद (UP Awas Evam Vikas Parishad) को निर्देश दिया है कि वह शास्त्री नगर योजना संख्या 3 और 7 में चिह्नित किए गए 1478 अवैध निर्माणों के संबंध में छह सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करे।
\r\n\r\nFollow the Khabreelal News channel on WhatsApp Join › \r\n\r\n
अदालत की इस सख्ती ने व्यापारियों की नींद उड़ा दी है। जो व्यापारी कुछ माह पहले तक नेताओं के आश्वासन पर चैन की सांस ले रहे थे, अब वे मान चुके हैं कि "अब केवल कोई चमत्कार ही उन्हें बचा सकता है।"
\r\n\r\n(Internal link to related article: उत्तर प्रदेश में अवैध निर्माणों पर सुप्रीम कोर्ट के पिछले 5 बड़े फैसले)
\r\n\r\n\r\n\r\n
विवाद की जड़: भूखंड संख्या 661/6 की कहानी
\r\n\r\nइस पूरे विवाद की शुरुआत शास्त्री नगर के एक भूखंड, संख्या 661/6 से हुई। यह मामला केवल एक इमारत का नहीं, बल्कि पूरे शहर में आवासीय जमीनों के व्यावसायिक दुरुपयोग का प्रतीक बन गया है।
\r\n\r\n\r\n\r\n
आवास से व्यवसाय तक का सफर
\r\n\r\nआवास विकास परिषद के रिकॉर्ड के मुताबिक, यह कहानी 1986 में शुरू हुई:
\r\n\r\n- \r\n
- \r\n 30 अगस्त, 1986: भूखंड संख्या 661/6 काजीपुर निवासी वीर सिंह को आवंटित किया गया।\r\n \r\n
- \r\n 6 अक्टूबर, 1988: इसकी फ्री होल्ड डीड (Freehold Deed) जारी की गई। इसमें स्पष्ट शर्त थी कि जमीन का उपयोग केवल 'आवासीय' (Residential) होगा।\r\n \r\n
- \r\n नियमों का उल्लंघन: कुछ वर्षों बाद, विनोद अरोड़ा नामक व्यक्ति ने 'पावर ऑफ अटॉर्नी' (Power of Attorney) के जरिए इस संपत्ति का नियंत्रण लिया और वहां आवासीय घर की जगह 22 व्यावसायिक दुकानें खड़ी कर दीं।\r\n \r\n
\r\n\r\n
यह केवल एक भूखंड की कहानी नहीं थी, बल्कि यह उस प्रवृत्ति की शुरुआत थी जिसने धीरे-धीरे पूरे आवासीय क्षेत्र को एक व्यस्त बाजार में बदल दिया।
\r\n\r\n\r\n\r\n
नोटिस का खेल और अधिकारियों की मिलीभगत
\r\n\r\nसुप्रीम कोर्ट ने अपनी सुनवाई में अधिकारियों की भूमिका पर भी तीखी टिप्पणी की है। कोर्ट ने माना कि यह अवैध निर्माण रातों-रात नहीं हुआ, बल्कि दशकों तक अधिकारियों की नाक के नीचे चलता रहा।
\r\n\r\n\r\n\r\n
इतिहास गवाह है कि कैसे कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित रही:
\r\n\r\n- \r\n
- \r\n 19 सितंबर, 1990: आवास विकास ने पहली बार इसे अवैध मानते हुए नोटिस दिया। काम रोकने को कहा गया, लेकिन निर्माण जारी रहा।\r\n \r\n
- \r\n 9 फरवरी, 2004: उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद अधिनियम की धारा-83 के तहत आदेश दिया गया कि या तो निर्माण रोकें या ध्वस्त करें।\r\n \r\n
- \r\n 23 मार्च, 2005: बाकायदा ध्वस्तीकरण आदेश (Demolition Order) पारित हुआ। लेकिन बुलडोजर कभी मौके पर नहीं पहुंचा।\r\n \r\n
- \r\n 2014: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी ध्वस्तीकरण का आदेश दिया, लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट में अपील के चलते लटक गया।\r\n \r\n
\r\n\r\n
अंततः 17 दिसंबर, 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने लंबी कानूनी लड़ाई के बाद फैसला सुनाया कि 661/6 और ऐसे अन्य निर्माणों को ध्वस्त किया जाए। कोर्ट ने कहा कि "लंबे समय से चला आ रहा अवैध कब्जा या निर्माण उसे कानूनी नहीं बना देता"।
\r\n\r\n\r\n\r\n
अक्टूबर 2025 का वो मंजर: जब गरजा बुलडोजर
\r\n\r\n27 जनवरी 2026 के आदेश की गंभीरता को समझने के लिए हमें कुछ महीने पीछे, 25 अक्टूबर 2025 की घटनाओं को याद करना होगा। जब कोर्ट की अवमानना (Contempt of Court) का मामला बना, तो प्रशासन हरकत में आया।
\r\n\r\n\r\n\r\n
आरटीआई कार्यकर्ता की जिद्द: आरटीआई कार्यकर्ता लोकेश खुराना (Lokesh Khurana) ने जब देखा कि कोर्ट के आदेश के बावजूद कार्रवाई नहीं हो रही, तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर की। इसी याचिका ने सोए हुए प्रशासन को जगाया।
\r\n\r\n\r\n\r\n
कार्रवाई का दिन: 25 अक्टूबर, 2025 को भारी पुलिस बल की मौजूदगी में आवास विकास की टीम ने भूखंड संख्या 661/6 पर बनी 22 दुकानों को जमींदोज कर दिया। उस दिन व्यापारियों के आंसू और विरोध प्रशासन की सख्ती के आगे बेअसर साबित हुए।
\r\n\r\n\r\n\r\n
राजनीतिक आश्वासन और 'बाजार स्ट्रीट' का फॉर्मूला
\r\n\r\nअक्टूबर 2025 में हुई कार्रवाई के बाद, मेरठ का राजनीतिक पारा चढ़ गया था। व्यापारियों के आक्रोश को देखते हुए सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों के नेता मैदान में उतर आए थे।
\r\n\r\n\r\n\r\n
- \r\n
- \r\n 28 अक्टूबर, 2025: सपा विधायक अतुल प्रधान ने व्यापारियों के समर्थन में धरना दिया।\r\n \r\n
- \r\n 29 अक्टूबर, 2025: भाजपा सांसद अरुण गोविल और कैंट विधायक अमित अग्रवाल मौके पर पहुंचे। उन्होंने भरोसा दिलाया कि "अब एक भी दुकान नहीं टूटेगी"।\r\n \r\n
- \r\n विधायक का फॉर्मूला: कैंट विधायक अमित अग्रवाल ने सुझाव दिया था कि मास्टर प्लान (Master Plan) में संशोधन करके इस क्षेत्र को 'बाजार स्ट्रीट' घोषित कर दिया जाए, जिससे निर्माण वैध हो सकें।\r\n \r\n
- \r\n महापौर का वादा: महापौर ने घोषणा की थी कि जिनकी दुकानें टूटी हैं, उन्हें नगर निगम के कॉम्प्लेक्स में जगह दी जाएगी।\r\n \r\n
\r\n\r\n
लेकिन आज, फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट के ताजा रुख ने इन सभी राजनीतिक वादों की हवा निकाल दी है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि मास्टर प्लान का उल्लंघन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
\r\n\r\n\r\n\r\n
1478 संपत्तियों पर रिपोर्ट तलब: प्रशासन में हड़कंप
\r\n\r\nसुप्रीम कोर्ट ने अब केवल एक भूखंड तक सीमित न रहकर, पूरी शास्त्री नगर योजना की जांच के आदेश दिए हैं। आवास विकास परिषद ने अपनी प्रारंभिक जांच में शास्त्री नगर योजना संख्या 3 और 7 में कुल 1478 निर्माण चिह्नित किए हैं जो आवासीय भूखंडों पर व्यावसायिक गतिविधियों में लिप्त हैं।
\r\n\r\n\r\n\r\n
कोर्ट के निर्देश:
\r\n\r\n- \r\n
- \r\n स्टेटस रिपोर्ट: 1478 निर्माणों की वर्तमान स्थिति क्या है?\r\n \r\n
- \r\n अधिकारियों पर कार्रवाई: उन अधिकारियों के नाम और उन पर की गई कार्रवाई का ब्यौरा, जिनके कार्यकाल में ये अवैध निर्माण हुए।\r\n \r\n
- \r\n समय सीमा: 6 सप्ताह।\r\n \r\n
\r\n\r\n
उप आवास आयुक्त (मेरठ जोन) अनिल कुमार सिंह ने पुष्टि की है कि विभाग सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुपालन में विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रहा है। उन्होंने कहा, "सुप्रीम कोर्ट के आदेश सर्वोपरि हैं। हम निर्धारित समय सीमा के भीतर रिपोर्ट सौंपेंगे और कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार ही आगे की कार्रवाई होगी।"
\r\n\r\n\r\n\r\n
व्यापारियों का दर्द: "बर्बाद करके क्या मिलेगा?"
\r\n\r\nसेंट्रल मार्केट के व्यापारी इस समय गहरे सदमे में हैं। उनका कहना है कि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी की कमाई इन दुकानों में लगा दी है।
\r\n\r\n\r\n\r\n
- \r\n
- \r\n व्यापारी आलोक सोम का दर्द छलक पड़ा: "40 साल लगे इस प्रतिष्ठान को खड़ा करने में। अगर एक झटके में सब टूट गया तो हम कहां जाएंगे? सुप्रीम कोर्ट का आदेश है, इसलिए हम सड़क पर उतरकर विरोध भी नहीं कर सकते। लेकिन सवाल यह है कि याचिकाकर्ता को हजारों परिवारों को बर्बाद करके क्या मिला?"\r\n \r\n
- \r\n किशन गिरधर, एक अन्य पुराने व्यापारी, ने कहा: "38 साल से यहाँ दुकान है। यही हमारी दुनिया है। इस उम्र में अगर दुकान छिन गई, तो हमें नौकरी कौन देगा? यह आदेश व्यापारी हित में नहीं है, यह मानवीय आधार पर गलत है।"\r\n \r\n
\r\n\r\n
व्यापारियों का तर्क है कि जब प्रशासन उनसे कॉमर्शियल टैक्स और बिजली का बिल वसूलता रहा, तब अवैध निर्माण की याद क्यों नहीं आई?
\r\n\r\n\r\n\r\n
कानूनी पहलू: अवैध निर्माण कभी वैध नहीं होता
\r\n\r\nसुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में एक महत्वपूर्ण नजीर पेश की है। राजेंद्र कुमार बड़जात्या बनाम यूपी आवास एवं विकास परिषद मामले में कोर्ट ने कहा कि:
\r\n\r\n\r\n\r\n
\r\n\r\n\r\n"केवल इसलिए कि कोई अवैध निर्माण लंबे समय से खड़ा है, उसे वैध नहीं माना जा सकता। यदि हम इसे अनुमति देते हैं, तो यह कानून का पालन करने वाले नागरिकों के साथ अन्याय होगा और अराजकता को बढ़ावा देगा।"\r\n
\r\n\r\n
यह टिप्पणी उन सभी तर्क का खंडन करती है जो "30 साल पुरानी दुकान" या "रोजी-रोटी" की दुहाई देकर कार्रवाई रोकने की मांग कर रहे थे।
\r\n\r\n\r\n\r\n
आगे क्या होगा?
\r\n\r\nअब सबकी निगाहें 6 सप्ताह बाद होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं। संभावनाएं निम्नलिखित हैं:
\r\n\r\n\r\n\r\n
- \r\n
- \r\n बड़े पैमाने पर ध्वस्तीकरण: यदि कोर्ट अपनी सख्ती बरकरार रखता है, तो मेरठ के इतिहास का सबसे बड़ा ध्वस्तीकरण अभियान चल सकता है।\r\n \r\n
- \r\n भारी जुर्माना (Compounding): क्या कोर्ट कोई बीच का रास्ता निकालेगा जिसमें भारी जुर्माना लगाकर निर्माणों को नियमित किया जाए? इसकी संभावना कम दिखती है क्योंकि यह 'लैंड यूज़ चेंज' (Land Use Change) का गंभीर मामला है।\r\n \r\n
- \r\n अधिकारियों पर गाज: इस बार केवल दुकानें नहीं टूटेंगी, बल्कि उन रिटायर्ड और सेवारत अधिकारियों पर भी गाज गिरेगी जिन्होंने समय रहते आंखें मूंद ली थीं।\r\n \r\n
\r\n\r\n
मेरठ सेंट्रल मार्केट का यह मामला अब केवल एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक नजीर बन गया है। यह स्पष्ट करता है कि कानून के हाथ लंबे होते हैं और देर-सवेर उनका प्रहार जरूर होता है। व्यापारियों की पीड़ा वास्तविक है, लेकिन अनियोजित शहरी विकास (Unplanned Urban Development) के खतरों को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता।
\r\n\r\n\r\n\r\n
आगामी 6 सप्ताह मेरठ के व्यापारिक भविष्य की दशा और दिशा तय करेंगे। फिलहाल, सेंट्रल मार्केट के व्यापारियों के पास प्रार्थना और चमत्कार की उम्मीद के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।
\r\n\r\n\r\n\r\n
सुप्रीम कोर्ट ने 27 जनवरी 2026 को सुनवाई करते हुए मेरठ सेंट्रल मार्केट के 1478 अवैध निर्माणों पर 6 सप्ताह में रिपोर्ट मांगी है। कोर्ट ने पूर्व में 17 दिसंबर 2024 को भूखंड 661/6 के ध्वस्तीकरण आदेश को सही ठहराया था। व्यापारियों में भय का माहौल है, जबकि आवास विकास परिषद रिपोर्ट तैयार करने में जुट गया है। राजनीतिक आश्वासन अब विफल नजर आ रहे हैं।
Sabse pehle comment karne wale banein.