उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर स्थित शास्त्रीनगर इलाके में पिछले कई दिनों से दहशत और असमंजस का माहौल था। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और आवास विकास परिषद (Awas Vikas Parishad) के कड़े रुख के कारण सेंट्रल मार्केट ध्वस्तीकरण की तलवार व्यापारियों के सिर पर लटक रही थी। पिछले दो दिनों से मुख्य बाजार पूरी तरह बंद था और व्यापारी धरने पर बैठे थे। लेकिन, रविवार की शाम ढलते-ढलते कुछ ऐसा हुआ जिसने मायूस चेहरों पर अचानक खुशी की लहर दौड़ा दी। सेंट्रल मार्केट के ध्वस्तीकरण मामले में 80 व्यापारियों को भू-उपयोग (Land Use) बदलने का आधिकारिक नोटिस प्राप्त हुआ है। इस नोटिस के आते ही व्यापारियों ने राहत की सांस ली और एक-दूसरे को गुलाल लगाकर समय से पहले ही होली का जश्न मनाया।READ ALSO:-यूपी में गहराया बिजली संकट: मार्च में ही डिमांड 19 हजार मेगावाट पार, चरमराई ट्रांसमिशन व्यवस्था; गर्मियों में क्या होगा हाल?
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नई भवन निर्माण एवं विकास उपविधि के तहत वास्तुविद नियोजक की ओर से इन 80 व्यापारियों को शमन शुल्क (Compounding Fee) जमा कराने के निर्देश दिए गए हैं। हालांकि, इस आदेश ने बाजार में एक नई बहस को भी जन्म दे दिया है। जहां बड़े व्यापारियों के लिए यह एक जीवनदान की तरह है, वहीं छोटे व्यापारियों के माथे पर अभी भी चिंता की लकीरें साफ देखी जा सकती हैं। (Internal link: उत्तर प्रदेश में अवैध निर्माण और शहरी नियोजन की चुनौतियां)
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भू-उपयोग परिवर्तन: क्या है नई नीति और कितनी है फीस?
\r\n\r\nसेंट्रल मार्केट ध्वस्तीकरण की कार्रवाई को रोकने के लिए आवास विकास परिषद ने एक मध्य मार्ग निकाला है। जो निर्माण मूल रूप से आवासीय भूखंडों पर किए गए थे और वर्तमान में वहां व्यावसायिक गतिविधियां (शोरूम, दुकानें, कॉम्प्लेक्स) संचालित हो रही हैं, उन्हें अब नियमित (Regularize) करने का मौका दिया जा रहा है।
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आवास विकास परिषद लखनऊ से प्राप्त महत्वपूर्ण पत्र और बोर्ड बैठक में मिली मंजूरी के बाद, व्यापारियों को सशुल्क भू-उपयोग परिवर्तन (Paid Land Use Change) का आदेश दिया गया है। इसके तहत:
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- \r\n शमन शुल्क की दर: सेंट्रल मार्केट के लिए 36,000 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर तय की गई है।\r\n \r\n
- \r\n नियम और शर्तें: व्यापारियों को न केवल यह भारी-भरकम शुल्क जमा करना होगा, बल्कि भवन निर्माण उपविधि के अनुसार अपनी दुकानों के सामने निर्धारित 'सेट बैक' (Setback - खाली जगह) भी छोड़ना अनिवार्य होगा।\r\n \r\n
- \r\n अलग-अलग ब्लॉक, अलग दरें: प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि हर सेक्टर और ब्लॉक के लिए सड़कों की चौड़ाई और व्यावसायिक उपयोग के आधार पर अलग-अलग दरें निर्धारित की गई हैं।\r\n \r\n
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इस फैसले से उन 80 व्यापारियों को तुरंत राहत मिली है जिन्होंने पहले चरण में शमन के लिए आवेदन किया था और जिनकी आपत्तियों का निस्तारण वास्तुविद नियोजक द्वारा कर दिया गया है।
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सेंट्रल मार्केट ध्वस्तीकरण की पृष्ठभूमि: आखिर नौबत यहां तक कैसे पहुंची?
\r\n\r\nइस पूरे विवाद को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। मेरठ का शास्त्रीनगर इलाका मुख्य रूप से एक आवासीय योजना (Residential Scheme) के तहत विकसित किया गया था। लेकिन समय के साथ, मुख्य सड़कों के किनारे स्थित आवासीय भूखंडों पर अवैध रूप से व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स और दुकानें तनती चली गईं। आज की तारीख में इस क्षेत्र में 1400 से अधिक ऐसे निर्माण हैं जो आवासीय भूखंडों पर अवैध रूप से व्यावसायिक गतिविधियां चला रहे हैं।
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मामला तब तूल पकड़ गया जब एक अवमानना याचिका (Contempt Petition) पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाया। सर्वोच्च न्यायालय ने 27 जनवरी को 6 सप्ताह के भीतर सेंट्रल मार्केट ध्वस्तीकरण की कार्रवाई पूरी करने के सख्त निर्देश दिए थे। कोर्ट ने साफ कहा था कि अवैध निर्माणों को खुद हटाया जाए, अन्यथा परिषद मशीनें लगाकर इन्हें ध्वस्त करे।
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इसी दबाव के चलते आवास विकास परिषद ने युद्ध स्तर पर कार्रवाई शुरू की थी। विभाग की ओर से व्यापारियों को 15 दिन का समय देते हुए अवैध निर्माण खुद हटाने के नोटिस चस्पा किए गए थे। जब समय सीमा नजदीक आने लगी, तो व्यापारियों में हड़कंप मच गया, जिसके परिणामस्वरूप बाजार बंद और धरने का दौर शुरू हुआ।
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छोटे व्यापारियों की परेशानी: 36 हजार रुपये प्रति वर्ग मीटर का भारी बोझ
\r\n\r\nयद्यपि 80 व्यापारियों को मिले नोटिस ने तात्कालिक रूप से सेंट्रल मार्केट ध्वस्तीकरण की कार्रवाई को रोक दिया है, लेकिन यह समाधान सभी के लिए मुफीद नहीं है। 36,000 रुपये प्रति वर्ग मीटर का शुल्क एक बहुत बड़ी रकम है।
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बाजार के जानकारों और व्यापारी नेताओं का कहना है कि:
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- \r\n बड़े शोरूम मालिकों का फायदा: जिनके पास बड़े शोरूम हैं और जिनका टर्नओवर करोड़ों में है, वे बैंक से लोन लेकर या अपनी जमा पूंजी से यह शमन शुल्क आसानी से चुका सकते हैं। उनके लिए अपनी करोड़ों की संपत्ति बचाने के लिए कुछ लाख रुपये देना घाटे का सौदा नहीं है।\r\n \r\n
- \r\n छोटे दुकानदारों का दर्द: वे छोटे व्यापारी जो महज 10x10 या उससे थोड़ी बड़ी दुकानों में अपना गुजर-बसर कर रहे हैं, उनके लिए लाखों रुपये का शमन शुल्क जुटाना रातों-रात संभव नहीं है।\r\n \r\n
- \r\n सेट बैक की समस्या: कई दुकानें इतनी छोटी हैं कि अगर वे नियमानुसार सेट बैक (आगे की जगह) छोड़ते हैं, तो उनकी दुकान का अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा।\r\n \r\n
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यही कारण है कि नोटिस मिलने के बाद जहां एक वर्ग में खुशी की लहर है, वहीं छोटे व्यापारियों की परेशानी और मानसिक तनाव अभी भी खत्म नहीं हुआ है।
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व्यापारियों में दो फाड़: तिरंगा व्यापार संघ का अलग रुख
\r\n\r\nसेंट्रल मार्केट ध्वस्तीकरण के इस गंभीर संकट के बीच व्यापारियों की एकता भी दरकती हुई नजर आई। जब आवास विकास के बुलडोजर का डर सताने लगा, तो बाजार में विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। पिछले दो दिन से मेन सेंट्रल मार्केट पूरी तरह बंद था और व्यापारी धरने पर बैठे हुए थे।
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लेकिन रविवार सुबह बाजार बंद कराने को लेकर व्यापारियों के गुटों में तीखी बहस हो गई और वे दो फाड़ हो गए। 'तिरंगा व्यापार संघ' (Tiranga Vyapar Sangh) ने हड़ताल का समर्थन करने से इनकार कर दिया। उनकी ओर से बाजार बंद नहीं किया गया और लगातार दुकानें खोली गईं। तिरंगा व्यापार संघ का तर्क था कि बाजार बंद करने से प्रशासन पर दबाव बनने के बजाय आम जनता और व्यापारियों का ही आर्थिक नुकसान हो रहा है। इसके विपरीत, धरना दे रहे व्यापारियों का मानना था कि जब तक पूर्ण समाधान नहीं निकलता, तब तक एकजुट होकर प्रशासन के खिलाफ आवाज बुलंद करनी चाहिए।
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देर रात पुलिस ने आवास विकास कार्यालय के सामने धरना दे रहे व्यापारियों को वहां से हटा दिया, जिसके बाद से स्थिति और भी तनावपूर्ण बनी हुई थी, लेकिन भू-उपयोग परिवर्तन के नोटिस ने माहौल को कुछ हद तक शांत कर दिया है।
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द रिलायबल कंपनी और पूर्व की ध्वस्तीकरण कार्रवाई
\r\n\r\nव्यापारियों का डर बेबुनियाद नहीं था। आवास विकास परिषद इस बार पूरी तरह से एक्शन के मूड में थी। इससे पहले विभाग ने पिछले साल ही 'द रिलायबल कंपनी' (The Reliable Company) नामक एक ठेकेदार फर्म को 85 लाख रुपये में 661/6 और 31 अन्य व्यावसायिक भूखंडों में किए गए अवैध निर्माणों के ध्वस्तीकरण का ठेका दिया था।
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याद दिला दें कि बीते साल 25 और 26 अक्टूबर को इसी इलाके में 661/6 नंबर के प्लॉट पर बने एक बड़े व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स का भारी पुलिस बल की मौजूदगी में ध्वस्तीकरण कर दिया गया था। जब सुप्रीम कोर्ट की नई डेडलाइन करीब आई, तो विभाग ने फिर से उसी कंपनी को मशीनें (JCB और बुलडोजर) लेकर आने का निर्देश दिया था।
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परिषद ने सेंट्रल मार्केट ध्वस्तीकरण के लिए सोमवार (आगामी कार्यदिवस) को भारी पुलिस फोर्स की मांग भी कर ली थी। मशीनों को स्टैंडबाय पर रखा गया था। इन निर्देशों में अभी तक आधिकारिक तौर पर कोई बदलाव नहीं हुआ है, जिससे बाकी बचे उन सैकड़ों व्यापारियों की सांसें अटकी हुई हैं जिन्हें अभी तक शमन का नोटिस नहीं मिला है।
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सूना बाजार और नदारद खरीदार: रविवार का हाल
\r\n\r\nध्वस्तीकरण की दहशत का सीधा असर बाजार की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। रविवार, जो आमतौर पर सेंट्रल मार्केट में सबसे ज्यादा भीड़भाड़ और व्यापार का दिन होता है, पूरी तरह से सूना रहा। मेन सेंट्रल मार्केट में सन्नाटा पसरा था।
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हालांकि, तिरंगा व्यापार संघ के आह्वान पर व्यावसायिक भूखंडों पर बनी कुछ दुकानें दोपहर बाद खुलीं, लेकिन डर और असमंजस के माहौल के कारण खरीदार नदारद रहे। बाजार में एक अजीब सा खौफ था। अरोड़ा गारमेंट्स के सामने खाली स्थान पर डरे हुए व्यापारी धरने पर बैठे रहे।
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सबसे दुखद दृश्य यह था कि कई व्यापारी प्रशासन की कार्रवाई से बचने के लिए अपनी ही दुकानों के बोर्ड, बाहर निकले हुए शेड और अस्थाई स्ट्रक्चर खुद ही हटाने का काम करते रहे। भीतरी इलाकों में, जहां ध्वस्तीकरण का खतरा सबसे ज्यादा था, वहां दुकानों के शटर लगातार गिरते और बंद होते रहे।
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आगे क्या होगा? सोमवार की बैठक पर टिकी हैं निगाहें
\r\n\r\nभले ही 80 व्यापारियों को 36 हजार रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर से शमन शुल्क जमा करने का निर्देश मिल गया हो, लेकिन सेंट्रल मार्केट ध्वस्तीकरण का मामला पूरी तरह से शांत नहीं हुआ है। 1400 से अधिक निर्माणों में से केवल 80 को राहत मिलना ऊंट के मुंह में जीरा के समान है।
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यही वजह है कि अभी तक यह पूरी तरह साफ नहीं है कि बचे हुए हिस्सों में ध्वस्तीकरण होगा या नहीं। इस पूरे मामले का निर्णायक मोड़ सोमवार शाम को आएगा। आवास विकास परिषद के उच्चाधिकारियों की सोमवार शाम एक महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है। इस बैठक में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की जाने वाली अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) की रूपरेखा तय की जाएगी और यह फैसला लिया जाएगा कि जिन व्यापारियों ने शमन शुल्क के लिए आवेदन नहीं किया है, उनके खिलाफ कब और कैसे बल प्रयोग किया जाए।
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व्यापारी नेता और स्थानीय जन प्रतिनिधि लगातार प्रशासन के संपर्क में हैं ताकि एक ऐसी सर्वमान्य नीति बनाई जा सके जिससे छोटे व्यापारियों का व्यापार भी बच जाए और न्यायालय के आदेशों का पालन भी हो सके।
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मेरठ के शास्त्रीनगर स्थित सेंट्रल मार्केट ध्वस्तीकरण का मामला शहरी नियोजन की विफलता और व्यावसायिक दबाव के बीच एक क्लासिक टकराव का उदाहरण बन गया है। सुप्रीम कोर्ट के कड़े निर्देशों के बाद एक्शन में आई आवास विकास परिषद ने जहां एक ओर ध्वस्तीकरण का खौफ पैदा किया, वहीं भू-उपयोग परिवर्तन नीति के तहत 80 व्यापारियों को शमन शुल्क (36,000 रुपये प्रति वर्ग मीटर) जमा करने का नोटिस देकर एक बीच का रास्ता भी निकाला है।
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इस नोटिस ने बड़े व्यापारियों को होली मनाने का मौका तो दे दिया है, लेकिन छोटे व्यापारी अभी भी आर्थिक बोझ और सेट बैक के नियमों के कारण खौफजदा हैं। व्यापारियों की आपसी गुटबाजी (तिरंगा व्यापार संघ का अलग रुख) ने भी इस आंदोलन को कमजोर किया है। अब सबकी निगाहें सोमवार शाम होने वाली आवास विकास के अधिकारियों की बैठक पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि क्या सेंट्रल मार्केट के बाकी हिस्सों पर बुलडोजर चलेगा या फिर सरकार छोटे व्यापारियों के लिए भी कोई नई रियायती योजना लेकर आएगी।
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मेरठ के शास्त्रीनगर में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर होने वाले सेंट्रल मार्केट ध्वस्तीकरण को लेकर प्रशासन और व्यापारियों के बीच तनाव चरम पर था। इसी बीच, आवास विकास परिषद ने 80 व्यापारियों को बड़ी राहत देते हुए 36,000 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर से शमन शुल्क जमा कर भू-उपयोग (आवासीय से व्यावसायिक) बदलने की मंजूरी दे दी है। इस फैसले से खुश व्यापारियों ने रविवार को गुलाल उड़ाकर होली खेली। हालांकि, भारी-भरकम फीस के कारण छोटे व्यापारी अभी भी चिंतित हैं और बाजार में व्यापारी संघों के बीच गुटबाजी भी सामने आई है। ध्वस्तीकरण की पूर्ण स्थिति सोमवार शाम होने वाली विभागीय बैठक के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
Sabse pehle comment karne wale banein.