मेरठ: शहर में अवैध तरीके से खड़े किए गए कॉम्प्लेक्सों के खिलाफ दायर की गई जनहित याचिका (PIL) पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शुक्रवार को सुनवाई पूरी कर ली है और अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। करीब 15 मिनट तक चली जोरदार बहस के बाद न्यायालय के इस कदम से मेरठ शहर में खड़े 70 से अधिक अन्य अवैध निर्माणों पर भी कार्रवाई की तलवार लटक गई है।READ ALSO:-Bijnor Crime: ट्यूशन टीचर ने 12 साल की छात्रा से किया दुष्कर्म, BSA ने जेल भेजे गए सरकारी शिक्षक को तत्काल किया निलंबित
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याचिकाकर्ता और आरटीआई कार्यकर्ता मनोज चौधरी के अनुसार, हाईकोर्ट का यह फैसला मेरठ अवैध कॉम्प्लेक्स कार्रवाई की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। यह दिखाता है कि न्यायालय अवैध निर्माणों के खिलाफ सख्त रुख अपना रहा है।
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क्या है जनहित याचिका और कौन हैं याचिकाकर्ता?
\r\n\r\nमिशन कम्पाउंड निवासी मनोज चौधरी एक सक्रिय आरटीआई कार्यकर्ता हैं, जो लंबे समय से जनहित याचिकाओं के माध्यम से शहर की समस्याओं को उठाते रहे हैं। 1 अगस्त, 2025 को मनोज चौधरी ने पहली बार मेरठ के दो अवैध कॉम्प्लेक्सों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। 4 अगस्त, 2025 को चीफ जस्टिस कोर्ट ने याचिका को स्वीकार कर लिया था।
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हालांकि, 4 अगस्त को हुई शुरुआती सुनवाई में कोर्ट ने याचिकाकर्ता से पूछा कि जब शहर में कई अवैध निर्माण हैं, तो उन्होंने केवल दो का ही जिक्र क्यों किया है? इसके बाद 7 अगस्त को मनोज चौधरी ने याचिका में संशोधन किया और शहर के आठ अन्य अवैध कॉम्प्लेक्सों का विवरण जोड़ते हुए कुल 10 अवैध निर्माणों पर सवाल उठाए।
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इन बड़े अवैध निर्माणों को लेकर उठाए गए सवाल
\r\n\r\nशुरुआत में याचिका में पीएल शर्मा रोड पर बनी एक बेकरी और शिवाजी रोड के एक निर्माणाधीन अस्पताल को शामिल किया गया था। लेकिन संशोधित याचिका में निम्नलिखित प्रमुख अवैध निर्माणों को निशाना बनाया गया, जो सभी नियमों का उल्लंघन कर बनाए गए थे:
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- \r\n बेगमपुल का निर्माणाधीन कॉम्प्लेक्स\r\n \r\n
- \r\n उदय सिटी का एक कॉम्प्लेक्स\r\n \r\n
- \r\n कबाड़ी बाजार का निर्माणाधीन कॉम्प्लेक्स\r\n \r\n
- \r\n पल्लवपुरम सर्विस रोड पर बनाए गए तीन कॉम्प्लेक्स\r\n \r\n
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इन सभी निर्माणों में सेटबैक (setback) और फ्लोर एरिया रेश्यो (FAR) जैसे नियमों का उल्लंघन किया गया था, जिसके चलते मेरठ अवैध कॉम्प्लेक्स कार्रवाई की आवश्यकता महसूस हुई।
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MDA की ढिलाई और सुनवाई का लंबा सफर
\r\n\r\nयाचिकाकर्ता मनोज चौधरी ने बताया कि शुरुआत में मेरठ विकास प्राधिकरण (MDA) ने इस जनहित याचिका पर कोई गंभीरता नहीं दिखाई। 11 सितंबर को पहली सुनवाई पर MDA के अधिवक्ता कोर्ट में उपस्थित नहीं हुए। इसके बाद कोर्ट ने एक के बाद एक छह बार (18 सितंबर, 25 सितंबर, 9 अक्टूबर, 16 अक्टूबर और 30 अक्टूबर) तारीखें दीं, लेकिन प्राधिकरण की ओर से कोई गंभीरता नहीं दिखाई गई।
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7 नवंबर को दोनों पक्षों के अधिवक्ता कोर्ट में मौजूद थे, लेकिन चीफ जस्टिस की अनुपस्थिति के कारण याचिका को कोर्ट नंबर 21 में स्थानांतरित कर दिया गया था। इसके बाद अगली सुनवाई की तिथि 14 नवंबर निर्धारित की गई।
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15 मिनट की बहस के बाद फैसला सुरक्षित
\r\n\r\nशुक्रवार, 14 नवंबर को चीफ जस्टिस कोर्ट में याचिका पर सुनवाई हुई। 11:30 बजे शुरू हुई बहस करीब 11:50 बजे तक चली, यानी लगभग 15 मिनट। याचिकाकर्ता की तरफ से अधिवक्ता सौरभ सिंह ने मजबूती से अपना पक्ष रखा। उन्हें अधिवक्ता अनूप बरनवाल और निशांत कुमार राय ने सहयोग दिया।
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करीब 15 मिनट की बहस सुनने के बाद, न्यायालय ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया, जिसके देर शाम तक सुनाए जाने की उम्मीद है। याचिकाकर्ता का मानना है कि इस फैसले पर न केवल याचिका में शामिल 10 अवैध कॉम्प्लेक्सों पर, बल्कि शहर में खड़े अन्य 70 से अधिक अवैध निर्माणों पर भी मेरठ अवैध कॉम्प्लेक्स कार्रवाई का भविष्य निर्भर करता है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट में मेरठ अवैध कॉम्प्लेक्स कार्रवाई से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई पूरी हो चुकी है और कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित कर लिया है। आरटीआई कार्यकर्ता मनोज चौधरी द्वारा दायर यह याचिका मेरठ विकास प्राधिकरण (MDA) के लिए एक बड़ी चुनौती है और माना जा रहा है कि हाईकोर्ट का फैसला शहर में अवैध निर्माणों पर एक बड़ा और सख्त संदेश देगा, जिससे भविष्य में नियमों के उल्लंघन पर लगाम लग सकेगी।
Sabse pehle comment karne wale banein.