बिजनौर पुलिस ने 2.24 करोड़ की GST चोरी करने वाले अंतर्राज्यीय गिरोह का भंडाफोड़ किया है। शमा परवीन नाम की महिला गरीबों को नौकरी का झांसा देकर आधार कार्ड लेती थी, जिस पर फर्जी फर्में खोली जाती
Published at : 21 Jan 2026, 01:41 PM
Updated at : 11 Sep 2026, 06:28 PM
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Bijnor Police Busts Interstate GST Fraud Gang 4 Arrested for Creating Fake Firms
बुधवार, 21 जनवरी 2026 को बिजनौर पुलिस और क्राइम ब्रांच की संयुक्त टीम ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए फर्जी जीएसटी (GST) फर्में बनाकर सरकार को करोड़ों रुपये के राजस्व का चूना लगाने वाले एक गिरोह को ध्वस्त कर दिया है। यह गिरोह भोली-भाली जनता, विशेषकर गरीब तबके के लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने के नाम पर उनके दस्तावेज ठगता था और फिर उन दस्तावेजों पर करोड़ों का व्यापार दिखा देता था।
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पुलिस ने इस मामले में 2.24 करोड़ रुपये की जीएसटी चोरी (Input Tax Credit Fraud) का खुलासा किया है और उत्तराखंड के जसपुर से चार शातिर जालसाजों को गिरफ्तार किया है।
इस विस्तृत रिपोर्ट में हम आपको इस पूरे घोटाले की 'मोडस ऑपरेंडी' (कार्यप्रणाली), पुलिस की जांच और गिरफ्तारी की पूरी कहानी विस्तार से बताएंगे।
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क्या है पूरा मामला? (The Case Overview)
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यह मामला केवल टैक्स चोरी का नहीं, बल्कि विश्वासघात और गरीबों के शोषण का भी है। राज्य कर विभाग (State Tax Department) और पुलिस के रडार पर यह गिरोह काफी समय से था।
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कैसे शुरू हुई जांच?
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राज्य कर विभाग, धामपुर के डिप्टी कमिश्नर संदीप कुमार वर्मा ने थाना शेरकोट (Sherkot Police Station) में कुल 6 एफआईआर (FIR) दर्ज कराई थीं। विभाग की आंतरिक जांच और डेटा विश्लेषण में यह सामने आया था कि क्षेत्र में कुछ ऐसी फर्में सक्रिय हैं जो हकीकत में कोई व्यापार नहीं कर रही हैं, लेकिन कागजों पर करोड़ों रुपये की खरीद-फरोख्त (Transactions) दिखा रही हैं।
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इन फर्मों का एकमात्र उद्देश्य फर्जी बिल (Fake Invoices) जनरेट करना और सरकार से इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) का अवैध रिफंड लेना था। मामले की गंभीरता को देखते हुए बिजनौर के पुलिस अधीक्षक (SP) ने क्राइम ब्रांच और सर्विलांस सेल को सक्रिय किया। अप्पर पुलिस अधीक्षक (नगर) के नेतृत्व में एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया, जिसने तकनीकी साक्ष्यों और मुखबिरों के नेटवर्क के जरिए इस सिंडिकेट की जड़ों को खोदा।
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ठगी का मास्टरप्लान: शमा परवीन और 'दस्तावेजों' का खेल
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पुलिस की पूछताछ में जो खुलासे हुए हैं, वे हैरान करने वाले हैं। इस गिरोह का काम करने का तरीका बेहद व्यवस्थित (Organized) था और इसमें हर सदस्य की भूमिका तय थी।
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स्टेप 1: शिकार की तलाश (The Bait)
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इस गिरोह की एक महिला सदस्य है—शमा परवीन उर्फ गुड़िया, जो बिजनौर के शेरकोट की रहने वाली है। शमा का काम 'ग्राउंड वर्क' करना था।
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वह ग्रामीण इलाकों में जाती और अनपढ़, मजदूर या बेहद गरीब परिवारों को निशाना बनाती।
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लोगों को भरोसे में लेने के लिए वह कहती कि "सरकार ने नई योजना निकाली है" या "मैं तुम्हें नौकरी दिलवा दूंगी।"
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इस झांसे में आकर ग्रामीण उसे अपने आधार कार्ड, पैन कार्ड और फोटो सौंप देते थे।
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स्टेप 2: दस्तावेजों की सप्लाई
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दस्तावेज हाथ लगते ही शमा उन्हें अपने साथी इंद्रजीत (निवासी जसपुर, उत्तराखंड) को सौंप देती थी। इंद्रजीत इस चेन का 'मिडलमैन' था। वह इन दस्तावेजों को आगे जीशान और अजमल तक पहुँचाता था।
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स्टेप 3: फर्जी फर्म का रजिस्ट्रेशन
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जीशान और अजमल, जो कंप्यूटर और तकनीकी कार्यों में माहिर थे, इन दस्तावेजों का उपयोग करके जीएसटी पोर्टल पर नई फर्में रजिस्टर करते थे।
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ये फर्में उन मजदूरों के नाम पर होती थीं जिन्हें पता भी नहीं होता था कि वे करोड़ों की कंपनी के मालिक बन चुके हैं।
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इन फर्मों के नाम बेहद प्रोफेशनल रखे जाते थे, जैसे—'कामा ट्रेडर्स', 'एमए ट्रेडर्स', 'स्काई एंटरप्राइजेज' आदि।
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स्टेप 4: फर्मों की बिक्री (The Sale)
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एक बार फर्म का जीएसटी नंबर (GSTIN) जनरेट हो जाता, तो यह गिरोह उस फर्म के सारे दस्तावेज (लॉगिन आईडी, पासवर्ड) कादिर नाम के व्यक्ति (निवासी जसपुर) को बेच देता था।
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कीमत: एक फर्म की कीमत महज 50,000 रुपये लगाई जाती थी।
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कादिर इन फर्मों का इस्तेमाल आगे बड़े स्तर पर फर्जी बिल काटने के लिए करता था।
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2.24 करोड़ की चोरी का गणित (The Financial Fraud)
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इस गिरोह ने सरकारी खजाने को कैसे लूटा, इसे समझने के लिए पुलिस ने कुछ उदाहरण पेश किए हैं।
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केस स्टडी 1: एमए ट्रेडर्स (MA Traders)
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यह फर्म एक मजदूर मौ. अफजल के दस्तावेजों पर खोली गई थी।
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जमीनी हकीकत में अफजल एक दिहाड़ी मजदूर है।
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कागजों पर उसकी फर्म ने बिना किसी माल की आवाजाही के 1.22 करोड़ रुपये का टर्नओवर दिखाया।
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इस फर्जी टर्नओवर के आधार पर लगभग 22 लाख रुपये की टैक्स चोरी (ITC Claim) की गई।
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वसीम (पुत्र मो. इकबाल): निवासी जसपुर, उत्तराखंड। (लॉजिस्टिक्स और पैसे का लेनदेन संभालने वाला)।
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बरामदगी (Recovered Items):
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3 कूटरचित (Forged) आधार कार्ड: जिनमें फोटो और नाम में हेरफेर की गई थी।
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10 अन्य आईडी प्रूफ: जो निर्दोष ग्रामीणों के हैं।
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30 फर्मों के दस्तावेज: ये वो फर्में हैं जो या तो बन चुकी थीं या प्रोसेस में थीं।
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3 मोबाइल फोन: जिनमें व्हाट्सएप चैट और जीएसटी पोर्टल के लॉगिन्स मिले हैं।
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फरार मास्टरमाइंड और आगे की जांच
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हालांकि पुलिस ने ऑपरेशनल टीम को पकड़ लिया है, लेकिन इस खेल के असली खिलाड़ी अभी भी पुलिस की पकड़ से दूर हैं। पुलिस ने तीन मुख्य आरोपियों को 'वांटेड' (Wanted) घोषित किया है:
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शाहनवाज (Shahnawaz): इसे गिरोह का मुख्य सरगना माना जा रहा है जो पूरे ऑपरेशन को फंड कर रहा था।
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शमा परवीन उर्फ गुड़िया: वह महिला जो ग्रामीणों को फंसाती थी। पुलिस को शक है कि उसने सैकड़ों लोगों के दस्तावेज चुराए हो सकते हैं।
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कादिर (Qadir): जो 50,000 रुपये में फर्म खरीदकर आगे करोड़ों का वारा-न्यारा करता था।
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पुलिस अधीक्षक (SP Bijnor) ने कहा है कि फरार आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए टीमें दबिश दे रही हैं और जल्द ही उनकी संपत्ति कुर्की की कार्रवाई भी शुरू की जा सकती है।
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क्या है इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) फ्रॉड?
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आम पाठकों के लिए यह समझना जरूरी है कि आखिर यह चोरी होती कैसे है।
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ITC क्या है? जब कोई व्यापारी कच्चा माल खरीदता है, तो वह उस पर टैक्स (GST) चुकाता है। जब वह तैयार माल बेचता है, तो वह ग्राहक से टैक्स वसूलता है। सरकार व्यापारी को सुविधा देती है कि वह खरीदते समय चुकाए गए टैक्स को बेचते समय वसूले गए टैक्स से घटा (Adjust) सकता है। इसे इनपुट टैक्स क्रेडिट कहते हैं।
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फ्रॉड कैसे होता है?
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जालसाज फर्जी फर्म बनाते हैं।
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वे एक फर्जी बिल (Invoice) बनाते हैं कि उन्होंने 1 करोड़ का माल खरीदा (जबकि कोई माल नहीं खरीदा गया)।
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इस बिल पर वे दिखाते हैं कि उन्होंने 18 लाख टैक्स चुकाया है।
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अब वे सरकार से दावा करते हैं कि "चूंकि हमने 18 लाख टैक्स पहले ही दे दिया है, इसलिए हमें टैक्स में छूट दी जाए या रिफंड दिया जाए।"
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इस तरह वे बिना व्यापार किए सरकार का पैसा लूट लेते हैं।
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पुलिस की अपील: अपने दस्तावेज़ सुरक्षित रखें
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बिजनौर पुलिस ने इस खुलासे के बाद एक एडवाइजरी (Advisory) जारी की है। पुलिस ने आम जनता से अपील की है:
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सावधान रहें: कोई भी व्यक्ति अगर आपको मुफ्त में सरकारी योजना, लोन या नौकरी दिलाने के नाम पर आपके आधार कार्ड (Aadhar Card) और पैन कार्ड (PAN Card) की ओरिजिनल कॉपी या फोटो मांगे, तो उसे न दें।
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OTP शेयर न करें: अक्सर ये ठग आपका मोबाइल नंबर रजिस्टर करके ओटीपी मांगते हैं। ओटीपी देते ही आपके नाम पर फर्म रजिस्टर हो जाती है।
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सत्यापन करें: किसी भी योजना के लिए सीधे सरकारी दफ्तर (ब्लॉक या तहसील) में संपर्क करें, किसी बिचौलिये (Middleman) पर भरोसा न करें।
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एक बड़ी सफलता
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बिजनौर पुलिस की यह कार्रवाई सराहनीय है। इसने न केवल सरकारी राजस्व को होने वाले नुकसान को रोका है, बल्कि उन गरीब लोगों को भी कानूनी पचड़ों में फंसने से बचाया है जिनके नाम पर ये फर्में चल रही थीं। अगर यह गिरोह नहीं पकड़ा जाता, तो भविष्य में जीएसटी विभाग का नोटिस उन गरीब मजदूरों के घर पहुँचता, जिनका इन फर्मों से कोई लेना-देना नहीं था।
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यह मामला प्रशासन के लिए भी एक सबक है कि जीएसटी रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया में और अधिक कड़ाई और भौतिक सत्यापन (Physical Verification) की आवश्यकता है।
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FAQs: इस मामले से जुड़े सवाल
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Q1: इन आरोपियों पर कौन सी धाराएं लगाई गई हैं?
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Ans: पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धोखाधड़ी (420 के समकक्ष), जालसाजी (Forgery), आपराधिक साजिश और आईटी एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है। साथ ही जीएसटी अधिनियम के तहत भी कार्रवाई होगी।
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Q2: जिन गरीबों के नाम पर फर्में खुलीं, क्या उन्हें सजा होगी?
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Ans: पुलिस जांच का विषय है। यदि जांच में यह साबित होता है कि वे निर्दोष हैं और उनके साथ धोखाधड़ी हुई है, तो उन्हें गवाह (Witness) बनाया जाएगा, आरोपी नहीं।
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Q3: क्या बिजनौर में और भी ऐसे गिरोह सक्रिय हैं?
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Ans: पुलिस को संदेह है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के सीमावर्ती जिलों में ऐसे और भी सिंडिकेट हो सकते हैं। सर्विलांस टीम डेटा माइनिंग कर रही है।
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Q4: फर्जी फर्म की पहचान कैसे होती है?
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Ans: जीएसटी विभाग डेटा एनालिटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग करता है। यदि कोई फर्म बिना बिजली बिल, बिना गोदाम और बिना ई-वे बिल के भारी टर्नओवर दिखाती है, तो वह रडार पर आ जाती है।
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नोट: यह खबर बिजनौर पुलिस द्वारा 21 जनवरी 2026 को जारी प्रेस विज्ञप्ति और मीडिया ब्रीफिंग पर आधारित है।
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