विशेष रिपोर्ट | लखनऊ
\r\n\r\nक्या आपने कभी सोचा है कि अगर किसी शहर की पूरी आबादी अचानक रातों-रात गायब हो जाए, तो मंजर कैसा होगा? यह किसी हॉलीवुड फिल्म की पटकथा नहीं, बल्कि भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की हकीकत बनती जा रही है। प्रदेश की राजधानी लखनऊ में स्थित इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने जो सवाल उठाए हैं, वे न केवल डराने वाले हैं, बल्कि 'सुरक्षा' और 'सुशासन' के दावों की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी हैं।READ ALSO:-मेरठ विशेष: सेंट्रल मार्केट के ताबूत में सुप्रीम कोर्ट की 'आखिरी कील' — राजनीति, वादे और आश्वासन सब फेल, अब सिर्फ 'चमत्कार' बचा सकता है बाजार!
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पिछले 24 महीनों में उत्तर प्रदेश से 1,08,300 लोग लापता हुए हैं। यह आंकड़ा चौंकाने वाला है, लेकिन इससे भी ज्यादा खौफनाक वह आंकड़ा है जो पुलिस की 'कार्यशैली' को बयां करता है—इन एक लाख से अधिक लोगों में से पुलिस केवल 9,700 लोगों को ही वापस ला पाई है। यानी 90 प्रतिशत से ज्यादा लोग अब भी लापता हैं। क्या वे जीवित हैं? क्या वे तस्करी का शिकार हो गए? या फिर उनकी फाइलें थानों के किसी धूल भरे कोने में हमेशा के लिए बंद हो गई हैं?
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एक पिता की लाचारी से शुरू हुई यह लड़ाई अब एक जन-आंदोलन और न्यायिक सख्ती का रूप ले चुकी है। इस विस्तृत रिपोर्ट में हम जानेंगे कि आखिर यूपी में लोग हवा में कैसे विलीन हो रहे हैं, कोर्ट ने डीजीपी को क्यों तलब किया, और इस त्रासदी के पीछे के असली कारण क्या हैं।
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वह याचिका जिसने सिस्टम को हिला दिया
\r\n\r\nकिसी भी बड़े बदलाव की शुरुआत अक्सर एक व्यक्ति की पीड़ा से होती है। इस मामले में वह व्यक्ति हैं—चिनहट, लखनऊ के निवासी विक्रमा प्रसाद।
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एक पिता का दर्द और पुलिस की उदासीनता
\r\n\r\nजुलाई 2024 का वह दिन विक्रमा प्रसाद के जीवन का सबसे काला दिन साबित हुआ, जब उनका युवा बेटा अचानक लापता हो गया। शुरुआत में, जैसा कि हर भारतीय परिवार करता है, उन्होंने सोचा कि बेटा शायद दोस्तों के पास गया होगा या कहीं रुक गया होगा। लेकिन जब घंटे दिनों में और दिन हफ्तों में बदलने लगे, तो उनका धैर्य टूटने लगा।
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उन्होंने पुलिस की शरण ली। चिनहट थाने में 'गुमशुदगी' की रिपोर्ट दर्ज कराई गई। विक्रमा प्रसाद को उम्मीद थी कि पुलिस, जिसके पास सर्विलांस, मुखबिर तंत्र और जिप्सी का पूरा लवाजमा है, उनके बेटे को पाताल से भी ढूंढ निकालेगी। लेकिन उन्हें क्या मिला? सिर्फ तारीखें और आश्वासन।
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पुलिस ने मामले को रोजनामचा (General Diary - GD) में दर्ज तो किया, लेकिन जांच के नाम पर प्रक्रिया वही पुरानी लकीर पीटने वाली रही। महीनों बीत गए, साल 2025 भी गुजर गया और 2026 आ गया, लेकिन विक्रमा प्रसाद के बेटे का कोई सुराग नहीं लगा। पुलिस के लिए उनका बेटा सिर्फ एक 'केस नंबर' था, लेकिन विक्रमा प्रसाद के लिए वह उनकी जिंदगी था।
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हाईकोर्ट की शरण और 'जनहित' का जन्म
\r\n\r\nजब खाकी वर्दी से उम्मीद टूट गई, तो विक्रमा प्रसाद ने न्याय के मंदिर का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में याचिका दायर की। जब यह मामला न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति ए.के. चौधरी की पीठ के सामने आया, तो जजों की पारखी नजर ने तुरंत भांप लिया कि यह मामला साधारण नहीं है।
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कोर्ट ने महसूस किया कि अगर राजधानी लखनऊ में एक पिता की यह हालत है, तो दूर-दराज के गांवों की स्थिति क्या होगी? न्यायालय ने विक्रमा प्रसाद की व्यक्तिगत याचिका को विस्तार देते हुए इसे "प्रदेश में गुमशुदा व्यक्तियों के संबंध में" (In Re: Missing Persons in the State) शीर्षक से एक जनहित याचिका (Suo Motu PIL) के रूप में स्वीकार कर लिया। यह एक ऐतिहासिक क्षण था जब न्यायपालिका ने कहा—"अब बहुत हो चुका।"
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आंकड़ों का 'पोस्टमार्टम'—सच्चाई जो रूह कंपा दे
\r\n\r\nन्यायालय के आदेश पर राज्य सरकार के अपर मुख्य सचिव (गृह) ने जो शपथ पत्र (Affidavit) दाखिल किया, उसके आंकड़े किसी महामारी से कम नहीं थे। आइए इन आंकड़ों का बारीक विश्लेषण करते हैं।
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भयावह गणित (1 जनवरी 2024 से 18 जनवरी 2026)
\r\n\r\nराज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत डेटा के अनुसार:
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- \r\n कुल दर्ज गुमशुदगी: 1,08,300 व्यक्ति।\r\n \r\n
- \r\n कुल बरामद (Recovered): 9,700 व्यक्ति।\r\n \r\n
- \r\n अभी भी लापता: 98,600 व्यक्ति।\r\n \r\n
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विफलता का प्रतिशत
\r\n\r\nअगर हम इन आंकड़ों को प्रतिशत में बदलें, तो तस्वीर और भी डरावनी हो जाती है:
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- \r\n सफलता दर (Recovery Rate): मात्र 8.95%।\r\n \r\n
- \r\n विफलता दर (Failure Rate): 91.05%।\r\n \r\n
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इसका सीधा अर्थ है कि उत्तर प्रदेश पुलिस के पास आने वाले हर 100 गुमशुदगी के मामलों में से 91 मामलों में पुलिस के हाथ खाली हैं। यह आंकड़ा किसी भी मानक से स्वीकार्य नहीं है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, 90% से अधिक की विफलता दर किसी जांच एजेंसी के 'कोलैप्स' (पूर्ण विफलता) को दर्शाती है।
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प्रति दिन का हिसाब
\r\n\r\nअगर हम पिछले 748 दिनों (लगभग 2 साल) का औसत निकालें:
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- \r\n प्रति दिन गायब होने वाले लोग: औसतन 145 लोग।\r\n \r\n
- \r\n प्रति दिन मिलने वाले लोग: औसतन 13 लोग।\r\n \r\n
- \r\n नेट लॉस (शुद्ध हानि): हर रोज 132 लोग ऐसे हैं जो घर से निकले और फिर कभी वापस नहीं लौटे।\r\n \r\n
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यह संख्या किसी युद्धग्रस्त देश की नहीं, बल्कि उस राज्य की है जो 'उत्तम प्रदेश' बनने की ओर अग्रसर है।
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कोर्ट का 'रौद्र रूप' और 23 मार्च का अल्टीमेटम
\r\n\r\nइलाहाबाद हाईकोर्ट ने इन आंकड़ों को देखने के बाद जो टिप्पणियां कीं, वे इतिहास में दर्ज की जाएंगी। न्यायालय ने साफ कहा कि स्थिति "गंभीर और असंतोषजनक" है।
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न्यायालय की तल्ख टिप्पणियां
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- \r\n "हवा में विलीन होना": कोर्ट ने आश्चर्य व्यक्त किया कि आधुनिक युग में, जब हर हाथ में मोबाइल है और हर चौराहे पर सीसीटीवी, तब 1 लाख लोग कैसे गायब हो सकते हैं? क्या वे हवा में उड़ गए?\r\n \r\n
- \r\n "प्रयास नहीं, परिणाम चाहिए": पुलिस ने जब अपने 'प्रयासों' का जिक्र किया, तो कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उन्हें कागजी प्रयासों में दिलचस्पी नहीं है, उन्हें परिणाम (Result) चाहिए। 9% का रिजल्ट किसी भी परीक्षा में 'फेल' माना जाता है।\r\n \r\n
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DGP और गृह सचिव को तलब करना: इसका मतलब क्या है?
\r\n\r\nआमतौर पर, अदालती सुनवाई में सरकारी वकील या कनिष्ठ अधिकारी सरकार का पक्ष रखते हैं। लेकिन कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आदेश दिया है:
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- \r\n अगली तारीख: 23 मार्च 2026।\r\n \r\n
- \r\n कौन पेश होगा: अपर मुख्य सचिव (गृह) और पुलिस महानिदेशक (DGP), उत्तर प्रदेश।\r\n \r\n
- \r\n माध्यम: वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC)।\r\n \r\n
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यह आदेश पुलिस महकमे के लिए खतरे की घंटी है। जब राज्य का सबसे बड़ा पुलिस अधिकारी (DGP) कोर्ट में खड़ा होता है, तो इसका मतलब है कि सिस्टम की निचली इकाइयां काम नहीं कर रही हैं और अब जवाबदेही शीर्ष नेतृत्व की है। कोर्ट उनसे पूछेगा कि उनके पास इन 98,600 लोगों को खोजने का क्या 'ब्लूप्रिंट' है।
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पुलिस का बचाव—तर्क या बहाने?
\r\n\r\nशपथ पत्र में पुलिस ने अपनी विफलता को छिपाने के लिए कई तर्क दिए, जो कानूनी और तार्किक कसौटी पर खरे नहीं उतरे।
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पुलिस के प्रमुख तर्क:
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- \r\n "वयस्क अपनी मर्जी से जाते हैं": पुलिस का कहना है कि गायब होने वालों में बड़ी संख्या वयस्कों (Adults) की है। वे प्रेम प्रसंग, एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर्स, या पारिवारिक कलह के कारण स्वेच्छा से घर छोड़ देते हैं। ऐसे मामलों में पुलिस का हस्तक्षेप सीमित होता है।\r\n \r\n
- \r\n "सूचना का अभाव": पुलिस का दावा है कि कई बार लोग वापस आ जाते हैं, लेकिन परिवार वाले थाने में आकर सूचना नहीं देते। इसलिए पुलिस के रिकॉर्ड में वे अब भी 'लापता' दिख रहे हैं।\r\n \r\n
- \r\n "तकनीकी सीमाएं": अपराधी या गायब होने वाले लोग मोबाइल सिम बदल लेते हैं, जिससे उन्हें ट्रेस करना मुश्किल होता है।\r\n \r\n
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तर्कों का खंडन (Counter-Arguments):
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- \r\n तर्क 1 पर: अगर लोग अपनी मर्जी से गए हैं, तो पुलिस उन्हें ढूंढकर उनका बयान (Statement) दर्ज क्यों नहीं करती? कानूनन, पुलिस को गुमशुदा व्यक्ति को खोजकर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होता है। केवल यह मान लेना कि "वे मर्जी से गए होंगे", जांच से भागना है।\r\n \r\n
- \r\n तर्क 2 पर: अगर लोग वापस आ गए हैं और पुलिस को नहीं पता, तो यह बीट कांस्टेबल (Beat Constable) और एलआईयू (LIU) की विफलता है। क्या पुलिस का जमीनी नेटवर्क (Intelligence Network) इतना कमजोर हो गया है कि उन्हें अपने इलाके की खबर नहीं?\r\n \r\n
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आखिर कहां जा रहे हैं ये 1 लाख लोग? (गहन पड़ताल)
\r\n\r\nअगर 1 लाख लोग गायब हैं और मिल नहीं रहे, तो वे किसी न किसी भयावह स्थिति में होंगे। विशेषज्ञों और अपराध शास्त्रियों (Criminologists) के अनुसार, इसके पीछे चार प्रमुख "ब्लैक होल" हो सकते हैं:
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1. मानव तस्करी (Human Trafficking) का विशाल जाल
\r\n\r\nउत्तर प्रदेश, नेपाल सीमा से सटा हुआ है और कई राज्यों का केंद्र है। आशंका है कि यूपी मानव तस्करी का 'सोर्स हब' (Source Hub) बन गया है।
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- \r\n महिलाएं और बच्चियां: वेश्यावृत्ति (Prostitution) के लिए मुंबई, दिल्ली, या खाड़ी देशों (Gulf Countries) में भेजी जा रही हैं।\r\n \r\n
- \r\n बच्चे: भीख मांगने वाले गिरोहों, ईंट-भट्ठों पर बाल मजदूरी, या घरेलू नौकर के रूप में काम करने के लिए दूसरे राज्यों में बेचे जा रहे हैं।\r\n \r\n
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2. अंग तस्करी (Organ Trade)
\r\n\r\nहालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में लोगों का बिना सुराग गायब होना अंग तस्करी के सिंडिकेट की ओर भी इशारा करता है। गरीब और बेसहारा लोग अक्सर इसका आसान शिकार बनते हैं।
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3. आधुनिक दासता (Modern Slavery)
\r\n\r\nपंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बड़े फार्म हाउसों या दूरदराज की फैक्ट्रियों में 'बांडेड लेबर' (बंधुआ मजदूरी) के लिए लोगों का अपहरण किया जाता है। वहां उनसे संपर्क के सारे साधन छीन लिए जाते हैं, जिससे वे पुलिस या परिवार तक नहीं पहुंच पाते।
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4. "अनआइडेंटिफाइड डेड बॉडीज" (Unidentified Dead Bodies)
\r\n\r\nहर साल हजारों लावारिस लाशें मिलती हैं जिनका अंतिम संस्कार पुलिस 'लावारिस' मानकर कर देती है। क्या पुलिस के पास इन लावारिस लाशों का डीएनए डेटाबेस है? क्या इन 1 लाख गायब लोगों का मिलान उन लावारिस लाशों से किया गया? इसका जवाब अक्सर 'नहीं' में होता है, क्योंकि दोनों विभागों (Missing Cell और Body Recovery) के बीच तालमेल की भारी कमी है।
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कानून क्या कहता है? (The Legal Perspective)
\r\n\r\nभारत का संविधान और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश इस मामले में बहुत स्पष्ट हैं, जिनका पालन यूपी पुलिस द्वारा नहीं किया जा रहा है।
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बचपन बचाओ आंदोलन बनाम भारत संघ (2013)
\r\n\r\nसुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा था कि अगर कोई बच्चा गुमशुदा होता है, तो पुलिस को अनिवार्य रूप से FIR दर्ज करनी चाहिए और उसे तस्करी (Trafficking) का मामला मानकर जांच शुरू करनी चाहिए। लेकिन हकीकत में, पुलिस अक्सर एनसीआर (NCR) या सिर्फ गुमशुदगी की रपट लिखकर पल्ला झाड़ लेती है।
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अनुच्छेद 21 (Article 21)
\r\n\r\nसंविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को 'जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता' का अधिकार देता है। राज्य (State) की यह जिम्मेदारी है कि वह नागरिक की सुरक्षा करे। 1 लाख लोगों का गायब होना सीधे तौर पर राज्य द्वारा अपने संवैधानिक दायित्वों में विफलता है।
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गोल्डन ऑवर (The Golden Hour)
\r\n\r\nगुमशुदगी के मामलों में पहले 24 से 48 घंटे (गोल्डन ऑवर) सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। अगर इस दौरान सही से नाकेबंदी, सीसीटीवी स्कैनिंग और मोबाइल ट्रैकिंग हो जाए, तो व्यक्ति के मिलने की संभावना 80% तक होती है। यूपी पुलिस इसी 'गोल्डन ऑवर' को कागजी कार्रवाई और क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) के विवाद में गंवा देती है।
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तकनीकी विफलता—स्मार्ट पुलिसिंग का खोखलापन
\r\n\r\nहम 21वीं सदी में हैं, जहां 'स्मार्ट सिटी' और 'त्रिनेत्र ऐप' (Trinetra App) के दावे किए जाते हैं। फिर भी जांच के तरीके पुराने क्यों हैं?
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- \r\n चेहरा पहचान तकनीक (Facial Recognition System - FRS): क्या यूपी पुलिस राज्य के सभी रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और टोल प्लाजा के सीसीटीवी फीड को एक केंद्रीकृत FRS से जोड़ पाई है? अगर हां, तो 1 लाख चेहरे क्यों नहीं पहचाने जा सके?\r\n \r\n
- \r\n ZIPNET और CCTNS: जोनल इंटीग्रेटेड पुलिस नेटवर्क (ZIPNET) और क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क (CCTNS) का उद्देश्य था कि पूरे देश का डेटा एक जगह हो। लेकिन यूपी के थानों का डेटा अक्सर अप-टू-डेट नहीं होता, जिससे अगर कोई बच्चा दिल्ली में मिले, तो यूपी पुलिस को पता ही नहीं चलता।\r\n \r\n
- \r\n सोशल मीडिया का कम उपयोग: गुमशुदा लोगों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल करने का कोई ठोस मैकेनिज्म (SOP) पुलिस के पास नहीं है। यह काम अक्सर पीड़ित परिवार खुद करता है।\r\n \r\n
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समाधान की राह—अब क्या होना चाहिए?
\r\n\r\n23 मार्च को जब डीजीपी कोर्ट के सामने पेश हों, तो उन्हें केवल सफाई नहीं, बल्कि एक ठोस कार्ययोजना (Action Plan) पेश करनी होगी। विशेषज्ञों के अनुसार, निम्नलिखित कदम तत्काल उठाए जाने चाहिए:
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- \r\n विशेष कार्य बल (Dedicated Task Force): हर जिले में एक 'एंटी-ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट' (AHTU) को सक्रिय किया जाए जिसका एकमात्र काम सिर्फ गायब लोगों को ढूंढना हो, न कि वीआईपी सुरक्षा या कानून व्यवस्था देखना।\r\n \r\n
- \r\n केन्द्रीयकृत डेटाबेस: सभी लावारिस लाशों और गुमशुदा लोगों का डीएनए और फोटो डेटाबेस एक जगह हो और एआई (AI) की मदद से उनकी मैचिंग की जाए।\r\n \r\n
- \r\n जवाबदेही तय हो: जिस थाने के क्षेत्र से रिकवरी रेट सबसे कम हो, वहां के एसएचओ (SHO) और क्षेत्राधिकारी (CO) की जवाबदेही तय की जाए और उनके सर्विस रिकॉर्ड में इसे दर्ज किया जाए।\r\n \r\n
- \r\n ऑपरेशन स्माइल (Operation Smile) की वापसी: अतीत में चले 'ऑपरेशन स्माइल' और 'ऑपरेशन मुस्कान' जैसे अभियानों को फिर से शुरू करने की जरूरत है, जिसमें पुलिस विशेष अभियान चलाकर बच्चों को ढूंढती थी।\r\n \r\n
- \r\n अंतर-राज्यीय समन्वय (Inter-state Coordination): चूंकि तस्करी के तार दूसरे राज्यों से जुड़े होते हैं, इसलिए यूपी पुलिस को दिल्ली, बिहार, हरियाणा और नेपाल पुलिस के साथ मिलकर 'ज्वाइंट ऑपरेशन' चलाने होंगे।\r\n \r\n
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चुप्पी तोड़नी होगी
\r\n\r\nविक्रमा प्रसाद की हिम्मत ने सिस्टम की नींद तोड़ दी है, लेकिन यह लड़ाई अभी लंबी है। 1,08,300 फाइलें सिर्फ कागज के टुकड़े नहीं हैं; हर फाइल में एक मां का इंतजार, एक पिता का बुढ़ापा और एक बच्चे का बचपन कैद है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जो सवाल उठाया है—"क्या 'गुमशुदा' का मतलब 'हमेशा के लिए खो जाना' है?"—इसका जवाब यूपी पुलिस को देना ही होगा। अगर राज्य सरकार और पुलिस अब भी नहीं जागी, तो जनता का सिस्टम पर से भरोसा पूरी तरह उठ जाएगा। "सब सुरक्षित हैं" के होर्डिंग लगाने से सुरक्षा नहीं आती, सुरक्षा तब महसूस होगी जब वह 1 लाखवां व्यक्ति भी अपने घर सुरक्षित लौट आएगा।
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23 मार्च 2026 की तारीख सिर्फ एक अदालती सुनवाई नहीं है, यह उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था की 'अग्निपरीक्षा' है।
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पाठकों के लिए नोट:
\r\n\r\nअगर आपके आसपास कोई व्यक्ति लापता होता है, तो तुरंत 112 पर कॉल करें और पुलिस से एफआईआर (FIR) की मांग करें। सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार, पुलिस एफआईआर दर्ज करने से मना नहीं कर सकती। जागरूक बनें, सुरक्षित रहें।
Sabse pehle comment karne wale banein.